इसराइल और हमास की लड़ाई से ऐसे तबाह हो रहे हैं ग़ज़ा के ऐतिहासिक स्थल

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- Author, मनार हफीज़
- पदनाम, बीबीसी अरबी
पत्रकार सलेम जमाल अल-दीन का कहना है कि पिछली सात अक्टूबर से चल रहे इसराइल-हमास युद्ध में गज़ा के रहने वाले लोगों को सिर्फ अपने परिवार या प्रियजनों को खोने का दुख नहीं है.
वे कहते हैं कि इस युद्ध ने सबसे ज्यादा उन जगहों को नुकसान पहुंचाया है जो हमारे बचपन से जुड़ी हुई हैं. इन जगहों में खासकर गज़ा का पुराना शहर शामिल है.
पत्रकार सलेम जमाल को इसराइली बमबारी में दो बार अपने परिवार के साथ विस्थापित होना पड़ा है. पहले उन्होंने खान यूनिस में शरण ली और उसके बाद वे रफाह पहुंचे.
सलेम उन ऐतिहासिक और पुरातात्विक जगहों को याद करते हैं, जो उन्हें अपने पिता से विरासत में मिले थे, लेकिन इन महत्वपूर्ण स्थानों को इसराइली बमबारी ने नष्ट कर दिया है.
वे कहते हैं कि इन ऐतिहासिक इमारतों में ग्रेट ओमारी मस्जिद भी शामिल थी, जिसे लेकर इतिहासकारों का मानना है कि वह 1500 साल पुरानी है.
सलेम कहते हैं, "जब तक मैं अल-ओमारी मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ता तब तक मुझे ईद का एहसास नहीं होता. मेरा और मेरे भाई-बहनों का इस मस्जिद से जुड़ाव मेरे पिता की वजह से है, क्योंकि वह उनके बेहद करीब है."
वे कहते हैं, "अल-ओमारी मस्जिद और हे अल दराज से उनकी बचपन की यादें जुड़ी हुई हैं. बचपन में वे अपने परिवार, दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ यहां जाते थे और यहीं उनका अपने पुराने पड़ोसियों से मिलना होता था. हमें यह मस्जिद इसलिए पसंद है क्योंकि यह हमारे पिता के लिए बेहद खास है."
सलेम कहते हैं, "जब मैंने मस्जिद में कदम रखे थे तो मैं आध्यात्मिक भावनाओं से भर गया था और वहां रमजान के आखिरी दस दिनों में अलग ही माहौल होता था."
वे कहते हैं, "मुझे हर ऐतिहासिक चीज पसंद है, क्योंकि मैं ग़ज़ा का रहने वाला हूं. यह शहर घनी आबादी वाला है, जहां ऊंची इमारतें और ओल्ड सिटी मार्केट है, जिसके पास में ही ओमारी मस्जिद और गोल्ड बाजार जैसी ऐतिहासिक जगह हैं."
कितने ऐतिहासिक स्थल नष्ट हुए?

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फलस्तीनी संस्कृति मंत्री अतेफ़ अबू सैफ ने बीबीसी को बताया कि पिछले 60 दिनों से इसराइल ग़ज़ा पर लगातार बमबारी कर रहा है, जिसमें करीब 144 ऐतिहासिक स्थल नष्ट हो गए हैं.
उनके मुताबिक इसमें संग्रहालय, पुरातात्विक जगहें और ग़ज़ा का पुराना शहर शामिल है.
हेरिटेज फॉर पीस ऑर्गेनाइजेशन और अरब सिविल सोसाइटी नेटवर्क फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ कल्चरल हेरिटेज ने मिलकर सात नवंबर को एक रिपोर्ट जारी की थी. इस रिपोर्ट का शीर्षक है- 'हाल के युद्ध का ग़ज़ा की विरासत पर प्रभाव'
इस रिपोर्ट के मुताबिक इसराइल के साथ हमास के इस हाल के युद्ध में कुल 325 ऐतिहासिक स्थल नष्ट हुए हैं.
संस्कृति मंत्री अबू सैफ का कहना है कि ग़ज़ा में सैकड़ों और हजारों साल पुरानी इमारतें बर्बाद हो गई हैं, जिसमें दुनिया की सबसे पुरानी चर्चों में से एक माने जाने वाली सेंट पोर्फिरियस चर्च भी शामिल है, जो 1800 साल पुरानी है.
अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन नहीं

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अबू सैफ कहते हैं कि इस युद्ध में सेंट पोर्फिरियस चर्च के अलावा सैय्यद हशम मस्जिद भी नष्ट हो गई है, जहां पैगंबर मोहम्मद के दादा की कब्र है.
शहर के हर थिएटर, सांस्कृतिक केंद्र और पवित्र स्थानों के नष्ट होने पर ग़ज़ा के स्थानीय लोग काफी दुखी हैं. वे सोशल मीडिया पर इस दुख को जाहिर कर रहे हैं.
हेरिटेज फॉर पीस संगठन के प्रमुख इस्बर सबरीन के मुताबिक फलस्तीनियों को अपने घर तबाह होने से ज्यादा दुख ओमारी मस्जिद के नष्ट होने का है, क्यों यह मस्जिद पुराने ग़ज़ा का प्रतीक है.
इस्बर सबरीन कहते हैं कि इंसानों और ऐतिहासिक स्थलों की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून हैं, लेकिन वे इस बात से हैरान हैं कि ग़ज़ा में कोई इसका पालन नहीं कर रहा है.
वे कहते हैं, "ग़ज़ा में ऐतिहासिक स्थलों को निशाना बनाना यह दिखाता है कि इसराइल जानबूझकर ऐसा कर रहा है ताकि यहां के लोगों का अपनी जमीन से लगाव खत्म हो जाए, क्योंकि ग़ज़ा के प्रतीक फलस्तीनियों की मौजदूगी को दिखाते हैं."
सबरीन कहते हैं कि ग़ज़ा में जो हो रहा है वह मानव नरसंहार के साथ-साथ सांस्कृतिक नरसंहार है.
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इसराइल ने 1954 में सांस्कृतिक संपत्ति की सुरक्षा के लिए हेग इंटरनेशनल कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए हैं.
इसराइली बमबारी में ओमारी मस्जिद के बर्बाद होने पर ग़ज़ा के रहने वाले अमजद अल फयूमी ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा, "अब कोई मालिक नहीं है, कोई पुराना शहर नहीं है और अब ग़ज़ा में कुछ नहीं बचा है."
अल-ओमारी मस्जिद ग़ज़ा में पुराने शहर के केंद्र में स्थित है. इसका क्षेत्रफल 4100 वर्ग मीटर है. यह अपने मजबूत निर्माण, खूबसूरत संगमरमर के स्तंभों और शिलालेखों के लिए जानी जाती है. इस पर मामलुक और ओटोमन युग के समय की छाप देखी जा सकती है.
पुरानी कथाओं के मुताबिक कई चरणों में इस मस्जिद को बनाया गया था. पहले यह एक मंदिर था, जिसे बाद में एक चर्च में बदला गया और फिर जब इस्लामी युग आया तो इसे एक मस्जिद में बदल दिया गया.
कुछ इतिहासकारों का कहना है कि मस्जिद 1,500 साल से अधिक पुरानी है, जबकि कुछ लोगों का कहना है कि मंदिर के रूप में इसकी उम्र लगभग तीन हजार साल है.
ऐतिहासिक स्थलों पर हमले क्यों?

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प्राचीन इतिहास शोधकर्ता ओसामा अबू अल घनम कहते हैं कि कुछ लोग ग़ज़ा को इतिहास का साथी, समुद्र की बहन और रेगिस्तान का पड़ोसी बताते हैं.
वे कहते हैं कि ग़जा की रणनीतिक लोकेशन के चलते इसे लेवंत और मिस्र के बीच एक कड़ी माना जाता है, जिसने इसे कई शक्तियों से बचाने का काम किया है.
ओसामा अबू कहते हैं कि इतिहास किसी भी शहर, लोगों या सभ्यता की पहचान को आकार देने में एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और जब यह नष्ट हो जाता है, तो इसका मतलब शहर की पहचान को मिटाना है.
वे कहते हैं कि ग़ज़ा दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक है. यह करीब पांच हजार साल पुराना है. सबसे पहले इस शहर को बनाने वाले लोग कनानवासी थे और इसका पता ग़ज़ा घाटी के उत्तर में स्थित खंडहरों से लगता है.
ओसामा अब कहते हैं कि पिछले युद्ध में ये खंडहर नष्ट हो गए थे. इसके अलावा ग़ज़ा शहर जॉर्डन में नबातियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण बंदरगाह था और वे इसका इस्तेमाल भूमध्य सागर में व्यापार करने के लिए करते थे.
संस्कृति मंत्री अबू सैफ का कहना है कि उनके मंत्रालय ने फलस्तीनी विरासत की रक्षा के लिए यूनेस्को लिखा है.
इसके अलावा ग़ज़ा के ऐतिहासिक स्थलों को बचाने के लिए अरब विज्ञान और सांस्कृतिक संगठन और इस्लामी विश्व विज्ञान और सांस्कृतिक संगठन को भी मदद करने के लिए कहा गया है.
अबू सैफ के मुताबिक यूनेस्को और अंतरराष्ट्रीय निकायों की मदद से ग़जा के ऐतिहासिक स्थलों और सांस्कृतिक वैभव को फिर से स्थापित करने के लिए राष्ट्रीय योजनाएं विकसित करने की उम्मीद है.
प्राचीन इतिहास के शोधकर्ता ओसामा अबू ने उन ऐतिहासिक स्थलों के बारे में बात की जिन पर इसराइली बमबारी हुई थी.
वे कहते हैं कि इस बमबारी में उत्तरी ग़ज़ा में स्थित बेत लाहिया भी शामिल है, जिसमें रोमन युग का एक प्राचीन मंदिर है और इसके अलावा प्राचीन मठों में से एक सेंट हिलारियन मठ भी है.
ग़ज़ा की सेंट पोर्फिरियस चर्च

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इसराइली बमबारी में हाशेम मस्जिद भी आंशिक रूप से नष्ट हो गई है. इसका क्षेत्रफल करीब 2400 वर्ग मीटर है. इसे ग़ज़ा की सबसे खूबसूरत और सबसे पुरानी मस्जिदों में से एक माना जाता है.
ऐसा माना जाता है कि इसमें गुंबद के नीचे पैगंबर मोहम्मद के दादा हशम बिन अब्द मनाफ की कब्र है.
वर्तमान में जो मस्जिद दिखाई देती है उसका निर्माण ओटोमन युग के समय मामलुक शैली में किया गया था.
युद्ध में सेंट पोर्फिरियस चर्च भी नष्ट हो गई है. युद्ध में अपनी जान बचाने के लिए यहां एक फलस्तीनी नागरिक ने शरण ली हुई थी. इसराइली बमबारी में उनकी भी मौत हो गई है.
यह चर्च, ग़ज़ा में अल जायतौन के पास है, जो ईसाई कब्रिस्तान से घिरी हुई है. इसमें सेंट पोर्फिरियस की कब्र है. स्थानीय रूप से इसे ग्रीक ऑर्थोडॉक्स चर्च के रूप में जाना जाता था.
चर्च का निर्माण 425 ईस्वी में हुआ था, जो इसे दुनिया की सबसे पुराने चर्चों में से एक बनाता है.
फलस्तीनियों के लिए विदेश मामलों की शाखा ने दिसंबर में बयान जारी किया था, जिसके मुताबिक यूनेस्को ने
ग़ज़ा में सेंट हिलारियन के जन्मस्थल उम्म आमेर को उस लिस्ट में डाला था, जिनकी सुरक्षा युद्ध के चलते बढ़ाई गई है.
ऐतिहासिक स्थलों को इस लिस्ट में डालने का मतलब है कि ये लोगों के लिए सांस्कृतिक विरासत हैं और इनका इस्तेमाल सैन्य कामों के लिए नहीं किया जा सकता है.
फ़लस्तीनी पर्यटन मंत्रालय ने पाशा पैलेस के नष्ट होने की निंदा की है. इसराइली बमबारी ने पैलेस के एक बड़े हिस्से को तबाह कर दिया है.
संग्रहालय और लाइब्रेरी पर भी हमला

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मंत्रालय ने समरा स्नान घर की तबाही का भी जिक्र किया है, जो ग़ज़ा के अंदर पुराने शहर में स्थित है. संस्कृति मंत्रालय का कहना है कि समरा स्नानघर पूरी तरह नष्ट हो गया है.
मंत्रालय के मुताबिक यह एकलौता बचा हुआ स्नानघर था, जो करीब एक हजार साल पुराना था, जिसका क्षेत्रफल 500 वर्ग मीटर था. स्नान घर को सामरियों ने बनाया था, यही वजह है कि इसे समरा स्नानघर कहा जाता था.
मंत्री अबू सैफ के मुताबिक अल करारा संग्रहालय को निशाना बनाया गया है. हमले में संग्रहालय आंशिक रूप से नष्ट हो गया है.
उनका कहना है कि संग्रहालय के अलावा कनानी मूर्तियों को भी तबाह किया गया है, जिसमें कनानी और फोनीशियन देवताओं की सबसे पुरानी मूर्ति का सिर शामिल था.
मंत्री के मुताबिक ग़ज़ा के सांस्कृतिक स्थलों पर भी इसराइल बमबारी कर रहा है. वे कहते हैं कि ग़ज़ा की सौ साल पुराने केंद्रीय अभिलेखागार को भी नहीं छोड़ा गया है.
इस केंद्रीय अभिलेखागार में ग़ज़ा शङर के सभी ऐतिहासिक दस्तावेज रखे हुए हैं.
बीबीसी से बातचीत में वे बेडौइन संग्रहालय और रफाह संग्रहालय की तबाही की तरफ भी इशारा करते हैं, जहां 320 से ज्यादा प्राचीन फलस्तीनी पोशाकें रखी हुई हैं.
वे कहते हैं, “ये पोशाकें, इसराइल की उम्र से पांच गुना ज्यादा पुरानी हैं.”
ऐतिहासिक स्थलों पर बमबारी को लेकर इसराइली सेना का कहना है कि ये जगह हमास की सुरंगों या उसके लड़ाकों की संभावित उपस्थिति से जुड़ी हुई हैं.
ग़ज़ा में प्राचीन स्थलों को निशाना बनाए जाने पर अमेरिकी एनजीओ नेशनल पब्लिक रेडियो ने चिंता जताई है और सभी से अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करने की सलाह दी है.
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