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अयोध्या में बीजेपी उम्मीदवार को मात देने वाले अवधेश प्रसाद का राजनीतिक सफ़र
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अयोध्या से
अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद फ़ैज़ाबाद लोकसभा सीट से बीजेपी को हरा देने वाले 79 वर्षीय दलित नेता अवधेश प्रसाद की चर्चा हर तरफ़ हो रही है.
अयोध्या के बाहर, अधिकतर लोग फ़ैज़ाबाद सीट पर बीजेपी की अप्रत्याशित हार से हैरान हैं.
लेकिन मिल्कीपुर से वर्तमान विधायक अवधेश प्रसाद की राजनीति को क़रीब से देखने वाले अंदाजा लगा रहे थे कि इस बार अयोध्या में राजनीतिक उलटफेर हो सकता है.
अयोध्या में बहुत से लोग मानते हैं कि बीजेपी प्रत्याशी लल्लू सिंह की उदासीनता और स्थानीय मुद्दों की अनदेखी बीजेपी की हार की बड़ी वजह है.
लेकिन ऐसे लोग भी कम नहीं है जिन्हें लगता है कि यहां बीजेपी हारी नहीं है बल्कि अवधेश प्रसाद की ज़मीनी राजनीति ने उसे हराया है.
अवधेश प्रसाद से हमारी मुलाक़ात पूर्वांचल एक्सप्रेस वे पर हुई. वो मिल्कीपुर विधानसभा क्षेत्र के एक गांव में एक शादी में शामिल होकर लौट रहे थे.
अवधेश प्रसाद कहते हैं, "हमारे एक क़रीबी की बिटिया की शादी थी. हमने वादा किया था, कहीं भी हों, कितने भी व्यस्त हों, आएंगे ज़रूर. और हमने वादा पूरा किया. हमने क्षेत्र की जनता से किया हर वादा पूरा किया है."
नौ बार विधायक, छह बार मंत्री
79 साल के अवधेश प्रसाद मज़बूत क़दमों से चलते हैं. उन्हें देखकर उम्र का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है. उनके साथ चल रहे अधिकतर कार्यकर्ता युवा हैं.
सिर पर लाल टोपी, गले में लाल गमछा और सफ़ेद कुर्ती के साथ धोती पहने छोटे क़द के अवधेश प्रसाद दूर से देखने पर मुलायम सिंह यादव जैसे दिखते हैं.
नौ बार विधायक और छह बार राज्य सरकार में मंत्री रहे अवधेश प्रसाद राजनीति में अचानक नहीं आए थे. ये उनका सोचा समझा क़दम था.
अपने बचपन का एक क़िस्सा सुनाते हुए अवधेश प्रसाद कहते हैं, "दसवीं पास करने के बाद हम एक सांसद के पास अपनी फ़ीस माफ़ करवाने के लिए हस्ताक्षर करवाने गए थे. उन सांसद जी का व्यवहार अपमानजनक था."
अवधेश प्रसाद कहते हैं, "मैं युवा था, बहुत अपमानित और क्रोधित महसूस किया. मैं वहीं बैठा और एक काग़ज़ पर लिखा- अवधेश प्रसाद- एलएलबी, एडवोकेट, विधायक, सांसद- गृह मंत्री. मैंने उस दिन अपने लिए तय किए सभी लक्ष्य हासिल कर लिए हैं. बस एक रह गया है."
31 जुलाई, 1945 को सुरवारी गांव के एक साधारण किसान परिवार में पैदा हुए अवधेश प्रसाद ने लखनऊ यूनिवर्सिटी से एलएलबी किया और कानपुर के डीएवी कॉलेज से एमए की डिग्री ली.
अवधेस प्रसाद ने बीए, एमए करने के बाद 1968 में क़ानून की डिग्री पूरी की.
राजनीतिक सक्रियता
अवधेश प्रसाद बताते हैं, "एलएलबी का आख़िरी पेपर देने के बाद मैं सीधे फ़ैज़ाबाद कचहरी पहुंचा था. वहां सरकार बनाम साहब का एक केस मेरे पास आया. मैंने मुवक्किल से कहा कि अभी मुझे डिग्री नहीं मिली है, लेकिन उसने ज़िद की की मैं उनकी तरफ़ से मुक़दमा दायर करूं."
"उस मुवक्किल ने 12 रूपये फ़ीस दी थी. अभी मुझे डिग्री नहीं मिली थी, मैं एक बड़े वकील के पास गया और वो 12 रुपये देकर मुक़दमा फ़ाइल करने के लिए कहा. उन्होंने दो रुपये अपने मुंशी को दिए और दस रुपये मेरे मना करने के बावजूद मुझे लौटा दिए. ये क़ानून की पढ़ाई से मेरी पहली कमाई थी."
अवधेश प्रसाद बताते हैं कि राजनीति में आना उनका लक्ष्य था और पढ़ाई के दौरान ही वह राजनीति में सक्रिय हो गए थे.
1968 में उन्होंने वकालत शुरू कर दी थी और इस दौरान वो राजनीतिक रूप से भी सक्रिय थे.
उन्होंने पहला चुनाव 1974 में लड़ा और 324 वोट से हार गए. अगले कुछ सालों में देश में आपातकाल लगा.
लोकनायक जय प्रकाश ने आपातकाल के विरोध में आंदोलन खड़ा किया. अवधेश प्रसाद भी इसमें शामिल हो गए.
आपातकाल के दौरान देश के बड़े नेताओं को गिरफ़्तार किया गया था. अवधेश प्रसाद भी इस दौरान लखनऊ और फ़ैज़ाबाद की जेल में रहे.
आपातकाल में जेल में रहने के दौरान ही अवधेश प्रसाद की मां का निधन हो गया. मां को याद करते हुए उनकी आवाज़ रूंध जाती है.
अवधेश प्रसाद कहते हैं, "चार दिन तक मेरी मां की लाश पड़ी रही लेकिन मैं अंतिम दर्शन के लिए नहीं जा सका. मैं अपने पिता के भी अंतिम दर्शन नहीं कर सका था. अमेठी में संजय गांधी बनाम शरद यादव चुनाव हो रहा था. चौधरी चरण सिंह ने हमें अमेठी में लगा दिया था- कहा था- तुम अपने गांव ना जाना, इस दौरान मेरे पिता का देहांत हुआ. मैं काउंटिंग एजेंट था, तब बैलट पेपर से मतदान होता था, छह-सात दिन तक गिनती चलती थी. काउंटिंग से एक दिन पहले मेरे पिता का निधन हो गया था, लेकिन मैं जा नहीं सका."
अवधेश प्रसाद कहते हैं कि उन्होंने अपनी राजनीति और वकालत को साथ-साथ जारी रखा.
1977 में उन्होंने पहली बार विधायक का चुनाव जीता और आगे चलकर नौ बार विधायक बनें.
राजनीतिक क़द
अयोध्या से हैरान करने वाली जीत के बाद अवधेश प्रसाद का राजनीतिक क़द बढ़ गया है.
अवधेश प्रसाद नपे तुले अंदाज़ में ये भी दावा करते हैं कि उनके सामने कोई भी होता वो हार जाता.
वो दावा करते हैं कि अखिलेश यादव ने पहले ही उन्हें अयोध्या से चुनाव लड़ाने का मन बना लिया था.
अवधेश प्रसाद कहते हैं, "अखिलेश यादव ने अक्तूबर में हमसे में कहा था कि विधायक जी आपको बड़ा आदमी बनाएंगे, आप देखिएगा बीबीसी लंदन भी आपके पास इंटरव्यू लेने आएगा. लेकिन उन्होंने ये नहीं कहा था कि हमें अयोध्या से टिकट देंगे."
अवधेश प्रसाद कहते हैं, "ये हमारी नहीं, अयोध्या की महान जनता की जीत है, अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यहां से खड़े होते तो हार जाते, क्योंकि जनता ने ठान लिया है कि अहंकार की राजनीति को हराना है."
फ़ैज़ाबाद में बीजेपी के प्रत्याशी लल्लू सिंह को चार लाख 99 हज़ार से ज़्यादा मत मिले हैं और अयोध्या विधानसभा सीट से वे चार हज़ार की बढ़त भी हासिल करने में कामयाब रहे.
हालांकि वे यह चुनाव 54 हज़ार मतों से हार गए.
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बीजेपी यहां मुक़ाबले में नहीं थी, किसी बड़े उम्मीदवार के मैदान में होने से तस्वीर का रूख़ बदल भी सकता था.
अवधेश प्रसाद कहते हैं, "मेरे ख़िलाफ़ लल्लू सिंह नहीं, बल्कि स्वयं मोदी चुनाव लड़ रहे थे. मुख्यमंत्री यहां बार-बार आ रहे थे, प्रधानमंत्री रोड शो कर रहे थे, यहां तक कि राष्ट्रपति का कार्यक्रम भी यहां रखा गया. बीजेपी ने पूरा ज़ोर यहां प्रचार पर लगाया."
जीत की वजहों को लेकर महंगाई, बेरोज़गारी और पेपरलीक जैसे मुद्दों का ज़िक्र करते हुए अवधेश प्रसाद कहते हैं, "गांव-गांव में जनता त्रस्त है, लेकिन कोई उनकी सुनने वाला नहीं हैं. बीजेपी की हार से सिर्फ़ वही लोग हैरान हैं जो देश की ज़मीनी हक़ीक़त से दूर हैं."
अवधेश प्रसाद कहते हैं, "मैंने अपने जीवन में 11 चुनाव लड़े हैं. ये मेरा पहला चुनाव था, जिसे जनता लड़ रही थी."
79 साल के अवधेश प्रसाद मानते हैं कि अभी राजनीति में उन्हें और लंबा सफर तय करना है.
अवधेश कहते हैं, "हम देश को राष्ट्रपति महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर, लोहिया, चौधरी चरण सिंह के सपनों का देश बनाना चाहते हैं. आज देश में महंगाई, भ्रष्टाचार, और बेरोज़गारी है. जब तक ये लक्ष्य हासिल नहीं होगा, जब तक सांस चलेगी, राजनीति में हम सक्रिय रहेंगे."