पीएम मोदी ने रूस जाने का जो समय चुना, उस पर क्यों हो रही है बहस

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आठ और नौ जुलाई को दो दिन के रूस दौरे पर रहेंगे.
तीसरी बार सत्ता संभालने के बाद पीएम मोदी का ये पहला रूस दौरा है और पहला द्विपक्षीय विदेशी दौरा भी.
पीएम मोदी का ये रूस दौरा कई मायनों में अहम है.
एक तरफ़ चीन से रूस की बढ़ती नज़दीकियां तो दूसरी तरफ़ रूस विरोधी माने जाने वाले गुट नेटो की बैठक के वक़्त पीएम मोदी का रूस दौरा.
आमतौर पर रूस-भारत के बीच होने वाली ये सालाना बैठक साल के अंत में होती है. ऐसे में इस दौरे के वक़्त को लेकर अंतरराष्ट्रीय मामलों के कई जानकार सवाल उठा रहे हैं.
इस बारे में भी भारत के विदेश मंत्रालय की भी प्रतिक्रिया आई है.

नेटो समिट और पीएम मोदी का रूस दौरा
पीएम मोदी जिस दिन रूस के दौरे पर जा रहे हैं, उसी दिन अमेरिका में नेटो समिट होना है. ये समिट रूस-यूक्रेन संघर्ष पर केंद्रित हो सकता है.
नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन यानी नेटो दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1949 में बना था.
इसे बनाने वाले अमेरिका, कनाडा और अन्य पश्चिमी देश थे. इसे इन्होंने सोवियत यूनियन के ख़िलाफ़ बनाया था. तब दुनिया दो ध्रुवीय थी. एक महाशक्ति अमेरिका था और दूसरी सोवियत यूनियन. अब जब सोवियत यूनियन टूट कर रूस बचा है तो इसे रूस के ख़िलाफ़ माना जाता है.
रूस और यूक्रेन बीते ढाई साल से युद्ध कर रहे हैं. इस युद्ध के कारण दुनिया के कई देश दो धड़ों में बँट गए हैं.
एक तरफ़ वो देश हैं, जो रूस के ख़िलाफ़ हैं. दूसरी तरफ़ वो देश हैं, जो रूस के साथ हैं.
ऐसा ही एक मज़बूत धड़ा है नेटो. इसी लिहाज़ से नेटो का ये समिट अहम माना जा रहा है.
ऐसे में क्या पीएम मोदी के दौरे को नेटो समिट के जवाब के तौर पर देखा जाना चाहिए?
भारत के विदेश सचिव विनय क्वात्रा ने मीडिया से कहा कि पीएम मोदी का ये दौरा पूरी तरह द्विपक्षीय है.
विदेश मंत्रालय ने जानकारी दी कि जब पुतिन और मोदी मिलेंगे तो दोनों नेताओं के बीच यूक्रेन संघर्ष पर भी बात होगी. ख़ासकर रूसी सेना की ओर से भारतीयों को भर्ती किए जाने के मुद्दे पर ज़ोर रहेगा.
क्वात्रा ने बताया कि क़रीब 30-45 भारतीय नागरिक रूसी सेना में अवैध तरीके से भर्ती किए गए और पीएम मोदी इन सैनिकों को जल्दी छोड़े जाने की गुज़ारिश कर सकते हैं.
दोनों देशों के बीच 2021 के सालाना समिट के बाद से कई मुद्दे लंबित हैं. दोनों देशों के बीच व्यापार, कनेक्टिविटी, स्पेस, तेल, एलएनजी, डिफेंस सप्लाई, भुगतान संबंधी विषयों पर बात हो सकती है.
वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की मेज़बानी में नेटो की 75वीं सालगिरह का ख़ास समिट होना है. इस समिट में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की भी शिरकत करेंगे.
पुतिन, मोदी और भारत-रूस संबंध

