कफ़ सिरप: 'जब मैं देखता हूँ कि कोई दवा भारत में बनी है, तो उसे छूता भी नहीं'

द गांबिया के लैैमिन के मां-बाप
इमेज कैप्शन, लैमिन के परिवार ने बताया कथित ज़हरीली कफ़ सिरप पीने के सात दिनों में ही उसकी मृत हो गई.
    • Author, विनीत खरे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, गांबिया और जम्मू से
  • पिछले साल जुलाई और अक्टूबर के बीच गांबिया में क़रीब 70 बच्चों की मौत हो गई
  • साल 2019 दिसंबर और जनवरी 2020 के बीच जम्मू के रामनगर में कम से कम 12 बच्चों की मौत हो गई थी
  • मौत के लिए दो भारतीय कंपनियों के बनाए कफ़ सिरप को ज़िम्मेदार ठहराया गया
  • दोनो भारतीय कंपनियों ने आरोपों को ग़लत बताया
  • रामनगर में ऐसे परिवार हैं, जिन्होंने बताया कि बच्चों ने कथित ज़हरीली कफ़ सिरप को पीया और बच गए
  • ये परिवार बच्चों के इलाज के लिए सरकारी मदद चाहते हैं
  • गांबिया में हमने जितने लोगों से बात की, उन्हें भारत सरकार और भारतीय कंपनी के खंडन पर भरोसा नहीं
  • बच्चों की मौत ने भारत में बनी दवाओं के बारे में कई लोगों के मन में अविश्वास पैदा किया है
वीडियो कैप्शन, भारत से लेकर द गांबिया तक जब बच्चों के लिए ज़हर बन गई दवा

डेढ़ साल का श्रेयांश, तीन साल का लामिन, तीन साल की सुरभि शर्मा, 22 महीने की अमीनाटा, ढाई साल का अनिरुद्ध... और कई दूसरे बच्चे.

भारत और गांबिया के ये वो बच्चे हैं, जिनके माँ-बाप ने उन्हें दम तोड़ते देखा.

दो महीने से पाँच साल की उम्र तक के बच्चे.

इसकी वजह थी खाँसी की कथित ज़हरीली दवा खाने से उनका पेशाब बंद होना, शरीर में सूजन और गुर्दे का ख़राब होना.

बच्चे रोते थे, लेकिन अपना दर्द बता नहीं पाते थे.

परिवार
इमेज कैप्शन, पिछले साल जुलाई और अक्तूबर के बीच द गांबिया में क़रीब 70 बच्चों की मौत हो गई.

पिछले साल जुलाई और अक्तूबर के बीच गांबिया में क़रीब 70 बच्चों की मौत हो गई.

जबकि साल 2019 दिसंबर और जनवरी 2020 के बीच जम्मू के रामनगर में कम से कम 12 बच्चों की मौत हो गई थी.

मौत के लिए भारतीय कंपनियों के बनाए कफ़ सिरप को ज़िम्मेदार ठहराया गया.

कंपनियों ने आरोपों को ग़लत बताया, लेकिन पीड़ित परिवारों को उन पर विश्वास नहीं.

पुलिस ने जम्मू में बच्चों की मौत की जाँच की और मामला अदालत में है.

जबकि गांबिया में बच्चों की मौत की जाँच के बाद सरकारी रिपोर्टें जारी की गईं, जिनमें एक भारतीय कंपनी के बनाए कफ़ सिरप को मौत के लिए ज़िम्मेदार बताया गया.

द गांबिया की स्थानीय अदालत के सामने पीड़ित परिवार
इमेज कैप्शन, कुछ परिवारों ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया है और कहा है कि वो भारतीय और अंतरराष्ट्रीय अदालतों का दरवाज़ा खटखटाने से नहीं हिचकिचाएंगे.

