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ईरान का दावा: अमेरिका और इसराइल के 'कंट्रोल रूम' में रची गई सीरिया की साजिश
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ने सीरिया में बशर अल-असद की सत्ता के पतन के लिए सीधे तौर पर अमेरिका और इसराइल को ज़िम्मेदार ठहराया है. उन्होंने कहा कि इसमें परोक्ष तौर पर तुर्की का भी हाथ है.
ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी इरना के मुताबिक 11 दिसंबर को आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ने राजधानी तेहरान में एक सार्वजनिक भाषण में कहा, ''इसमें कोई शक नहीं है सीरिया में जो कुछ भी हुआ वो अमेरिकी-जियोनिस्ट योजना का नतीजा था.''
उन्होंने सीधे तौर पर तुर्की का तो नाम नहीं लिया, लेकिन कहा, ''इसमें एक पड़ोसी देश ने भी अपनी भूमिका निभाई है और अब भी वो ऐसा कर रहा है. हर कोई ये देख रहा है. लेकिन मुख्य अपराधी, साजिशकर्ता और इस पूरी योजना को अंजाम देने वालों का निर्देश केंद्र अमेरिका और जियोनिस्ट शासन में है.''
उन्होंने कहा, ''हमारे पास इसके सुबूत हैं. इन सुबूतों के बाद हमारे पास अब संदेह की कोई वजह नहीं बची है.''
सीरिया में इस्लामी विद्रोही गुट हयात तहरीर अल-शाम ने 27 नवंबर को असद सरकार की सेना के ख़िलाफ़ बड़ा हमला शुरू किया था और आठ दिसंबर तक उन्होंने राजधानी दमिश्क पर कब्जा कर लिया था. इन हमलों के बाद राष्ट्रपति बशर अल-असद देश छोड़ कर रूस चले गए थे.
ईरान सीरिया का अहम सहयोगी रहा है. विद्रोहियों के हमलों के दौरान ईरान ने सीरिया को हरसंभव मदद का वादा किया था.
लेकिन सीरिया की सेना विद्रोहियों को रोकने में नाकाम रही और बशर अल-असद की सत्ता का पतन हो गया.
ख़ामेनेई ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि ये सब कुछ अमेरिका और इसराइल की शह पर हुआ है.
उन्होंने कहा, "सीरिया में हमला करने वाले हर पक्ष का अलग-अलग मकसद है. कुछ ज़मीन पर कब्ज़ा करना चाहते हैं तो अमेरिका इस क्षेत्र में अपने पैर जमाना चाहता है. वक्त बताएगा कि इनमें से कोई भी अपने इस मकसद को हासिल नहीं कर पाएगा."
सीरिया में असद सरकार के साथ और ख़िलाफ़ कई देश रहे हैं. ईरान और रूस ने जहाँ असद सरकार का खुलकर समर्थन किया है, वहीं अमेरिका अब असद सरकार के पतन का श्रेय ले रहा है.
एक नज़र, उन देशों की रणनीति पर जो सीरिया के मौजूदा घटनाक्रम में अहम किरदार साबित हो रहे हैं.
अमेरिका
सीरिया के गृहयुद्ध में अमेरिका का रुख़ कई बार बदला है.
ओबामा प्रशासन ने बशर अल-असद सरकार के ख़िलाफ़ विपक्षी संगठनों को हथियार और ट्रेनिंग दी थी. हालांकि इसका सीमित असर दिखा.
2014 में कथित इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ अमेरिकी सेना ने कार्रवाई की थी.
इस दौरान वह कुर्दिश लड़ाकों का साथ देती रही और किसी भी विद्रोह को दबाने के लिए उत्तर पश्चिम सीरिया में बनी रही.
लेकिन 2019 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ज्यादातर अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला लिया था. हालांकि अभी भी वहां 900 अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं.
ये सैनिक कुर्दों के नियंत्रण वाले तेल खनने वाले इलाके में हैं. कुछ सैनिक उत्तर-पूर्व और दक्षिण-पूर्व में इराक़ और जॉर्डन के नजदीक सीरियाई सीमा के नजदीक भी मौजूद हैं.
अमेरिका ने यह बात पहले ही स्पष्ट कर दी है कि अमेरिकी सैनिक पूर्वी सीरिया में रहेंगे, कथित इस्लामिक स्टेट समूह का मुक़ाबला करने के लिए उसके पास आधिकारिक तौर पर छोटी संख्या में सैन्य बल मौजूद हैं.
बशर अल-असद के "ऐतिहासिक" पतन की गति और इसकी अहमियत ने अमेरिका को हैरान करके रख दिया है. मगर, राष्ट्रपति बाइडन इसका श्रेय भी ले रहे हैं.