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भारत-रूस के बीच आख़िरी वार्षिक समिट नई दिल्ली में छह दिसंबर 2021 को हुआ था, तब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन भारत दौरे पर थे.
2020 में कोविड महामारी के कारण यह वार्षिक बैठक नहीं हो पाई थी.
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक पीएम मोदी रूस दौरे पर नहीं गए थे. पीएम मोदी आख़िरी बार सितंबर 2019 में रूस गए थे.
हालांकि इन दौरों के ना होने से दोनों देशों के बीच संबंधों में किसी तरह की कोई कमी नहीं आई थी.
पुतिन कई मौक़ों पर पीएम मोदी की तारीफ़ करते नज़र आते रहे हैं.
हालांकि जब सितंबर 2023 में भारत में जी-20 समिट हुआ था, तब इसमें पुतिन नहीं आए थे. हाल ही में एससीओ समिट में पुतिन गए थे पर मोदी नहीं गए थे.
जी-20 समिट के अंत में जारी किए जाने वाले साझे बयान पर भी रूस और चीन ने सहमति जता दी थी. इस बयान पर सहमति को भारत की सफलता के तौर पर देखा गया था. साझे बयान की भाषा पर रूस ने आपत्ति नहीं जताई थी.
इससे पहले जब यूक्रेन युद्ध के कारण पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए थे, तब आलोचनाओं के बावजूद भारत ने रूस से तेल ख़रीदना जारी रखा था.

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क्या बोले जानकार
पूर्व विदेश सचिव और 2004 से 2007 के बीच रूस में भारत के राजदूत रहे कंवल सिब्बल ने आरटी वेबसाइट पर एक लेख लिखा है.
इस लेख में सिब्बल कहते हैं, ''अपनी सरकार का तीसरा कार्यकाल शुरू करते ही पीएम मोदी का दौरा रूस से संबंधों की अहमियत को बताता है. भारत इस मामले में पश्चिमी देशों से अलग खड़ा है. साथ ही भारत अमेरिका की क़रीबी भी बढ़ी है.''
सिब्बल के मुताबिक़, भारत ने पश्चिमी प्रतिबंधों को मानने से इनकार कर दिया था. यहां तक कि भारत एक वक़्त में रूस से सबसे ज़्यादा तेल लेने वाला देश बन गया था.
सिब्बल लिखते हैं, ''मोदी कुछ दिन पहले जी-7 सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए इटली गए. अब जब घरेलू राजनीति में बड़ी चीज़ें हो रही हैं, तब वो रूस के दौरे पर जा रहे हैं. साफ़ है कि मोदी संतुलन बनाए रखना चाहते हैं. पीएम मोदी इन दौरों से वैसी धारणा नहीं बनने देना चाहते कि राष्ट्रीय स्तर पर कमज़ोर सरकार और मज़बूत विपक्ष होने के कारण विदेश नीति में किसी तरह का बदलाव होगा. भारत अपने हितों को प्राथमिकता देता रहेगा.''
कुछ दिन पहले क़ज़ाख़स्तान में शंघाई सहयोग सगंठन यानी एससीओ समिट हुआ था. इस समिट में पीएम मोदी नहीं, विदेश मंत्री एस जयशंकर को भेजा गया था.
सिब्बल ने कहा- एससीओ में रूस की अहम भूमिका है. रूस जाकर पीएम मोदी एससीओ समिट में शामिल ना होने की भरपाई कर रहे हैं. मोदी का रूस दौरा द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई आयाम वाला है.

