साज़िश, संघर्ष और बेटे का वियोग झेलने वाली जुझारू रानी जिंद कौर

रणजीत सिंह की पत्नी और दलीप सिंह की मां महारानी जिंद कौर

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    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी

जब 28 जून 1839 को महाराजा रणजीत सिंह का निधन हुआ, तब उनके बेटे दलीप सिंह की उम्र एक साल भी नहीं थी और उनकी मां जिंद कौर पर पूरी ज़िम्मेदारी आ गई.

जिंद कौर को लोग प्यार से जिंदन भी कहते थे.

सन 1817 में जन्मी जिंदन की ज़िंदगी ख़ूंख़ार शिकारी कुत्तों के बीच गुज़री, क्योंकि उनके पिता मन्ना सिंह औलख, महाराजा रणजीत सिंह के कुत्तों की देखभाल करते थे.

महाराजा रणजीत सिंह ने जिंदन से तब शादी की थी जब वह 55 साल की उम्र पार कर चुके थे. उस समय जिंदन की उम्र मात्र 18 साल थी.

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विलियम डेलरिंपल और अनीता आनंद अपनी किताब 'कोहिनूर: द स्टोरी ऑफ़ वर्ल्ड्स मोस्ट फ़ेमस डायमंड' में लिखते हैं, "जिंदन बहुत सुंदर थीं. उनका चेहरा अंडाकार था और नाक मुड़ी हुई. उनकी आँखें बादामी थीं और वो एक नर्तकी के अंदाज़ में बहुत नज़ाकत से चलती थीं."

"उनके प्रशंसकों और विरोधियों की संख्या लगभग बराबर थी. उनके ठीक विपरीत, कई लड़ाइयाँ लड़ चुके उनके पति रणजीत सिंह के सिर और दाढ़ी के बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे. उनके चेचक के दागों से भरे चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ चुकी थीं."

जिंदन ने बेटे के नाम पर पंजाब की हुकूमत संभाली

दलीप सिंह

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इमेज कैप्शन, दलीप सिंह को 5 साल की उम्र में पंजाब का महाराजा बनाया गया

जब 18 सितंबर 1843 को जिंदन के पांच साल के बेटे दलीप सिंह को पंजाब का महाराजा बनाया गया, तो दरबारियों को उम्मीद जगी कि वह एक कठपुतली राजा साबित होंगे और वे उससे अपनी मर्जी के अनुसार फैसले करवा सकेंगे.

किसी को यह अंदाज़ा तक नहीं था कि 26 वर्षीय जिंदन, जिसकी कोई ख़ानदानी पृष्ठभूमि नहीं थी और जो पढ़ी-लिखी भी नहीं थीं, कुछ और ही इरादे रखती हैं.

कुत्तों की देखभाल करने वाले की बेटी ने जब पर्दा छोड़कर यह ऐलान किया कि वह अपने बेटे के नाम पर पंजाब पर शासन करेंगी, तो दरबारी स्तब्ध रह गए.

विलियम डेलरिंपल और अनीता आनंद लिखते हैं, "अपनी बांह में कोहिनूर हीरा बांधे दलीप सिंह अपनी मां की गोद में बैठते और वह एशिया के सबसे शक्तिशाली घरानों में से एक, पंजाब पर राज करतीं. उनके खिलाफ माहौल तब और बिगड़ गया जब उन्होंने अपने भाई जवाहर सिंह को नया वज़ीर बना दिया."

जिंदन कौर के भाई जवाहर सिंह की हत्या

जवाहर सिंह ने वज़ीर बनते ही अपनी बहन जिंदन की राह में आने वाली हर चुनौती को दूर करने का बीड़ा उठाया.

सबसे पहले उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह के एक अन्य बेटे, राजकुमार पशौरा सिंह कंवर को अपने रास्ते से हटा दिया. यह बात सिखों के धार्मिक नेताओं से छिपी नहीं रही और उन्होंने जवाहर सिंह को अपने सामने पेश होने का आदेश दिया.

