सत्ता का जुनून और 'त्रासदी', कहानी ईरान की शहज़ादी अशरफ़ पहलवी की

अशरफ़ पहलवी

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इमेज कैप्शन, शहज़ादी अशरफ़ पहलवी ईरान के शाह की जुड़वां बहन थीं
    • Author, वक़ार मुस्तफ़ा
    • पदनाम, पत्रकार और शोधकर्ता

"तुम मर्द हो या चूहा?" — यह सवाल किसी और ने नहीं बल्कि ईरान के शाह से उनकी जुड़वां बहन शहज़ादी अशरफ़ पहलवी ने पूछा था.

मई 1972 के एक अमेरिकी ख़ुफ़िया दस्तावेज़ 'सेंटर्स ऑफ़ पावर' के अनुसार जब अमेरिकी राजदूत ने ईरान के शाह को यह सलाह दी कि वह राजनीति से अलग होकर राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बन जाएँ तो उन्होंने एक हल्की-सी मुस्कुराहट के साथ कहा, "अशरफ़ ने कल ही मुझसे पूछा था कि मैं मर्द हूँ या चूहा?"

स्टीफ़न किन्ज़र ने अपनी किताब 'ऑल द शाह्ज़ मेन' में लिखा है, "शहज़ादी अशरफ़ की अपने भाई को डाँटने की कहानियाँ सबकी ज़बान पर थीं."

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रज़ा पहलवी ने ईरान पर राज करने वाले इस वंश की स्थापना की थी. एक सैन्य कमांडर रहे रज़ा पहलवी ने 15 दिसंबर 1925 को शाह का ताज अपने सिर पर रखा था.

इन्हीं रज़ा पहलवी और ताजुल-मुलूक के यहाँ, अपने भाई मोहम्मद रज़ा की पैदाइश के पाँच घंटे बाद, 26 अक्तूबर 1919 को शहज़ादी अशरफ़ मुलूक का जन्म हुआ था. हालाँकि उस समय शहज़ादी के पिता महज़ एक सैन्य कमांडर थे.

बहरहाल, बाद में रज़ा पहलवी के बेटे और शहज़ादी के भाई मोहम्मद रज़ा ईरान के शाह बने.

अर्से तक छिपाकर रखी गई अमेरिका की ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए की रिपोर्ट में कहा गया कि रज़ा में निर्णय लेने की क्षमता नहीं थी. यह रिपोर्ट पहली बार सन 2000 में न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी थी.

इस दस्तावेज़ में लिखा है कि रज़ा पहलवी के व्यक्तित्व में जो गुण थे, वे सब उनके बेटों को नहीं मिल पाए.

हिजाब छोड़ने वाली महिलाओं में सबसे आगे

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इमेज कैप्शन, अशरफ़ पहलवी पारंपरिक हिजाब त्यागने वाली पहली ईरानी महिलाओं में से एक थीं
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उस दस्तावेज़ के मुताबिक गद्दी पर बैठने के शुरुआती दिनों में ही मोहम्मद रज़ा को अपने ही परिवार में सम्मान नहीं मिल सका. उनकी माँ भी उन्हें नीची निगाह से देखती थीं.

"अकसर रिपोर्टों में बताया गया कि वह उनके ख़िलाफ़ साज़िशें करती रहीं और अपने दूसरे बेटे अली को ज़्यादा बेहतर उत्तराधिकारी के तौर पर आगे बढ़ाती रहीं. एक मौक़े पर उन्होंने यहाँ तक कहा कि अफ़सोस, (शहज़ादी) अशरफ़ शाह नहीं बनी."

वॉशिंगटन पोस्ट के ब्रायन मर्फ़ी के अनुसार, 1930 के दशक की शुरुआत में अशरफ़ पहलवी, उनकी बड़ी बहन शम्स और उनकी माँ उन शुरुआती ईरानी महिलाओं में शामिल थीं जिन्होंने परंपरागत हिजाब को त्याग दिया.

एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका के अनुसार, साल 1951 से लेकर 1953 तक ईरान के प्रधानमंत्री रहने वाले मोहम्मद मुसद्दिक़ ने जब ब्रितानी क़ब्ज़े वाले तेल भंडारों का राष्ट्रीयकरण किया तो ईरान में गंभीर राजनीतिक और आर्थिक संकट पैदा हो गया.