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चीन कनेक्शन
चीन और रूस एससीओ के अहम देश हैं.
राष्ट्रपति बनने के बाद पुतिन ने अपना पहला विदेश दौरा चीन का किया था. इस दौरे से रूस की चीन पर निर्भरता पता चली, जिस पर भारत भी निगाह रखे हुए था.
मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज़ एंड एनालिसिस की एसोसिएट फेलो स्वास्ति राव ने ब्लूमबर्ग से कहा, ''रूस और चीन के गहराते रिश्ते भारत को असहज कर रहे हैं. ये ऐसा है कि आपका सबसे पक्का दोस्त आपके दुश्मन के साथ रोमांस कर रहा हो. इन्हीं चिंताओं को देखते हुए पीएम मोदी का रूस जाकर पुतिन से मिलना समझ में आता है.''
अतीत में पीएम मोदी सत्ता में आते ही पड़ोसी देश भूटान, मालदीव, श्रीलंका और नेपाल जाते रहे हैं. इस बार मोदी ने ऐसा नहीं किया.
मोदी रूस के बाद वियना के दौरे पर जाएंगे. कोई भारतीय पीएम 40 साल बाद ऑस्ट्रिया के दौरे पर जा रहा है.
भारत रूस के संबंधों में तेल ख़रीद एक बड़ा मुद्दा रहा है. अप्रैल में आईसीआरएक की छपी एक स्टडी के मुताबिक़, भारत ने बीते 23 महीनों में रूस से तेल ख़रीदकर क़रीब 13 अरब डॉलर बचाए हैं.
अंतरराष्ट्रीय मामलों के एक जानकार ने ब्लूमबर्ग से कहा- मोदी के रूस दौरे पर पुतिन ये दिखाना चाहते हैं कि रूस अंतराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग नहीं पड़ा है और ये उसके लिए काफ़ी अहम है.
वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत रूस से अपने संबंधों में ज़ोर चीन को जवाब देने के लिए भी कर रहा है.
शीत युद्ध के दौर से सोवियत संघ भारत का क़रीबी रहा है. लेकिन हाल के सालों में चीन के उभार ने भारत और अमेरिका को भी क़रीब ला दिया है.
जानकारों का कहना है कि भारत ये दिखाना चाहता है कि रूस के पास विकल्प हैं, वो अलग-थलग नहीं है और उसे अपने सारे अंडे चीनी टोकरी में रखने की ज़रूरत नहीं है.
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र माने जाने वाले ग्लोबल टाइम्स के सोशल मीडिया हैंडल पर लिखा गया- मोदी के रूस दौरे को पश्चिमी देशों की ओर से हैरत भरे क़दम के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. अमेरिका के हाथ की कठपुतली बनने की बजाय भारत अपनी विदेश नीति को अपना रहा है, जो उसके लिए अच्छा है.

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अमेरिका के रुख़ पर सवाल
रॉ में रह चुके विक्रम सूद ने सोशल मीडिया पर लिखा, ''अमेरिका का रवैया रहा है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाते रहो. कुछ स्थायी, कुछ अस्थायी. रूस, ईरान और चीन... अमेरिका उम्मीद करता है कि बाक़ी उसे मानें. वो ये समझता नहीं है कि सिर्फ़ एक की ही चलेगी, ऐसा ज़रूरी नहीं.''
कंवल सिब्बल ने कहा- भारत की विदेश नीति में अमेरिका की अपनी जगह है और रूस की अपनी. भारत और ग्लोबल साउथ पुतिन को ख़ारिज नहीं करते हैं.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुछ दिन पहले ही रूसी दूत वेस्सिली नेबेन्ज़िया ने कहा था- भारत रूस का पुराना दोस्त रहा है, उम्मीद करिए कि दोनों देशों के संबंध और निखरेंगे.
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार डेरेक जे ग्रॉसमैन ने कहा- वॉशिंगटन में यूक्रेन के मसले पर नेटो समिट होने जा रहा है और मोदी पुतिन के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करने के लिए मिल रहे हैं. ये पश्चिम के लिए अपमानजनक है.
ग्रॉसमैन लिखते हैं, ''भारत कब इस बात को समझेगा कि रूस से रणनीतिक संबंधों से चीन-रूस संबंध पर कोई असर नहीं होगा. रूस और चीन के बीच अहम असीमित साझेदारी हो गई है. मोदी उस पुतिन से मिलने जा रहे हैं, जो कहते हैं कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में तालिबान रूस का साथी है.''
भारत-रूस संबंधों पर अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विश्लेषक प्रोफ़ेसर जॉन मिएरशाइमर ने कहा- ''ज़्यादातर भारतीय समझते हैं कि यूक्रेन और पश्चिम के साथ खड़े रहना सही पॉलिसी नहीं है. अमेरिका चाहता है कि भारत यूक्रेन के मसले पर पश्चिम के साथ रहे और रूस के ख़िलाफ़ जाए. भारत इससे सहमत नहीं है.''

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भारत और रूस एक-दूसरे पर कितना निर्भर?
2023-2024 में भारत और रूस के द्विपक्षीय व्यापार में इजाफा देखने को मिला है. दोनों देशों के बीच क़रीब 65 अरब डॉलर का व्यापार हुआ. इस व्यापार की अहम वजह ऊर्जा है.
भारत ने रूस को चार अरब डॉलर का निर्यात किया और रूस से 60 अरब डॉलर का आयात किया. यानी भारत रूस से जितना सामान ले रहा है, उतना रूस को भेज नहीं रहा है.
रूस भारत का एनर्जी और डिफेंस सेक्टर के मामले में अहम सहयोगी है.
रूस भारत का बड़ा हथियार सप्लायर रहा है.
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक़, साल 2017-2022 के बीच भारतीय रक्षा आयात में रूस की हिस्सेदारी 62% से गिरकर 45% हो गई थी.
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट का कहना था कि भारत में हथियारों का उत्पादन बढ़ने और यूक्रेन पर आक्रमण के कारण हथियारों के निर्यात में आ रही बाधाओं के कारण रूस से हथियारों की सप्लाई घटी.
भारतीय सेना में रूस के बनाए टैंक्स, राइफल्स इस्तेमाल होते हैं. वायुसेना रूस के बनाए सुखोई लड़ाकू विमान और एम-17 हेलिकॉप्टर इस्तेमाल करती है.
हालांकि नवंबर 2023 को द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट में कहा गया था कि रूस यूक्रेन युद्ध के बाद हथियारों की कमी से जूझ रहा है और उसने भारत समेत कई देशों को की जाने वाली हथियारों की सप्लाई रोकी है.

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भारतीय सेना और रूस
भारतीय वायु सेना रूसी सुखोई एसयू-30 एमकेआई, मिग-29 और मिग-21 लड़ाकू विमानों पर निर्भर है.
इसके अलावा आईएल-76 और एंटोनोव एएन-32 ट्रांसपोर्ट विमान, एमआई-35 और एमआई-17वी5 हेलिकॉप्टर हैं और कुछ वक़्त पहले ली गई एस-400 वायु रक्षा प्रणाली भी रूसी है.
भारत की सेना रूसी T72 और T90 युद्धक टैंकों का इस्तेमाल करती है, नौसेना का आईएनएस विक्रमादित्य विमान वाहक पोत पहलेएडमिरल गोर्शकोव था.
भारत की नौसेना आइएल 38 समुद्री निगरानी विमान और कामोव के-31 हेलिकॉप्टर भी उड़ाती है.
भारत के पास रूस से पट्टे पर ली हुई एक परमाणु पनडुब्बी है और वह भारत को अपनी परमाणु पनडुब्बी बनाने में भी मदद कर रहा है.
भारत लगातार इस बात की कोशिश कर रहा है कि रूस से हथियारों की खरीदारी कुछ कम हो.
कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत सरकार की रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता ही एकमात्र सही पॉलिसी है.
पीएम मोदी के रूस दौरे से पहले भारत-रूस के साझा उपक्रम इंडो रसिएन राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड ने 35 हज़ार एके-203 राइफल्स की सप्लाई भारतीय सेना को की है.
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