जवाहर सिंह, महाराजा रणजीत सिंह के हाथी पर सवार होकर, अपने आगे दलीप सिंह को बैठाकर सिख समुदाय के धार्मिक नेताओं के सामने पेश हुए.

पतवंत सिंह ने अपनी किताब 'द सिख्स' में लिखा, "सिख खालसा ने जवाहर सिंह के हाथी को घेर लिया और रोते हुए दलीप सिंह को उनकी बाहों से छीन लिया. इसके बाद उन्होंने जवाहर सिंह को हाथी के हौदे से नीचे मिट्टी में गिरा दिया."

"गिरते ही वह अपनी जान की भीख मांगने लगे, लेकिन सिखों ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया. दलीप सिंह ने अपने मामा की हत्या का दृश्य अपनी आँखों से देखा, जिसे वह पूरी ज़िंदगी नहीं भुला सके."

ईस्ट इंडिया कंपनी ने मौक़े का फ़ायदा उठाया

जिंदन इस घटना से बेहद दुखी हुईं और कुछ दिनों के लिए राज-काज से अलग हो गईं. लेकिन कुछ हफ्तों बाद, तमाम उम्मीदों के खिलाफ, वह एक बार फिर दरबार में प्रकट हुईं और रीजेंट के रूप में उन्होंने अपना पुराना कार्यभार फिर से संभाल लिया.

उधर, सैकड़ों मील दूर ईस्ट इंडिया कंपनी इस घटनाक्रम को बहुत दिलचस्पी से देख रही थी.

पहले एंग्लो-सिख युद्ध (1845–46) के समय न तो दलीप सिंह और न ही उनकी मां को अंदाज़ा था कि उनके दरबार के दो सबसे शक्तिशाली लोग अंग्रेज़ों से जा मिलेंगे.

जवाहर की जगह वज़ीर बनाए गए लाल सिंह ने अंग्रेज़ जासूसों को न केवल सिख गन बैटरियों की पूरी जानकारी दी, बल्कि यह भी बता दिया कि उनकी युद्ध योजना क्या है और किन-किन जगहों पर सिख सैनिक तैनात हैं.

इसके बावजूद, जिंदन की अगुवाई में सिख सैनिक शुरुआत में अंग्रेज़ों पर भारी पड़ रहे थे.

लड़ाई में अंग्रेज़ों की जीत

रणजीत सिंह की मौत के बाद भी खालसा दरबार की सेना ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ युद्ध लड़े

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जनरल हेनरी हेवलॉक ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "यह संभावना देखते हुए कि सिख किसी भी समय उन्हें कुचल सकते हैं, हार्डिंग ने सभी सरकारी कागज़ात जलाने का आदेश दे दिया."

"कागज़ात को जलाने का आदेश तभी दिया जाता है जब हार तय लग रही हो. इसके बाद हार्डिंग ने अपनी सबसे कीमती चीज़ - एक तलवार, जिसे कभी नेपोलियन ने इस्तेमाल किया था, अपने सहायक को सौंप दी."

यह वह मौका था जब सिखों को अंग्रेज़ों पर निर्णायक हमला करना चाहिए था, लेकिन जिंदन के जनरल तेज सिंह ने अपने सैनिकों को पीछे लौटने का आदेश दे दिया. इसकी वजह से पीछे से आ रही ब्रिटिश सेना को वहाँ पहुंचने का पर्याप्त समय मिल गया और उन्होंने सिखों पर जवाबी हमला शुरू कर दिया.

अंग्रेज़ यह लड़ाई जीत ज़रूर गए, लेकिन उन्हें अंदाज़ा था कि इस इलाके में सिख सैनिक संख्या में उनसे कहीं अधिक हैं. इसलिए उन्होंने रणनीति बनाई कि वे महाराजा दलीप सिंह को गद्दी पर बनाए रखेंगे, लेकिन साथ ही अपने हितों की भी रक्षा करेंगे.

