जब 76 घंटे समंदर में 1600 फ़ुट अंदर फंसे रहे दो लोग

वैनेसा बैरफ़ोर्ड

बीबीसी न्यूज़

जहाज़

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टाइटैनिक के मलबे को दिखाने गई टाइटन पनडुब्बी अभी भी लापता है और उसमें अंदर के 5 लोगों की तलाश जारी है. लेकिन ऐसा पहली बार नहीं है जब समुद्र के अंदर इस तरह लोग फंसे हों.

करीब 50 साल पहले दो ब्रिटिश सैनिकों को कुछ इसी तरह पानी के अंदर तीन दिन तक छह फीट चौड़ी एक स्टील बॉल के अंदर गुज़ारने पड़े थे.

ये घटना आयरलैंड से करीब 150 मील दूर हुई थी. जब इन लोगों को बचाया गया, उस वक़्त ये पनडुब्बी समुद्र में 1600 फ़ीट नीचे थी और उसमें केवल 12 मिनट का ऑक्सीजन बचा था.

ये कहानी पाइसीस III की है. 29 अगस्त 1973 को रॉयल नेवी के कर्मचारी रोजर चैपमैन (28) और इंजीनियर रोजर मैलिनसन एक हादसे के बाद अटलांटिक महासागर में काफ़ी गहराई में चले गए थे. उन्हें बचाने के लिए 76 घंटों का बचाव अभियान चलाया गया.

उस दिन क्या हुआ था?

घटना के दिन रोज़र चैपमैन और रोज़र मैलिनसन आयरलैंड से करीब 150 मील दूर अटलांटिक महासागर के अंदर टेलीफ़ोन केबल बिछाने का काम कर रहे थे.

इस हादसे को लेकर बीबीसी ने साल 2013 में रोज़र चैपमैन और रोज़र मैलिनसन से बात की थी. चैपमैन ने तब बीबीसी को बताया था, ''हम पानी के अंदर आधा मील प्रतिघंटा की रफ़्तार से जाते थे, वहां सतह से पहुंचते थे. पंप और जेट के इस्तेमाल के बाद केबल बिछाते थे.''

वहीं रोज़र मैलिनसन ने घटना को याद करते हुए बताया था, ''ये सब करते हुए काफ़ी थकावट हो जाती थी. ऐसा लगता था कि एक घने कोहरे में हम सड़क पर गाड़ी चला रहे हों और बस एक सफे़द लाइन के भरोसे हम ड्राइव कर रहे हों.''

बकौल मैलिनसन उस वक्त उन्हें 26-26 घंटे लगातार काम करना पड़ता था, वो भी बिना नींद के. इस घटना से कुछ दिन पहले ही ये पनडुब्बी एक छोटे हादसे का शिकार हो गई थी, जिसके बाद इसके ऑक्सीजन टैंक को बदला गया था.

उन्होंने घटना के बारे आगे बताया, ''हम अपनी पनडुब्बी को एक रस्सी के ज़रिए ऊपर खींचे जाने का इंतज़ार कर रहे थे . हमें रस्सी और बेड़ियों का आवाज़ आ रही थी, ऐसा हमेशा होता था. लेकिन तभी अचानक हम डूबने लगे पनडुब्बी बुरी तरह से झटके खा रही थी. ये काफ़ी डरावना था.''

इसके बाद दोनों नाविकों ने पनडुब्बी में बिजली सप्लाई बंद कर दी. ये पनडुब्बी समुद्र की सतह से 15 75 फ़ीट नीचे आकर रुकी.

राहत की बात ये रही कि इस दौरान दोनों नौसनिकों कोई ख़ास चोट नहीं आई थी.

जब पाइसीस III के अंदर फ़ंसे थे रोज़र चैपमैन

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बचाव अभियान

इसके बाद चैपमैन और मैलिनसन ने फ़ोन के ज़रिए मदद मांगी. जिस वक्त ये हादसा हुआ उनकी पनडुब्बी में 66 घंटे की ऑक्सीजन बाकी थी.

पाइसीस III की मदद की गुहार के बाद उसके सहयोगी जहाज विकर्स वॉयेगर को कोर्क शहर के लिए रवाना हुआ. फिर वॉयेगर पाइसीस III से मिलती जुलती 2 पनडुब्बियों पाइसीस II और पाइसीस V को लेकर घटना स्थल पर पहुंचा.

इसके अलावा कुछ और जहाजों और एक विमान को घटनास्थल के पास रेस्क्यू ऑपरेशन में मदद के लिए तैनात किया गया.

रेस्क्यू के बाद रोज़र चैपमैन और रोज़र मैलिनसन

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बेहद मुश्किल रेस्क्यू मिशन

तीन दिनों तक चले रेस्क्यू ऑपरेशन में पहले पाइसीस II को रस्सी के सहारे समुद्री तल पर फंसी पाइसीस III के पास भेजने की कोशिश की गई, लेकिन ये रस्सी टूट गई. और उसे वापस ऊपर लौटना पड़ा.

बाद में पाइसीस V को पनडुब्बी को ढूंढने के लिए रस्सी के सहारे नीचे भेजा गया, लेकिन कई घंटों की मशक्कत के बाद भी वो उसे ढूंढा नहीं जा सका. ईंधन ख़त्म होने के कारण उसे भी वापस लौटना पड़ा.

हालांकि कुछ समय बाद पाइसीस V को फिर से नीचे फंसी पनडुब्बी को ढूंढने के लिए रवाना किया गया. इस बार पाइसीस V, पाइसीस III को ढूंढने में कामयाब रहा.

समुद्र की सतह में फ़ंसे दोनों नौसैनिकों को पहले बताया गया कि क्वीन एलिज़ाबेथ ने उनके लिए शुभकामना संदेश भेजा है.

मैलिनसन ने इसे याद करते हुए बताया, ''इतने बुरे हालात में हम थे, ठंड के बीच बेहद मुश्किल हालात में, लेकिन महारानी के संदेश ने हमें गर्मजोशी से भर दिया.''

हालांकि बाद में पता चला कि जो संदेश आया था, महारानी की तरफ़ से नहीं, बल्कि क्वीन एलिज़ाबेथ-2 नाम के जहाज़ से आया था.

अभियान से जुड़े लोग

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तीन दिन बाद बाहर आए

आख़िरकार तमाम मशक्कतों के बाद 1 सितंबर, 1973 को दोनों को बाहर निकाल लिया गया.

जब उन्हें बचाया गया तब पाइसीस III में पायलट 84 घंटे 30 मिनट बिता चुके थे.

चैपमैन ने कहा, “जब हमने पानी में गोता लगाया तो हमारे पास 72 घंटे का लाइफ़ सपोर्ट था, इसीलिए हम किसी तरह 12.5 घंटे और निकालने में सफल रहे. जब रेस्क्यू किया गया तो हमारे ऑक्सीजन सिलेंडर में सिर्फ 12 मिनट की ऑक्सीजन बची थी.”

रोज़र चैपमैन ने इस घटना के बाद नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया और अपनी डिफेंस से जुड़ी कंपनी शुरू की.

रोज़र मैलिनसन अगले 5 साल तक उसी कंपनी में काम करते रहे. दोनों घटना के सालों बाद भी संपर्क में बने रहे.

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