पाकिस्तान चीनी मुद्रा में रूसी तेल क्यों ख़रीद रहा है?

शुभम किशोर

बीबीसी संवाददाता

चीनी युआन

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पाकिस्तान के पेट्रोलियम मंत्री मुसादिक मलिक ने बीते सोमवार बताया है कि उनकी सरकार ने रूस से कच्चा तेल ख़रीदने के लिए पहली बार चीनी मुद्रा का इस्तेमाल किया है.

पाक सरकार के इस कदम को एक बड़ा नीतिगत फ़ैसला माना जा रहा है क्योंकि इससे पहले तक तेल ख़रीदने के लिए पाकिस्तान अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल करता था.

कम दरों पर रूस से कच्चा तेल मिलना पाकिस्तान के लिए एक राहत की बात मानी जा रही हैं.

इसकी वजह पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था के मौजूदा हालात हैं.

पाकिस्तान इस समय बैलेंस ऑफ़ पेमेंट समस्या से जूझ रहा है और बाहरी क़र्ज़ के कारण देश पर डिफ़ॉल्ट करने का ख़तरा मंडरा रहा है.

पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के पास एक महीने तक आयात के भुगतान करने के लिए भी पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार नहीं है.

पाकिस्तान और रूस के बीच डिस्काउंट वाले रूसी तेल का करार इस साल की शुरुआत में हुआ था.

इसकी पहली खेप रविवार को कराची पहुंची है.

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डील पर पाकिस्तान ने क्या कहा?

मुसादिक मलिक ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को फ़ोन पर बताया है कि “पेमेंट चीनी युआन” में किया गया है.

उन्होंने कहा है कि ये 100,000 टन की डील है, जिसमें से 45,000 टन कराची बंदरगाह पर पहुंच गया है. और बाकि रास्ते में हैं.

पाकिस्तान ने ये डील अप्रैल महीने में की थी.

पाकिस्तान ने कहा है कि वहां की रिफ़ाइनरी में तेल को प्रोसेस किया जाएगा. मलिक ने ये भी कहा है कि इसका फ़ायदा लोकल मार्केट को मिलेगा.

पाकिस्तान की ओर से दूसरे देशों को किए जाने वाले पेमेंट में ऊर्जा आयात के लिए दिए जाने वाले भुगतान की हिस्सेदारी अच्छी-ख़ासी है.

किपलर के आंकड़ों के मुताबिक़, पाकिस्तान ने साल 2022 में हर दिन 154,000 बैरेल तेल का आयात किया है.

मलिक ने कहा, “हमारा टार्गेट है कि हम एक तिहाई तेल रूस से आयात करें."

पाकिस्तान में सबसे ज़्यादा कच्चा तेल सऊदी अरब और उसके बाद संयुक्त अरब अमीरात से आयात किया गया था.

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चीन की मुद्रा का इस्तेमाल क्यों?

पाकिस्तान चीन की मुद्रा में व्यापार करने वाला अकेला देश नही हैं.

बांग्लादेश ने भी हाल ही में एक योजना के लिए डॉलर के बजाय चीनी युआन में पेमेंट करने का फ़ैसला किया है.

वो निर्माणाधीन रूपपुर बिजली संयंत्र के लिए रूस को 110 मिलियन डॉलर का भुगतान चीनी मुद्रा में करेगा.

ब्रिक्स देशों के समूह की कोशिश है कि वो डॉलर के प्रभुत्व को ख़त्म करें और दूसरी मुद्राओं में लेनदेन शुरू हो.

भारत भी रुपये का इस्तेमाल कर रूसी कच्चा तेल ख़रीदने को बढ़ावा देना चाहता था.

भारत ने रुपये में रूस के साथ सेटलमेंट के लिए काफ़ी कोशिश की. लेकिन ये कामयाब नहीं हो सका.

रूस इस वक़्त भारत का सबसे बड़े हथियार और दूसरे सैनिक साजो-सामान का सप्लायर है.

