जनरल सुंदरजी: स्कॉलर जनरल जिन्हें टैंक से लेकर मोटरसाइकिल तक का था शौक

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
लोग अक्सर पूछा करते थे कि क्या सुंदरजी मुखर्जी, बैनर्जी या चैटर्जी की तरह बंगाली हैं या फिर फ़्रांजी या जमशेदजी की तर्ज़ पर पारसी. कुछ लोग उन्हें सिंधी भी समझते थे.
जनरल सुंदरजी की पत्नी वाणी सुंदरजी अपने लेख 'अ मैन कॉल्ड सुंदरजी' में लिखती हैं, "अपनी शादी के शुरुआती दिनों में मैंने उनसे पूछा कि आपको सुंदरजी नाम कैसे मिला जबकि आपके माता-पिता दोनों तमिल ब्राह्मण थे?"
उनका जवाब था, "जब मैं तीन साल का था तो मैं अपने माता-पिता को अक्सर गांधीजी के बारे में बातें करते हुए सुनता था. एक दिन मैंने अपने पिता से पूछा, आप किन गांधीजी के बारे में बातें करते हैं. मेरे पिता ने जवाब दिया कि महात्मा गांधी एक बहुत महान व्यक्ति हैं. हम उनके सम्मान में उनके नाम के आगे जी लगाते हैं. मैंने उसी दिन से ज़िद लगा दी कि मुझे भी सुंदरजी कहा जाए. मेरे पिता इसके लिए राज़ी हो गए."
यहाँ तक कि मद्रास के होली एंजेल्स कॉन्वेंट में भी उनका नाम कृष्णास्वामी सुंदरजी लिखवाया गया. उनके नौकर और भाई भी उनके नाम के आगे जी लगाने लगे और जिंदगी भर उन्हें इसी नाम से पुकारते रहे.

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लड़ाई के मैदान में थककर सो गए सुंदरजी

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नाम के अलावा अन्य मामलों में भी सुंदरजी लीक से हट कर थे. एक बार देहरादून की ऑफ़िसर्स मेस में सेना का एक कैप्टन उनके पास दौड़ा-दौड़ा आकर बोला, "सर हमने आपके लिए पूरा शाकाहारी भोजन बनवाया है.''
सुंदरजी का जवाब था, "मेरे युवा साथी मैं बीफ़ खाने वाला ब्राह्मण हूँ. मैं चलने, तैरने और रेंगने वाली हर चीज़ खाता हूँ बशर्ते उसका स्वाद मुझे अच्छा लगे."
अपने पिता के ज़ोर देने पर उन्होंने डॉक्टर बनने की मंशा से जीव विज्ञान में ऑनर्स की पढ़ाई शुरू की थी लेकिन बीच पढ़ाई में उन्होंने सेना में जाने का मन बना लिया. उस समय उनकी उम्र मात्र 17 वर्ष थी.
उन्होंने अपनी ज़िंदगी में पाँच लड़ाइयाँ लड़ीं. जब वो मेजर थे तो उन्हें संयुक्त राष्ट्र की सेना की तरफ़ से लड़ने के लिए कांगो भेजा गया. वहाँ कई ज़बरदस्त लड़ाइयाँ हुईं.
एक बार 72 घंटे की लगातार गोलाबारी के बाद बिना खाए और सोए सुंदरजी इतना थक गए कि गोलाबारी के बीच जहाँ पर वो थे वहीँ थक कर सो गए.
वाणी सुंदरजी लिखती हैं, "उनके बिहारी सहायक लक्ष्मण ने उनको बंकर में खींचना चाहा लेकिन वो उस पर ज़ोर से चिल्लाए फ़.... ऑफ़... जब 24 घंटे बाद उनकी आँख खुली तो उन्होंने अपने-आप को लड़ाई के मैदान में पाया. उनके आसपास 36 मॉर्टर गोले पड़े हुए थे. उन्होंने बाक़ायदा उनको गिना लेकिन इतनी गोलाबारी के बावजूद उनको एक खरोंच तक नहीं आई."
कई सालों बाद जब वो सेनाध्यक्ष बन गए तो वही लक्ष्मण उनके लिए घर का बना देसी घी लेकर आया. अपने कांगो के दिनों को याद करते हुए सुंदरजी ने अपने पूर्व सहायक से मज़ाक में पूछा कि उस दिन लड़ाई के मैदान में मुझे सोता हुआ छोड़ कर तुम कैसे चले गए?
लक्ष्मण का जवाब था, "आपने मुझको 'पुक ऑफ़' बोला, तो मुझे दुख हुआ और मैं चला गया."
ऑपरेशन ब्लू स्टार

