पाकिस्तान: उन रास्तों की पड़ताल जहां से होती है ईरानी पेट्रोल और खाने के तेल की तस्करी

सहर बलोच

बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, माशकील

ईरान पाकिस्तान

"हम बच्चे थे तब से सुन रहे हैं कि स्मगलिंग बंद होगी और ईरान के साथ क़ानूनी ढंग से व्यापार शुरू किया जाएगा. या तो इसे पूरी तरह बंद कर दें या फिर कोई ऐसी नीति बनाएं कि यह काम ग़ैरक़ानूनी न रहे."

ये कहना है कराची के युसूफ़ गोठ बाज़ार में मिले दुकानदार नक़ीबुल्लाह का.

माशकील बलूचिस्तान के वाशुक ज़िले की एक तहसील है.

स्मगलिंग कहें या अनौपचारिक व्यापार, सच तो यह है कि इस समय पाकिस्तान में जगह-जगह ईरानी सामान की ख़रीद- बिक्री हो रही है और जो सामान एक समय में केवल बलूचिस्तान के सीमाई क्षेत्रों तक सीमित था वह पाकिस्तान के विभिन्न शहरों के बाज़ारों में सस्ते दामों पर मिल रहा है.

चाहे वो पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद का इतवार बाज़ार हो या फिर रावलपिंडी का ननकारी बाज़ार या बाजोड़ प्लाज़ा, या फिर कराची का यूसुफ़ गोठ, इस समय थोक के हिसाब से यह सामान ईरान से पाकिस्तान पहुंच रहा है.

लेकिन इनके बारे में दूसरी और बात जानने से पहले यह जान लेते हैं की कहानी असल में है क्या.

यह कहानी असल में दो देशों के बीच अनौपचारिक व्यापार की है. ईरान और पाकिस्तान को इस समय एक दूसरे की सख़्त ज़रूरत है. अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान को निर्यात में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और ऐसे में पाकिस्तान से सीमा से जुड़े होने के कारण वह वहां से सामान के बदले सामान दे और ले सकता है. जबकि महंगाई और डॉलर के बढ़ते रेट को देखते हुए पाकिस्तान की निर्भरता इस समय ईरानी सामान पर बढ़ रही है.

इस रिपोर्ट में हम दो ऐसी चीज़ों के बारे में यानी पेट्रोल और खाद्य तेल के ईरान से पाकिस्तान में बलूचिस्तान के सीमाई क्षेत्रों तक आने और यहां से इसके देश के विभिन्न शहरों तक पहुंचने के बारे में जानने की कोशिश करेंगे.

ईरान पाकिस्तान

बलूचिस्तान का सीमाई क्षेत्र और ईरानी पेट्रोल

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मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

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सामान लाने ले जाने को कुछ लोग स्मगलिंग और कुछ अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का नाम देते हैं.

अनौपचारिक अर्थव्यवस्था कहने के पीछे यहां के स्थानीय लोग यह कारण बताते हैं कि सदियों से इस कहानी की शुरुआत बलूचिस्तान के सीमाई क्षेत्रों से होती है जहां सड़क सिरे से मौजूद ही नहीं है और कच्चे रास्तों से हर दिन हज़ारों की संख्या में ड्राइवर ईरानी सीमा तक पेट्रोल के कनस्तर लाते और ले जाते हैं.

इस तरह सामान सीमाई क्षेत्रों में रहने वालों की कमाई ईरानी सामान के व्यापार पर निर्भर रही है.

माशकील तक दो रास्तों से पहुंचा जा सकता है. या तो कोटा से दालबंदीन के रास्ते या फिर ग्वादर पहुंचने के बाद पंचगोर के रास्ते.

दोनों रास्तों को चुनने में एक बात एक जैसी है, वह यह है कि माशकील तक जाने का लगभग पांच घंटे का रास्ता बेहद ख़स्ताहाल और टूट-फूट का शिकार है.

