बीजेपी और कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में कितनी महिलाओं को बनाया उम्मीदवार

संसद में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पास होने के बाद पहली बार देश में चुनाव हो रहे हैं.

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सात से 30 नवंबर के बीच पाँच राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिज़ोरम में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं.

मिज़ोरम में मतदान हो चुका है और छत्तीसगढ़ में पहले चरण का मतदान सात नवंबर को पूरा हो गया.

चुनाव के नतीजे तीन दिसंबर को आएंगे.

इन पाँच राज्यों के नतीजे प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों कांग्रेस और बीजेपी के लिए साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव की दिशा तय करेंगे.

संसद में पारित हुए नारी शक्ति वंदन अधिनियम के बाद पहली बार किसी राज्य में मतदान हो रहा है.

जहाँ तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मुख्य मुक़ाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच नज़र आ रहा है, वहीं तेलंगाना में कांग्रेस और बीआरएस के अलावा बीजेपी भी ताल ठोकती नज़र आ रही है.

दूसरी ओर पूर्वोतर क्षेत्र के छोटे से पर्वतीय राज्य मिज़ोरम में पहली बार दो क्षेत्रीय पार्टियों में लड़ाई बताई जा रही है.

वहाँ इस बार ज़ोराम पीपुल्स मूवमेंट (ज़ेपीएम) और मिज़ो नेशनल फ़्रंट (एमएनएफ़) आमने-सामने होंगे.

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी के अनुसार, "बीजेपी, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है जिसका नकारात्मक असर हो सकता है क्योंकि लोगों को पता नहीं है उनका सीएम कौन बनेगा. वहीं कांग्रेस तीन राज्यों में इशारों में अपने मुख्यमंत्री चेहरों को स्पष्ट कर चुकी है. हालाँकि इन चुनावों में एंटी इन्कम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) भी बड़ा मुद्दा है."

चुनाव

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी उन राज्यों का दौरा कर रही हैं, जहाँ विधानसभा चुनाव हो रहे हैं.

वे बताती हैं कि इन चुनावों में एंटी इन्कम्बेंसी और अलग-अलग विधायकों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे निकल कर आ रहे हैं लेकिन ये देखना होगा कि मुख्यमंत्री इसकी भरपाई कैसे करेंगे. हालाँकि वे कई योजनाएँ भी लेकर आए, जिसकी तारीफ़ भी हो रही है.

वहीं महिलाओं को टिकट देने के सवाल पर वे कहती हैं, ''बीजेपी ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम को एक बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की लेकिन इन चुनाव वो बन नहीं पाया है. अगर ये बड़ा मुद्दा बनता तो पार्टियाँ महिला उम्मीदवारों को ज़्यादा टिकट देती.''

इसका एक कारण ये भी हो सकता है कि लोगों को संदेश भी जा चुका था कि ये अधिनियम संसद में पारित हो चुका है लेकिन इसे अमलीजामा पहनाने में समय लगेगा.

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राज्य में सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच रही कड़वाहट जगजाहिर है.

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राजस्थान

राजस्थान में जहाँ कांग्रेस पार्टी में जारी अंदरूनी कलह और एंटी इन्कम्बेंसी का सामना कर रही है. वहीं बीजेपी राज्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि पर वोट पाने की उम्मीद लगाए है.

200 सीट वाले इस राज्य में कांग्रेस ने 28, बीजेपी ने 20 और आप ने 19 महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है.

राज्य में मुद्दों की बात की जाए तो बीजेपी पेपर लीक, क़ानून व्यवस्था, ध्रुवीकरण और भ्रष्टाचार को मुद्दा बना रही है.

वहीं कांग्रेस पार्टी एंटी इन्कम्बेंसी से निपटने के लिए हेल्थ इंश्योरेंस कवर, शहरी रोज़गार गारंटी, सरकारी कर्मचारियों के लिए वृद्धा पेंशन स्कीम की शुरुआत करने जैसी कई योजनाओं की घोषणा कर चुकी है.

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जयपुर में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ कहते हैं, ''बीजेपी के पास वसुंधरा राजे एक महिला चेहरा थीं लेकिन पार्टी न केवल उनसे दूरी बनाए हुए है बल्कि उनके क़रीबियों की भी टिकट काट ली है. वहीं कांग्रेस में गहलोत और पायलट के बीच लड़ाई का नुक़सान पार्टी को होगा और अब ये जातिगत स्तर पर भी पहुँच गया है.''

हालाँकि कांग्रेस की तरफ़ से प्रियंका गांधी रैलियों में ये दोहरा रही है कि पार्टी संगठित है लेकिन ये संदेश लोगों तक पहुँच चुका है कि सब ठीक नहीं है.

वहीं बीजेपी पाँच बार विधायक और पाँच बार लोकसभा सांसद रहीं पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को किनारे करके बैठी हुई है, हालाँकि सूची में उनका नाम ज़रूर है.

