पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय को मुसलमान न मानने के 50 साल, अब तक क्या कुछ बदला?

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- Author, ख़ालिद करामत
- पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, लंदन
“हम इस मुल्क के लिए अपनी जान देने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. उसके जवाब में हमसे जो सुलूक होता है और समाज हमें प्रताड़ित करने की कोशिश करता है, उससे न सिर्फ़ हमारे समुदाय बल्कि हर व्यक्ति को ठेस पहुंचती है.”
यह बात रशीद अहमद (सुरक्षा चिंताओं के कारण असली नाम छिपाया गया) ने कही थी. रशीद अहमद के भाई पाकिस्तानी सेना में थे और सियाचिन में ड्यूटी के दौरान उन्होंने अपनी जान गंवा दी थी. बाद में उन्हें सभी आधिकारिक सम्मान मिले, जैसे कि सेना के 'शहीदों' को दफ़नाने की विशेष व्यवस्था.
लेकिन रशीद अहमद के मुताबिक़, उनके भाई को दफ़नाने के कुछ समय बाद, अहमदिया समुदाय से उनके जुड़ाव के आधार पर कुछ चरमपंथी तत्वों ने उनकी क़ब्र के साथ अपमान किया था.
रशीद के मुताबिक़, उनके भाई के शव को क़ब्र में दफ़नाए जाने से कुछ समय पहले, उनके पैतृक इलाक़े में धार्मिक तनाव बढ़ रहा था और क्षेत्र में रहने वाले अहमदिया परिवारों के ख़िलाफ़ नफ़रत और उकसावे की घटनाएं बढ़ रही थीं.

रशीद का कहना है कि उनके भाई की क़ब्र की बेअदबी करने की घटना के बाद मामले की सूचना पुलिस को दी गई और इसके पीछे जो लोग थे, उनकी पहचान भी कर ली गई.
हालांकि, रशीद के मुताबिक़ पुलिस की ओर से उन्हें सिर्फ़ सांत्वना दी गई, जबकि ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकी.
बीबीसी उर्दू से बात करते हुए रशीद ने आगे कहा कि इस स्थिति को देखकर उन्होंने सेना के उच्च अधिकारियों से संपर्क किया, जिस पर ज़िला प्रशासन और स्थानीय पुलिस को क़ानून के मुताबिक़ मामले को सुलझाने के लिए कहा गया.
वो कहते हैं, “इसके बाद पुलिस ने हमें बुलाकार फिर सांत्वना दी और साथ ही कहा कि इधर-उधर दरख़्वास्त न करें.”
रशीद बताते हैं कि उनके परिवार ने सियाचिन में मोर्चे पर पाकिस्तान के लिए अपने भाई का बलिदान दिया था, लेकिन परिवार को बाद में सुरक्षा चिंताओं के कारण अपना पैतृक इलाक़ा ही छोड़ना पड़ा.
लेकिन ये सिर्फ़ रशीद की कहानी नहीं है. अहमदिया समुदाय पर ज़ुल्म की ऐसी कई कहानियाँ आए दिन अख़बारों की हेडलाइन बनती रहती हैं.
इस घटना के अलावा बीबीसी ने प्रशासन से उन घटनाओं पर प्रतिक्रिया जाननी चाही जिनका नीचे ज़िक्र आने वाला है. इसके साथ ही बीबीसी ने अहमदिया समुदाय की रक्षा करने में विफलता का पता लगाने के लिए पंजाब पुलिस और और पाकिस्तान सरकार के आला अधिकारियों से संपर्क किया लेकिन इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक उनकी ओर से सवालों का कोई जवाब नहीं दिया गया.

50 साल से भड़कती आग
वैसे तो अहमदिया समुदाय के ख़िलाफ़ धार्मिक नफ़रत लंबे समय से चली आ रही थी, लेकिन यह आज से क़रीब 50 साल पहले 7 सितंबर 1974 को उस वक़्त और तेज़ हो गई, जब पाकिस्तान की संसद ने एक संवैधानिक संशोधन के ज़रिए अहमदियों को ग़ैर-मुस्लिम घोषित कर दिया.
सितंबर 1974 में हुए इस संवैधानिक संशोधन के बाद उस समय के प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो ने एक रैली में बेहद जोशीला भाषण दिया और कहा, 'देख लें, आपके सामने हमारे कारनामे हैं. आपके सामने हमारी कोशिशें हैं. आप देख लें कि अहमदियों का मुद्दा इस दौर में 90 साल से था, इसी दौर में इसके हल का आख़िरी फ़ैसला भी नेशनल असेंबली ने किया है.’
विश्लेषकों का दावा है कि पूर्व प्रधानमंत्री जिन प्रयासों का ज़िक्र कर रहे थे, उन्ही कोशिशों ने पाकिस्तान को एक ऐसे रास्ते पर डाला जिसने अगले पचास साल में अहमदिया समुदाय के लिए पाकिस्तान की ज़मीन बहुत छोटी कर दी.
सितंबर 1974 में हुए इस संवैधानिक संशोधन के क़रीब 10 साल बाद पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह जनरल ज़िया-उल-हक के शासनकाल के दौरान पाकिस्तानी राष्ट्र एक क़दम और आगे बढ़ा. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि 1984 में पारित इस अध्यादेश के बाद अहमदियों को अपनी आस्था के अनुसार ज़िंदगी गुज़ारना मुश्किल हो गया और उन्हें विभिन्न मुक़दमों का सामना करना पड़ा.
इस अध्यादेश के तहत, अहमदिया समुदाय का कोई भी सदस्य ख़ुद को मुस्लिम घोषित नहीं कर सकता है. साथ ही वो अपने पूजा स्थलों के लिए मस्जिद शब्द का इस्तेमाल नहीं कर सकता है और न ही वो अज़ान दे सकता है. वो 'अस्सलामो अलैकुम' नहीं कह सकता है या 'बिस्मिल्लाह' नहीं पढ़ सकता है. अगर वो इनका उल्लंघन करता है तो उसे तीन साल की सज़ा हो सकती है.
इन क़ानूनों के तहत अहमदिया के तौर पर अपनी आस्था का पालन करना अपराध घोषित किया गया है, लेकिन दूसरी ओर पाकिस्तान के संविधान और क़ानून के मुताबिक़ धर्म या आस्था के आधार पर किसी व्यक्ति को निशाना बनाना भी अपराध है.
सितंबर 1974 में दूसरे संवैधानिक संशोधन के पचास साल बाद अब स्थिति यह है कि सोशल मीडिया पर हर दिन ऐसे वीडियो और क्लिप देखने को मिलते हैं जिनमें अहमदियों के ख़िलाफ़ भड़काऊ बयान जारी किए जाते हैं. यहां तक कि इस अल्पसंख्यक समुदाय की हत्या को अनिवार्य घोषित करने वाली भड़काऊ टिप्पणियां भी देखने को मिलती हैं.

सोशल मीडिया और टीवी पर धार्मिक नफ़रत के बयान
ये मामला सिर्फ़ राजनीतिक या धार्मिक रैलियों तक सीमित नहीं है बल्कि टीवी चैनल्स और सोशल मीडिया पर भी जिस तरह के बयान आते हैं उसके नतीजे में अहमदियों की जानें ख़तरे में पड़ जाती हैं.
बीबीसी उर्दू की टीम ने इस तरह के वीडियोज़ को इकट्ठा किया जो मुल्क में खुलेआम सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप आदि पर शेयर किए जा रहे हैं.
इन वीडियोज़ को मानवाधिकार कार्यकर्ता यासिर लतीफ़ को दिखाया गया तो उन्होंने कहा कि ‘ये साफ़तौर पर क़ानून का उल्लंघन है. यह पीआईसीए एक्ट (यानी प्रिवेंशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम एक्ट 2016) का उल्लंघन है.’
उनका ये भी कहना है कि इस तरह का बयान और उकसावा ‘पाकिस्तान पीनल कोड के सेक्शन 153 ए, और 295 ए का उल्लंघन है क्योंकि आप किसी अल्पसंख्यक समुदाय को उनकी धार्मिक मान्यता की वजह से निशाना बना रहे हैं और ये अपराध है.’
