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पुतिन ने बताया, सीरिया से बशर अल-असद के जाने से इसराइल को सबसे ज़्यादा फ़ायदा, तुर्की पर भी बोले
सीरिया से इसी महीने बशर अल-असद के शासन ख़त्म होने को रूस की हार के रूप में भी देखा जा रहा था.
लेकिन गुरुवार को वार्षिक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस बात को ख़ारिज कर दिया कि सीरिया में रूस के नौ सालों तक का हस्तक्षेप नाकाम रहा.
हालांकि पुतिन ने बशर अल-असद के जाने के बाद सीरिया में इसराइल के सैन्य ऑपरेशन पर चिंता जताई है.
वार्षिक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पुतिन से सीरिया को लेकर कई सवाल पूछे गए. पुतिन ने कहा कि सीरिया के नए शासक के सामने रूस ने प्रस्ताव रखा है कि वहाँ मौजूद रूस के एयर फोर्स और नेवी के बेस को रहने दिया जाए.
सीरिया की सत्ता पर इस्लामिक विद्रोही गुटों के नियंत्रण के बाद पुतिन ने पहली बार प्रतिक्रिया दी है.
बशर अल-असद अभी रूस में ही रह रहे हैं. पुतिन ने कहा कि असद से अभी उनकी मुलाक़ात नहीं हुई है, लेकिन वह मिलने की योजना बना रहे हैं.
सीरिया में रूसी हस्तक्षेप का किया बचाव
पुतिन ने सीरिया में 2015 से जारी रूस के सैन्य हस्तक्षेप का बचाव करते हुए कहा कि इससे सीरिया को 'आतंकवादियों के गढ़' बनने से बचाने में मदद मिली है.
पुतिन ने कहा कि सीरिया के मौजूदा हालात से इसराइल को सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ है.
सीरिया से असद की सत्ता जाते ही इसराइली सैनिक सीरियाई क्षेत्र के बफ़र ज़ोन में घुस गए थे.
यही बफ़र ज़ोन इसराइली क़ब्ज़े वाले गोलान हाइट्स को अलग करता है. इसराइल ने हवाई हमला करके सीरियाई सेना के हथियारों और ठिकानों को नष्ट किया था.
पुतिन ने कहा कि सीरिया के किसी भी हिस्से पर क़ब्ज़े का रूस विरोध करता है. रूसी राष्ट्रपति ने कहा कि इसराइल सीरिया में 25 किलोमीटर अंदर तक घुस गया है.
रूसी राष्ट्रपति ने कहा, ''रूस उम्मीद करता है कि इसराइल सीरियाई क्षेत्र से हट जाएगा. लेकिन मुझे लगता है कि इसराइल यहाँ से हटने की बजाय ख़ुद को और मज़बूत करेगा.''
पुतिन ने कहा कि तुर्की भी सीरिया में हस्तक्षेप कर रहा है लेकिन उसकी अपनी सुरक्षा चिंताएं हैं. तुर्की कुर्दिश लड़ाकों को आतंकवादी मानता है.
उन्होंने कहा, ''तुर्की दक्षिणी मोर्चे पर अपनी सुरक्षा की कोशिश कर रहा है. उसकी कोशिश है, ऐसा माहौल तैयार हो कि सीरियाई शरणार्थी वापस जा सकें. सीरिया में जो कुछ भी हुआ, उसका मुख्य रूप से फ़ायदा इसराइल को हुआ है.''
'सीरिया को अफ़गानिस्तान बनने से बचाना मक़सद'
साल 2011 में सीरिया में गृह युद्ध शुरू होने के बाद से तुर्की में लाखों सीरियाई शरणार्थी आ गए थे और अब भी हैं.
पुतिन ने कहा, ''मुझे पता है कि सीरिया में कई समस्याएँ हैं. लेकिन हम अंतरराष्ट्रीय नियमों के साथ खड़े हैं. हर किसी की संप्रभुता का सम्मान होना चाहिए. सीरिया के ज़्यादातर लोग चाहते हैं कि रूस का सैन्य ठिकाना वहाँ रहे. इसे लेकर हमारी बातचीत चल रही है.''
पुतिन का कहना है, ''हमलोग 10 साल पहले सीरिया में दाखिल हुए थे. हमारा मक़सद यही था कि सीरिया को आतंकवादियों का गढ़ नहीं बनने देना है. जैसा कि हम अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों में देख चुके हैं. हम इस मक़सद को हासिल करने में कामयाब रहे हैं."
"जिन विद्रोही गुटों ने सीरिया सरकार को बेदख़ल किया, उनमें आंतरिक रूप से बड़ी तब्दीली आई है. यूरोप के देश और अमेरिका सीरिया के विद्रोही गुटों से संबंध बेहतर करना चाह रहे हैं. अगर ये आतंकवादी संगठन थे तो पश्चिम के देश दोस्ती का हाथ क्यों बढ़ा रहे हैं?"