बलूचिस्तान के दक्षिणी क्षेत्रों में यात्रा करने के दौरान अक्सर बताया जाता है कि जहां तक पक्की सड़क बनी हुई हो, इसका मतलब यह है कि यहां तक पाकिस्तान के क़ानून लागू करने वाली संस्थाओं की पहुंच है. और अगर सड़क कच्ची है तो इसका मतलब है कि यहां या तो अधिकारी नहीं रहते या फिर सर्मचार मौजूद हैं. सर्मचार बलूचिस्तान के चरमपंथियों को कहा जाता है.

माशकील जाने वाली इसी कच्ची सड़क पर तस्करी के तीन अलग-अलग रास्ते हैं जिनसे पेट्रोल के अलावा मानव तस्करी भी होती है. इसी रास्ते पर स्थानीय ड्राइवर ख़ास महारथ से हर दिन गाड़ी एक कोने से दूसरे कोने तक ले जाते हैं.

इस रास्ते पर पहुंचने के बाद मुझे सावधान किया गया कि एक कच्ची सड़क के साथ चलते रहना है क्योंकि थोड़ा सा भी भटकने पर आप पेट्रोल की स्मगलिंग के ट्रैक पर चलने के बजाय मानव तस्करी के ट्रैक पर चलने लगेंगी जिसके बाद सीमा पर पहुंचने पर ईरानी अफ़सर फ़ायरिंग भी कर सकते हैं.

माशकील के लिए तड़के निकलने के दो घंटे के बाद तक रास्ते में कोई भी नज़र नहीं आया. इसके बाद उजाला होने पर एक के बाद दूसरे कई नीले रंग के पिकअप ट्रक नज़र आए. इन गाड़ियों को आम भाषा में 'ज़ंबाद' कहा जाता है जबकि ईरान में 'ज़मयाद' कहा जाता है.

एक समय ऐसा भी आया जब लगा कि शायद पूरे रास्ते पर कोई दिखेगा ही नहीं. यह वह समय था जब हम सोच रहे थे कि अगर इस रास्ते पर गाड़ी का पहिया फट गया तो क्या करेंगे?

लगभग चार घंटे यात्रा करने के बाद हमें एक तंबू नज़र आया. उस जगह पहुंचकर कुछ चहल-पहल दिखी. यह तंबू वास्तव में खाने-पीने के लिए रुकने की जगह के तौर पर इस्तेमाल होती है. यहां पर बड़े-बड़े ट्रक और गाड़ियां आकर रुकती हैं जहां पर उनको ईरानी बिस्कुट और चाय दी जाती है.

मुझे बताया गया कि इस जगह को बलोची भाषा में ड्रेग कहते हैं जिसका मतलब मिट्टी का डेरा बताया गया. और यहां पर आसपास केवल मिट्टी की थी जिसमें यही बड़े-बड़े ट्रक चाय पीने के बाद जैसे ग़ायब हो जाते थे.

माशकील की आर्थिक हालत यह है कि अगर एक दिन ईरानी सीमा बंद हो जाए तो स्थानीय लोगों में भुखमरी की नौबत आ जाती है. पेट्रोल और डीज़ल पहुंचाने वालों की एक दिन की दिहाड़ी मारी जाती है और दूसरे दिन सीमा खुलने पर अधिक पैसे कमाने का दबाव बढ़ जाता है.

पेट्रोल

'कमाई का कोई और साधन नहीं है'

आगे आने वाले रास्ते पर मेरी मुलाक़ात उन लोगों से हुई जिनकी ज़िंदगी का दारोमदार ईरानी पेट्रोल पर है जिनमें एक 24 साल के 'ज़ंबाद' ड्राइवर भी थे. मिलने के साथ ही उन्होंने बताया कि कैसे उनका हर दूसरे दिन माशकील से क्वेटा जाना होता है.

वो कहते हैं, "आप देख सकते हैं यहां यह रोड है. आज मुझे सातवां दिन है इस रास्ते पर, कोई पूछने वाला नहीं है. माशकील में कुछ भी नहीं है. ना फ़ैक्ट्री है, ना कमाने का कोई और ज़रिया है. हमारे लिए बस यही काम है."

इस ड्राइवर ने बताया कि कैसे अगर सरकार चाहे तो "माशकील में फ़ैक्ट्री या कोई और नौकरी का ज़रिया बना सकती है. और जब तक नहीं बनेगा तब तक इस काम के अलावा कोई और चारा नहीं है."

इसी तरह एक 19 साल के 'ज़ंबाद' ड्राइवर ने बताया कि वह यह काम मजबूरी में कर रहे हैं. "हम ग़रीब लोग हैं. इधर रोड भी नहीं है, इधर कुछ भी नहीं है. आप एक घंटा नहीं बैठ सकेंगे यहां पर. यहां ना बिजली है, ना पानी है और ना ही कमाने का कोई और तरीक़ा है. दिन में कभी तीन हज़ार और कभी दस हज़ार रुपये कमा लेते हैं. (पाकिस्तान के तीन हज़ार भारतीय मुद्रा में 855 रुपये).

माशकील के बाजार पहुंचने पर मुझे इस बात पर हैरानी हुई इस बाज़ार में खाने पीने की चीज़ों से ज़्यादा बड़ी संख्या ईरानी पेट्रोल और डीजल के कंटेनर्स की थी.

और इसी जगह मुझे लोगों से बात करने पर विरोध का सामना भी करना पड़ा.

ईरानी पेट्रोल का कारोबार करने वाले व्यापारियों ने बात करने से यह कहकर पूरी तरह इंकार कर दिया कि उनका कारोबार बंद हो जाएगा.

माशकील से वापसी पर मैंने देखा कि कैसे इस पूरी पट्टी पर अधिकारी मुश्किल से ही नज़र आते हैं. और अगर वह किसी 'ज़ंबाद' को रोक भी लें तो बिना काग़ज़ जांच किए आगे जाने देते हैं.

इस क्षेत्र में अधिकारी चेकपोस्ट लगाकर नहीं खड़े होते बल्कि सरकारी 'वीगो' या पिकअप गाड़ियों में बैठे होते हैं और बारी बारी से ईरानी तेल ले जाने वाले 'ज़ंबाद' उनके पास से या तो गुज़र जाते हैं या किसी को वह रोक कर सलाम- दुआ कर लेते हैं.

उस समय हम लोग भी 'वीगो' में ही थे जिसके कारण से लोगों ने हमसे बात करने से पूरी तरह इनकार कर दिया.

ट्रक ड्राइवर

पेट्रोल पाकिस्तान में कैसे जाता है?

माशकील से ईरानी सीमा लगभग 20 किलोमीटर दूर है. इस सीमा से पेट्रोल और डीज़ल तीन तरीक़ों से पाकिस्तान में दाख़िल होता है.

फ़्रंटलाइन पर यानी सबसे आगे पेट्रोल ले जाने वाले ड्राइवर आते हैं. यह ड्राइवर स्थानीय और सीमाई क्षेत्रों के ही रहने वाले होते हैं और उनकी उम्र की कोई पाबंदी नहीं होती क्योंकि रास्ते में कई स्थानों पर मैंने कम उम्र लड़कों को भी 'ज़ंबाद' चलाते हुए देखा.

दूसरे नंबर पर इस पेट्रोल को जमा करने वाले डिपो आते हैं जहां से इस तेल को विभिन्न जगहों तक पहुंचाया जाता है.

और फिर बारी आती है सीमाई क्षेत्रों में जगह-जगह बने पेट्रोल स्टेशन की जहां पर यह कम दाम वाला तेल बिकता है.

उदाहरण के लिए माशकील से वापसी पर दालबंदीन पर पेट्रोल की मंडी आती है जहां पर सीमा से आने वाला तेल कंटेनर में रखा जाता है.

इसके बाद यहां आने वाले ट्रक, पिकअप और बसों के ज़रिए इसे आगे भेजा जाता है. आगे से मतलब क्वेटा, हब और कराची. कराची के इलाक़े नार्दन हाईपास, यूसुफ़ गोठ के कुछ स्थानों और ल्यारी में यह पेट्रोल बिकता है.