अंग्रेज़ों ने बालक महाराजा के साथ भैरोवाल की संधि पर हस्ताक्षर किए, लेकिन अभी संधि की स्याही भी नहीं सूखी थी कि लाहौर में अंग्रेज़ सैनिकों की संख्या बढ़ा दी गई. बहाना यह दिया गया कि बालक महाराजा की सुरक्षा ज़रूरी है, और भेजे गए अंग्रेज़ सैनिकों का पूरा ख़र्च भी महाराजा से ही वसूला गया.

दलीप सिंह गद्दी पर बने रहे, लेकिन सिर्फ़ रानी जिंदन को इस बात का अंदाज़ था कि पर्दे के पीछे क्या हो रहा है. अपने सलाहकारों के ढुलमुल रवैये से नाराज़ होकर उन्होंने अपने कड़े उतारकर उनके सामने रख दिए और उन्हें जमकर फटकार लगाई.

जब जनरल तेज सिंह, जिसने अंग्रेज़ों से मिलकर ग़द्दारी की थी, को सियालकोट में जागीर दी गई, तो जिंदन अपने ग़ुस्से पर क़ाबू नहीं रख सकीं. उन्होंने अपने बेटे को निर्देश दिया कि वह अंग्रेज़ों का आदेश न माने और उन्हें लाहौर दरबार के सामने अपमानित करे.

विलियम डेलरिंपल और अनीता आनंद लिखते हैं, "दरबार की परंपरा थी कि किसी को जागीर देने से पहले महाराजा खुद उसके माथे पर केसरी और लाल रंग का टीका लगाता था. लेकिन जिंदन ने अपने बेटे को ऐसा न करने का आदेश दिया."

"जब एक सार्वजनिक समारोह में तेज सिंह टीका लगवाने के लिए घुटनों के बल बैठा, तो दलीप सिंह ने उसके माथे पर टीका लगाने से इनकार कर दिया. तेज सिंह तो इससे अपमानित हुआ ही, अंग्रेज़ों के ग़ुस्से की भी कोई सीमा नहीं रही."

दलीप सिंह को ज़िंदन से अलग किया गया

अंग्रेज़ों ने तय किया कि जिंदन को हर हाल में उनके बेटे से अलग किया जाएगा. दिसंबर 1847 में, जब दलीप सिंह केवल नौ साल के थे, उन्हें उनकी मां जिंदन से अलग कर दिया गया.

जब जिंदन को खींचकर ले जाया जा रहा था, उन्होंने वहां मौजूद लोगों से गुहार लगाई कि वे उनकी और उनके बेटे की मदद करें लेकिन एक भी व्यक्ति ने उनकी मदद के लिए उंगली तक नहीं उठाई.

जिंदन को पहले लाहौर के किले में दस दिनों तक क़ैद रखा गया, फिर उन्हें वहां से 25 मील दूर शेख़ूपुरा के किले में ले जाया गया. वहीं से उन्होंने अंग्रेज़ों को पत्र लिखकर अपने इकलौते बेटे को लौटाने की मांग की.

उन्होंने लिखा, "आपने मेरे राज्य पर बेईमानी से क्यों कब्ज़ा किया? आपने ऐसा खुलेआम क्यों नहीं किया? आपने मुझसे मेरा बेटा छीन लिया. मैं इस अलगाव को बर्दाश्त नहीं कर सकती. बेहतर हो कि आप मुझे मौत की सज़ा दे दें."

(महाराजा दलीप सिंह कॉरेस्पोंडेंस, पृष्ठ 90)

रानी जिंदन को चुनार के किले में भेजा गया

दलीप सिंह से उनका राज्य छीन लिया गया

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सर हेनरी लॉरेंस की जगह पंजाब के नए रेज़िडेंट बने सर फ़्रेडरिक करी ने रानी जिंदन को पंजाब से हटाकर सैकड़ों मील दूर चुनार किले में भेजने का फैसला किया.

तब तक रानी जिंदन के साथ हो रहे व्यवहार को लेकर अंग्रेज़ों की आलोचना शुरू हो चुकी थी. उनके साथ किए जा रहे बर्ताव पर पंजाब के विरोधी खेमे में रहे अफ़गानिस्तान के शासक दोस्त मोहम्मद ख़ां ने भी आपत्ति जताई थी.