एक जैसा दर्द

जम्मू और गांबिया के बीच क़रीब 10,000 किलोमीटर की दूरी है, जिनको पाटता इनका एक जैसा दर्द है, एक जैसी न्याय मांगने की लड़ाई है, जो अब भी जारी है.

मृतकों में गांबिया की क़रीब पाँच लाख की आबादी वाली राजधानी बैंजुल में रहने वाला तीन साल का लामिन भी था.

लामिन को ड्राइव के दौरान पापा की गोद में बैठना बहुत पसंद था.

पिछले साल सितंबर में जब उसे बुख़ार आया, तो डॉक्टर ने जो दवाइयाँ देने को कहा, उनमें कफ़ सिरप भी था.

लामिन दवा नहीं पीना चाहता था, लेकिन परिवार चाहता था कि वो जल्द ठीक हो जाए.

ड्राइवर का काम करने वाले उसके पिता एब्रिमा सानिया उस क्षण को याद करते हैं, "मैंने लामिन से ज़बरदस्ती दवा खाने को कहा."

Ebrima
इमेज कैप्शन, एब्रिमा शायद ही उस लम्हे को भूल पाएँ जब उन्होंने अपने बेटे को कफ़ सिरप दिया.

एब्रिमा शायद ही उस लम्हे को भूल पाएँ. उस क्षण को याद करके वो रोने लगे.

दवा लेने के कुछ समय बाद ही लामिन का खाना और पेशाब कम होने लगा.

डॉक्टरी जाँच में पता लगा कि लामिन को गुर्दे की समस्या थी. उसके होठ काले होने लगे थे.

एब्रिमा बोले, "लामिन ने मेरी ओर, मेरी आँखों में देखा. मैंने पूछा, लामिन तुम्हें क्या हो गया? मुझे उसका चेहरा, उसकी आँखें हमेशा याद रहेंगी क्योंकि वो मेरी आँखों के भीतर देख रहा था. मैं भी उसकी आँखों में देख रहा था."

परिवार के मुताबिक़ कफ़ सिरप पीने के सात दिनों में ही लामिन की मृत्यु हो गई.

बच्चों के इस तरह अचानक चले जाने के सदमे से अभी भी उभर रहे माता-पिता याद करते हैं कि कैसे उनके बच्चों ने दर्द से तड़पते हुए दुनिया छोड़ी.

कफ़ सिरप

एक पिता ने कहा, "मेरी बेटी लगातार इतना चिल्ला रही थी कि आख़िरकार उसके मुंह से आवाज़ निकलनी बंद हो गई. आख़िरी वक़्त में वो माँ का नाम ले रही थी, जैसे माँ से मदद मांग रही हो."

लामिन के घर के नज़दीक ही 22 महीने की अमीनाटा रहती थी.

अमीनाटा के माँ-बाप को भी समझ नहीं आया कि उनके बेटी के साथ क्या हो रहा है.

लकड़ी बेचकर गुज़ारा करने वाले अमीनाटा ने पिता मोमोदू डैंबेले ने उसे बेहतर, लेकिन महंगे इलाज के लिए पड़ोसी देश सेनेगल तक भेजा.

वो याद करते हैं, "उसका शरीर फूल रहा था. वो ख़त्म हो रही थी. हमें समझ नहीं आ रहा था कि उसके शरीर के अंदर क्या हो रहा है."

22 महीने की अमीनाटा के माता-पिता
इमेज कैप्शन, अमीनाटा के पिता ने आख़िरी बार बेटी का चेहरा एक वीडियो कॉल में देखा.

उन्होंने आख़िरी बार बेटी का चेहरा एक वीडियो कॉल में देखा. अमीनाटा सेनेगल के एक अस्पताल के बिस्तर पर बेसुध लेटी थी.

मोमोदू याद करते हैं, "मुझे उसका सिर हिलता दिख रहा था. मैं उसे बताना चाह रहा था कि ये मैं हूँ, उसका पापा."

इस वीडियो कॉल के कुछ ही देर बाद अमीनाटा नहीं रहीं.