"मुसद्दिक़ और शाह के बीच सत्ता पर क़ब्ज़ा करने की लगातार कशमकश में अगस्त 1953 में जब शाह ने मुसद्दिक़ को सत्ता से हटाने की कोशिश की, तो मुसद्दिक़ के समर्थक सड़कों पर निकल आए और शाह और उनकी बहन अशरफ़ पहलवी को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया."

"लेकिन कुछ ही दिनों में मुसद्दिक़ के विरोधियों ने अमेरिकी और ब्रितानी एजेंसियों की मदद से एक सैनिक विद्रोह के ज़रिए उनकी सरकार गिरा दी और शाह को दोबारा सत्ता में वापस ले आए."

सन 1953 के इस राजनीतिक घटनाक्रम को 'ऑपरेशन एजेक्स' के नाम से जाना जाता है.

'ऑपरेशन एजेक्स' और शहजादी

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इमेज कैप्शन, राजनीतिक विरोधियों ने शहजादी अशरफ़ पर भ्रष्टाचार का भी आरोप लगाया, जिसका उन्होंने हमेशा खंडन किया.

शहज़ादी अशरफ़ पहलवी ने ऑपरेशन एजेक्स में एक अहम भूमिका अदा की. उन्होंने मोहम्मद रज़ा शाह का मन बदलकर अमेरिकी और ब्रितानी ख़ुफ़िया एजेंसियों को इस विद्रोह की शुरुआत करने की इजाज़त देने के लिए तैयार किया.

शाह शुरू में इस कार्रवाई के बिल्कुल ख़िलाफ़ थे और कुछ अर्से तक इसकी मंज़ूरी देने से इनकार करते रहे. साल की शुरुआत में सीआईए के एजेंटों ने अशरफ़ से अनुरोध किया कि वह अपने भाई से बात करें.

इतिहासकार स्टीफ़न किन्ज़र अपनी किताब ऑल द शाह्स मेन में लिखते हैं, "अशरफ़ उस वक़्त फ़्रांस के कसीनो और नाइट क्लबों में जीवन का आनंद उठा रही थीं. वहीं पर ऑपरेशन के इंचार्ज सीआईए अधिकारी कर्मिट रूज़वेल्ट के एक अहम ईरानी एजेंट असदुल्लाह रशीदयान उनसे मुलाक़ात के लिए पहुँचे."

अशरफ़ ने शुरुआत में प्रतिरोध किया, लेकिन अगले दिन अमेरिकी और ब्रितानी एजेंटों का एक दल यह ऑफ़र और "ज़्यादा प्रभावी ढंग" से पेश करने आ पहुँचा. इस दल का नेतृत्व सीनियर ब्रितानी ख़ुफ़िया अधिकारी नॉर्मन ड्रबीशर कर रहे थे, जो अपने साथ एक मिंक कोट और नक़द रक़म का एक पैकेट लाए थे. उनके अनुसार, जैसे ही अशरफ़ की नज़र उन तोहफ़ों पर पड़ी, "उनकी आँखों में चमक आ गई और उनका प्रतिरोध ख़त्म हो गया."

हालाँकि अशरफ़ पहलवी की आत्मकथा फ़ेसेज़ इन ए मिरर में उनके अपने बयान के अनुसार, उन्हें फ़्रांस में निर्वासन से देश वापसी पर तैयार करने के लिए एक ब्लैंक चेक पेश किया गया था, मगर उन्होंने रक़म लेने से इनकार किया और अपनी मर्ज़ी से ईरान वापस आईं.

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि 1953 का विद्रोह अशरफ़ पहलवी की अपने भाई को मनाने की कोशिशों के बिना भी हो सकता था. इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ मिडिल ईस्ट स्टडीज़ में प्रकाशित एक लेख में लेखक मार्क गेसोरेवस्की लिखते हैं कि शाह को न तो विद्रोह के फ़ैसले में शामिल किया गया, न ही इसके तरीक़े पर कोई सलाह दी गई, और न ही उनसे यह पूछा गया कि मुसद्दिक़ की जगह कौन लेगा.

