पंजाब के लाखों किसानों और मज़दूरों का जीवन बदलने वाले सर छोटूराम कौन थे?

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी
सर छोटूराम ने अपने एक विरोधी को पत्र लिखा था, "मैं जीसस क्राइस्ट की इस सीख में विश्वास नहीं करता कि अगर कोई तुम्हारे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे तो तुम उसके सामने अपना बायाँ गाल आगे कर दो."
उन्होंने कहा था, "मेरा विश्वास मूसा की सीख में अधिक है, आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत. अगर आप मेरे ऊपर पत्थर फेकेंगे तो मैं आपके ऊपर उससे बड़ा पत्थर फेंकने से पीछे नहीं हटूँगा."
उनकी ज़ुबान हमेशा से ही तेज़ रही और उन्होंने उसे छिपाने की कभी कोशिश नहीं की. सन 1882 में रोहतक ज़िले के साँपला गाँव में एक जाट परिवार में जन्मे छोटूराम का असली नाम राम रछपाल था.
परिवार में सबसे छोटे होने के कारण सब लोग उन्हें छोटू कहकर पुकारते थे.

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स्कूल में भी उनका यही नाम लिखवाया गया. रोहतक में शुरुआती पढ़ाई करने के बाद छोटूराम ने साल 1905 में दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज से स्नातक की परीक्षा पास की.
कांग्रेस से नाता तोड़ा

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सर छोटूराम पीसीएस परीक्षा में बैठे लेकिन गणित कमज़ोर होने के कारण वो उसे पास नहीं कर सके.
इसके बाद वो कालाकांकर के राजा के निजी सचिव बन गए लेकिन कुछ दिनों बाद उन्होंने वहाँ से इस्तीफ़ा देकर क़ानून की पढ़ाई शुरू की और लाहौर के रंगमहल मिशन हाई स्कूल में अध्यापक बन गए.
सर छोटूराम के जीवनीकार मदन गोपाल अपने लेख 'रहबर-ए-आज़म' में लिखते हैं, "पंजाब के इतिहास में मध्य पंजाब यानी लाहौर, अमृतसर और मुल्तान से जुड़ा हिस्सा ही वहाँ की राजनीति का केंद्र रहा है.
छोटूराम के उदय के बाद ही पिछड़े हुए इलाके अंबाला डिवीजन ने, जहाँ पंजाब की 50 फ़ीसदी से अधिक हिंदू आबादी रहती है, मध्य पंजाब के प्रभुत्व को बहुत हद तक कम किया."
साल 1916 में उन्होंने साप्ताहिक समाचारपत्र 'जाट गज़ेट' शुरू किया. इसी दौरान वो आर्य समाज और कांग्रेस के सदस्य बने.
पहले विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग किया और सेना में नए लोगों की भर्ती के उनके प्रयासों में सहायता की.
साल 1920 में जब कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार के प्रति अपनी नीतियों में परिवर्तन किया और अहिंसा और असहयोग का मार्ग अपनाया तो उन्होंने कांग्रेस से अपना नाता तोड़ लिया.
यूनियनिस्ट पार्टी के सबसे बड़े नेताओं में एक

सर छोटूराम ने पहली बार 1921 में पंजाब काउंसिल का चुनाव लड़ा लेकिन उसमें उनकी हार हुई.
लेकिन अपने दूसरे प्रयास में वो पंजाब काउंसिल के सदस्य बनने में कामयाब रहे. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और हर चुनाव में उनकी जीत हुई.
सन 1924 में उन्हें पंजाब का कृषि मंत्री बनाया गया. एक वर्ष बाद वो पंजाब के शिक्षा मंत्री बने. सन 1936 में उन्हें पंजाब काउंसिल का अध्यक्ष बनाया गया.
उसी वर्ष जब फ़ज़्ले हसन की मृत्यु हुई तो वो सिकंदर हयात ख़ाँ के साथ यूनियनिस्ट पार्टी के सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे.
सन 1937 में यूनियनिस्ट पार्टी ने पंजाब का चुनाव जीता और उसने सिकंदर हयात ख़ाँ के नेतृत्व में सरकार बनाई.
इस सरकार में छोटूराम पहले तो विकास मंत्री बने और फिर उन्होंने राजस्व मंत्री का पद संभाला.
अपनी किताब 'पंजाब पॉलिटिक्स एंड द रोल ऑफ़ सर छोटूराम' में प्रेम चौधरी लिखती हैं, "सिकंदर हयात ख़ाँ के कैबिनेट में सर छोटूराम की हैसियत नंबर 2 की थी. उन्होंने पंजाब के गवर्नर को बाकायदा सूचित किया था कि सर छोटूराम उनके उत्तराधिकारी होंगे."
प्रेम चौधरी लिखती हैं, "लेकिन सिकंदर हयात की मौत के बाद सर छोटूराम ने यूनियनिस्ट पार्टी का नेतृत्व संभालने से इनकार कर दिया था. उनको ये अच्छी तरह मालूम था कि पंजाब जैसे मुस्लिम बहुल प्रदेश में एक मुस्लिम को ही प्रीमियर पद पर स्वीकार किया जाएगा."
नतीजा ये हुआ कि जब जनवरी, 1943 में सिकंदर हयात ख़ाँ की मृत्यु हुई तो उनकी जगह पर ख़िज़्र हयात ख़ान टिवाना को पंजाब का प्रीमियर बनाया गया लेकिन इसके बावजूद सर छोटूराम की राजनीतिक महत्ता में कोई कमी नहीं आई.
लाला लाजपत राय से मुलाकात
बीस के दशक में लाला लाजपत राय न सिर्फ़ पंजाब बल्कि देश के बड़े नेता हुआ करते थे.
विचारधारा के तौर पर वो कांग्रेस नेता मदनमोहन मालवीय के बहुत करीब थे. लाजपत राय छोटूराम से बहुत प्रभावित थे.
डीके वर्मा अपनी किताब 'छोटूराम, लाइफ़ एंड टाइम्स' में लिखते हैं, "छोटूराम के मंत्री बनने के बाद लाला लाजपत राय ने उनसे मुलाकात कर उन्हें पंजाब की राजनीति में अपने विचारों में ढालने की कोशिश की. उन्होंने उन्हें सलाह दी की वो यूनियनिस्ट पार्टी से नाता तोड़ राष्ट्रवादियों का साथ देना शुरू कर दें."
लाला लाजपत राय के इस प्रस्ताव पर सर छोटूराम का जवाब था कि वह यूनियनिस्ट पार्टी से नाता तोड़ने को तैयार हैं. बशर्ते राष्ट्रवाद को संप्रदायवाद से जोड़ कर ना देखा जाए.
उन्होंने कहा, "पंजाब में हिंदू असमंजस में हैं. उनको एक विकल्प चुनना होगा. अगर वो राष्ट्रवादी बनना चाहते हैं तो उन्हें मुसलमानों और सिखों से अपने सारे मतभेद भुलाकर सिर्फ़ अंग्रेज़ों से लड़ना होगा. अगर वो संप्रदायवादी बनना चाहते हैं तो वो सिर्फ़ मुसलमानों से लड़ने के बारे में सोचें. उनकी वर्तमान स्थिति ये है कि वो इन दोनों के बीच फ़ैसला नहीं ले पा रहे हैं."
किसानों के हित में किए कई बड़े काम

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पंजाब में यूनियनिस्ट सरकार के शासन के दौरान एक बड़े किसान आंदोलन की नींव रखी गई.
पंजाब सरकार ने प्रदेश के किसानों के बीच और ग्रामीण इलाक़ों में जागरूकता पैदा करने का प्रयास किया.
उन्होंने किसानों की गिरवी ज़मीन को छुड़वाया और पंजाब में भाखड़ा नंगल बांध बनवाने की शुरुआत की.
उन्होंने कर्ज़ माफ़ी एक्ट-1934, साहूकार पंजीकरण एक्ट-1938, कृषि उत्पाद मंडी एक्ट-1938 और व्यवसाय श्रमिक एक्ट-1940 पास करवाए.
डीके वर्मा लिखते हैं, "किसानों के मुद्दे पर ही उनकी तत्कालीन वायसराय लॉर्ड वैवेल से एक झड़प हुई. उनको इस बात पर बहुत आश्चर्य हुआ कि एक प्रांतीय मंत्री जिनको वो जानते भी नहीं, उनके मुँह पर उनसे कह सकता था कि पंजाब सरकार उनके प्रस्ताव से सहमत नहीं है."
मुद्दा था गेहूँ की कीमत पर नियंत्रण का. छोटूराम ने न तो हिंदुओं का समर्थन किया और न मुसलमानों का. उनके ह्रदय में हमेशा हर वर्ग के पिछड़े हुए लोग ही थे.
वर्मा लिखते हैं, "छोटूराम वामपंथी नहीं थे, उन्होंने ग़रीबों और किसानों के लिए जो कुछ किया, कम लोगों ने किया. अलग-अलग विचारधारा के लोग जैसे केएम मुंशी, एमएन रॉय जैसे कम्युनिस्ट, मौलाना आज़ाद और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेता भी उनके प्रशंसक बन गए थे."
वायसराय की एक्ज़ीक्यूटिव काउंसिल में
सन 1943 में जब वायसराय की एक्ज़ीक्यूटिव काउंसिल में रिक्त स्थान भरने की बात आई तो वायसराय लिनलिथगो ने छोटूराम को काउंसिल में लेने की इच्छा जताई.
उन्होंने 2 मार्च, 1943 को पंजाब के गवर्नर को पत्र में लिखा, "मैं अपनी काउंसिल में छोटूराम जैसे पंजाबी को रखना चाहूँगा. छोटूराम की क्षमता और हिम्मत के बारे में मेरे मन में बहुत इज़्ज़त है और मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि वो बहुत अच्छे सदस्य साबित होंगे."
गवर्नर बर्टरेंड ग्लैंसी ने इस पत्र का जवाब देते हुए लिखा, "क्षमता, सूझ-बूझ और अपने विचार रखने की हिम्मत, हर दृष्टि से मैं समझता हूँ कि छोटूराम एक अच्छे सदस्य साबित होंगे."
लेकिन अंतत: छोटूराम को इस पद पर नियुक्त नहीं किया गया.
प्रेम चौधरी लिखती हैं, "बाद में वायसराय और गनर्नर दोनों की राय बनी कि छोटूराम ख़िज़्र हयात खाँ के नए मंत्रिमंडल के लिए अपरिहार्य हैं और अगर उस समय उन्हें कैबिनेट से अलग किया गया तो मंत्रिमंडल को ख़तरा हो सकता है. उनके बारे में सोच थी कि वो अकेले शख़्स हैं जो मंत्रिमंडल को जोड़कर रखे हुए हैं."
जिन्ना से भिड़ंत

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साल 1937 में मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत के सभी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने का दावा किया था.
उस समय सीमांत प्रांत के ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ ने उसका विरोध करते हुए कहा कि वो मुसलमानों के एक वर्ग का प्रतिनिधित्व करने का दावा कर सकते हैं.
लेकिन उन्हें सारे मुसलमानों के प्रतिनिधि के तौर पर नहीं स्वीकार किया जा सकता.
जब वो शिमला से लाहौर पहुंचे तो इसी अंदाज़ में सिकंदर हयात ख़ाँ ने भी उनका विरोध किया.
उन्होंने कहा कि यूनियनिस्ट सरकार मुस्लिम लीग की सरकार नहीं है.
छोटूराम ने ऐलान किया, "जिन्ना दिल्ली जा सकते हैं, बंबई के लिए ट्रेन पकड़ सकते हैं लेकिन पंजाब में उनके लिए कोई जगह नहीं है."
लेकिन कुछ दिनों बाद हालात बदल गए. सिकंदर हयात ख़ाँ के मन में आया कि वो मुलमानों के राष्ट्रीय स्तर के नेता बन सकते हैं.
जिन्ना की बढ़ती उम्र को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े मुस्लिम नेता की जगह दिखाई भी पड़ रही थी.
अक्तूबर, 1937 में सिकंदर हयात ख़ाँ ने मुस्लिम लीग के लखनऊ अधिवेशन में भाग लिया. ख़बरें आईं कि जिन्ना से उनका समझौता हो गया है जिसे सिकंदर–जिन्ना समझौते का नाम दिया गया.
सिकंदर हयात ख़ाँ के लाहौर लौटने पर सर छोटूराम ने इसका विरोध करते हुए इसको संप्रदायवाद के साथ समझौते की संज्ञा दी.
लेकिन सिकंदर हयात ख़ाँ ने सफ़ाई दी कि इसके पीछे कोई निहित स्वार्थ नहीं है. वो सिर्फ़ राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम लीग का समर्थन कर रहे हैं. जहाँ तक पंजाब की बात है, मुस्लिम लीग से उनका कोई लेना देना नहीं है.
लेकिन इस सब का ये परिणाम हुआ कि सिकंदर हयात ख़ाँ ने मुस्लिम लीग की राष्ट्रीय राजनीति पर ध्यान देना शुरू किया.
उन्होंने पंजाब और प्रांतीय राजनीति की ज़िम्मेदारी छोटूराम पर छोड़ दी.
बाद में ख़िज़्र हयात ख़ाँ की तरफ़ से जिन्ना को जितने पत्र लिखे गए, उन्हें सर छोटूराम ने ड्राफ़्ट किया. आख़िर में छोटूराम और जिन्ना का मुलाकात हुई जो तीन घंटे चली.
मदन गोपाल लिखते हैं, "इस मुलाकात से कोई समाधान नहीं निकल सका. सर छोटूराम की सहमति से ख़िज्र हयात ख़ाँ ने जिन्ना को पत्र लिखकर कहा कि धर्म के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं हो सकता. यूनियनिस्ट पार्टी अपना अस्तित्व बरक़रार रखेगी और उसका मुस्लिम लीग में विलय नहीं होगा."
मेहनती जनसेवक
छोटूराम का दिन सुबह पाँच बजे शुरू होता था और वो रात दो बजे तक काम करते थे. वो कई भाषाओं के जानकार थे.
उन्हें अंग्रेज़ी, संस्कृत, हिंदी, उर्दू और फ़ारसी पर बराबर की महारत हासिल थी. उनको किताबें और समाचारपत्र पढ़ने का बहुत शौक था.
वो अल्लामा इक़बाल से बहुत प्रभावित थे, हालाँकि उनके राजनीतिक विचार मेल नहीं खाते थे.
लोगों के बीच सर छोटूराम की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके 61वें जन्म दिन पर रोहतक में दो लाख लोग जमा हुए थे.
इस मौक़े पर प्रीमियर ने कहा था, "सर छोटूराम उन लोगों में से हैं जो कई दशकों में एक बार पैदा होते हैं. इतने कम समय में उन्होंने लोगों के लिए जो कुछ भी किया है उसे हमेशा याद रखा जाएगा. उन्होंने लोगों के लिए इतना कुछ किया है कि आने वाले दशकों में पंजाब को किसी और नेता की ज़रूरत नहीं पड़ेगी."
हज़ारों लोग शवयात्रा में शामिल हुए

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नौ जनवरी, 1945 को जिस दिन सर छोटूराम का निधन हुआ हज़ारों लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे.
समाचारपत्र ट्रिब्यून के संवाददाता एसी बाली ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, लोग कहते सुने गए, "म्हारा राजा मर गया."
यूनियनिस्ट और कांग्रेस के झंडों में लिपटे सर छोटूराम के पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार 50 हज़ार लोगों की मौजूदगी में किया गया.
सर छोटूराम की मृत्यु के बाद यूनियनिस्ट पार्टी का प्रभाव कम होना शुरू हो गया और कांग्रेस ने रातों-रात ग्रामीण पंजाब के वोट बैंक पर अपना प्रभुत्व जमा लिया.
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