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सन 1928 में तमिलनाडु के चेंगलपेट में जन्मे कृष्णास्वामी सुंदरजी ने सन 1945 में भारतीय सेना में अपना करियर शुरू किया था. उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उत्तर पश्चिम फ़्रंटियर में सैन्य एक्शन में भाग लिया था.
सन 1971 की लड़ाई के दौरान वो बांग्लादेश फ़्रंट पर थे. सन 1984 में सुंदरजी ने इंदिरा गांधी के आदेश पर चरमपंथियों को स्वर्ण मंदिर से बाहर निकालने के राजनीतिक रूप से बहुत संवेदनशील ऑपरेशन ब्लू स्टार का नेतृत्व किया था.
ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान जनरल सुंदरजी पश्चिमी कमान के प्रमुख थे. 3 जून, 1984 को इंदिरा गाँधी ने उन्हें दिल्ली बुलावा भेजा था. उसी रात उनकी इंदिरा गांधी से अकेले एक घंटे तक बात हुई थी. रात 2 बजे जब वो घर लौटे थे तो उन्होंने अपनी पत्नी से कहा था, 'ये उनकी सबसे बड़ी परीक्षा है.'
ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद वो बिल्कुल बदल गए थे. उनकी हँसी गायब हो गई थी. जब उनकी पत्नी ने इस पर अपनी चिंता प्रकट की तो उन्होंने कहा था कि मैं जल्दी इससे उबर जाउँगा. लेकिन वो इससे कभी उबर नहीं पाए.
कई बार उनको कहते सुना गया, "मुझे दुश्मन से लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया गया है, अपने लोगों से लड़ने के लिए नहीं."
खुशवंत सिंह ने उनसे अनुरोध किया कि वो ऑपरेशन ब्लू स्टार के अपने अनुभवों के बारे में लिखें, ताकि लोगों को सच्चाई का पता चल सके. उन्होंने कहा कि मैं फुर्सत से विषय पर लिखूँगा लेकिन वो समय कभी नहीं आया.
लेफ़्टिनेंट जनरल केएस बराड़ ने अपनी किताब 'ऑपरेशन ब्लू स्टार द ट्रू स्टोरी' में जनरल सुंदरजी को कहते बताया, "हम स्वर्ण मंदिर में गुस्से से नहीं बल्कि दुखी हो कर घुसे. घुसते समय हमारे होठों पर प्रार्थना थी और दिल में विनम्रता. उस समय न तो हमारे मन में हार का विचार था और न जीत का और न ही किसी पुरस्कार की अभिलाषा. हमारे लिए वो एक कर्तव्य था जिसे पूरा किया जाना था."
ऑपरेशन ब्रासस्टैक्स की कहानी