"इसका मतलब है कि उनमें तब्दीली आई है. क्या ऐसा नहीं है? इसका मतलब यह भी है कि जो हम सीरिया में चाहते थे, उसे हासिल करने में कामयाब रहे हैं.''
रूस का पीछे हटना
जब पिछले हफ़्ते सीरिया में विद्रोही गुटों के सामने बशर अल-असद की सेना हार रही थी तो रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोफ़ दोहा फ़ोरम में शामिल होने क़तर गए थे.
दोहा फ़ोरम में अल-जज़ीरा ने लावरोफ़ से पूछा कि बशर अल-असद की हार रूस के लिए कितना बड़ा झटका है?
इस सवाल के जवाब में लावरोफ़ ने कहा था, ''रूस न केवल सीरिया में लोगों की मदद कर रहा था बल्कि इराक़, लीबिया और लेबनान में भी हमने मदद की है. दुनिया में दो तरह की लड़ाई चल रही है. दुनिया का एक हिस्सा अपने दबदबे की लड़ाई लड़ रहा है तो दूसरा हिस्सा अपनी संप्रभुता और स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा है. अगर आप चाहते हैं कि हम ये कहें कि सीरिया में हमारी हार हुई है तो कोई बात नहीं, आप पूछना जारी रखिए.''
सर्गेई लावरोफ़ से पूछा गया कि सीरिया में जो कुछ भी हो रहा है, उसमें तुर्की की क्या भूमिका है? आपको लगता है कि सीरिया में जो कुछ भी हो रहा है, तुर्की उसे कंट्रोल कर रहा है?
इसके जवाब में लावरोफ़ ने कहा था, ''आपको पता है कि तुर्की सीरिया में काफ़ी प्रभावी है. तुर्की की सीमा सीरिया से लगी है और सुरक्षा को लेकर उसकी अपनी चिंताएँ हैं.''
रूस को न केवल तुर्की से सीरिया में हार मिली है, बल्कि लीबिया और कारबाख़ में भी हार का सामना करना पड़ा है.
भले पुतिन कह रहे हैं कि सीरिया में रूस अपने मक़सद में सफल रहा है लेकिन कई लोग रूस की हार के रूप में देख रहे हैं.
भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू के अंतरराष्ट्रीय संपादक स्टैनली जॉनी को लगता है कि पुतिन से अर्दोआन को समझने में चूक हुई है.
जॉनी ने लिखा है, ''जब पुतिन ने सीरिया में तुर्की की मदद से गृह युद्ध रोकने की पहल की तो उन्होंने इस तथ्य की उपेक्षा कर दी थी कि अर्दोआन आख़िरकार नेटो के सहयोगी हैं. पुतिन को लगा कि वह यूक्रेन में तुर्की को नियंत्रित करने में कामयाब रहे हैं. ज़ाहिर है कि तुर्की रूस के ख़िलाफ़ पश्चिम के प्रतिबंध में शामिल नहीं हुआ. लेकिन अर्दोआन अपने समय का इंतज़ार कर रहे थे. आख़िरकार अर्दोआन ने सीरिया में पुतिन को मात दी.''
रूस के राजनीतिक विज्ञानी और लेखक एलेक्जेंडर दुगिन ने सीरिया में बशर अल-असद के शासन ख़त्म होने के बाद लिखा है, ''रूस ऐसा कुछ भी नहीं करेगा, जिससे तुर्की को नुक़सान हो. लेकिन इस तरह के विश्वासघात के बाद तुर्की मुश्किल घड़ी में रूस से मदद की उम्मीद नहीं कर सकता है. समय-समय पर मुश्किलें आती रहती हैं. तुर्की और रूस के बीच कई स्तरों पर संबंध रहे हैं. तुर्की का रवैया स्पष्ट रूप से इसराइल के पक्ष में है. यह बहुत ही दुखद है.''
एलेक्जेंडर दुगिन ने लिखा है, ''जैसा कि पश्चिम के देश बता रहे हैं कि रूस कमज़ोर पड़ गया है लेकिन यह सच्चाई नहीं है. मेरा मानना है कि पश्चिम का आकलन ग़लत है. तुर्की का दुश्मन इस्लामिक कट्टरता है. अरब के देश तुर्की के नेतृत्व से कभी सहमत नहीं होंगे.''
''सीरिया में कुर्द पश्चिम के समर्थन से सत्ता पर काबिज़ होने की कोशिश करेंगे. सीरिया में रूस के नहीं होने से अर्दोआन ने एक अहम सहयोगी और दोस्त को खो दिया है. हम अब तक अर्दोआन का समर्थन करते थे. 2015 में हमने तुर्की से टकराव बढ़ने से रोका था. अर्दोआन के ख़िलाफ़ तख़्तापलट को रोकने में भी हमने मदद की थी. लेकिन सीरिया में जो कुछ भी हुआ, वो हमारे लिए दुखद है. मुझे लगता है कि अर्दोआन ने रणनीतिक ग़लती की है.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित