जी20 में अफ़्रीकन यूनियन को शामिल करना भारत के लिए कितनी बड़ी उपलब्धि?

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- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
“आप सबकी सहमति से मैं अफ़्रीकन यूनियन के अध्यक्ष को जी20 के स्थायी सदस्य के रूप में अपना स्थान ग्रहण करने के लिए आमंत्रित करता हूं.”
जी20 की अध्यक्षता कर रहे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस घोषणा के बाद दुनिया भर से जुटे नेताओं की तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई देने लगी.
इसी बीच विदेश मंत्री एस जयशंकर अफ़्रीकन यूनियन के अध्यक्ष अजाली औसमानी को लेने उनकी कुर्सी तक पहुंचे.
इसके बाद पीएम मोदी औसमानी को बधाई देने के लिए उठे और दोनों नेताओं ने एक दूसरे को गले लगाया और तुरंत ही अफ़्रीकन यूनियन नाम का प्लेकॉर्ड और झंडा उनकी कुर्सी के सामने रख दिया गया.
अफ्रीकन यूनियन को स्थायी सदस्य बनाया जाना न सिर्फ अफ़्रीका के देशों के लिए बल्कि भारत के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि है.
सवाल है कि इससे भारत को क्या फायदा होगा? और क्या यह पीएम नरेंद्र मोदी को एक वैश्विक नेता के तौर पर मजबूती से प्रोजेक्ट करेगा? इससे अन्य देशों के डायनामिक्स कैसे बदल जाएंगे?

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कितना बड़ा है जी20
जी20 अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग का एक प्रमुख मंच है, जहां विश्व नेता एक साथ बैठकर वैश्विक आर्थिक और वित्तीय मुद्दों पर चर्चा करते हैं. इसके अलावा इस मंच पर जलवायु परिवर्तन, सतत विकास, कृषि, ऊर्जा और पर्यावरण समेत अन्य जरूरी मुद्दों पर भी बातचीत की जाती है.
यह मंच कितना बड़ा है, इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें शामिल देशों का वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के करीब 85 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार का करीब 75 प्रतिशत का योगदान है, इसमें विश्व की करीब दो तिहाई आबादी आती है.
अब तक जी20 में 19 देश और यूरोपीय संघ शामिल था. संगठन में शामिल देशों में अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, मेक्सिको, कोरिया, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, तुर्किये, यूके और अमेरिका हैं.
लेकिन अब अफ़्रीकन यूनियन के स्थायी सदस्य बनने के बाद यह पहले से और अधिक मजबूत और बड़ा हो गया है, क्योंकि अफ़्रीकन यूनियन 55 देशों का एक ऐसा संघ है, जिसमें दुनिया की करीब 18 प्रतिशत आबादी रहती है. यह विश्व का करीब 20 प्रतिशत लैंड एरिया है, जिसकी अर्थव्यवस्था सात ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा है.
बड़ी बात है कि यह सब भारत की जमीन पर घटित हुआ, जिसे पूरी दुनिया ने देखा.