गेसोरेवस्की के अनुसार, यह विद्रोह बुनियादी तौर पर अमेरिका और उसके सहयोगियों की ओर से मुसद्दिक़ को कमज़ोर करने और उन्हें हटाने के लिए किया गया था, और शाह इसमें केवल एक प्रतीकात्मक भूमिका अदा कर रहे थे.

मुसद्दिक़ को ग़द्दारी के जुर्म में तीन साल क़ैद की सज़ा सुनाई गई, और सज़ा पूरी होने के बाद उन्हें बाक़ी जीवन नज़रबंदी में बिताना पड़ा.

हालाँकि ईरान को तेल संयंत्रों पर प्रतीकात्मक स्वायत्तता मिली रही, लेकिन सन 1954 के समझौते के तहत तेल की आमदनी का पचास फ़ीसद हिस्सा एक अंतरराष्ट्रीय कंसोर्टियम को जाता रहा, जो उत्पादन और बिक्री पर पूरा अधिकार रखता था.

शहज़ादी अशरफ़ पहलवी की ज़िंदग़ी

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इमेज कैप्शन, कहा जाता है कि युवावस्था में अशरफ़ पहलवी का आत्मविश्वास थोड़ा कम था.

अशरफ़ अली उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहती थीं, मगर इसके बजाय उनकी शादी सन 1937 में 18 साल की उम्र में कर दी गई.

शहज़ादी अशरफ़ ने तीन शादियाँ कीं और तीनों का अंत तलाक़ पर हुआ. उनके तीन बच्चे थे.

सन 1980 में न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में अशरफ़ ने कहा था, "मैं कभी अच्छी माँ नहीं रही, क्योंकि मेरी जीवन-शैली ऐसी थी कि बच्चों के साथ समय नहीं बिता सकी."

राजनीतिक विरोधियों ने शहज़ादी अशरफ़ पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. उनके निजी जीवन से जुड़े फ़ैसलों की भी अक्सर आलोचना की जाती रही.

अमेरिकी दस्तावेज़ों के अनुसार, शहज़ादी अशरफ़ कई सालों तक शाही दरबार से जुड़े लगभग सभी स्कैंडलों के केंद्र में रही हैं.

भ्रष्टाचार के आरोप

अशरफ़ पहलवी पर आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए गए, लेकिन उनके अनुसार ऐसा इसलिए था क्योंकि वह "कई संगठनों के प्रशासन में सक्रिय थीं."

उनके अनुसार, जब मुसद्दिक़ ने उन्हें पेरिस निर्वासित किया तो उनके पास सीमित आर्थिक संसाधन थे. लेकिन बाद के वर्षों में कहा गया कि उन्होंने बहुत दौलत जमा कर ली.

मरफ़ी के अनुसार, अशरफ़ ने अपनी दौलत की वजह अपने पिता रज़ा शाह से विरासत में मिली ज़मीन की क़ीमत में इज़ाफ़े और विरासत में मिले कारोबार से होने वाली आमदनी को बताया.

लेकिन निक्की केडी की किताब 'रूट्स ऑफ़ रिवॉल्यूशन: ऐन इंटरप्रेटेटिव हिस्ट्री' और फ़रीदून हुवेदा की किताब 'द फ़ॉल ऑफ़ द शाह' के अनुसार उनकी दौलत के पीछे की एक कहानी यह भी है कि जब ईरान में तेल की क़ीमतों में इज़ाफ़े की वजह से औद्योगिक विकास का दौर आया तो अशरफ़ पहलवी और उनके बेटे शहराम ने नई कंपनियों को सरकार से ऑपरेटिंग, निर्यात-आयात या सरकारी समझौते की इजाज़त दिलवाने के बदले उन कंपनियों के शेयर में से दस फ़ीसद या उससे अधिक बिना क़ीमत के हासिल किए.

"कहा जाता है कि सरकारी लाइसेंस केवल कुछ प्रभावी कंपनियों को दिए जाते थे, जिसकी वजह से लाइसेंस लेना हर कारोबारी के लिए एक महँगा सौदा बन गया."