अमीनाटा के पिता

गांबिया में मौत का सिलसिला और जाँच

द गांबिया मे अदालत के सामने
इमेज कैप्शन, परिवारों का दावा है कि पिछले एक साल में द गांबिया की स्वास्थ्य व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ है.

पिछले साल जुलाई में दुनिया के सबसे ग़रीब देशों में से एक गांबिया में स्वास्थ्य अधिकारियों को एक्यूट किडनी इंजरी (एकेआई) के मामलों में बढ़ोत्तरी देखने को मिली. ऐसे मामले पाँच साल से कम के बच्चों में देखे जा रहे थे.

एकेआई मतलब गुर्दे में गड़बड़ी, जिसका असर दूसरे अंगों पर पड़ता है, जिससे जान तक जा सकती है.

बाद में गांबिया की सरकार ने ये जानकारी दी कि इससे 69 बच्चों की मौत हो गई है.

गांबिया ने इसकी सूचना डब्लूएचओ को दी जिसके बाद डब्लूएचओ ने जाँच शुरू की.

फिर पिछले साल अक्तूबर में विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्लूएचओ ने कहा कि ये मामला चार कफ़ सिरप से जुड़ा हुआ है. इस अलर्ट में कहा गया कि सिरप को भारतीय कंपनी मेडन फ़ार्मासूटिकल्स ने बनाया.

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द गांबिया में पीड़ित माता-पिता
इमेज कैप्शन, पीड़ित परिवारों का कहना है कि एकेआई से बच्चों की मौत को रोका जा सकता था.

डब्लूएचओ ने कहा कि उसने इस कंपनी के बनाए चार कफ़ सिरप के सैंपल की जाँच की और फिर ये निष्कर्ष निकाला कि इनमें तय मानदंड से अधिक मात्रा में डाइइथिलीन ग्लाइकोल और इथिलीन ग्लाइकोल था. ये दोनों ज़हरीले पदार्थ हैं.

डब्लूएचओ ने कहा कि इस कारण पेट में दर्द, उल्टी, डायरिया, पेशाब करने में तकलीफ़, सिरदर्द, मानसिक स्थिति में बदलाव और एक्यूट किडनी इंजरी हो सकती है जो मौत का कारण भी बन सकती है.

डब्लूएचओ ने जिन चार कफ़ सिरप का नाम लिया था, वो हैं प्रोमिथाज़ाइन ओरल सॉल्यूशन, कोफ़ेक्सामलिन बेबी कफ़ सिरप, मेकऑफ़ बेबी कफ़ सिरप और मैगरिप एन कोल्ड सिरप. ये सिरप मेडन फार्मासूटिकल बनाती है.

इसके बाद भारत सरकार एक्शन में आई और जाँच शुरू हुई.

गांबिया में मौत पर संसदीय जाँच की रिपोर्ट और हाल में ही जारी हुई एक्यूट किडनी इंजरी जाँच रिपोर्ट में भारतीय मेडन फ़ार्मासूटिकल्स कंपनी के बनाए "दूषित" कफ़ सिरप को ज़िम्मेदार ठहराया गया.

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द गांबिया की राजधानी बैंजुल
इमेज कैप्शन, द गांबिया में हमने जितने लोगों से बात की, उन्हें आरोपों पर भारत सरकार और भारतीय कंपनी के खंडन पर भरोसा नहीं.

रिपोर्ट में जानकारों और सबूतों के हवाले से कहा गया कि उसमें एथलीन ग्लाइकॉल और डाइइथिलीन ग्लाइकॉल की इतनी मात्रा थी कि उससे जान चली जाए.

मेडन और भारत सरकार ने लगातार आरोपों से इनकार किया है.

भारत सरकार के मुताबिक मेडन के कफ़ सिरप सैंपल की जाँच में पता चला कि वो स्टैंडर्ड क्वालिटी के थे.