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एक और ऑपरेशन जिसके साथ जनरल सुंदरजी की नाम लिया जाता है वो है 'ऑपरेशन ऑपरेशन ब्रासस्टैक्स.' ये ऑपरेशन भारत की युद्ध तैयारियों को परखने के लिए फरवरी-मार्च 1986 में राजस्थान के रेगिस्तान में शुरू किया गया था.
ये आज़ादी के बाद भारतीय सेना का सबसे बड़ा सैन्य अभ्यास था. एशिया में इस स्तर का युद्धाभ्यास इससे पहले कभी नहीं किया गया था. सुंदरजी चाहते थे कि युद्ध की परिस्थिति में सेना के सभी उपकरणों, वाहनों और टैंकों का परीक्षण किया जाए.
इस अभ्यास में सेना के बहुत बड़े हिस्से को शामिल किया गया था. अभ्यास इतना गहन था कि पाकिस्तान को ग़लतफ़हमी हो गई कि भारत उस पर हमला करना चाहता है.
इसकी प्रतिक्रिया में पाकिस्तान ने अपने सैनिकों की छुट्टियाँ रद्द कर दीं और उन्हें ड्यूटी पर बुला लिया. इसकी वजह से रक्षा राज्य मंत्री अरुण सिंह का विभाग बदल दिया गया.
नटवर सिंह अपनी आत्मकथा 'वन लाइफ़ इज़ नॉट एनफ़' में लिखते हैं, "एक बार जब हम अफ़गानिस्तान के राष्ट्रपति नजीबुल्ला को रिसीव करने हवाई अड्डे जा रहे थे, राजीव ने मुझसे पूछा, नटवर, क्या हम पाकिस्तन से लड़ाई शुरू करने वाले हैं?"
इस अभ्यास की स्वीकृति रक्षा राज्य मंत्री अरुण सिंह ने अपने स्तर पर दी थी जिसकी राजीव गांधी को कोई जानकारी नहीं थी.
एक बार राजीव गांधी ने नटवर सिंह और नारायण दत्त तिवारी से पूछा कि मैं रक्षा राज्य मंत्री का क्या करूँ?
नटवर सिंह लिखते हैं, "मैंने उनसे साफ़ कहा कि उन्हे मंत्री को बर्ख़ास्त कर देना चाहिए. इस पर राजीव बोले कि अरुण सिंह उनके दोस्त हैं. इस पर मैंने कहा 'सर आप दून स्कूल की ओल्ड ब्वाएज़ एसोसिएशन के अध्यक्ष नहीं हैं. आप भारत के प्रधानमंत्री हैं. प्रधानमंत्रियों के कोई दोस्त नहीं होते."
कुछ दिनों बाद अरुण सिंह को रक्षा मंत्रालय से हटा कर वित्त मंत्रालय में भेज दिया गया.
'स्कॉलर जनरल' का नाम मिला

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इस ऑपरेशन के दौरान एक चीज़ कभी नहीं रुकी. वो थी जनरल ज़िया की जनरल सुंदरजी को भेजी गई आम और कीनू की बड़ी टोकरियाँ.
वाणी सुंदरजी लिखती हैं, "उन फलों की टोकरियों पर जनरल ज़िया के हाथों से लिखा रहता था, 'जनरल सुंदरजी के लिए, शुभकामनाओं के साथ. उम्मीद करता हूँ, आप इनका आनंद लेंगे. ज़िया."
जनरल ज़िया की हवाई हादसे में मौत तक फलों की ये टोकरियाँ उनके पास पहुंचती रहीं.
जनरल सुंदरजी को भारतीय सेना को बोफ़ोर्स तोपों की ख़रीद की सिफ़ारिश करने के लिए भी याद किया जाएगा.
जनरल सुंदरजी को लोग 'स्कॉलर जनरल' भी कहा करते थे. उन्होंने 'न्यूक्लियर डाक्ट्रिन' भी बनाई थी जिसका अनुसरण करते हुए भारत ने 1998 के परमाणु परीक्षण के बाद परमाणु हथियारों को पहले न इस्तेमाल करने का फ़ैसला किया था.
जनरल एचएस पनाग ने 'द प्रिंट' में छपे अपने लेख 'जनरल सुंदरजी गेव चाइना स्ट्रैटजी फ़ोर डिकेड्स अगो' में लिखा था, "उनके बुरे से बुरे आलोचक भी इस बात पर सहमत थे कि कि भारतीय सेना में किसी दूसरे जनरल के पास इतनी अधिक बौद्धिक गहराई, रणनीतिक परिप्रेक्ष्य और व्यवस्था बदलने की क्षमता नहीं थी. अपने दो साल और 4 महीने के कार्यकाल में उन्होंने भारतीय सेना को 21वीं सदी में पहुँचा दिया था."
'विज़न 2100' का मसौदा तैयार किया

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जनरल सुंदरजी की छवि एक तड़क-भड़क वाले फ़ौजी इंसान की थी. लेकिन उनकी पत्नी का मानना था कि उनके बारे में ये धारणा न्यायसंगत नहीं थी. उनकी नज़र में उनमें बच्चों जैसी सादगी और ईमानदारी थी.
वाणी सुंदरजी कहती हैं, "वो स्टाइल से रहना ज़रूर पसंद करते थे लेकिन उनको अक्सर अनौपचारिक कपड़ों में देखा जाता था. वो पाइप पीते थे और उसकी डंडी से दीवार पर लगे नक्शों को उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को समझाया करते थे. बीच बीच में वो पाइप के एक-दो कश भी ले लिया करते थे. उनके दिमाग में हमेशा नए-नए विचार जन्म लेते थे."
उस दौरान वो मानसिक रूप से 21वीं सदी में पहुंच गए थे. उन्होंने कागज़ पर 'विजन 2000' का मसौदा तैयार किया था जिसमें 21वीं सदी में भारतीय सेना की रणनीति को बहुत बारीकी से समझाया गया था.
परमाणु मुद्दों पर उनकी सोच जगज़ाहिर थी. उस पर उन्होंने बहुत कुछ लिखा भी था. उनके निजी पुस्तकालय में हज़ारों किताबें थीं.
वाणी सुंदरजी लिखती हैं, "सुंदरजी लियोनार्डो द विंची और चंगेज़ ख़ाँ से बहुत प्रभावित थे. उनकी संगीत के प्रति भी बहुत दीवानगी थी. वो भारतीय, पश्चिमी, शास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत हर तरह का संगीत पसंद करते थे. हम लोग रात से सुबह पौ फटने तक रवि शंकर के संगीत सम्मेलनों में बैठे हैं. वो हमारे चार दशक पुराने मित्र थे."
रवि शंकर ने सुंदरजी के अनुरोध पर मेकानाइज़्ड इनफ़ैंट्री रेजिमेंट की धुन बनाई थी. वे अक्सर मशहूर वैज्ञानिक राजा रामन्ना के घर जाकर उनको पियानो बजाते हुए सुनते थे.
काम करते समय सुंदरजी अक्सर बिसमिल्ला ख़ाँ, यहूदी मेन्यूहिन या एमएस सुब्बालक्ष्मी का संगीत सुना करते थे.
खगोलशास्त्र और पक्षियों में रुचि

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सुंदरजी को नई चीज़े सीखने का हमेशा शौक रहा. हर विषय के बारे में उनकी जानकारी गहरी हुआ करती थी, सतही नहीं.
एक बार जब वो रिटायर होने के बाद चीन जा रहे थे तो उन्होंने चीनी भाषा सीखने के लिए दो किताबें खरीदीं थीं. वहाँ जाने से पहले वो अच्छी ख़ासी मेंडारिन बोलने लगे थे हालाँकि वो तब 60 की उम्र पार कर चुके थे.
वाणी सुंदरजी लिखती हैं, "दो चीजें उन्होंने मुझसे सीखीं. उसमें से एक था खगोलशास्त्र में दिलचस्पी. मेरे पिता मुझे छह साल की उम्र से ग्रहों और सितारों को दिखाने वेधशाला ले जाया करते थे. सुंदरजी मेरे लिए खगोलशास्त्र पर कुछ किताबें लाए और कुछ समय बाद उनकी भी इस क्षेत्र में दिलचस्पी हो गई."
वाणी सुंदरजी लिखती हैं, "दूसरी चीज़ थी पक्षियों में मेरी दिलचस्पी. उन्होंने मुझसे प्रेरित होकर इस विषय पर सालिम अली और डिलन रिप्ले की कई किताबें खरीद लीं. उन्होंने पक्षियों पर नज़र रखने के लिए दो शक्तिशाली दूरबीनें भी खरीदीं. उनको मछली पकड़ने और शिकार का भी शौक था. उनकी फ़िशिंग रॉड और 12 बोर की गन अभी भी मेरे पास है."
सुंदरजी के हर काम में गति हुआ करती थी. वो इतना तेज़ चलते थे कि लोगों की उनके साथ चलने में साँस फूल जाया करती थी. वो अस्पताल में भर्ती किए जाने तक रोज़ 18 से 20 घंटे काम किया करते थे.
मोटरसाइकिल और टैंक की ड्राइविंग