सन 1979 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि 17 सितंबर 1978 की एक दस्तावेज़ के अनुसार, अशरफ़ के दफ़्तर से एक आवेदन दिया गया कि उनके बैंक खाते से 7,08,000 डॉलर स्विट्ज़रलैंड के यूनियन बैंक ऑफ़ जिनेवा में उनके खाते में ट्रांसफ़र किए जाएँ.

इसे ख़ुफ़िया कोड SAIPA यानी (S-on, A-ltesse, I-mperiale, P-rincesse, A-shraf) के तहत खोला गया था. यह फ़्रांसीसी भाषा में उनकी पसंद की शब्दावली थी, जिसका मतलब था: "शहज़ादी अशरफ़, शाही श्रेष्ठता की मालिकिन."

हुसैन फ़र्दोस्त ने 'द राइज़ ऐंड फ़ॉल ऑफ़ द पहलवी डायनेस्टी' में अशरफ़ पहलवी को ड्रग्स स्मगलिंग से जोड़ने की भी कोशिश की.

इस पर अशरफ़ ने अपने संस्मरण में लिखा: "मेरे विरोधियों ने मुझ पर स्मगलर, जासूस, माफ़िया की साथी और एक बार तो ड्रग्स सेलर होने तक का आरोप लगाया."

सन 1980 में अशरफ़ ने न्यूयॉर्क टाइम्स में एक लेख में यह तर्क दिया कि उनकी दौलत नाजायज़ ढंग से हासिल नहीं की गई, बल्कि विरासत में मिली ज़मीनों से थी, जिनकी क़ीमत ईरान की तरक़्क़ी और ख़ुशहाली की वजह से कई गुना बढ़ गई थी.

वह अपने संस्करण में आरोपों का इस तरह जवाब देती हैं: "मेरे पिता की मौत के बाद मुझे लगभग तीन लाख डॉलर विरासत में मिले थे और कैस्पियन सागर के पास लगभग 10 लाख वर्ग मीटर ज़मीन मिली थी. इसके अलावा जर्जान और किरमानशाह में कुछ जायदादें भी मिलीं, जो बाद में बहुत क़ीमती साबित हुईं."

मनोवैज्ञानिक पहलू

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इमेज कैप्शन, शहज़ादी कहती थीं कि मोहम्मद रज़ा शाह उनके सबसे क़रीबी दोस्त थे.

अपनी युवावस्था में अशरफ़ पहलवी ने आत्मविश्वास की कमी का सामना किया.

उन्होंने लिखा है, "मुझे आईने में अपनी शक्ल पसंद नहीं आती थी. मैं किसी और के चेहरे, गोरी रंगत और लंबे क़द की ख़्वाहिश रखती थी. हमेशा महसूस करती थी कि दुनिया में मुझसे कम क़द वाले बहुत कम लोग हैं."

शायद यही एहसास उनके साहस का कारण बना.

"अपने संस्मरण में वह लिखती हैं, "बीस साल पहले फ़्रांसीसी पत्रकारों ने मुझे काली चीती का नाम दिया. यह नाम मुझे बहुत पसंद आया और सच कहूं तो कुछ पहलुओं में यह मेरे मिज़ाज से मेल भी खाता है. चीते की तरह मेरा स्वभाव उत्साही, विद्रोही और आत्मविश्वासी है."

"अक्सर मुझे सार्वजनिक सभाओं में ख़ुद पर नियंत्रण रखने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ती है. मगर कभी-कभी मेरा दिल चाहता है कि काश मेरे पास चीते के पंजे होते कि मैं अपने देश के दुश्मनों पर झपट पड़ती."

भाई के साथ संबंध पर वह कहती थीं कि मोहम्मद रज़ा शाह उनके सबसे क़रीबी दोस्त थे.

अपने संस्मरण में अशरफ़ लिखती हैं, "हमारे बालिग़ होने से बहुत पहले मेरे लिए उसकी आवाज़ ही ज़िंदगी की सबसे मज़बूत आवाज़ बन चुकी थी."

महिलाओं के अधिकार

वीडियो कैप्शन, पहलवी वंश से ख़ामेनेई तक, 100 साल में कितना बदला ईरान- विवेचना

अशरफ़ पहलवी अपने भाई की सरकार के दौरान ईरान और दुनिया भर में महिलाओं के अधिकारों की ज़बर्दस्त समर्थक रहीं.