पहली अगस्त को संसद में एक सवाल के जवाब में सरकार ने कहा कि द गांबिया मामले में जांच में पता चला कि गुड मैन्युफ़ैक्चरिंग प्रैक्टिसेज़ का उल्लंघन हुआ, जिसके बाद मेडन फ़ार्मा को शोकॉज़ नोटिस भेजा गया, और कंपनी को आदेश दिया गया कि वो तुरंत सोनीपत में सभी मैन्युफ़ैक्चरिंग गतिविधि बंद कर दे.

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मेडन फार्मासूटिकल्स का पक्ष जानने के लिए हमने उनसे संपर्क किया और दफ़्तर भी गए लेकिन किसी से बात नहीं हो पाई.

हालाँकि कंपनी ने पूर्व में समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बातचीत में कहा था कि उन्हें भारतीय रेग्युलेट्री और न्यायिक प्रक्रिया पर पूरा विश्वास है और उन्होंने कुछ ग़लत नहीं किया.

फार्मासूटिकल्स एक्सपोर्ट प्रोमोशन काउंसिल ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़ साल 2022-23 में भारत ने गांबिया को 9.09 मिलियन अमरीकी डॉलर मूल्य की दवाइयाँ भेजीं, जबकि उसी साल अफ़्रीका को भेजी दवाइयों का मूल्य 3.646 बिलियन डॉलर था.

नेशनल एसेंबली के सदस्य यायदा सानयांग ने बताया, "मैं अपने लिए, अपने बच्चों के लिए दवा लाने से डरने लगा था. सब कुछ बहुत डरावना और परेशान कर देने वाला था."

द गांबिया
इमेज कैप्शन, मारियामा सिसावो ने अपनी बेटी को खत्म होते देखा
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गांबिया में आयातित दवाओं की जाँच के लिए लैब तक नहीं है और दूसरे अफ़्रीकी देशों की तरह यहाँ भी बड़ी मात्रा में भारतीय दवाएँ पहुँचती हैं.

लेकिन गांबिया ही नहीं, बल्कि उज़्बेकिस्तान, इराक़, कैमरून में भी भारतीय कफ़ सिरप से जुड़े मामलों पर रिपोर्टें सामने आने के बाद भारतीय फार्मासूटिकल कंपनियों को लेकर सवाल बढ़े हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इराक़ पर जारी ताज़ा अलर्ट में कहा है कि सैंपल में पाया गया कि उसमें अस्वीकार्य मात्रा में डाइथिलीन ग्लाइकॉल (0.25 प्रतिशत) और एथिलीन ग्लाइकॉल (2.1 प्रतिशत) कंटैमिनेंट है.फार्मासूटिकल एक्सपोर्ट प्रोमोशन काउंसिल ऑफ़ इंडिया के डायरेक्टर जनरल उदय भास्कर के मुताबिक, "गांबिया, उज़्बेकिस्तान और दूसरी जगहों में हुई घटनाएँ दुर्भाग्यपूर्ण हैं.

इन्होंने भारतीय फार्मासूटिकल इंडस्ट्री की छवि में सेंध लगाई है, लेकिन अगर आप हमारे निर्यात को देखें, उस पर कोई असर नहीं पड़ा है."

भारत सरकार ने फार्मा कंपनियों से कहा है कि वो विश्व स्वास्थ्य संगठन की अच्छी उत्पादन पद्धति का पालन करें. इसके लिए डेडलाइन दे दी गई है.

भारत में क़रीब 3,000 दवा बनाने वाली कंपनियों की क़रीब 10,000 मैन्युफ़ैक्चरिंग फ़ैक्टरियाँ हैं. साल 2030 तक ये इंडस्ट्री 130 अरब डॉलर तक की हो सकती है.

उदय भास्कर बताते हैं, "अगर आप उस त्रासदी को देखें और जिस तरह से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अलर्ट जारी किए, इतने सारे देश दोबारा सोच रहे हैं. वो लगातार पूछताछ कर रहे हैं. ये आसान नहीं है."