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सुंदरजी को ड्राइविंग का भी बहुत शौक था. वो टैंक से लेकर, एपीसी और मोटर साइकिल तक चला लेते थे.
एक रविवार जब वो पश्चिमी कमान के प्रमुख हुआ करते थे उनके पूर्व एडीसी मोटर साइकिल पर उनसे मिलने आए.
वाणी सुंदरजी याद करती हैं, "उस समय हम दिल्ली में इंस्पेक्शन बंगले के बरामदे में चाय पी रहे थे. जैसे ही सुंदरजी ने मोटरसाइकिल को देखा उन्होंने कहा, मेरे साथ आओ. हम दोनों मोटरसाइकिल पर बैठे. उस समय सुंदरजी ने कुर्ता पायजामा पहन रखा था और मैं नाइटी में थी. अगले आधे घंटे तक वो मुझे पूरे केंटोनमेंट में मोटरसाइकिल पर घुमाते रहे."
एक बार रेगिस्तान की 44 डिग्री ती तपती गर्मी में उन्होंने एपीसी (आर्मर्ड पर्सनल कैरियर) चलाया था. थोड़ी देर में उनके साथ चल रहे कई लोग गर्मी में बेहाल हो गए थे लेकिन उस 51 वर्षीय लेफ़्टिनेंट जनरल ने अगले तीन घंटों तक गाड़ी चलाई थी.
वाणी याद करती हैं, "कुछ वर्षों बाद जब वो सेना प्रमुख बन गए तो हम साथ बबीना गए. वहाँ उन्होंने कतार में खड़े कई टैंकों को देखा. वो तुरंत पास के टैंक की ड्राइविंग सीट पर जा बैठे और मुझे भी अपने पास बुला लिया. उसके बाद उन्होंने पूरी रफ़्तार से उस ऊबड़- खाबड़ इलाके में टैंक को चलाया."
'मोटर न्यूरॉन बीमारी' से हुए पीड़ित

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जब वो पाकिस्तान गए तो वो वहाँ के सेनाध्यक्ष जनरल आसिफ़ नवाज़ जंजुआ के मेहमान थे. वो इस्लामाबाद, पेशावर और ख़ैबर पास भी गए. पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष के अनुरोध पर वो अफ़गानिस्तान की सीमा के 50 मीटर अंदर तक चले गए.
इसके बाद उन्होंने हेलिकॉप्टर से तक्षशिला, मोहनजोदड़ो और लाहौर का भी दौरा किया.
10 जनवरी, 1998 को डॉक्टरों ने पाया कि जनरल सुंदरजी 'मोटर न्यूरॉन बीमारी' से पीड़ित हैं.
ये एक तंत्रिका संबंधी बीमारी है जो मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी में मौजूद मोटर न्यूरॉन्स को प्रभावित करती है. इससे माँसपेशियाँ कमज़ोर हो जाती हैं और आख़िरकार पक्षाघात हो जाता है.
डॉक्टरों को जनरल सुंदरजी को इस बीमारी के बारे में बताने में थोड़ी झिझक हो रही थी लेकिन जल्द ही उन्होंने इंटरनेट के ज़रिए इस बीमारी के बारे में सब कुछ पता कर लिया.
वो लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम के सहारे ज़िंदा नहीं रहना चाहते थे. उन्होंने इच्छा मृत्यु के बारे में अपने डॉक्टरों से सवाल पूछे थे.
28 मार्च आते-आते वो पूरी तरह से लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम के सहारे पर चले गए थे.
उस दशा में भी उन्होंने अपनी पत्नी के लिए चार शब्द का नोट लिखा था, 'प्लीज़ लेट मी गो' यानी अब मुझे जाने दो.
वाणी सुंदरजी लिखती हैं, "अपने जीवन के आख़िरी मिनट तक वो पूरी तरह से होश में थे और अपनी आँखों के ज़रिए अपने डाक्टरों और मुझसे बातें कर रहे थे. मैंने उन्हें पोखरण परमाणु परीक्षण के बारे में बताया था. उस हालत में भी वो रोज़ तीन अख़बार पढ़ते थे और बड़े टीवी स्क्रीन पर क्रिकेट देखा करते थे."
बीमारी पता चलने के एक साल एक हफ़्ते तक वो जीवित रहे और 8 फ़रवरी 1999 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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