उन्होंने गवर्नर जनरल को पत्र लिखकर रानी जिंदन की रिहाई की मांग की थी.

साल 1849 में हुए दूसरे एंग्लो-सिख युद्ध में भी सिखों को हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद अंग्रेज़ों ने दलीप सिंह को लाहौर समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया.

रानी जिंदन भागकर नेपाल पहुंचीं

दलीप सिंह

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इमेज कैप्शन, दलीप सिंह को उनकी मां ने दोबारा सिख धर्म अपनाने को कहा

अपने पुत्र के वियोग में रानी जिंदन का स्वास्थ्य तेज़ी से गिरने लगा था. दलीप के लाहौर समझौते पर दस्तख़त करने के कुछ दिनों बाद जिंदन चुनार किले से एक भिखारिन के वेश में रात के अँधेरे में भाग निकली. जाने से पहले वो अपनी कोठरी के फ़र्श पर एक नोट छोड़ गईं.

अवतार सिंह गिल ने अपनी किताब 'लाहौर दरबार एंड रानी जिंदन' में लिखा, "रानी ने अपने नोट में लिखा, तुमने मुझे पिंजड़े में बंद कर क़ैद कर दिया. तुम्हारे सारे तालों और संतरियों के बावजूद मैं जादू से बाहर निकल आई."

"मैंने तुमसे कहा था कि मेरे धैर्य का इम्तिहान मत लो. ये मत समझो कि मैं चोर की तरह वहाँ से भागी. मैं बिना किसी मदद के तुम्हारी जेल से निकलने में कामयाब रही."

जंगली रास्तों से होते हुए हज़ार किलोमीटर से भी लंबा रास्ता तय करते हुए रानी नेपाल की राजधानी काठमांडू पहुँच गईं.

रानी ज़िंदन ने आँखों की रोशनी खोई

काठमांडू में रानी जिंदन नेपाल के शासक जंग बहादुर की शरण में गईं, लेकिन उनसे पहले ही ब्रिटिश दूत वहाँ पहुंच चुके थे. उन्होंने नेपाल नरेश से अनुरोध किया कि जिंदन को शरण केवल कुछ शर्तों पर ही दी जाए.

पहली शर्त थी कि वह भारत की धरती पर कभी क़दम नहीं रखेंगी. दूसरी, कि वह अपने बेटे से संपर्क करने की कभी कोशिश नहीं करेंगी. और तीसरी, कि वह पंजाब में किसी भी प्रकार का विद्रोह भड़काने की कोशिश नहीं करेंगी.

अगर उन्होंने इन शर्तों में से कोई भी तोड़ी, तो उन्हें वापस भारतीय जेल में भेज दिया जाएगा. मानसिक और शारीरिक रूप से टूट चुकी जिंदन के पास इन शर्तों को मानने के सिवा कोई विकल्प नहीं था.

लेडी लेना लोगिन ने अपनी किताब 'सर जॉन लोगिन एंड दलीप सिंह' में लिखा है, "नेपाल में भी जिंदन एक तरह से क़ैदी की तरह ही रहीं. जंग बहादुर इस बात पर नियंत्रण रखते कि वह कहाँ जा रही हैं और किससे मिल रही हैं."

"कर्नल रैमसी ने उनका वर्णन करते हुए लिखा था कि 'वह अंधी हो गई हैं और उनकी पुरानी स्फूर्ति विलुप्त हो चुकी है. उन्होंने अपने आसपास होने वाली घटनाओं में दिलचस्पी लेना छोड़ दिया है."

दलीप सिंह को इंग्लैंड भेजा गया

दलीप सिंह को गद्दी से उतार दिया गया

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इमेज कैप्शन, दलीप सिंह को गद्दी से उतार दिया गया और अंग्रेज़ों ने उन्हें इंग्लैंड भेज दिया

दलीप सिंह का राज्य हड़पने के बाद, अंग्रेज़ों ने उन्हें पंजाब से हमेशा के लिए निष्कासित कर दिया. उन्हें फ़तेहगढ़ ले जाकर एक स्कॉटिश डॉक्टर, जॉन स्पेंसर लोगिन के संरक्षण में रखा गया.