लेकिन इन वीडियोज़ में बयान देते लोग या उन्हें सोशल मीडिया पर फैलाने वाले लोगों के ख़िलाफ़ किसी भी क़िस्म की कोई कार्रवाई नहीं की जाती.
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट क्या कहती है?

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हाल ही में देश के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनसीआरएच) ने अल्पसंख्यक अधिकारों के बारे में एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसका शीर्षक था- ‘मॉनिटरिंग द प्लाइट ऑफ़ द अहमदिया कम्युनिटी’ (अहमदिया समुदाय की दुर्दशा की निगरानी).
यह एक सरकारी रिपोर्ट है जिसमें सरकार से नफ़रत फैलाने वाले भाषण और अहमदियों को निशाना बनाने वाले बयानों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की मांग की गई है.
मानवाधिकार संगठन अतीत में पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय और उनके सामने आने वाली समस्याओं, पूर्वाग्रह और हिंसा के बारे में बात करते रहे हैं, लेकिन पहली बार एक सरकारी रिपोर्ट में पूर्वाग्रह और समस्याओं को स्वीकार किया गया है.
साल 2024 की शुरुआत में पंजाब के हासिलपुर इलाक़े में एक अहमदिया व्यक्ति बुरहान अहमद (असली नाम छिपाया गया है) पर हमला ऐसे ही उकसावे का एक उदाहरण है.
पाकिस्तान के ग़ैर-सरकारी संगठन ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ़ पाकिस्तान (एचआरसीपी) के फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग मिशन के मुताबिक़, इस घटना में दो अज्ञात हमलावरों ने अहमदिया समुदाय के एक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी.
एचआरसीपी की रिपोर्ट के मुताबिक़, स्थानीय ज़िला पुलिस अधिकारी ने उन्हें (आयोग को) बताया कि दो युवा लड़कों ने एक स्थानीय मस्जिद में भड़काऊ भाषण के बाद अहमदिया समुदाय के एक व्यक्ति की हत्या कर दी और बाद में अपने कथित कबूलनामे में कहा, 'उन्होंने ऐसा एक धार्मिक व्यक्ति की ओर से दिए गए फ़तवे के आधार पर और जन्नत जाने के लिए किया.’
एचआरसीपी की ही फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग मिशन के मुताबिक़, इस हमले से पहले अहमदिया समुदाय ने इस उकसावे के बारे में पुलिस से शिकायत की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई.
इस घटना के बाद जान के ख़तरे को देखते हुए मृतक के परिजनों को अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थान पर जाना पड़ा.
पुलिस की एफ़आईआर के मुताबिक़, शख़्स की हत्या सुबह 6:30 बजे की गई, लेकिन पीड़ित की पत्नी उमता अलबारी (फ़र्ज़ी नाम) ने बीबीसी उर्दू को बताया कि पुलिस 12:00 बजे के बाद घटनास्थल पर पहुंची थी.
बीबीसी टीम को स्थिति समझाते समय उमता अलबारी रोने लगीं. उन्होंने बताया कि अपने बेटे के साथ 'जब मैंने जाकर देखा तो मेरे पति मृत पड़े थे, वहां काफ़ी लोग जमा थे.'
उमता अलबारी ने आगे कहा कि 'मुझसे वो मंज़र बर्दाश्त ही नहीं हुआ, आप सोचिए कि उस वक़्त क्या एहसास होगा जब एक बच्चे के सामने उसका बाप मुर्दा हालत में घंटों ज़मीन पर पड़ा हो.’
एचआरसीपी की रिपोर्ट में कहा गया है कि पुलिस ने कथित तौर पर पीड़ित के रिश्तेदारों को सलाह दी कि वे हत्या को आस्था आधारित हिंसा का मामला न कहें.
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़े क्या कहते हैं?

एनसीएचआर की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अहमदिया समुदाय के ख़िलाफ़ धार्मिक कट्टरता और उनकी ज़िंदगियों और संपत्ति को ख़तरा एक तत्काल समस्या है जिसके लिए सरकार द्वारा तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है.
रिपोर्ट के अनुसार, 1984 के बाद से अहमदिया समुदाय के 280 लोगों को सिर्फ़ उनकी धार्मिक आस्था के कारण मार दिया गया है और 415 अन्य लोगों पर उनकी आस्था के कारण हमला किया गया है.
अगर ज़िंदा रहते हुए अहमदिया समुदाय की सुरक्षा नहीं की गई तो मरने के बाद भी उन्हें वह सुरक्षा नहीं मिलती जो राष्ट्र की ज़िम्मेदारी है.
इस रिपोर्ट के मुताबिक़, जनवरी 2023 से सितंबर 2023 (नौ महीने) तक के आंकड़ों की जांच की जाए तो यह काफ़ी परेशान करने वाला है.
रिपोर्ट के मुताबिक़, 39 मामलों में अहमदिया समुदाय के लोगों के शवों को दफ़नाने के बाद क़ब्रों से बाहर निकाल लिया गया, 99 मामलों में क़ब्रों की बेअदबी की गई और 96 मामलों में अहमदिया समुदाय के सदस्यों को सामान्य क़ब्रिस्तानों में दफ़नाने की अनुमति नहीं दी गई.
आए दिन होने वाले हमलों से जहां अहमदियों की जान ख़तरे में है, वहीं पिछले कुछ सालों में अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक स्थलों पर हमले भी तेज़ हो गए हैं.
कुछ समय पहले, पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में स्थानीय लोगों की भीड़ ने अहमदिया समुदाय के धार्मिक स्थल पर हमला किया और पुरुषों और महिलाओं को निशाना बनाया. इस हमले से पहले इलाक़े में अहमदिया समुदाय के साथ तनाव भी बढ़ रहा था.
अहमदिया समुदाय के नेताओं ने बीबीसी को बताया कि हमले से पहले उन्हें डराया गया और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई, लेकिन मामले को पुलिस के ध्यान में लाने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई.
वह इलाक़ा जहां अहमदिया समुदाय को कोई समस्या नहीं है
लेकिन पाकिस्तान में ऐसे इलाक़े भी हैं जहां अहमदिया समुदाय अपने पड़ोसियों के साथ चैन-सुकून से रहते हैं और जहां स्थानीय आबादी को अहमदिया समुदाय और उनके धार्मिक स्थलों से कोई समस्या नहीं है. इसके बावजूद इन धार्मिक स्थलों को भी नुक़सान पहुंचाया गया है.
पंजाब का शेख़ूपुरा शहर ऐसा ही एक इलाक़ा है. जब देश के अन्य शहरों से अहमदिया समुदाय के धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने की ख़बरें आने लगीं तो यहां की स्थानीय आबादी ने आगे आकर ये बात साफ़ कर दी कि उन्हें कोई समस्या नहीं है.

बीबीसी उर्दू ने स्थानीय समुदाय से एक दस्तावेज़ प्राप्त किया है, जिस पर क्षेत्र के धार्मिक और स्थानीय नेताओं ने हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें कहा गया है कि उन्हें क्षेत्र में रहने वाले अहमदिया समुदाय या उनके धार्मिक स्थल से कोई समस्या नहीं है.
बीबीसी उर्दू ने दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करने वाले एक व्यक्ति से संपर्क किया, जिसने कहा कि स्टाम्प पेपर पर हस्ताक्षर करने के बाद, उसे और अन्य हस्ताक्षरकर्ताओं को चरमपंथियों ने धमकी दी और प्रताड़ित किया गया.
उसी इलाक़े के एक अन्य व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि "हम तो भाइयों की तरह रहते हैं. हमारे रिश्ते ठीक चल रहे हैं.”
हालाँकि इस मामले में स्थानीय आबादी को कोई समस्या नहीं थी, लेकिन कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि कभी-कभी सरकारी संस्थाएँ ख़ुद अहमदिया समुदाय के ख़िलाफ़ पक्षपातपूर्ण कार्रवाइयों में शामिल होती दिखाई देती हैं.
और इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ जब कथित तौर पर एक चरमपंथी धार्मिक समूह के दबाव में स्थानीय पुलिस ने कार्रवाई की और यहां अहमदिया समुदाय के धार्मिक स्थल के कुछ हिस्सों को ध्वस्त कर दिया.
हाल ही में विभिन्न धार्मिक समूहों के साथ-साथ धार्मिक और राजनीतिक पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) पर अहमदिया समुदाय के ख़िलाफ़ हिंसा, उनके ख़िलाफ़ भड़काऊ बयान और पुलिस पर दबाव के आरोप लग रहे हैं.
इन आरोपों पर उनकी स्थिति जानने के लिए बीबीसी उर्दू ने टीएलपी से संपर्क किया है.
तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान के केंद्रीय उप महासचिव मुफ़्ती अमीर अल-अज़हरी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि “तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान जो भी क़दम उठाता है वह क़ानून के मुताबिक़ है. अहमदिया समुदाय के किसी भी धार्मिक स्थल को मुसलमानों की शैली में बनाना, उनकी मीनारों को मस्जिदों की शैली में बनाना, उन्हें मस्जिद का नाम देना क़ानूनी रूप से प्रतिबंधित है. इस्लाम के रीति-रिवाजों के मुताबिक़ और क़ानूनी-संवैधानिक तौर पर वे बाध्य हैं कि वे ऐसे धार्मिक स्थल नहीं बना सकते.”
अहमदिया समुदाय की इबादतगाहों पर हमले के आरोपों पर मुफ़्ती अमीर ने कहा कि ''जब भी वे ग़ैर-क़ानूनी क़दम उठाते हैं, तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान के नेता, कार्यकर्ता हमेशा क़ानूनी क़दम उठाते हैं, ग़ैरक़ानूनी नहीं.''
बीबीसी उर्दू ने तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान के नेता से ये भी सवाल किया कि सोशल मीडिया और रैलियों में भड़काऊ बयान देना भी पाकिस्तान के संविधान और क़ानूनों के तहत अवैध हो सकता है. इस सवाल पर अज़हरी ने कहा, “अगर कोई बात संदर्भ से हटकर कही जाएगी और अगर उसके बुनियादी सिद्धांतों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तो तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान के नेताओं के प्रति आपका यही रवैया होगा.”
अहमदिया धार्मिक स्थलों में तोड़फोड़

मानवाधिकार की सरकारी संस्था एनसीएचआर की रिपोर्ट, जिसमें केवल जनवरी 2023 से सितंबर 2023 तक का डेटा शामिल है, वो एक परेशान करने वाली तस्वीर पेश करती है. इस आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस अहमदिया धार्मिक स्थलों को नुक़सान पहुंचाने की कई घटनाओं में शामिल थी या उस समय मौजूद थी.
कुछ धार्मिक समूहों का दावा है कि पाकिस्तान के क़ानूनों के मुताबिक़ अहमदिया मुस्लिम धार्मिक स्थलों की शैली में अपने धार्मिक स्थल नहीं बना सकते हैं और इस वजह से, पिछले कुछ सालों में कई अहमदिया धार्मिक स्थलों के कुछ हिस्सों को ध्वस्त कर दिया गया है.
हालाँकि, कानूनी विशेषज्ञ इस संबंध में एक अदालती फ़ैसले की अनदेखी की ओर इशारा करते हैं, जिसमें इस संबंध में लाहौर हाई कोर्ट का एक निर्णय स्पष्ट है, जिसमें कहा गया है कि यह क़ानून 1984 से पहले बने अहमदिया धार्मिक स्थलों पर लागू नहीं होता है.
बीबीसी उर्दू ने शेखूपुरा में जिस अहमदिया धार्मिक स्थल का दौरा किया, उसका निर्माण 1962-63 में किया गया था और लाहौर हाई कोर्ट के संदर्भ में इसे क़ानून के दायरे में नहीं आना चाहिए था. शेख़ूपुरा में रहने वाले एक स्थानीय अहमदिया ने कहा कि अहमदिया समुदाय ने "लाहौर हाई कोर्ट के फ़ैसले के बारे में पुलिस को भी सूचित किया था."
बीबीसी उर्दू ने अहमदिया समुदाय के ख़िलाफ़ नफ़रत को रोकने में विफलता और कुछ मामलों में मिलीभगत के आरोपों के संबंध में पंजाब पुलिस की स्थिति जानने की कोशिश की, लेकिन अभी तक पंजाब पुलिस की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है.
क़ानूनी विशेषज्ञ यासिर लतीफ़ हमदानी के मुताबिक़, धार्मिक स्थलों के ख़िलाफ़ इस तरह की पुलिस कार्रवाई 'संविधान का उल्लंघन और क़ानून का उल्लंघन दोनों है.'
वह कहते हैं कि पाकिस्तान में, 'मिसाल (पिछली मिसाल या उदाहरण) का पालन किया जाता है और लाहौर हाई कोर्ट द्वारा निर्धारित मिसाल के तहत, ये क़ानून 1984 से पहले बने अहमदिया धार्मिक स्थलों पर लागू नहीं होता.'
अहमदिया समुदाय के धार्मिक स्थलों की मीनार गिराने और उन्हें नुक़सान पहुंचाने के मामले में पुलिस की मिलीभगत के आरोपों के बारे में यासिर लतीफ़ हमदानी का कहना था कि वो (पुलिस) इन पूजा स्थलों को 'ध्वस्त' नहीं कर सकते हैं.
वो आगे कहते हैं कि 'यह लाहौर हाई कोर्ट का फ़ैसला था, इसलिए अगर इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ अदालत की अवमानना याचिका दायर की जाती है, तो इस बात की प्रबल संभावना है कि अदालत पुलिस की इस कार्रवाई को असंवैधानिक और अवैध घोषित करेगी.'
बीबीसी उर्दू के कार्यक्रम सैरबीन पर बोलते हुए पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता मुनीज़े जहांगीर ने कहा, "हम देखते हैं कि हर साल वे (अहमदिया) अधिक असुरक्षित होते जा रहे हैं."
वो कहते हैं, 'अगर आप उनके (अहमदिया समुदाय) ख़िलाफ़ क़ानून बनाना शुरू कर देंगे तो उनकी सुरक्षा करने की जगह आप उनको और असुरक्षित कर रहे हैं.'
उन्होंने कहा कि ‘उनके (अहमदिया समुदाय) लिए ज़मीन तंग होती जा रही है और इसमें राष्ट्र का बहुत बड़ा हाथ है. अगर राष्ट्र अपनी ताक़त उनके धार्मिक गिरोहों के पीछे डाल देता है तो जो अहमदियों का शोषण करते हैं तो ज़ाहिर अहमदिया समुदाय अपने आप को असुरक्षित समझेगा.’

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गहराता पूर्वाग्रह
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में माना गया है कि पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय की जान, संपत्ति, पूजा स्थल और यहां तक कि क़ब्रें भी सुरक्षित नहीं हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, अहमदियों के ख़िलाफ़ मामले और न्यायिक कार्यवाही, एक या दो व्यक्तियों के ख़िलाफ नहीं, बल्कि पूरे समुदाय और क्षेत्रों के निवासियों के ख़िलाफ़, क़ानूनी व्यवस्था में एक 'प्रणालीगत' या 'संस्थागत' पूर्वाग्रह का संकेत देती है.
बीबीसी से बात करने वाले विशेषज्ञों के मुताबिक़, सरकार और राष्ट्र या तो अहमदिया समुदाय के साथ हो रहे अन्याय को नज़रअंदाज़ करते हैं या (कुछ मामलों में) उन अन्यायों में भागीदार बन जाते हैं.
मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार मुनीज़े जहांगीर का कहना है कि अगर राष्ट्र की मानसिकता यह है कि वह अहमदिया समुदाय के साथ भेदभाव करने या उन्हें अपमानित करने के लिए क़ानून बना रहा है, तो यह बहुत मुश्किल है.
“अगर सरकार उनकी रक्षा करना चाहती है तो उसका रवैया और नीतियां अलग होनी चाहिए. और अगर वे उनकी रक्षा नहीं करना चाहते, तो आज का जो पाकिस्तान है अहमदियों के लिए वही होगा.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित


