दालबंदीन के इस डिपो पर आने वाले पेट्रोल की फ़िल्मिंग करते हुए हमारी टीम को नहीं रोका गया. और इस डिपो के मालिक ने बताया कि कैसे "यह काम चोरी छिपे नहीं हो रहा बल्कि सभी अधिकारियों के सामने से होता हुआ यह तेल पाकिस्तान की सीमाओं में प्रवेश करता है."

अब मैंने यह सोचा कि यहां से निकलते हुए यह पता लगाऊं कि ईरानी सीमा से पेट्रोल माशकील तक तो आ जाता है लेकिन यहां से फिर कहां- कहां जाता है.

ग्वादर बंदरगाह

आर्थिक कॉरिडोर और आमदनी के सीमित साधन

फ़्रंटलाइन पर काम करने वाले ड्राइवरों और इस सस्ते तेल की ख़रीद- बिक्री करने वाले व्यापारियों से बात करने के लिए अब मैंने ग्वादर का रुख़ किया.

माशकील से आने वाला तेल विभिन्न रास्तों से होता हुआ ग्वादर पहुंचता है. लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि आर्थिक कॉरिडोर से जुड़े होने के बावजूद ग्वादर के निवासी भी अपने लिए उसी तेल को आमदनी का एकमात्र और बुनियादी साधन समझते हैं.

यहां मेरी मुलाक़ात पेट्रोल ले जाने वाले एक 27 वर्षीय ड्राइवर से हुई जिन्होंने 'रेंट अ कार' का कारोबार छोड़कर ईरानी सीमा से तेल लाने और ले जाने का काम हाल ही में शुरू किया है.

"महंगाई का यह हाल है कि कोई भी ऐसा काम नहीं कर पा रहे हैं जिसमें अच्छे पैसे मिले." यह कहना था उस ड्राइवर का जिन्होंने अपनी पहचान छिपाने को कहा.

ग्वादर से भी जिउनी के रास्ते सीमा तक 'ज़ंबाद' जाते हैं. अगर कुछ ड्राइवर चाहें तो अपनी निजी पिकअप को भी तेल लाने ले जाने के लिए इस्तेमाल करते हैं.

मैंने उस गाड़ी के अंदर बैठने का इरादा करते हुए उस 27 वर्षीय व्यक्ति से यह जानने की कोशिश की कि उन्होंने तेल लाने और ले जाने का काम क्यों शुरू किया?

"यहां पर किसी और काम में पैसे नहीं है. जहां मैं 'रेंट अ कार' चलाकर दिन में तीन हज़ार रुपये कमाता हूं, वहीं ईरानी तेल से दिन भर में सात हज़ार कमा लेता हूं. मैंने केवल दसवीं क्लास तक पढ़ाई की है और मुझे शुरू से मालूम था कि मैं गाड़ियों का कारोबार करूंगा."

घरवालों की तरफ़ से भी इस काम को करने पर कोई रोकटोक नहीं क्योंकि उस ड्राइवर ने बताया कि उसके घर वाले क्षेत्र की आर्थिक स्थिति को जानते हैं.

"यहां सीमा से सटे क्षेत्रों में रहने वाले अधिकतर लोग ईरान, ओमान और दूसरे देशों से जुड़े होते हैं. ईरान के सीस्तान व बलूचिस्तान में हमारे रिश्तेदार भी हैं. इस तरफ़ विकास का कोई काम नहीं होता जबकि ईरान की तरफ़ काफ़ी तरक़्क़ी है. पाबंदियों के बावजूद कमाई के साधन हैं."

"लेकिन इन सब बातों के बावजूद मैं अपने भाइयों को यह काम नहीं करने दूंगा क्योंकि यह पूरी तरह मज़दूरी वाला काम है. वो चाहें तो सरकारी नौकरी कर लें."

इसके बाद मैं एक पेट्रोल स्टेशन पहुंची जहां के मालिक की कहानी भी उस ड्राइवर से ख़ास अलग नहीं थी.

उन्होंने बताया, "मैंने बीए किया हुआ है. और इसके बावजूद मैं यही काम कर रहा हूं. मेरा भाई अभी पढ़ रहा है और हम सबको पता है कि ग्रेजुएशन के बाद वह भी ईरानी पेट्रोल बेचने के कारोबार से जुड़ जाएगा."