लेकिन एक आलेख में रचनाकार की बॉयल ने उनकी तीखी आलोचना की और लिखा, "शहज़ादी जब अंतरराष्ट्रीय 'बहनचारे' की बात कर रही थीं तब ईरान में उन्हीं की लगभग 4000 बहनें राजनीतिक बंदी थीं जिन्हें किसी सैनिक या दीवानी मुक़दमे की उम्मीद भी नहीं थी."

अपने संस्मरण में अशरफ़ पहलवी ने ईरान में महिलाओं की ख़राब स्थिति को स्वीकार किया और इस पर चिंता प्रकट की.

वह लिखती हैं, "ईरान की औरतों के साथ जो कुछ हो रहा था, उसकी ख़बरें बहुत दुखदायी थीं. वह अलग-थलग कर दी गई थीं और दूसरे दर्जे की नागरिक बना दी गई थीं. बहुत सी औरतें या तो जेल में डाल दी गई थीं या उन्हें निर्वासन का सामना करना पड़ा था."

सन 1979 की क्रांति के बाद अशरफ़ पहलवी ने अमेरिकी बैंकर डेविड रॉकफ़िलर से अनुरोध किया कि वह उनके भाई मोहम्मद रज़ा शाह को शरण दिलवाने में मदद करें.

उन्होंने उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव कर्ट वाल्डहाइम की भी इस बात के लिए आलोचना की कि उन्होंने क्रांति की शुरुआत में शाह का साथ नहीं दिया.

निर्वासन और मौत

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इमेज कैप्शन, अशरफ़ पहलवी अपने भाई के शासनकाल के दौरान ईरान और दुनिया भर में महिला अधिकारों की प्रबल समर्थक रहीं

क्रांति के बाद अशरफ़ न्यूयॉर्क और पेरिस में समय बिताती रहीं. 7 जनवरी 2016 को मोनाको में अल्ज़ाइमर के रोग के बाद 96 साल की उम्र में उनकी मौत हुई.

मौत के वक़्त वह पहलवी परिवार की सबसे उम्रदराज़ सदस्य थीं.

एसोसिएटेड प्रेस ने लिखा कि शहज़ादी अशरफ़ का बाद का जीवन शेक्सपियर की ट्रेजडी से कम न थी.

"क्रांति के तुरंत बाद पेरिस की एक सड़क पर उनके बेटे को मार डाला गया, उनके जुड़वां भाई कैंसर से चल बसे, उनकी एक भतीजी 2001 में लंदन में अत्यधिक ड्रग्स लेने से मर गई और एक भतीजे ने 10 साल बाद बोस्टन में आत्महत्या कर ली."

विलियम ग्राइमर ने न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखा, "अशरफ़ पहलवी एक आकर्षक मगर विवादास्पद व्यक्तित्व थीं. पश्चिमी सोच वाली, आधुनिक, नफ़ासत से भरी, फ़र्राटे से फ्रेंच और अंग्रेज़ी बोलने वाली, हाई सोसायटी की शौक़ीन."

"उनकी पहचान एक कट्टर सोच वाली राजनीतिक खिलाड़ी की थी जो अपने भाई शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी की तानाशाही की खुल्लम खुला समर्थन करती थीं."

एपी के अनुसार, उनका कहना था, "मेरे भाई की मौत के बाद अगर हमारे पास वाक़ई वह 65 अरब डॉलर होते जिनका लोग दावा करते हैं तो हम पलक झपकते ही ईरान को वापस ले लेते."

समय के साथ वह सार्वजनिक जीवन से धीरे-धीरे ओझल होती गईं लेकिन 1994 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के अंतिम संस्कार में वह शामिल हुईं.

उन्होंने हमेशा कहा कि उन्हें अपने जीवन पर कोई पछतावा नहीं, "मैं अगर दोबारा जी सकूं तो वही सब कुछ करूंगी. सब गुज़र गया है, अब केवल यादें हैं लेकिन वह 50 साल शानदार थे और ठसक से भरे थे."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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