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भारत को क्या होगा फायदा
कई सालों से पीएम मोदी ने अलग-अलग मंचों पर अफ़्रीका को भारत की प्राथमिकता बताया है. वे कई खुद कई अफ़्रीकी देशों की यात्रा कर चुके हैं.
55 देशों के संघ को जी20 में शामिल करने में भारत ने अहम भूमिका निभाई है, जिसका फायदा उसे अलग अलग मंचों पर होगा.
यूनिवर्सिटी ऑफ मुंबई में अफ़्रीकन स्टडीज डिपार्टमेंट की प्रोफेसर और पूर्व डायरेक्टर रेणु मोदी कहती हैं कि अफ़्रीकन यूनियन के देश पोटेंशियल वोटर हैं, जिन्हें भारत अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सकता है. अभी तक उनके पास आधिकारिक दर्जा नहीं था और वे बाहर से अपना विचार रख रहे थे लेकिन अब उनके पास वोट करने का अधिकार होगा और महत्वपूर्ण फैसलों को प्रभावित कर पाएंगे.
वे कहती हैं, “जब चीन को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी बनाया गया था, तो उसमें अफ्रीका के देशों ने भी मदद की थी. यह भारत के एजेंडा में है और 50 से ज्यादा देशों का यह संघ इस काम में भारत के काम आ सकता है.”
रेणु मोदी कहती हैं, “अफ़्रीकन संघ के देश क्लाइमेट चेंज, सस्टेनेबल डेवलपमेंट जैसे कई मुद्दों पर भी भारत का साथ दे सकते हैं, क्योंकि उनके और हमारे हित साझा हैं."
ऐसी स्थिति में भारत विश्व मंच पर निर्णायक भूमिका अदा कर सकता है. दिल्ली यूनिवर्सिटी में अफ़्रीकन स्टडीज डिपार्टमेंट के प्रोफेसर और 'अफ्रीका इंडिया' के एडिटर सुरेश कुमार 'त्रिकोणीय समीकरण' की बात करते हैं.
वे कहते हैं, “अफ्रीका के देशों को साथ लेकर भारत अलग-अलग त्रिकोणीय कॉरपोरेशन बना सकता है. भारत, जापान और अफ्रीका पहले से काम कर रहे हैं. उसी तरह भारत-अमेरिका-अफ्रीकन यूनियन, भारत-सऊदी- अफ्रीकन यूनियन जैसे ग्रुप आने वाले दिनों में दिखाई दे सकते हैं, जिससे भारत को फायदा मिलेगा.”

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अफ़्रीकन यूनियन के साथ भारत के संबंध
भारत ने दक्षिण अफ्रीका के देशों को हमेशा से अपने साझीदार और सहयोगी के दौर पर देखा है. घाना, तंजानिया, कांगो, तंजानिया और नाइजीरिया जैसे देशों में भारतीय पीढ़ियों से रहते आए हैं लेकिन इन देशों में चीन के लोगों के रहने का इतना पुराना इतिहास नहीं मिलता.
प्रोफेसर रेणु मोदी कहती हैं, “भारत हजारों साल से अफ्रीका के साथ व्यापार कर रहा है. हम विचारधारा के तौर पर भी उनसे जुड़े हुए हैं. महात्मा गांधी वहां 21 साल तक रहे. भारत ने अफ्रीका में गांधी भेजे थे, लेकिन उन्होंने हमें महात्मा दिया, जिसने भारत की आजादी में महत्वपूर्ण रोल अदा किया.”
वे कहती हैं, “शीत युद्ध के समय जब भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई, तब भी अफ्रीका के देशों ने हमारा साथ दिया. वहीं भारत ने उनका साथ देते हुए ऐतिहासिक तौर पर रंगभेद विरोधी आंदोलन का समर्थन किया.”
अफ्रीका के देशों के साथ भारत के संबंध शुरू से ही अच्छे रहे हैं. कोरोना काल में भी भारत ने आगे बढ़कर मदद की थी.
प्रोफेसर सुरेश कुमार कहते हैं, “नरेंद्र मोदी के समय में भारत विकासशील देशों का मजबूती के साथ प्रतिनिधित्व कर रहा है. पिछले दो सालों में नरेंद्र मोदी ने अफ्रीका के देशों में कोविड वैक्सीन पहुंचाने का काम किया है.”