ईरान

इमेज स्रोत, NASIR KABDANI

खाना पकाने का दुर्लभ ईरानी तेल

अब यह तो ईरानी पेट्रोल की कहानी थी. लेकिन ईरान से बड़ी मात्रा में खाना पकाने का तेल भी सीमा के रास्ते बलूचिस्तान पहुंचता है. और वहां से आगे ले जाया जाता है.

दो साल पहले तक ईरानी सीमा से आने वाला खाना पकाने का तेल ग्वादर के समुद्री किनारे पर नावों के ज़रिए पीले रंग के कनस्तरों में पहुंचाया जाता था. लेकिन अधिकारियों की ओर से सख़्ती के बाद अब इसका वैकल्पिक रास्ता तलाश कर लिया गया है. ग्वादर से डेढ़ सौ किलोमीटर की दूरी पर कुंटाई का इलाक़ा आता है. यहां सुबह सवेरे से लेकर शाम तक पेट्रोल और डीज़ल के साथ-साथ नावों पर खाना पकाने का तेल भी आता है.

ग्वादर पहुंचने के बाद खाना पकाने के इस तेल को पहले सादे थैले में डाला जाता है ताकि कराची और यहां तक के लाहौर के रेस्त्रां में इस्तेमाल हो सके. लेकिन अब इस तेल को अपने असली पैकेजिंग के साथ ही कराची, लाहौर और रावलपिंडी भेजा जाता है. ऐसे में ईरानी तेल 'गुलनाज़' अब सीमाई क्षेत्रों से देश के कोने-कोने तक पहुंच जाता है.

बलूचिस्तान का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां पर यह तेल आसानी से नहीं मिलता हो.

खाना पकाने के इस तेल का इस्तेमाल ग्वादर की रहने वाली ज़ैतून अब्दुल्ला भी करती हैं.

"मैंने जब से होश संभाला है तब से घर में ईरानी सामान ही देखा है. एक दौर ऐसा भी था के कराची में रहने वाले रिश्तेदार मुझसे ईरानी पिस्ता, तेल और अचार मंगवाते थे. और अब यह दौर है कि यह सभी सामान आसानी से कराची में मिल जाता है."

उन्होंने कहा, "हाल ही में मैंने टीवी पर देखा कि आटे की क़ीमतें बढ़े होने पर इस्लामाबाद और लाहौर में प्रदर्शन हो रहा था लेकिन हम लोग तो वह भी नहीं कर सकते क्योंकि हमारे पास एक ही सीमा और एक ही बाज़ार है और उसी पर सब निर्भर हैं. कराची, लाहौर और इस्लामाबाद में कम से कम दूसरे बाज़ार हैं, जहां पर सस्ता सामान मिल सकता है. हमें इसी से काम चलाना है. इसी मार्केट में मज़दूर भी आता है और अमीर लोग भी. हमें इसी से काम चलाना है, हम भूख से मर नहीं सकते."

ज़ैतून ने बताया कि कैसे कराची और लाहौर में मिलने की वजह से यह तेल अब 'दुर्लभ' हो गया है. "पहले जहां यह तेल 60 या 70 रुपये तक मिल जाता था वहीं अब इसकी क़ीमत 600 रुपये तक पहुंच चुकी है."

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि वह उस सामान के लाने को स्मगलिंग का नाम नहीं देंगी. "सीधे तौर पर भी नहीं कह सकती. स्मगलिंग वही है जो चीज़ आप चोरी-छिपे भेज रहे हों लेकिन यह तो अधिकारियों को देखना है और यह उनकी जानकारी में है. यह तो सीमाई क्षेत्रों में शुरू से आता रहा है. और अब जाकर पाकिस्तान के विभिन्न शहरों को पता चला है कि कहां से आ रहा है. हमारे घर के राशन का एकमात्र साधन आप कैसे ख़त्म कर सकते हैं?"

कराची

कराची के 'बड़ा रोड' का बड़ा ईरानी सामान

ग्वादर से होता हुआ खाना पकाने का यह तेल कराची के यूसुफ़ गोठ बस टर्मिनल पहुंचता है. इस टर्मिनल के बराबर ही 'बड़ा रोड' नाम का बाज़ार है जहां की दुकानों पर यह तेल बेचा जाता है. यहां एक दुकानदार नक़ीबुल्लाह ने बताया कि कैसे उस सामान की क़ानूनी हैसियत पर फ़ैसला करना अब ज़रूरी हो चुका है.

"हम बच्चे थे, तब से यह बात चल रही है कि स्मगलिंग बंद होगी. फिर यह शुरू हो जाती है और फिर से लोगों की जेबें भरना शुरू हो जाती हैं. अगर बंद करना है तो कर लें ताकि हम कोई और काम शुरू कर दें. दुनिया में कोई काम धंधा कम तो नहीं है. या पूरा रिलीफ़ दें या बंद कर दें."

हालांकि उन्होंने कहा कि यह होना नामुमकिन है. "क्योंकि ईरान पर प्रतिबंधों की वजह से उसका दुनिया भर से कारोबार स्मगलिंग से ही चलता है."

अब मेरे मन में यह सवाल आया कि अगर ईरानी सीमा से सामान कराची पहुंचाया जाता है तो क्या बदले में पाकिस्तान से भी कोई सामान ईरान जाता है?

इस सवाल का जवाब जानने के लिए मैंने कराची की मच्छी मियानी मार्केट का रुख़ किया. मच्छी मियानी कराची की पुरानी व्यापारिक मंडियों में से एक है और यह बाज़ार भी ब्रितानी राज के दौरान उस क्षेत्र के मछुआरों के लिए बनाया गया था. यहां मेरी मुलाक़ात आशिक़ अली से हुई. आशिक़ अली मसाले का कारोबार कर रहे हैं जिसकी बुनियाद आज से 50 साल पहले उनकी मां ने रखी थी.

"यह मसाले के पैकेट देख रही हैं आप? यह पूरा पैकेट हम बनाते हैं और फिर यहां से ईरान जाता है. वहां इसकी बहुत डिमांड है. पहले मेरी मां यहां बैठती थीं. फिर मेरे पिता और भाई ने काम संभाला और अब उन सब के जाने के बाद अब मेरे ज़िम्मे मसाले का काम आया है."

उन्होंने बताया कि यहां पर हर दिन अलग-अलग व्यापारी आकर मसाले की बोरियां ले जाते हैं जिसमें कभी पांच तो कभी 10 किलो मसाला होता है. और फिर उसे पहले तुरबत और फिर मंद की सीमा से ईरान भेज दिया जाता है.

"यहां आने वालों में ईरानी बलोच ज़यादा होते हैं जो मसाला ले जाते हैं. यहीं पास में पलंग की चादरें, चावल और जींस की पैंट मिलती हैं. वह भी कराची से ईरान जाती हैं."

कराची के पत्रकार सईद सरबाज़ी ने बताया कि आज भी ल्यारी में ऐसे परिवार मौजूद हैं जिनका ईरान से व्यापारिक और पारिवारिक संबंध है.

"पाकिस्तान में बहुत से लोग इस बात को नहीं समझते लेकिन यह सदियों पुराने रिश्ते हैं जिन्हें आज भी निभाया जा रहा है. बलूचिस्तान की सीमा के इस पार भी बलोच हैं और उस पर भी, और वो एक दूसरे की मदद करते रहते हैं."

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"ग़रीब को क्यों तंग करते हैं?"

इस यात्रा में मेरा आख़िरी पड़ाव रावलपिंडी का बाजोड़ प्लाज़ा बना जहां ईरानी सामान थोक के भाव मिलता है. यहां पर आने के साथ ही मुझे खाना पकाने का तेल मिला जो इससे पहले मैं ग्वादर और कराची में देख चुकी थी.

यहां पर आकर पता चला कि यह होलसेल की सबसे बड़ी मार्केट है जहां पर ईरानी खाना पकाने के तेल के अलावा चॉकलेट और टॉफ़ियां भी मिलती हैं. इसी तरह बाजोड़ प्लाज़ा के पास बने ननकारी बाज़ार और पान गली में भी ईरानी सामान मिलता है. यह आम लोगों की मार्केट है जहां पर लोग हर महीने 10 हज़ार से 12 हज़ार रुपये की ख़रीदारी कर सकते हैं.

बाजोड़ प्लाज़ा में दुकानदारों से बात करने पर पता चला कि उनकी समस्याएं भी दूसरे शहरों के आम लोगों से मिलती जुलती हैं.

एक दुकानदार ने बताया, "अक्सर कस्टम वाले तंग करते हैं. पिछले दिनों भी छापेमारी करके गए हैं लेकिन उनका काम तो नहीं बनता है. उन्होंने कहा कि छापे के नतीजे में जो दुकानदार यहां काम करते हैं उनकी भी दुकान ख़राब हो जाती है. हमारे पास रोज कस्टमर आते हैं ख़ासतौर से कश्मीर के इलाक़े हो गए, या ऐबटाबाद मानसहरा, पंजाब के क्षेत्रों तक के सामान जाता है."

उन्होंने बताया कि उनके पास अधिकतर सामान में शैंपू, बर्तन धोने का साबुन, केक, कुकिंग ऑयल, चॉकलेट और लस्सी आती है.

"अगर उन्हें बंद करना है तो सीमा से बंद करें ताकि माल भी न आए. फिर ग़रीबों को क्यों तंग करते हैं?"

ईरान पाकिस्तान

तस्करी या अनौपचारिक व्यापार?

इत्तेफ़ाक़ से इसी रिपोर्ट की फ़िल्मिंग के दौरान प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और ईरानी राष्ट्रपति सैयद इब्राहीम रईसी ने केच की सीमा पर मन्द, पशीन बज़ार का उद्घाटन किया.

मन्द पाकिस्तानी बलूचिस्तान का हिस्सा है और पशीन ईरानी राज्य सीस्तान और बलूचिस्तान का. इस उद्घाटन पर काफ़ी हैरानी हुई थी क्योंकि इससे पहले इस प्रोजेक्ट पर 2009 में बात की गई थी जिसके बाद यह ठंडे बस्ते में चला गया था.

हाल के दिनों में ईरान और सऊदी अरब के संबंधों में सुधार भी महत्वपूर्ण बात थी. विशेष तौर पर जब ख़ुद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के पूर्व प्रवक्ता कहते रहे हैं कि जब तक ईरान और सऊदी अरब के संबंध तनावपूर्ण रहेंगे तब तक पाकिस्तान ईरानी सीमा से आने वाले सामान को क़ानूनी रूप नहीं दे सकेगा.

इस समय मकरान डिविज़न को 75 प्रतिशत बिजली ईरान से मिलती है. वहां के स्थानीय लोग बताते हैं कि यह आज-कल की बात नहीं बल्कि लंबे अरसे से नज़रअंदाज़ हुए सीमाई क्षेत्रों में बिजली की भारी कमी के कारण ईरानी सप्लाई पर निर्भरता रही है. तो इसपर सब्सिडी क्यों नहीं दी जाती? या इसे क़ानूनी रूप क्यों नहीं दिया जाता?

पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली के सदस्य असलम भूतानी ने ईरानी सामान की ख़रीद- बिक्री को क़ानूनी रूप देने के सवाल पर यह कहकर कुछ कहने से इंकार कर दिया, "मेरे वोटर्स आपकी रिपोर्ट देखेंगे. ईरानी सामान के बारे में एक ग़लत जुमला मेरे वोटर्स को नाराज़ कर देगा. इसलिए मैं माफ़ी चाहता हूं."

अब सवाल यह भी है कि ईरान के साथ व्यापारिक संबंध सुधारने से पाकिस्तान को क्या लाभ होगा?

ग्वादर के चेंबर ऑफ़ कॉमर्स के सेक्रेटरी शमशुल हक़ ने बताया कि कैसे पाकिस्तान के लिए ईरान से व्यापार करना बहुत बेहतर है. "मैं कहता हूं कि इसे चलते रहना चाहिए लेकिन एक नीति बनानी चाहिए. क्योंकि यह बॉर्डर ट्रेड की मद में आ जाता है. यहां पर डॉलर शामिल नहीं, यहां पर कैश दिया जाता है. और सामान के बदले सामान देते हैं. यानी अगर हम ईरान से एलपीजी लेते हैं तो बदले में हम चावल, आम, टेक्सटाइल का सामान देते हैं. यह हमारी अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अच्छा है क्योंकि बदले में चावल, कीनू और आम एक्सपोर्ट हो जाएगा. और दूसरे मसाले आदि वहां जा सकेंगे."

ग्वादर में रहने वाले विश्लेषक नासिर रहीम सोहराबी ने कहा कि बलूचिस्तान केवल एक राज्य नहीं बल्कि ऐतिहासिक तौर पर एक विशेष क्षेत्र रहा है. "और उसके बारे में किए जाने वाले फ़ैसले उस क्षेत्र की राजनीति को देखकर किए जाने चाहिएं. जहां राष्ट्रीय राजनीति और नीतियां सऊदी अरब को प्राथमिकता देती रही हैं वहीं बलूचिस्तान के सीमाई क्षेत्रों में वर्षों से ईरानी प्रभाव रहा है. और ईरान और सऊदी अरब के संबंध में सुधार पाकिस्तान के इस सीमाई क्षेत्र के लिए बेहतर होगा क्योंकि इससे यहां के आम लोगों के लिए कारोबार के अवसर बढ़ेंगे."

बलूचिस्तान के सीमाई क्षेत्रों की बेहतरी के लिए पहले भी कई बार योजनाएं बनाई जा चुकी हैं.

बलूचिस्तान

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क्यों नाकाम हुईं योजनाएं ?

बलूचिस्तान असेंबली के सदस्य सनाउल्लाह बलोच ने कहा, "ये सारे झूठे वादे थे. चाहे वह पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने बलूचिस्तान पैकेज के नाम पर किए. या इससे पहले जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के दौर में किए गए या फिर इमरान ख़ान की सरकार में दक्षिणी बलूचिस्तान के नाम पर 360 अरब रुपये के पैकेज के नाम पर किए गए. हमने इस पर कहा कि इस तरह के फ़ैंसी और झूठे पैकेजों उसे बलूचिस्तान में तरक़्क़ी नहीं होगी."

उन्होंने कहा कि बलूचिस्तान में रहने के ख़र्च बहुत अधिक हैं. "लेकिन अगर आप टैक्स की व्यवस्था ऐसी बनाएंगे कि आप कहें कि जो व्यवस्था इस्लामाबाद में लागू करवाई है, वही यहां पर लागू करेंगे तो फिर स्मगलिंग को बढ़ावा मिलेगा."

इस सवाल पर कि अधिकारी अपनी मर्ज़ी और नीति के तहत बलूचिस्तान में जारी स्मगलिंग को नज़रअंदाज़ करते रहते हैं और फिर अपनी सुविधा के अनुसार इसे स्मगलिंग कह कर इस पर पाबंदी लगा देते हैं, सनाउल्लाह ने कहा कि यह समझना ग़लत है. "सरकार की नाकामी ज़रूर है लेकिन इसका हल यह है कि बलूचिस्तान के लिए आपको दो या तीन अलग-अलग व्यापारिक कॉरिडोर बनानी पड़ेगी. यानी ईरान के साथ हमारा ट्रेड कॉरिडोर हो जिसके अंदर आप चुने हुए लोगों के लिए टैक्स की व्यवस्था बनाएं, जिसमें वीज़ा की व्यवस्था भी शामिल होनी चाहिए."

सरकारें पहले भी वादे करते रही हैं और अब भी कर रही हैं. इस पूरे सफ़र में एक बात तो साफ़ हुई कि आमदनी का एक स्थाई साधन नहीं होने और बढ़ती महंगाई के कारण ऐसे सामान की मांग बढ़ती रहेगी और लोग वैकल्पिक रास्तों से यह काम करते रहेंगे.

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