गांबिया में हमने जितने लोगों से बात की, उन्हें आरोपों पर भारत सरकार और भारतीय कंपनी के खंडन पर भरोसा नहीं.

मौत पर जाँच रिपोर्ट बनाने वाली नेशनल एसेंबली की सेलेक्ट कमेटी ऑन हेल्थ के प्रमुख अमाडु कामरा कहते हैं, "मैं इससे बिल्कुल असहमत हूँ. बिल्कुल. क्योंकि हमारे पास सबूत हैं. हमने उन दवाओं की जाँच की. उन दवाओं में अस्वीकार्य मात्रा में एथलीन ग्लायकॉल और डाइथिलीन ग्लायकॉल (डीईजी) था, उन्हें मेडन ने बनाया और उन्हें सीधा भारत से आयात किया गया था."

द गांबिया
इमेज कैप्शन, बच्चों की मौत ने भारत में बनी दवाओं के बारे में द गांबिया में कई लोगों के मन में अविश्वास पैदा किया है.

बच्चों की मौत ने भारत में बनी दवाओं के बारे में कई लोगों के मन में अविश्वास पैदा किया है.

अपने नौ महीने के बेटे को खोने वाले लामिन डांसो ने कहा, "जब मैं देखता हूँ कि कोई दवा भारत में बनी है, तो मैं उस दवा को छूता तक नहीं हूँ."

लेकिन जानकारों के मुताबिक़ फ़िलहाल भारत में बनी दवाओं पर गांबिया की निर्भरता जारी रहेगी.

खोजी पत्रकार मुस्तफ़ा दारबोई कहते हैं, "मैंने जिन दवा विक्रेताओं से बात की है, ज़्यादातर भारत में बनी दवाओं को लेकर आ रहे हैं. वो अमेरिका और यूरोप से आयातित दवाओं से सस्ती हैं."

ताज़ा जाँच रिपोर्ट में कई क़दमों को उठाने की बात की गई है और ड्रग रेग्युलेटर संस्था मेडिसिंस कंट्रोल एजेंसी के दो शीर्ष अफ़सरों को बर्खास्त कर दिया गया है.

द गांबिया
इमेज कैप्शन, परिवारों के मुताबिक पिछले एक साल में गांबिया की स्वास्थ्य व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आया है.

लेकिन परिवार इससे ख़ुश नहीं और वो न्याय की मांग कर रहे हैं. उनके मुताबिक़ पिछले एक साल में गांबिया की स्वास्थ्य व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आया है.

परिवारों के ग्रुप के प्रवक्ता एब्रिमा सैडी के मुताबिक़, "स्वास्थ्य मंत्री सहित जो भी इस अपराध में शामिल थे, न्याय व्यवस्था को उनके साथ पूरी कड़ाई के साथ पेश आना चाहिए."

कुछ परिवारों ने मेडन फार्मा और स्थानीय आधिकारिक संस्थाओं के ख़िलाफ़ गांबिया की अदालत का दरवाज़ा खटखटाया है और कहा है कि वे भारतीय और अंतरराष्ट्रीय अदालतों का दरवाज़ा खटखटाने से नहीं हिचकिचाएँगे.

जम्मू में भी न्याय की गुहार

अशोक कुमार और उनकी पत्नी वीना कुमारी
इमेज कैप्शन, जम्मू में मरने वालों में अशोक कुमार और वीना कुमारी का करीब तीन साल का अनिरुद्ध भी था.

न्याय की मांग जम्मू के रामनगर से भी आ रही है, जहाँ 2019 दिसंबर और जनवरी 2020 के बीच पाँच साल से कम उम्र के कम से कम 12 बच्चों की मौत हो गई थी.

हेल्थ एक्टिविस्ट दिनेश ठाकुर और वकील प्रशांत रेड्डी ने अपनी किताब "द ट्रुथ पिल" में रामनगर की मौत को भारत में ज़हर से मौत का पाँचवाँ बड़ा वाकया बताया है.

किताब में जम्मू से पहले चेन्नई, मुंबई, दिल्ली और बिहार में ज़हरीले डीईजी से मौत का ज़िक्र है. मरने वालों में ज़्यादातर ग़रीब तबके के लोग थे.

जम्मू में मरने वालों में ढाई साल का अनिरुद्ध भी था. मौत से तीन दिन पहले रिकॉर्ड किए गए आख़िरी वीडियो में अनिरुद्ध एक अस्पताल के बिस्तर पर निढाल लेटा नज़र आता है.

उसके हाथ तार से जुड़े हैं और पीछे मशीन की बीप की आवाज़ सुनाई दे रही है.

अनिरुद्ध
इमेज कैप्शन, मौत से तीन दिन पहले रिकॉर्ड किए गए आख़िरी वीडियो में अनिरुद्ध अस्पताल के बिस्तर पर निढाल लेटा नज़र आता है.

रुआँसी सी माँ वीना कुमारी चम्मच से उसे खाना खिलाने की कोशिश कर रही हैं.

कुछ दिन पहले अनिरुद्ध को बुख़ार और चेस्ट इन्फ़ेक्शन के बाद उसके माता-पिता ने कफ़ सिरप दिया था.

ये कफ़ सिरप पास के ही एक केमिस्ट से ख़रीदा गया था.

इलाक़े में अच्छा बच्चों का डॉक्टर न होने के कारण कई परिवार इसी केमिस्ट के पास बच्चों को ले जाते थे और उसकी दी हुई दवा बच्चों को देते थे.

परिवार के मुताबिक़ कफ़ सिरप पीने के बाद अनिरुद्ध का पेशाब रुक गया, उसके पाँव फूल गए और वो जो भी खाता उल्टी कर देता था.

बाद में डॉक्टरों ने बताया कि उसके गुर्दों को बहुत नुक़सान पहुँचा है.

अनिरुद्ध के पिता अशोक कुमार

अनिरुद्ध के पिता अशोक कुमार ने बताया, "हमारे पैरों तलों ज़मीन खिसक गई कि ऐसा कैसे हो सकता है? उलटी आने से, लूज़ मोशन से किडनी डैमेज नहीं हो सकती."

ज़्यादा वक्त नहीं बीता था, जब अनिरुद्ध को ब्रेन हैमरेज हुआ.

अशोक कुमार याद करते हैं, "(उसे) ब्रेन हैमरेज हो गया, नाक में से ख़ून निकल गया. उसके फेफड़े फट गए. डॉक्टर साहब बोलने लगे कि बच्चा 99 प्रतिशत ख़त्म हो चुका है. उस नौ जनवरी को हम कभी नहीं भूलेंगे."

दो महीने का इफ़ान जाफ़रउद्दीन और मुरफ़ा बीबी का पहला बच्चा था.

उनके पास इफ़ान की तस्वीर तक नहीं है. उन्होंने बताया कि कफ़ सिरप पीने के 10 दिनों के भीतर ही वो नहीं रहा.

मुरफ़ा बीबी बताती हैं, "वो उस वक़्त बहुत परेशान था. जब उसे उल्टी आती थी, तो वो लेट कर रोने लगता था. उसने दूध पीना बंद कर दिया था. वो बेहोश हो जाता था."

Jafardin
इमेज कैप्शन, जाफ़रउद्दीन के पास बेटे इफ़ान की तस्वीर तक नहीं है.

जम्मू में मौत की जाँच

सुकेश खजूरिया
इमेज कैप्शन, जम्मू में स्थानीय एक्टिविस्ट सुकेश खजूरिया रामनगर में बच्चों की मौत पर लगातार लिखते और बोलते रहे हैं.