नारायण बारेठ इसका कारण बताते हैं, ''दोनों ही पार्टियाँ महिला वोटरों की अहमियत समझती हैं. पहले के मुक़ाबले वे ज़्यादा मुखर भी हुई हैं और उन्हें लुभाने के लिए कई स्कीम की घोषणा भी की है. हालाँकि विरोधाभास ये भी है कि महिलाओं को वो जगह पार्टी में नहीं दे पा रही है.''

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शिवराज चौहान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ.

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मध्य प्रदेश

साल 2018 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद राज्य में सरकार पलटी और मार्च 2020 में बीजेपी फिर सत्ता में आ गई लेकिन अब बीजेपी एंटी इन्कम्बेंसी का सामना कर रही है

राजनीतिक विशलेषकों का मानना है कि शिवराज चौहान महिला केंद्रित योजनाएँ, लाडली बहन योजना, लाडली लक्ष्मी योजना, मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना आदि लाकर महिलाओं को अपनी ओर खींचना चाहते हैं.

वहीं इसके जवाब में कांग्रेस भी सत्ता में आने के बाद नारी सम्मान योजना लाने की बात कह रही है.

कांग्रेस राज्य में बीजेपी को घेरने के लिए भ्रष्टाचार, महिलाओं, आदिवासियों और दलितों के ख़िलाफ़ अपराध, असुरक्षा और बेरोज़गारी का मुद्दा उठा रही है.

मध्य प्रदेश में बीजेपी ने महिलाओं को 30, कांग्रेस ने 28 और आप ने 10 सीटों पर उम्मीदवार बनाया है.

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जानकारों का मानना है कि शिवराज चौहान का महिलाओं और लड़कियों को लेकर कई योजनाओं पर ज़ोर रहा है और कांग्रेस इस बार महिला, युवा और किसानों के मुद्दों पर ज़ोर दे रही है.

भोपाल में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार संजय सक्सेना का कहना कि महिला चेहरों की बात करें तो बीजेपी के पास उमा भारती, यशोधरा राजे जैसे बड़े चेहरे थे लेकिन वे चुनावी मैदान में नहीं हैं जिसके अलग-अलग कारण हैं.

हालाँकि माया सिंह मैदान में हैं लेकिन कांग्रेस की बात करें तो उनके पास बड़े महिला चेहरे दिखते ही नहीं हैं. बस विजय लक्ष्मी साधो जैसे कुछ चेहरे दिखते हैं.

भोपाल में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार संजय सक्सेना का कहना है, ''कोई भी पार्टी महिला को टिकट देकर रिस्क नहीं लेना चाहती. पार्टी ऐसी महिलाओं को टिकट देती है जिनके पिता या पति पार्टी में हो और वो इस बार चुनाव नहीं लड़ पा रहे क्योंकि विनबिलिटी फ़ैक्टर(चुनाव में जीत) देखी जाती है. केवल पाँच या छह प्रतिशत महिलाएँ, जो स्वतंत्र तौर पर लीडरशिप में हैं. कांग्रेस के पास कोई बड़ा महिला चेहरा नहीं है और बीजेपी की तरफ़ से उमा भारती हाशिए पर हैं."

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भूपेश बघेल

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छत्तीसगढ़

साल 2000 में मध्य प्रदेश से अलग हुए इस राज्य में लगभग 32 फ़ीसदी आदिवासी जनसंख्या है.

90 सीट वाले राज्य में दो चरणों सात और 17 नवंबर को चुनाव है. यहाँ सात नवंबर को पहले चरण का मतदान हो चुका है. यहाँ सीधी लड़ाई कांग्रेस और बीजेपी में मानी जा रही है.

साल 2003 में हुए चुनाव में रमन सिंह के नेतृत्व में सरकार सत्ता में आई और 15 साल तक उन्होंने शासन किया लेकिन साल 2018 में कांग्रेस ने जीत हासिल की और भूपेश बघेल राज्य के मुख्यमंत्री बने.

सत्ताधारी कांग्रेस और बीजेपी जहाँ दावा कर रही हैं कि उनकी कई योजनाएँ महिलाओं के लिए हैं लेकिन टिकटों की बात की जाए, तो जहाँ कांग्रेस ने 18 तो बीजेपी ने 15 महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है.

राज्य में कांग्रेस ने 500 रुपए में गैस सिलेंडर पर सब्सिडी देने, महिला स्व-सहायता समूह की कर्ज़ माफ़ी और 10 लाख रुपए तक का इलाज़ जैसी योजनाओं की घोषणा की है.

वहीं बीजेपी हर विवाहित महिलाओं को 12 हज़ार रुपए देने के अलावा रानी दुर्गावती योजना देने का वादा किया है जिसके तहत बीपीएल वर्ग की बालिकाओं के जन्म पर एक लाख रुपए का आश्वासन प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा.

स्थानीय पत्रकार आलोक पुतुल का कहना है कि राज्य में धान सबसे बड़ा मुद्दा बन रहा है और इसकी खेती में जहाँ महिलाएँ बड़ी संख्या में शामिल हैं वहीं राज्य में महिलाओं से जुड़ी योजनाओं का भी असर होगा. ऐसे में राज्य में महिलाओं की भूमिका मुख्य हो सकती है.

मणिपुर

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इमेज कैप्शन, मणिपुर में हिंसा जारी है

मिज़ोरम

40 विधानसभा सीट वाले पूर्वोतर राज्य मिज़ोरम में सात नवंबर को लोगों ने मतदान किया.

राज्य की सत्ता में मिज़ो नेशनल फ़्रंट (एमएनएफ़) काबिज़ है और माना जा रहा है कि मणिपुर में जारी जातीय हिंसा का असर भी राज्य की राजनीति पर पड़ेगा क्योंकि हज़ारों की संख्या में कुकी-ज़ोमी-हमार समुदाय के लोग वहाँ शरण लिए हुए हैं.

मणिपुर मुद्दा एमनएनएफ़ और बीजेपी के बीच दरार का कारण बन गया है लेकिन ईसाई बहुल राज्य में कई मुद्दे निकल कर आ रहे हैं जिसमें मणिपुर में जारी जातीय हिंसा, बेरोज़गारी और ढाँचागत विकास की कमी आदि हैं.

स्थानीय पत्रकार दिलीप शर्मा कहते हैं, ''बीजेपी को लेकर लोगों में इस बात पर मायूसी है कि वो मणिपुर में लगातार जारी हिंसा को लेकर सख़्त क़दम नहीं उठा रही है और उनको ये डर है कि इससे मिज़ोरम में भी शांति भंग हो सकती है.''

माना जाता है कि सांस्कृतिक तौर यहाँ का समाज खुला हुआ है लेकिन राजनीति में महिलाओं की भागीदारी की बात की जाए, तो उसमें कमी दिखाई देती है.

हालाँकि महिलाओं की राजनीति में भूमिका बढ़ाने की मांग उठती रही है लेकिन पितृसत्तात्मक सोच के कारण महिलाएँ आगे नहीं आ पा रही हैं.

टिकटों की बात की जाए, तो पार्टियों ने 16 महिलाओं को उम्मीदवार बनाया जिसमें बीजेपी की तीन, एमएनएफ़ की दो, जेडपीएम की दो और कांग्रेस की दो शामिल थीं.

अन्य महिलाओं ने निर्दलीय चुनाव लड़ा लेकिन जनता उनपर कितना विश्वास कर पाएगी, ये तीन दिसंबर को ही पता चलेगा.

के. चंद्रशेखर राव

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इमेज कैप्शन, के. चंद्रशेखर राव की बीते दो दशक में सबसे बड़ी पहचान तेलंगाना के नेता की रही है.

तेलंगाना

119 विधानसभा सीटों वाला तेलंगाना राज्य 10 साल पहले बना था.

बीजेपी और कांग्रेस को यहाँ के चंद्रशेखर राव की स्थानीय सत्तारूढ़ पार्टी भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) से कड़ी चुनौती मिल रही है.

इस राज्य में एक चरण में मतदान होना है, मतदान 30 नवंबर को होना है, ऐसे में अभी पूरी तरह टिकटों का बँटवारा नहीं हुआ है.

लेकिन ताज़ा जानकारी के मुताबिक़ बीआरएस ने 117 में से आठ महिलाओं, कांग्रेस ने 114 में से 10 और बीजेपी ने 100 सीटों में से 14 महिलाओं को उम्मीदवार बनाया है.

बीआरएस को उम्मीद है कि किसानों और समाज के कई वर्गों के लिए चलाई जा रही उनकी सरकारी योजनाएँ जैसे रायतु बंधु, दलित बंधु, अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए लाई गई कल्याण लक्ष्मी योजना और मिशन भागीरथ जिसके तहत घर-घर तक नल का पानी सुविधा दी रही है, वो वोट उनके पाले में डालने में मदद करेगी.

तो वहीं कांग्रेस को उम्मीद है कि कर्नाटक में जीत के बाद वो महिलाओं, किसानों और बुज़ुर्गों को लेकर छह गारंटी योजनाओं के ज़रिए सत्ता पाने में कामयाब होगी.

राज्य में कई योजनाएँ महिलाओं और किसानों पर केंद्रित हैं और पार्टियाँ चुनावों में महिलाओं के महत्व को समझ भी रही है.

ऐसे में क्या इन राज्यों के परिणामों को लोकसभा चुनाव से पहले का सेमी फ़ाइनल कहा जा सकता है?

जानकार मानते हैं कि राज्य में जहाँ क्षेत्रीय मुद्दे अहम होते हैं. वहीं दूसरी और राष्ट्रीय चुनाव में बड़े मुद्दे काम करते हैं.

ऐसे में इन राज्यों में पार्टियों का प्रदर्शन चाहे कुछ भी हो, आम चुनाव में आँकड़ा बिल्कुल विपरीत भी हो सकता है.

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