अपने बयान में, उन्होंने सीरिया में सत्ता के असाधारण हस्तांतरण को अमेरिकी रणनीति का परिणाम बताया.
उन्होंने कहा कि इसके ज़रिए उस क्षेत्र में रूस और ईरान की भूमिका को मौलिक तौर पर कमज़ोर किया गया और इससे बशर अल-असद के शासन का अंत करने में मदद मिली है.
लेकिन हक़ीक़त ये है कि अमेरिका ने शायद ही यह सोचा हो कि हमास के ख़िलाफ़ इसराइल को और रूस के ख़िलाफ़ यूक्रेन को दिया गया सैन्य सहयोग, सीरिया में असद के शासन का अंत करने में मददगार साबित होगा.
इसराइल
इसराइल सीरिया में हिज़बुल्लाह के लड़ाकों और ईरानी ठिकानों पर हवाई हमले करता रहा है.
इसराइल यहां हिज़्बुल्लाह के बड़े नेताओं, हथियार भंडारों और ईरान की ओर से हिज़्बुल्लाह को हथियार भेजने के रास्तों को निशाना बनाता रहा है.
बीते कुछ दिनों में इसराइल ने सीरिया के सैन्य ठिकानों पर सैकड़ों हवाई हमले किए हैं. उसने गोलान हाइट्स पर 'असैन्यीकृत बफर ज़ोन' में भी अपने सैनिक तैनात कर दिए हैं.
इसकी वजह से इसराइली नियंत्रण के तहत आने वाले सीरियाई इलाक़े में इज़ाफ़ा हो गया है.
इसराइल का कहना है कि वह अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ये क़दम उठा रहा है. लेकिन लोगों का कहना है कि इसराइल अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी को कमज़ोर करने की कोशिश कर रहा है.
इन हमलों के निशाने पर उत्तर में अलेप्पो से लेकर दक्षिण में दमिश्क तक सीरिया के सेना के अहम ठिकाने हैं. इनमें हथियारों के गोदाम, गोला-बारूद डिपो, हवाई अड्डे, नौसैनिक अड्डे और रिसर्च सेंटर शामिल हैं.
रूस
सीरिया के पूरे गृहयु्द्ध के दौरान रूस तत्कालीन राष्ट्रपति बशर अल-असद को मदद देता रहा है. रूस ने सीरिया में विद्रोहियों को दबाने के लिए अपने सैनिक और लड़ाकू विमान भेजे.
सीरिया में रूस ने हवाई और नौसैनिक अड्डों पर अपनी मौजूदगी बना रखी था. इनका इस्तेमाल इस क्षेत्र में सैन्य ऑपरेशन का अंजाम देने के लिए किया जाता था.
विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन से युद्ध की वजह से रूस इस बार असद सरकार की प्रभावी मदद नहीं कर सका.
हालांकि, रूसी सेना ने विद्रोहियों को पीछे धकेलने के लिए छिटपुट हवाई हमले किए थे लेकिन ये कामयाब नहीं हुए.
असद अपनी सत्ता के पतन के बाद राजनीतिक शरण के लिए रूस ही पहुंचे हैं.
ईरान
ईरान मध्य पूर्व में 'प्रतिरोध की धुरी' का अहम सदस्य रहा है. ये सीरिया समेत कुछ देशों और हिज़्बुल्लाह, फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास और यमन के हूती विद्रोहियों का नेटवर्क है, जो इसराइल को मिटा देने और मध्यपूर्व में अमेरिकी असर को ख़त्म करने की कसमें खाता है.
माना जाता है कि ईरान पूरे इराक़ और सीरिया में हिज़्बुल्लाह को हथियारों की सप्लाई करता है. इसके बदले हिज़्बुल्लाह के लड़ाके असद के समर्थन में विद्रोहियों से लड़ते रहे हैं.
इस बार भी ईरान ने असद की सेना को पूरी मदद करने का वादा किया था, लेकिन ईरान के रेवॉल्यूशनरी गार्ड्स को कोई खास सफलता नहीं मिली. दो-तीन दिन पहले ईरानी सैनिकों को पीछे हटते देखा गया.
सीरिया में असद की हार से ईरान को बड़ा झटका लगा है. लेकिन खुद भी इस वक़्त इसराइल के साथ संघर्ष में उलझा हुआ है.
हिज़्बुल्लाह, हमास के कई कमांडरों और ईरान के रेवॉल्यूशनरी गार्ड के कमांडरों की अमेरिकी हमले में मौत के बाद उन्होंने अमेरिका और इसराइल पर जमकर हमला किया था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित