केरल में बीजेपी की जीत, सीपीएम या कांग्रेस के लिए ख़तरे की घंटी

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

बीजेपी ने केरल में पहली बार त्रिशूर सीट पर जीत हासिल करके सबको चौंका दिया है.

बीजेपी ने काफ़ी तादाद में ईसाई समुदाय के वोट हासिल करके और लेफ़्च फ्रंट के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाकर ये जीत हासिल की है.

बीजेपी के उम्मीदवार, अभिनेता से राजनेता बने सुरेश गोपी ने सीपीआई के प्रत्याशी वीएस सुनील कुमार पर 74 हज़ार 686 वोट से जीत हासिल की.

आम तौर पर कामयाब रहने वाले कांग्रेस के के मुरलीधरन इस बार तीसरे नंबर पर रहे. इसके बाद मुरलीधरन ने एलान किया कि वो फ़िलहाल राजनीति से संन्यास लेना चाहेंगे.

लेकिन, इससे भी अहम बात ये है कि केरल की लगभग दर्जन भर विधानसभा सीटों में बीजेपी उम्मीदवार को सबसे ज़्यादा वोट मिले.

इससे सीपीएम की अगुवाई वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की चिंताएं बढ़ गई हैं.

बीजेपी ने इस बार केरल में लगभग 17 फ़ीसद वोट हासिल किए, जो पिछली बार की तुलना में चार प्रतिशत अधिक हैं.

केरल में बीजेपी की ये सफलता दिखाती है कि तिरुवनंतपुरम सीट पर कांग्रेस के शशि थरूर जैसे नेताओं को केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर से कितनी बड़ी चुनौती झेलनी पड़ी.

शशि थरूर ने राजीव चंद्रशेखर के ऊपर महज़ 16 हज़ार 77 वोटों से जीत हासिल की. जबकि 2019 में थरूर इसी सीट पर एक लाख से ज़्यादा वोटों से जीते थे.

इसी से पता चलता है कि बीजेपी ने केरल में लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस की अगुवाई वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (यूडीएफ) के वोट बैंक में कितनी गहरी सेंध लगाई है.

एक और केंद्रीय मंत्री वी मुरलीधरन का अट्टिंगल सीट पर प्रदर्शन भी काफ़ी अच्छा रहा है. हालांकि, अंतिम दौर की वोटिंग के बाद मुरलीधरन यूडीएफ और एलडीएफ के उम्मीदवारों के बाद तीसरे स्थान पर रहे थे.

केरल में इस बार यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने 20 में से 18 सीटें जीती हैं, जो 2019 की तुलना में एक कम है. अलाथुर सीट पर लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के के राधाकृष्णन ने जीत हासिल की.

केरल यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर और राजनीतिक पर्यवेक्षक प्रोफ़ेसर जे प्रभाष ने बीबीसी से कहा कि, ‘सवर्ण तबका और ऊंची जातियों के ईसाई कह रहे हैं कि त्रिशूर में उन्होंने बीजेपी को नहीं, बल्कि सुरेश गोपी को वोट दिया है. लेकिन हक़ीक़त ये है कि अब ईसाई समुदाय के लिए बीजेपी अछूत नहीं रह गई है. इसका एक मतलब ये भी है कि सीपीएम के अलावा और नायर हिंदू वोट बैंक में बीजेपी ने सेंध लगा दी है.’'

हिंदुओं को एकजुट करने की बीजेपी की कोशिश सफल रही

एलावा और नायर समुदाय के वोटों का लेफ्ट फ्रंट से छिटकना काफ़ी अहम है. 2014 से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी हिंदुओं को एकजुट करने में जुटी हुई है. मोदी ने एलावा, नायरों और मछुआरा समुदाय की तीन अलग-अलग बैठकों को संबोधित किया था.

लेकिन, जब हिंदू होने के नाते इन तीनों समुदायों को एकजुट करने के लिए एक समिति का गठन किया गया था, तब सबके बीच गंभीर मतभेद उभरे थे. एकजुटता की ये कमी भी इस बात का संकेत है कि इन समुदायों पर लेफ्ट फ्रंट की कितनी मज़बूत पकड़ है.

जब 2016 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी कोई असर छोड़ पाने में नाकाम रही थी, तब एक राजनीतिक टिप्पणीकार ने बीबीसी से कहा था कि, ‘ये बात सबको बख़ूबी पता है कि केरल में सीपीएम को एक हिंदू पार्टी माना जाता है.’

क्या मुख्यमंत्री मुसलमानों का तुष्टीकरण कर रहे थे?

इन चुनावों में कुछ समुदायों ने बेहद अहम राजनीतिक मोड़ पर बीजेपी को वोट देने का फ़ैसला किया है.

हाल के दिनों में मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने मुस्लिम समुदाय के धार्मिक नेताओं के साथ बातचीत करने की पहल की थी. इसे लेकर भी लोगों ने हैरानी जताई थी.

असल में पिनराई विजयन इन बैठकों के ज़रिए मुस्लिम समुदाय को ये यक़ीन दिलाना चाहते थे कि उनके हित, सबसे ज़्यादा सीपीएम की अगुवाई वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के साथ रहने में ही महफ़ूज़ रहेंगे, न कि कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ के साथ जाने में.

हालांकि, नागरिकता संशोधन क़ानून (सीसीडी-2) के ख़िलाफ़ सीपीएम की मुहिम से ईसाई समुदाय भी असहज महसूस कर रहा था.

एक राजनीतिक विश्लेषक अजित श्रीनिवासन ने बीबीसी को बताया कि अब पक्के तौर पर ये बात नहीं कही जा सकती है कि 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों में एलावा, दोबारा एलडीएफ को वोट देंगे.

अजित श्रीनिवासन ने कहा कि, ‘बीजेपी, हिंदू वोटों को एकजुट करने के लिए पुरज़ोर कोशिश कर रही है. इसके अलावा पिनराई विजयन के ऊपर लगे तमाम आरोपों की वजह से उनके ख़िलाफ़ लोगों में नाराज़गी भी है.’

कुल मिलाकर, केरल में बीजेपी के एक सीट जीतने से राज्य के जटिल चुनावी समीकरण बिल्कुल बदल गए हैं.

राज्य में अब तक मुख्य मुक़ाबला कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ और सीपीएम के नेतृत्व वाले एलडीएफ के बीच हुआ करता था.

पर, त्रिशूर सीट से बीजेपी की जीत के बाद अब केरल में चुनावी मुक़ाबला त्रिकोणीय हो जाने की संभावना है.

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