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प्राकृतिक संसाधनों का लाभ
अफ्रीका के देश सोना, क्रोमियम, प्लेटिनम, कोबाल्ट, हीरे और यूरेनियम जैसे प्राकृतिक संसाधनों से भरे हुए हैं.
रेणु मोदी कहती हैं, “अफ्रीका में जो संसाधन हैं, वे जमीन के नीचे हैं. उन्हें निकालने और इस्तेमाल करने के लिए जो टेक्नोलॉजी, ह्यूमन संसाधन, आईटी और मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी चाहिए, वो भारत के पास मौजूद है.”
वे कहती हैं, “अफ्रीका के पास विश्व का 20 प्रतिशत तेल है. फिलहाल भारत तेल के लिए मिडिल ईस्ट पर निर्भर है, जो काफी वोलेटाइल है. ऐसे में भारत अफ्रीका को साथ लेकर अपनी ऊर्जा जरूरतों को डायवर्सिफाई कर सकता है.”
इसी क्रम में भारत अफ्रीका के देशों के साथ मिलकर खाद्य सुरक्षा पर काम कर रहा है.
प्रोफेसर सुरेश कुमार कहते हैं, “भारत और अफ्रीका के देशों के बीच जितने भी समिट होते हैं उनमें खाद्य सुरक्षा एक प्रमुख मुद्दा होता है.मैंने अफ्रीका के चालीस देशों की यात्राएं की हैं. मैंने देखा कि अभी भी वहां पर बैलों और ऊंटों की मदद से लोग खेती कर रहे हैं, लेकिन भारत इस स्थिति को बदलने के लिए लंबे समय से काम कर रहा है.”
वे कहते हैं, “हम उन्हें नई तकनीक, अच्छे बीज और सस्ती खाद मुहैया करवा रहे हैं. भारत ने अलग अलग देशों में ट्रैक्टर भेजे हैं ताकि उससे उन्नत खेती को बढ़ावा दिया जा सके. अफ्रीका के युवाओं को भारत में बुलाकर छह-छह महीने की ट्रेनिंग भी दी जा रही है ताकि आधुनिक तरीके से खेती की जा सके.”

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चीन को चुनौती
भारत खुद को ‘ग्लोबल साउथ’ के नेता के तौर पर प्रोजेक्ट कर रहा है और इस क्षेत्र में चीन को चुनौती देते हुए दिखाई दे रहा है.
मौटे तौर पर भारत, चीन, ब्राजील और अफ्रीका को ग्लोबल साउथ कहा जाता है. हालांकि यह कोई भौगोलिक विभाजन नहीं है क्योंकि ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड भी दक्षिणी गोलार्ध में आते हैं, लेकिन ये देश इसका हिस्सा नहीं हैं.
प्रोफेसर रेणु मोदी कहती हैं, “अफ्रीका के कई देश चीन के कर्ज में डूबे हुए हैं. कर्ज इतना है कि लगता है जैसे गले में रस्सी लटकी हुई है. उन्होंने जल्दबाजी में चीन से कर्ज लिया है, लेकिन ऐसा नहीं है कि भारत वहां काम नहीं कर रहा है. भारत कैपेसिटी बिल्डिंग का काम कर रहा है, उन्हें पता है कि भारत शायद चीन जितना पैसा न दे पाए लेकिन उन्हें भारत पर भरोसा है.”
वे कहती हैं, “अफ्रीका को सालाना 100 बिलियन डॉलर के इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट की जरूरत है, जिसे अकेला चीन पूरा नहीं कर सकता है. वहां बहुत सारे प्लेयर काम कर रहे हैं. अमेरिका, यूरोपियन यूनियन और यूरोप तो पहले से हैं लेकिन तुर्किए, सऊदी अरब, इंडोनेशिया, कोरिया, सिंगापुर जैसे देश नए हैं. उदाहरण के लिए पाम आयल के क्षेत्र में इंडोनेशिया, कार के क्षेत्र में कोरिया और जापान जैसे देश बड़े पैमाने पर वहां काम कर रहे हैं.”
ऐसी स्थिति में भारत के पास एक अच्छा मौका है कि वह अफ्रीका के देशों में निवेश कर सकता है और चीन का दबदबा वहां कम किया जा सकता है.
सुरेश कुमार कहते हैं कि चीन का रवैया अफ्रीका के देशों में मौकापरस्ती का रहा है, जबकि भारत ने वहां जमीनी तौर पर काम किया है, जिसके चलते भारत को वहां एक सहयोगी की तरह देखा जाता है.
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