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लोकसभा चुनाव 2024: क्या बीजेपी दक्षिण भारत में भगवा फहराने में सफल रही?
- Author, शारदा वी
- पदनाम, बीबीसी तमिल संवाददाता
अठारहवीं लोकसभा चुनाव के नतीजे दक्षिण भारत के राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देते हैं.
दक्षिण भारत में कमज़ोर माने जाने वाली बीजेपी ने इस बार कर्नाटक और तेलंगाना के साथ आंध्र प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन किया है.
यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के गढ़ कहे जाने वाले केरल में भी बीजेपी ने पहली बार एक सीट जीत कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है.
हालांकि तमिलनाडु बीजेपी के लिए काफी चैलेंजिंग रहा.
तमिलनाडु में आक्रमक चुनाव प्रचार के बाद भी बीजेपी और उसके सहयोही दल एक भी सीट नहीं जीत सके.
तमिलनाडु में बीजेपी को एक भी सीट नहीं
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तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम(डीएमके) के नेतृत्व वाली इंडिया गठबंधन ने राज्य की सभी 39 सीटें जीती है. गठबंधन ने केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी की एकमात्र सीट पर भी जीत दर्ज की है.
कांग्रेस ने तमिलनाडु और पुडुचेरी में 10 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. इन सभी दस सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली है.
चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कई बार तमिलनाडु पहुंचे.
लेकिन इसके बाद भी बीजेपी राज्य में एक सीट भी नहीं जीत सकी. हालांकि बीजेपी राज्य के 10 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही.
वरिष्ठ पत्रकार अरुण जनार्दन कहते हैं, "इस बार भाजपा के वोट शेयर में बढ़ोतरी देखने को मिलेगी, क्योंकि पार्टी ने राज्य में अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा है. हालाँकि, पार्टी और उसके बड़े नेताओं के काफ़ी प्रयास के बाद भी बीजेपी राज्य में छाप छोड़ने में सफल नहीं रही."
बीजेपी के पूर्व सहयोगी अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) ने राज्य के क़रीब 29 सीटों पर दूसरा स्थान प्राप्त किया है. वहीं, दूसरे लोकसभा सीटों पर पार्टी तीसरे और चौथे स्थान पर रही.
एआईएडीएमके की लगातार तीसरी हार
एआईएडीएमके की पूर्व अध्यक्ष और सीएम जयराम जयललिता का निधन 2016 में हुआ था.
राज्य की दूसरी बड़ी पार्टी जयललिता के निधन के बाद लगातार तीसरी बार हार का सामना कर रही है.
फ़िलहाल पार्टी का पूरा ध्यान 2026 में होने वाली विधानसभा चुनाव पर है.
एआईएडीएमके ने 2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य की 39 में से 37 सीटें जीती थीं.
वहीं, 2019 के लोकसभा चुनाव में डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन ने राज्य के सभी 39 सीटें जीती थीं.
कर्नाटक में बीजेपी का दबदबा बरकरार है?
बीजेपी ने कर्नाटक की 28 लोकसभा सीटों में से करीब 17 सीटें हासिल कर राज्य में अपना दबदबा बरकरार रखा है.
पार्टी ने 2019 में 28 में से 25 सीटें जीती थीं. पिछली चुनाव के मुकाबले राज्य में बीजेपी की सीटें कम हुई हैं.
ग्यारह महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए बड़ा झटका था.
कांग्रेस ने कर्नाटक में अकेले बहुमत के साथ सरकार बनाई थी. ऐसे समय में, जब यह माना जा रहा था कि भाजपा राज्य में अपनी पकड़ खो रही है, लेकिन बीजेपी ने खुद को राज्य में कायम रखा है.
वरिष्ठ पत्रकार विजय ग्रोवर कहते हैं, "कर्नाटक में चुनाव हमेशा जाति के इर्द-गिर्द घूमता है. पिछले विधानसभा चुनाव में प्रमुख लिंगायत समुदाय से आने वाले बीएस येदियुरप्पा को दरकिनार कर दिया गया था. बीजेपी को इसका परिणाम भुगतना पड़ा."
"इससे सबक सीखते हुए बीजेपी ने येदियुरप्पा को कर्नाटक का प्रदेश अध्यक्ष बनाया. इससे पार्टी को 2024 लोकसभा चुनाव में फ़ायदा मिला है. हालांकि बीजेपी के एमपी राज्य में कोई भी विकास परियोजना लाने में विफल रहे."
विजय ग्रोवर बताते हैं, "कांग्रेस ने पांच गारंटी देने का वादा किया था, जिसे उन्होंने अपनी सरकार के पहले एक साल में पूरा कर दिया. कांग्रेस के पास पूरा करने के लिए कोई और वादा नहीं बचा था."
"उच्च वर्ग और उत्तर भारतीय आबादी वाले शहरी लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा ने 2 लाख से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की है. तटीय कर्नाटक में भाजपा धर्म के आधार पर वोट बैंक का ध्रुवीकरण करने में सक्षम रही. यहां लोगों ने जाति पर नहीं बल्कि हिंदू और मुस्लिम के तौर पर वोट किया."
भाजपा की सहयोगी दल जनता दल (सेक्युलर) ने दो सीटें जीत कर भाजपा की स्थिति को और मजबूत कर दिया है.
आध्र प्रदेश में भाजपा कहां खड़ी है?
25 लोकसभा सीटों वाली आंध्र प्रदेश ने एनडीए के पक्ष ने भारी जनादेश दिया है. यहां एनडीए को 21 सीटें मिली हैं. इससे पता चलता है कि वाईएसआर कांग्रेस के समर्थन में कमी आई है. यह राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में व्यापक बदलाव को दर्शाता है.
भाजपा सहयोगी और पूर्व सीएम चंद्र बाबू नायडू के नेतृत्व वाली तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) ने राज्य की 16 सीटों पर जीत दर्ज की है. वहीं, भाजपा को तीन और गठबंधन के दूसरे सहयोगी जन सेना पार्टी (जेएसपी) को राज्य में दो सीटें मिली हैं.
वरिष्ठ पत्रकार सुमित भट्टाचार्य कहते हैं, "आंध्र प्रदेश में कोई मोदी फैक्टर नहीं है. वहां के लोग वाईएसआर कांग्रेस से नाखुश थे. आंध्र में टीडीपी को विधानसभा और लोकसभा चुनाव में सत्ता विरोधी वोट मिले हैं. बीजेपी को इस चुनाव में पूर्ण बहुमत नहीं मिला है. इस जीत से चंद्रबाबू को भाजपा से निगोशिएट करने में मदद मिलेगी."
उन्होंने कहा, "साल 2019 के लोकसभा चुनाव में जो हुआ, यह उसका उलटा है. यह ध्यान देने वाली बात है कि पवन कल्याण की जेएसपी ने 2 लोकसभा और 21 विधानसभा सीटों चुनाव लड़ा था. उनकी पार्टी इन सभी सीटों पर जीत हासिल की है."
तेलंगाना में बीजेपी और कांग्रेस में टक्कर
तमिलनाडु के राजनीति विज्ञान के जानेमाने प्रोफ़ेसर रामू मणिवन्नन कहते हैं, "नतीजों से पता चलता है कि बीजेपी ने दक्षिण में अपनी छाप छोड़ी है. पार्टी को अकेले बहुमत नहीं मिलने की वजह से सरकार बनाने के लिए दक्षिणी राज्यों सहित अपने सहयोगियों पर निर्भर रहना होगा."
"भाजपा अब दक्षिण विरोधी पार्टी नहीं रह सकती. लोग स्थिर सरकार को सत्तावादी सरकार के रूप में समझते हैं, जो ग़लत है. हम एक अच्छी सरकार चाहते हैं."
तेलंगाना में बीजेपी और कांग्रेस में कड़ी टक्कर देखने को मिली. बीजेपी और कांग्रेस ने 17 लोकसभा सीटों वाले राज्य में 8-8 सीटें जीती हैं. पिछली बार की तुलना में बीजेपी को तेलंगाना में 4 सीटें ज़्यादा मिली हैं.
एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी हैदराबाद से लगातार पांचवीं बार सांसद बने हैं.
ये चुनाव पारंपरिक रूप से भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के प्रभुत्व वाले तेलंगाना में बदलाव का संकेत है. बीआरएस को पहले तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के नाम से जाना जाता था.
वरिष्ठ पत्रकार एमवीए शास्त्री कहते हैं, "कई लोकसभा सीटों पर बीआरएस के वोट बीजेपी के खाते में गए हैं और तेलंगाना इसका गवाह बना है. मलकाजगिरी में भाजपा उम्मीदवार एटाला राजेंद्रन ने अच्छी बढ़त जीत दर्ज की है. वे टीआरएस की सरकार में मंत्री रह चुके हैं."
वे कहते हैं कि "जय श्री राम के नारे और मोदी के करिश्मे के साथ बीजेपी के पास पहले से ही एक वोट बैंक है. बीआरएस के वोटों ने इसे और मजबूत किया है. बीआरएस जिसके पास लगभग 35 फ़ीसदी वोट शेयर है, इस बार कम हुआ है."
केरल में भी बीजेपी की एंट्री
केरल में एग्जिट पोल की भविष्यवाणी सही साबित हुई. केरल, कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ का गढ़ साबित हुआ.
यह राज्य दो पक्षीय चुनाव के लिए जाना जाता है. यहां यूडीएफ और एलडीएफ के बीच मुकाबला होता है. इस बार कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने अधिकतर सीटें जीती हैं.
बीजेपी को पहली बार केरल में एक सीट मिली है.
अभिनेता से नेता बने सुरेश गोपी ने त्रिशूर लोकसभा क्षेत्र से 70,000 से अधिक वोटों के भारी अंतर से जीत हासिल की है.
सत्ताधारी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी सिर्फ एक सीट जीतने में कामयाब हो पाई. सीपीएम उम्मीदवार ने अलाथुर में 20,000 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की है.
वरिष्ठ पत्रकार अरुण जनार्दनन कहते हैं, "इस बार केरल में सत्ता विरोधी लहर और दिल्ली में कांग्रेस का महत्व दो मुख्य फैक्टर थे. केरल में हिंदू आबादी 50 फ़ीसदी से ज़्यादा है. अल्पसंख्यक ख़ासकर मुस्लिम परंपरागत रूप से कांग्रेस को वोट देते रहे हैं."
"सत्तारूढ़ सीपीएम भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रही है और पिनाराई विजयन की सरकार और पार्टी पर पूरी पकड़ है. करीब 12 लोकसभा क्षेत्रों में कांग्रेस के उम्मीदवारों ने एक लाख से अधिक वोटों के अंतर से जीत हासिल की है."