सोशल: PMO को क्यों हटाना पड़ा सर छोटूराम पर किया ट्वीट

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- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को हरियाणा के रोहतक ज़िले में किसान नेता सर छोटूराम की 64 फ़ुट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया.
लेकिन उनकी इस रैली के दौरान पीएमओ इंडिया हैंडल से किए एक ट्वीट पर सोशल मीडिया में काफ़ी नाराज़गी दिखी. बाद में इस ट्वीट को डिलीट कर दिया गया. मगर मुद्दे पर बहस शुरू हो गयी.
प्रधानमंत्री के दफ़्तर (पीएमओ) ने नरेंद्र मोदी का बयान ट्वीट किया, "ये मेरा सौभाग्य है कि मुझे किसानों की आवाज़, जाटों के मसीहा, रहबर-ए-आज़म, दीनबंधु सर छोटूराम जी की इतनी भव्य प्रतिमा का अनावरण करने का अवसर मिला."

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हरियाणा में सोशल मीडिया पर इस बयान की काफ़ी आलोचना हुई और लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी पर जातिवाद फ़ैलाने के आरोप लगाए.
प्रधानमंत्री ने सर छोटूराम की तुलना सरदार पटेल से भी की. इस पर भी सोशल मीडिया पर वाक्य युद्ध चल रहा है.
जानकार मानते हैं कि रोहतक में आयोजित इस कार्यक्रम के सहारे भारतीय जनता पार्टी ने नाराज़ चल रहे जाटों को रिझाने की कोशिश की है.
साल 2016 में आरक्षण की मांग को लेकर जाटों ने आंदोलन शुरू किया था जिसके बाद हरियाणा में जमकर हिंसा हुई थी.
'कामगारों के मसीहा'
जाट नेताओं का कहना है कि सर छोटूराम को 'जाट मसीहा' कहना उनके क़द को छोटा करने जैसा है.
अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष यशपाल मलिक ने बीबीसी से कहा, "सर छोटू राम का व्यक्तित्व ऐसा था कि उनकी वजह से अविभाजित पंजाब प्रांत में न तो मोहम्मद अली जिन्ना की चल पायी और ना ही हिंदू महासभा की. वो उस पंजाब प्रान्त की सरकार के मंत्री थे जिसका आज दो तिहाई हिस्सा पकिस्तान में है. उन्हें सरकार का मुखिया बनने का अवसर मिला तो उन्होंने कहा कि तत्कालीन पंजाब प्रांत में मुसलमानों की आबादी 52 प्रतिशत थी. इसलिए उन्होंने किसी मुसलमान को ही मुख्यमंत्री बनाने की पेशकश की और खुद मंत्री बने रहे. इसलिए ही उन्हें 'रहबर-ए-हिन्द' की उपाधि दी गयी थी."
जाट नेता सर छोटूराम के राजनीतिक क़द को सरदार पटेल से भी ऊंचा मानते हैं.
उनका कहना है कि दलित और पिछड़े लोगों ने उन्हें 'दीन बंधु' माना जबकि अंग्रेज़ों ने उन्हें 'सर' की उपाधि दी थी. वो उनके काम की वजह से था.
ट्विटर पर मोहम्मद सलीम बालियान ने लिखा, "रहबरे आज़म दीनबंधु चौधरी छोटूराम सिर्फ़ जाटों के मसीहा नहीं थे, बल्कि वे समस्त किसानों और कामगारों के मसीहा थे. एक अज़ीम शख़्सियत को सिर्फ़ जाटों का मसीहा कहना, उनकी तौहीन करने वाली बात है."
सामाजिक कार्यकर्ता और आम आदमी पार्टी से जुड़े कुलदीप काद्यान ने ट्वीट किया, "मोदी जी, सर छोटूराम जाटों के नहीं, बल्कि किसान क़ौम के मसीहा थे. ये सिर्फ़ हरियाणा को जातिवाद के नाम पर लड़वाने वालों की सोच हो सकती है. उनका चेहरा जनता के सामने आ गया है."
हरियाणा के पत्रकार महेंद्र सिंह ने फ़ेसबुक पर लिखा, "महापुरुष किसी जाति विशेष के नहीं होते. ये तो पीएम मोदी ख़ुद कह चुके हैं. फिर हरियाणा में नियम कैसे बदल गया. पीएमओ को ये बयान वापल लेना चाहिए."
हरियाणा के नारनौल से वास्ता रखने वाले ओम नारायण श्रेष्ठ ने लिखा, "यदि मोदी जी सर छोटूराम जी को केवल जाटों का मसीहा समझते हैं तो मेरा विचार है कि वो देश के करोड़ों ग़रीब किसान मजदूरों के नेता का कद छोटा कर रहे हैं."
कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भी ट्वीट किया, "प्रधानमंत्री जी! इस ट्वीट में आपने दीनबंधु रहबरे आज़म सर छोटूराम को जाति के बंधन में बाँधने की कोशिश की है. ये आपकी संकीर्ण वोट बैंक की राजनीति का जीता-जागता सबूत है. जो जाति-धर्म के विभाजन से बाहर नहीं आती."
अब उस ट्वीट को हटा लिया गया है जिसमें उन्हें 'जाटों का मसीहा' कहा गया था.

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2019 का चुनाव प्रचार
कुछ लोग पीएम मोदी की रोहतक रैली को '2019 के चुनाव प्रचार की शुरुआत' भी कह रहे हैं. साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भी पीएम मोदी ने हरियाणा से ही अपने चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत की थी.
रोहतक की रैली में पीएम मोदी ने लंबा भाषण दिया और अपनी सरकार की तमाम उपलब्धियाँ गिनवाईं.
इस रैली में नरेंद्र मोदी ने जनता के बीच एक सवाल रखा कि "सर छोटू राम जैसे महान व्यक्तित्व को एक क्षेत्र के दायरों में ही क्यों सीमित कर दिया गया?"
मोदी ने कहा, "चौधरी साहब को एक क्षेत्र तक सीमित करने से उनके क़द पर तो कोई फ़र्क नहीं पड़ा, लेकिन देश की अनेक पीढ़ियाँ उनके जीवन से सीख लेने से वंचित रह गईं."
नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में ये दावा किया था कि उनकी सरकार देश के लिए जान देने वाले प्रत्येक व्यक्ति का मान बढ़ाने का काम कर रही है.

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सर छोटूराम और सरदार पटेल
इसी महीने 31 अक्तूबर को पीएम मोदी सरदार बल्लभ भाई पटेल की दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा का अनावरण करने वाले हैं.
रोहतक की जनसभा में छोटूराम के याद करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि उनका कद और व्यक्तित्व इतना बड़ा था कि सरदार पटेल ने छोटूराम के बारे में कहा था कि आज चौधरी छोटूराम जीवित होते तो पंजाब की चिंता हमें नहीं करनी पड़ती, छोटूराम जी संभाल लेते.
इसे लेकर भी सोशल मीडिया पर कुछ लोग टिप्पणी कर रहे हैं.
ट्विटर यूज़र प्रिंस ने लिखा है, "सर छोटू राम तो जाट मसीहा हुए. सरदार पटेल की मूर्ति का अनावरण करेंगे तो उन्हें क्या पटेलों का मसीहा बताएंगे? रुपया तो यूँ ही बदनाम हो रहा है. असली गिरावट तो सोच में आ रही है."
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कौन थे सर छोटूराम?
हरियाणा के किसानों के बीच सर छोटूराम एक जाना-पहचाना नाम हैं. सर छोटूराम हरियाणा के रोहतक ज़िले के गढ़ी साँपला गाँव के रहने वाले थे.
इनका असली नाम राम रिचपाल था. चूँकि ये घर में सबसे छोटे थे तो इन्हें छोटू राम कहकर बुलाया जाने लगा. वो रोहतक ज़िले के सांपला गाँव में रहते थे.
प्रारंभिक पढ़ाई के बाद उन्होंने दिल्ली के 'संत स्टीफेंस कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली और फिर एलएलबी पढ़ने वो इलाहाबाद चले गए. फिर पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वापस लौटकर वकालत भी की और इसी दौरान वो कांग्रेस में शामिल हो गए.
मगर 1920 में उन्होंने सभी समुदायों के किसानों को एकजुट करना शुरू कर दिया और एक नए राजनीतिक दल का गठन किया- 'यूनियनिस्ट पार्टी' या ज़मींदाराना लीग. अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में हुए चुनावों में 'यूनियनिस्ट पार्टी' ने चुनाव जीत लिए और सरकार बना ली. तब लाहौर अविभाजित पंजाब प्रांत की राजधानी हुआ करता था.
ब्रिटिशों के शासनकाल में उन्होंने किसानों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी. सर छोटूराम को नैतिक साहस की मिसाल माना जाता है.
ब्रिटिश राज में किसान उन्हें अपना मसीहा मानते थे. वे पंजाब राज्य के एक बहुत आदरणीय मंत्री (राजस्व) थे और उन्होंने वहाँ के विकास मंत्री के तौर पर भी काम किया था. ये पद उन्हें 1937 के प्रोवेंशियल असेंबली चुनावों के बाद मिला था.
राजस्व मंत्री रहते हुए सर छोटू राम की पहल पर दो प्रमुख क़ानून बने. पहला था पंजाब रिलीफ़ इंडेब्टनेस एक्ट 1934 और पंजाब डेब्टर्स प्रोटेक्शन एक्ट 1936 जिससे किसानों को सूदखोरों के चंगुल से मुक्ति मिली. इन क़ानूनों की वजह से किसानों को ज़मीन के अधिकार मिलने का रास्ता साफ़ हुआ.
इसके अलावा उन्हें भाखड़ा बांध बनाने में भी अहम भूमिका निभायी थी.
जाट समुदाय के लोगों के अलावा उन्हें अन्य समुदायों के बीच भी बड़े सम्मान से देखा जाता रहा है क्योंकि सर छोटू राम ने अपनी तनख़्वाह से आर्थिक रूप से कमज़ोर छात्रों की मदद करनी शुरू की. उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अंग्रेज़ी हुकूमत ने उन्हें 'सर' की उपाधि दी थी.
1945 में सर छोटूराम का लाहौर में निधन हो गया. मगर उनके पार्थिव शरीर को रोहतक लाया गया. उनका अंतिम संस्कार उन्हीं के बनाए स्कूल- जाट हीरोज़ मेमोरियल एंग्लो संस्कृत सीनियर सेकेंडरी स्कूल में हुआ. आज भी इस स्कूल में उनकी समाधि है.
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