लोगिन के साथ रहते हुए ही दलीप सिंह ने अंग्रेज़ी बोलना, बाइबिल पढ़ना और क्रिकेट खेलना सीखा. इसी दौरान उन्होंने अपने लंबे बाल कटवा दिए और 14 वर्ष की उम्र में अपना धर्म बदलकर ईसाई धर्म अपना लिया.

जब दलीप सिंह 15 साल के हुए, तो उन्होंने इंग्लैंड जाने की इच्छा प्रकट की. वह पानी के जहाज़ पर सवार होकर अपने संरक्षक लोगिन दंपती के साथ इंग्लैंड पहुंचे और वहीं बस गए.

दलीप सिंह की ज़िंदन से कलकत्ता में मुलाक़ात

साल 1860 में जब दलीप 21 वर्ष के हुए तो उन्होंने अपनी माँ जिंदन से मिलने की इच्छा प्रकट की. उन्हें माँ से इस शर्त पर मिलने की अनुमति दी गई कि वो पंजाब से जितनी दूर संभव हो उनसे मिलें.

नेपाल में रानी जिंदन को अंग्रेज़ों ने सूचित किया कि वो अपने बेटे से मिलने के लिए भारत जाने के लिए तैयार हो जाएँ. इस मुलाक़ात के लिए कलकत्ता के स्पेंस होटल को चुना गया.

ये मुलाक़ात 16 जनवरी, 1861 को हुई.

अनीता आनंद अपनी किताब 'सोफ़िया' में लिखती हैं, "जिंदन को तब तक दिखाई देना बंद हो चुका था. जब जिंदन को अपने बेटे से इतने सालों बाद मिलवाया गया तो उन्होंने उनके शरीर पर हाथ फेर कर ये महसूस करने की कोशिश की कि उनका बेटा अब कैसा हो गया है."

"जब उनका हाथ उनके सिर पर पहुंचा तब जाकर उन्हें लगा कि उन्होंने अपने बाल कटवा दिए हैं. तब उन्होंने रोते हुए कहा, "मैं अपने पति की मौत और अपने राज्य का छिन जाना बर्दाश्त कर सकती थी, लेकिन अपने बेटे का सिख धर्म को छोड़ देना मेरे बर्दाश्त के बाहर है."

सिर्फ़ 46 साल की उम्र में निधन

लंदन में दलीप सिंह ने लैंकास्टर गेट के अपने घर के पास अपनी माँ के लिए एक घर ख़रीदा

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लेकिन थोड़ी देर बाद जिंदन सामान्य हो गई.

उन्होंने कहा कि वो अब अपने बेटे को ख़ुद से अलग नहीं होने देंगी. जब कलकत्ता में स्पेंस होटल में दलीप सिंह और जिंदन की मुलाक़ात हो रही थी तभी दूसरे अफ़ीम युद्ध मे भाग लेकर लौटे सिख सैनिक हुगली के तट पर पहुंचे.

अनीता आनंद लिखती हैं, "वहाँ अफवाह फैल गई कि कलकत्ता में उनके महाराजा और रानी माँ मौजूद हैं. तुरंत थके हारे सिख सैनिक अपने महाराजा का अभिवादन करने स्पेंस होटल के चारों तरफ़ जमा हो गए और नारे लगाने लगे."

तभी अंग्रेज़ों ने तय किया कि रानी जिंदन को तुरंत कलकत्ता से हटाकर अपने बेटे के साथ ब्रिटेन भेज दिया जाए. लंदन पहुंच कर दलीप सिंह ने लैंकास्टर गेट के अपने घर के पास अपनी माँ के लिए एक घर ख़रीदा.

एक अगस्त, 1863 को महाराजा रणजीत सिंह की सबसे चहेती रानी जिंदन का निधन हो गया. जब उनकी मौत हुई तो वो बहुत बूढ़ी दिखाई देती थी लेकिन उस समय उनकी उम्र थी मात्र 46 साल.

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