जम्मू में स्थानीय एक्टिविस्ट सुकेश खजूरिया रामनगर में बच्चों की मौत पर लगातार लिखते और बोलते रहे हैं.

वो कहते हैं, "मरने वाले सब बेमौत मारे गए हैं और जिस कंपनी ने ये दवा बनाई और जो ड्रग्स कंट्रोलर के ऑफ़िसर थे, उन्होंने अपना काम नहीं किया. उन्होंने बिना चेक किए गए अवैध दवा को बिकने दिया. अगर सरकार ने उस वक़्त कॉग्निज़ेंस ली होती, तो गांबिया में ये नहीं होता."

जानवी का परिवार
इमेज कैप्शन, जम्मू में परिवारों का कहना है कि वो न्याय चाहते हैं

जम्मू और कश्मीर ड्रग सकंट्रोलर लोतिका खजूरिया कहती हैं, "लीगल सैंपल लिफ़्ट करके हमने उसे पहले रीजनल ड्रग लैबॉरेट्री चंडीगढ़ में भेजा. वहाँ से जो रिपोर्ट आई उसके मुताबिक़ उसमें डाइथिलीन ग्लाइकॉल 34 प्रतिशत ज़्यादा था. वो आख़िरी फ़ाइनल रिपोर्ट नहीं थी. हमने फिर सैंपल को सीडीएल कोलकाता ऐपलेट लेबोरेट्री में भेजा. वहाँ से भी वही रिपोर्ट आई कि उसमें 34 प्रतिशत से कुछ ज़्यादा डाइथलीन ग्लाइकॉल है. उसके बाद हमारी जाँच शुरू हुई."

बच्चों की डॉक्टर भवनीत भारती एक टीम की प्रमुख थीं, जिसने रामनगर में बच्चों की मौत की जाँच की.

वो कहती हैं, "टॉक्सिन देने के साथ उनकी किडनी फेल हो गईं. अगर उनके दिमाग़ पर असर होता, तो शारीरिक अक्षमता आ जाती है. उन्हें वेंटिलेशन की ज़रूरत हो सकती है क्योंकि बहुत से बच्चे वेंटिलेटर पर भी चले गए."

पुलिस ने मामले की जाँच की और मामला फ़िलहाल अदालत में है.

इस मामले में डिजिटल विज़न नाम की कंपनी पर आरोप लगे थे.

लोतिका खजूरिया
इमेज कैप्शन, जम्मू और कश्मीर ड्रग सकंट्रोलर लोतिका खजूरिया घटना के मुताबिक अफ़सरों ने परिवारों को न्याय दिलाने के लिए बहुत मेहनत की.

लेकिन इसके मालिक परषोत्तम गोयल का दावा है कि बच्चों ने उनकी कंपनी का बनाया कफ़ सिरप पीया ही नहीं.

हिमाचल प्रदेश में उनकी फ़ैक्टरी में उनसे फ़ोन पर बात हुई.

उन्होंने कहा, "हम बच्चे मारने के लिए थोड़े ही बैठे हैं. हम वहाँ किसी के बच्चे को क्यों मारेंगे? हम तो दवा बना रहे हैं, कोई ज़हर थोड़े ही बना रहे हैं. हम भगवान से डरने वाले लोग हैं. हम ऐसा काम करते ही नहीं हैं. हमें क्या ज़रूरत है किसी के साथ इंजस्टिस करने की."

हमें बताया गया कि बच्चों की मौत के बाद छह महीने तक फ़ैक्टरी को बंद कर दिया गया था, लेकिन अदालत के आदेश के बाद फ़ैक्टरी को दोबारा खोल दिया गया.

एक्टिविस्ट और लेखक दिनेश ठाकुर सिस्टम में पारदर्शिता में कमी का आरोप लगाते हैं.

उनका दावा है कि जब भारतीय कंपनियाँ अमेरिका और यूरोप के लिए दवा बनाती हैं, तो उनके मानक अलग और जब कंपनियाँ भारत या अफ़्रीका में देशों के लिए दवा बनाती हैं, तो उनके मानक अलग होते हैं.

फ़ार्मासूटिकल एक्सपोर्ट प्रोमोशन काउंसिल ऑफ़ इंडिया के डायरेक्टर जनरल उदय भास्कर इन आरोपों से सहमत नहीं.

वो कहते हैं, "अफ़्रीका हमारा तीसरा बड़ा निर्यात बाज़ार है. दक्षिण अफ्रीका, घाना, नाइजीरिया ऐसे बहुत से देश हैं, जहाँ की नियामक संस्थाएँ बहुत मज़बूत हैं."

बच गए बच्चों की कहानी

रामनगर में ऐसे भी परिवार हैं, जिन्होंने बताया कि उनके बच्चों ने भी कथित ज़हरीली कफ़ सिरप को पीया और बच गए.

पवन कुमार के परिवार के मुताबिक़ जब वो 15 महीने के थे, तब उन्हें वही कथित ज़हरीली कफ़ सिरप दी गई.

पवन तीन महीने अस्पताल में भर्ती रहे और उनका इलाज अब भी जारी है.

पवन के पिता शंभूराम मज़दूरी करके दिन का 400 से 500 रुपया कमाते हैं.

शंभूराम
इमेज कैप्शन, पवन के पिता शंभूराम मज़दूरी करके दिन का 400 से 500 रुपया कमाते हैं.

शंभूराम बताते हैं, "अभी इसकी आँखों की रोशनी भी कम है और इसका एक कान बिल्कुल ख़राब हो गया है. डॉक्टर ये बताते हैं कि ये बड़ा भी हो जाएगा, तो कोई काम नहीं कर पाएगा. दौड़ नहीं पाएगा, कोई वज़न नहीं उठा पाएगा."

छह साल का प्रनव 30 दिनो से ज़्यादा वक़्त कोमा में रहा. परिवार के मुताबिक़ वो अब न देख पाता है और न सुन पाता है.

उनकी माँ प्रिया वर्मा ने बताया, "डॉक्टर बोलते हैं कि इसकी दिमाग़ की, आँखों की, कानों की नसों को नुक़सान पहुँचा है. (ये वापस) आएगी या नहीं, ये पक्का नहीं है. (उन्होंने कहा है कि) भगवान पर छोड़ दो."

प्रनव अकेला नहीं रह पाता. उसके साथ हमेशा किसी का होना ज़रूरी है, नहीं तो वो डरता है कि कहीं उसे अकेला तो छोड़कर नहीं चले गए.

प्रणव और उनके मां-बाप
इमेज कैप्शन, छह साल का प्रणव 30 दिनो से ज़्यादा वक्त कोमा में रहा. परिवार के मुताबिक उसे सुनने और देखने में परेशानी होती है.

परिवार बच्चों के इलाज के लिए सरकारी मदद चाहते हैं ताकि अगर कल को वो न रहें, तो बच्चे अपनी देखभाल खुद कर पाएँ.

दो साल के बन्ना, तीन साल की अंकिता, 11 महीने की जाह्नवी, 10 महीने की आइसाटू, एक साल सात महीने का मूसा और कई नाम.

परिवार चाहते हैं कि क़ानून पूरी सख़्ती से दोषिया के ख़िलाफ़ काम करे और उन्हें पता है कि लंबी चलने वाली ये लड़ाई आसान नहीं होगी.

अपने दो महीने के बेटे इफ़ान को खोने वाले जाफ़रउद्दीन कहते हैं, "इंसाफ़ होना चाहिए."

गांबिया हो या जम्मू- दोनों ही जगह आरोप हैं कि कफ़ सिरप के कारण ही बड़ी संख्या में बच्चों की जान गई है.

अभी कई मामलों में जाँच पूरी नहीं हुई है, तो अन्य मामलों में कार्रवाई तक नहीं हो पाई है.

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