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अखिलेश यादव ने जो यूपी में किया, उसे तेजस्वी यादव बिहार में क्यों नहीं कर पाए
- Author, चंदन जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना
बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव अपनी चुनावी सभाओं में ‘ए टू ज़ेड’ की बात कर रहे थे.
तेजस्वी यादव अपने पिता के ‘एम-वाय’ (माय) यानी मुस्लिम यादव समीकरण से बाहर निकलकर हर वर्ग के समर्थन की तलाश में थे.
तेजस्वी अपनी पार्टी को ‘माय बाप’ (बीएएपी) यानी बहुजन, अगड़ा, आधी आबादी (महिलाएँ) और पुअर (ग़रीब) की पार्टी भी बता रहे थे.
आरजेडी ने बड़ी संख्या में कुशवाहा उम्मीदवारों को टिकट देकर नीतीश के ‘लव कुश’ वोट बैंक में भी सेंध लगाने की कोशिश की.
बिहार में तेजस्वी ने महंगाई और रोज़गार को बड़ा चुनावी मुद्दा बताया. वो अपने भाषण में अक्सर अपनी पार्टी के लिए वोट मांगते हुए आवाज़ लगा रहे थे, ‘चुपचाप लालटेन छाप’.
रोज़गार और महंगाई के अलावा जातिगत जनगणना, संविधान और आरक्षण जैसे मुद्दे को विपक्षी दलों ने देशभर में बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की थी. चुनाव प्रचार की शुरुआत में ही तेजस्वी यादव ने इन मुद्दों को उठाया था.
दर्जनों चुनावी सभाओं के बाद भी इस लोकसभा चुनाव में तेजस्वी यादव को कोई बड़ी चुनावी सफलता नहीं मिल पाई है जबकि बिहार के ही पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव बीजेपी को बड़ा झटका देने में कामयाब रहे हैं.
अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने यूपी में 62 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और 37 सीटों पर जीत मिली थी. वहीं कांग्रेस को 17 में से छह सीटों पर जीत मिली. जबकि बिहार में तेजस्वी यादव ऐसा नहीं कर पाए.
40 लोकसभा सीटों वाले बिहार के चुनावी नतीजों को देखें तो विपक्षी दलों को यहाँ केवल 9 सीटों पर जीत मिली है, जबकि पूर्णिया सीट से पप्पू यादव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीते हैं.
पटना के एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़ के पूर्व निदेशक डीएम दिवाकर के मुताबिक़ नीतीश कुमार बीजेपी के साथ रहकर भी बीजेपी से अलग दिखते हैं. नीतीश अपनी समाजवादी और सेक्युलर छवि बनाकर रखने में कामयाब रहे हैं.
डीएम दिवाकर कहते हैं, "बिहार में तेजस्वी के कमज़ोर प्रदर्शन के पीछे पहली वजह नीतीश कुमार की ईबीसी और महिला वोट बैंक पर पकड़ दिखती है. वो ऐसी छवि बनाने में सफल रहे हैं कि किसी के साथ भी रहकर बिहार का विकास कर सकते हैं. "
विपक्ष का मोर्चा
बिहार में आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने विपक्षी गठबंधन का मोर्चा संभाला था और अकेले दम पर पूरे विपक्ष के लिए चुनाव प्रचार कर रहे थे.
तेजस्वी यादव ने लोकसभा चुनावों के दौरान अंतिम समय में वीआईपी के मुकेश सहनी को भी इंडिया गठबंधन से जोड़ा था. सहनी समुदाय के वोटरों को जोड़ने के लिए तेजस्वी ने आरजेडी के कोटे की तीन लोकसभा सीटों पर मुकेश सहनी को भी दे दिया था.
उसके बाद ये दोनों नेता एक साथ चुनावी मंच पर नज़र आ रहे थे. चुनाव के नतीजे बताते हैं कि मुकेश सहनी के साथ समझौता तेजस्वी के लिए बहुत फ़ायदे वाला साबित नहीं हुआ.
सहनी न तो अपने उम्मीदवारों को जिता पाए और न ही अपने प्रभाव वाले इलाक़ों में विपक्ष को बड़ा लाभ दिला सके.
लोकसभा चुनावों की घोषणा के पहले नीतीश के महागठबंधन छोड़ने के बाद भी तेजस्वी यादव ने राज्यभर की यात्रा की थी.
उनकी सभाओं में युवाओं की बड़ी भीड़ भी दिखती थी. इसके बावजूद भी तेजस्वी यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल को बिहार में बड़ी चुनावी सफलता नहीं मिल पाई.
हालाँकि साल 2019 के मुक़ाबले इस बार के चुनाव में विपक्ष की जीत बड़ी नज़र आती है. साल 2019 में एनडीए ने एकतरफ़ा जीत हासिल की थी और राज्य की 40 में से 39 सीटों पर कब्ज़ा किया था.
साल 2019 के चुनावों में बीजेपी को राज्य में 24 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट मिले थे और उसने 17 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि उस साल जेडीयू ने भी 22 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट पाए थे और 16 सीटों पर कब्ज़ा किया था.
क्या कहते हैं आँकड़े
साल 2019 के लोकसभा चुनावों में बिहार में राष्ट्रीय जनता दल कोई सीट नहीं जीत पाई थी और उसे महज़ 15% के क़रीब वोट मिले थे.
लेकिन इस बार के चुनावों में आरजेडी ने केवल चार सीटें जीतनें में सफल रही है बल्कि उसे 22% से ज़्यादा वोट भी मिला है.
हालाँकि तेजस्वी यादव इस वोट को सीटों में बदलने में पूरी तरह कामयाब नहीं हो सके. बिहार की 40 लोकसभा सीटों में आरजेडी ने सबसे ज़्यादा 23 सीटों पर चुनाव लड़ा था.
यही नहीं तेजस्वी यादव के नेतृत्व में 9 सीटों पर चुनाव लड़कर काँग्रेस भी 3 सीटें जीतने में कामयाब रही है और सीपीआई(एमएल) तीन सीटों पर चुनाव लड़कर दो सीटों पर कब्ज़ा करने में सफल रही है.
यानी विपक्ष के वोट का जितना फ़ायदा कांग्रेस या सीपीआई (एमएल) को मिला, उतना फ़ायादा तेजस्वी की पार्टी आरजेडी को नहीं मिला.
वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, “बिहार में आरजेडी को चार सीटें मिलना भी उसके लिए बड़ी सफलता है क्योंकि उसके पास राज्य में एक भी सीट नहीं थी. आरजेडी राज्य में कुशवाहा वोट को तोड़ने में सफल रही है. गांवों के युवाओं में भी केंद्र सरकार को लेकर गुस्सा था, जिसका फायदा आरजेडी को मिला है.”
साल 2020 में बिहार विधानसभा चुनावों में भी तेजस्वी यादव अपने पिता लालू यादव के बिना चुनाव प्रचार में उतरे थे. उन चुनावों में आरजेडी ने 23 फ़ीसदी वोट के साथ 75 सीटों पर चुनाव जीता था और 243 सीटों की बिहार विधानसभा में आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी थी.
यहीं सेतेजस्वी यादव का राजनीतिक क़द भी बढ़ा था. फिर साल 2022 में बिहार की महागठबंधन सरकार में तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री भी बने थे.
उस सरकार में बिहार में युवाओं को क़रीब चार लाख सरकारी नौकरी देने का श्रेय तेजस्वी और आरजेडी ने ख़ुद को दिया था.
‘अकेले पड़ गए तेजस्वी यादव’
वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण का मानना है कि बिहार में विपक्ष के कमज़ोर प्रदर्शन के पीछे तेजस्वी का अकेले पड़ जाना एक वजह है.
चुनाव प्रचार में तेजस्वी यादव को किसी बड़े नेता का साथ नहीं मिला जबकि उत्तर प्रदेश में राहुल और प्रियंका गांधी ने भी जमकर प्रचार किया.
नचिकेता नारायण कहते हैं, “चुनावी माहौल बनाने वाले अरविंद केजरीवाल झारखंड पहुँच गए लेकिन बिहार नहीं आए. बिहार में विपक्षी दलों के बीच सीटों का बँटवारा भी बेहतर हो सकता था. लालू और आरजेडी को इसका भी मूल्यांकन करना होगा कि वो लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को दरकिनार नहीं कर सकते.”
बिहार में विपक्षी दलों के बीच सीटों का बँटवारा शुरू से ही सवालों के घेरे में रहा था. इस लिहाज से पूर्णिया सीट की काफ़ी चर्चा हुई थी, जहाँ से कांग्रेस के पप्पू यादव चुनाव लड़ना चाहते थे.
लालू प्रसाद यादव कांग्रेस के लिए यह सीट छोड़ने को तैयार नहीं हुए थे. बाद में पप्पू यादव न केवल इस सीट निर्दलीय चुनाव जीतने में सफल रहे, बल्कि आरजेडी की बीमा भारती अपनी ज़मानत तक नहीं बचा पाईं.
हमने बिहार में कई सीटों पर लालू और आरजेडी के समर्थकों से बात की थी और पाया था कि पूर्णिया से पप्पू यादव और सिवान सीट पर हेना शहाब को लेकर उन्हें आरजेडी से शिकायत थी. यानी इन दो नामों का असर बिहार की कई सीटों पर देखा गया.
वोट बँटने की वजह से आरजेडी न केवल सिवान की सीट हार गई बल्कि उसे शिवहर और सारण की सीट पर भी बहुत कम अंतर से हार का सामना करना पड़ा.
सारण से लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य चुनाव लड़ रही थीं. उनके सामने बीजेपी के बड़े नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी चुनाव मैदान में थे.
टिकट बँटवारे पर सवाल
साल 2004 में हुए लोकसभा चुनावों में बिहार की 22 सीटों पर आरजेडी ने कब्ज़ा किया था. उस साल कांग्रेस को तीन और एलजेपी को तीन सीटों पर जीत मिली थी.
साल 2009 के लोकसभा चुनावों में लालू और रामविलास कांग्रेस के लिए ज़्यादा सीट छोड़ने को तैयार नहीं थे. इससे बिहार में बीजेपी विरोधी दलों में टूट हुई और लालू की पार्टी केवल चार सीटों पर सिमट गई, जबकि रामविलास पासवान ख़ुद हाजीपुर से चुनाव हार गए.
उसके बाद से ही लालू प्रसाद यादव की आरजेडी बिहार में लोकसभा चुनावों में बड़ी सफलता के इंतज़ार में है.
साल 2014 के चुनावों में भी आरजेडी को महज़ चार सीटों पर जीत मिली थी और पिछले लोकसभा चुनावों में उसका खाता तक नहीं खुल पाया था.
इस बार के चुनाव में भी बिहार में विपक्षी दलों के बीच सीटों के बँटवारे पर शुरू से ही सवाल उठ रहे थे. विपक्षी दलों के बीच सीटों के बँटवारे की आधिकारिक घोषणा के पहले ही आरजेडी ने कई उम्मीदवारों को टिकट भी दे दिया था.
डीएम दिवाकर कहते हैं, “विपक्ष ने उम्मीदवारों के चयन में भी ग़लती की है. मसलन झंझारपुर सीट से विपक्ष के उम्मीदवार सुमन कुमार महासेठ थे, जिनका संबंध आरएसएस से रहा है. इसलिए मुसलमानों ने विपक्ष को वोट नहीं दिया. यहाँ से आरजेडी के विधायक गुलाब यादव बीएसपी से खड़े हो गए और यादवों का वोट भी बँट गया.”
आरजेडी सीटों का बँटवारा और बेहतर तरीक़े से कर सकता था. इस मामले में बड़ा सवाल पूर्णिया सीट को लेकर उठा, जहाँ से चुनाव लड़ने के लिए पूर्व सांसद पप्पू यादव लंबे समय से तैयारी कर रहे थे.
उन्होंने अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया था लेकिन आरजेडी पूर्णिया की सीट कांग्रेस के लिए छोड़ने को राज़ी नहीं हुई. आख़िरकार पप्पू यादव ने कांग्रेस से बग़ावत कर निर्दलीय ही इस सीट पर जीत हासिल की.
आरोप यह लगाया जाता है कि कांग्रेस को ऐसी कई सीटों से दूर रखा गया है, जहाँ से वह अच्छा मुक़ाबला कर सकती थी. इस लिहाज से बिहार की वाल्मीकि नगर सीट भी काफ़ी अहम है.
इस सीट पर साल 2020 में हुए लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस के प्रवेश मिश्रा महज़ 20 हज़ार वोट से हारे थे. लेकिन इस बार यह सीट आरजेडी ने अपने पास रख ली और यहाँ उसकी हार भी हुई.
बिहार की मधुबनी सीट भी कांग्रेस को नहीं दी गई. यहाँ से कांग्रेस नेता शकील अहमद आते हैं. साल 2019 के लोकसभा चुनावों में भी यह सीट कांग्रेस को नहीं मिली थी, तब शक़ील अहमद ने इस सीट से निर्दलीय ही चुनाव लड़ा था और दूसरे नंबर पर रहे थे जबकि आरजेडी समर्थित उम्मीदवार को काफ़ी कम वोट मिले थे.
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