लेकिन ये सप्लाई अभी रुकी हुई है. क्योंकि रूस को पेमेंट करने का भारत के पास जो मैकेनिज्म है, उस पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगा रखा है.

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भारत को रूस को हथियार और दूसरे सैनिक साजोसामान की सप्लाई की एवज में 2 अरब डॉलर देने हैं.

लेकिन प्रतिबंध की वजह से ये पेमेंट पिछले एक साल से लटका हुआ है.

भारत को डर है कि ऐसा करने पर वह अमेरिकी प्रतिबंध का शिकार बन सकता है. दूसरी ओर रूस रुपये में पेमेंट लेने को तैयार नहीं है.

भारतीय बैंकों ने रूसी बैंकों में वोस्त्रो अकाउंट खोले, ताकि रुपये में पेमेंट करके तेल ख़रीदा जा सके.

समस्या ये है कि भारत की ओर से तेल ख़रीद में तेज़ी के बाद रूस के पास रुपयों का अंबार लग गया.

रुपये में सेटलमेंट से जुड़ी समस्याओं को देखते हुए अब वो इसमें पेमेंट नहीं लेना चाहता.

युआन के साथ ये दिक्क्त नहीं है क्योंकि रूस चीन के साथ लगातार व्यापार करता रहा है.

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तानी पीएम शहबाज़ शरीफ़ से साथ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन

चीन, पाकिस्तान, रूस - सभी को फ़ायदा

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चीनी मामलों के जानकार अतुल भारद्वाज कहते हैं, “रूस और चीन ने डी डॉलराइज़ेशन की मुहिम छेड़ी हुई है, उसे देखते हुए इसे एक कामयाबी माना जाएगा. चीन के साथ रूस का व्यापार बहुत बढ़ गया है तो ये मुद्रा इस्तेमाल हो जाएगी. युआन की ट्रेडिंग से चीन को तो फ़ायदा होगा ही, इन देशों की डी डॉलराइज़ेशन की मुहिम को बहुत फ़ायदा होगा.”

उनके मुताबिक़, “रूस पाकिस्तान के साथ अपने रिश्ते मज़बूत करना चाहता है, वैसे ही जैसे वो भारत के साथ रिश्ते बेहतर बनाना चाहता है, पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बीच उसे इन देशों से संबंध बेहतर बनाने से फ़ायदा है.”

पाकिस्तान का चीन के साथ व्यापार बढ़ा है, अमेरिका से डॉलर ख़रीदना उनके लिए महंगा साबित होगा, चीन से व्यापार के लिए युआन का इस्तेमाल कर सकते हैं, तो उनकी ख़राब अर्थव्यवस्था को भी फ़ायदा है.

वहीं चीनी करेंसी में लेनदेन से चीन को भी फ़ायदा है.

इमेजइंडिया इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष रॉबिंद्र सचदेव कहते हैं, "डॉलर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में लेनदेन की करेंसी काफ़ी समय से हैं, और आगे भी कई सालों तक रहेगी, लेकिन उसके बाद अगले नंबर पर करेंसी है, तो चीन का युआन है."

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तो क्या भारत को इससे नुकसान होगा

रॉबिंद्र कहते हैंकिराजनीतिक तौर पर भारत के फ़ायदे के लिए पाकिस्तान में जो बदलाव आना है, वो तभी आएगा, जब पाकिस्तान के पास कोई रास्ता नहीं बचेगा और वो अर्थव्यवस्था के नज़रिए स एक 'डार्क होल' में चला जाएगा.

वो कहते हैं, "लेकिन चीन और रूस से मिल रही मदद से पाकिस्तान को थोड़ी राहत मिल रही है. पाकिस्तान के नज़रिए से अच्छा है लेकिन भारत के लिए फ़ायदा तभी होगा जब पाकिस्तान अपनी बुरी हालात के ऐसे दौर में पहुंच जाएगा, और जब वो खुद की नीतियों में बदलाव लाने के लिए मजबूर होगा."

रॉबिंद्र कहते हैं कि चीन का दबदबा बढ़ रहा है, तो भारत को सतर्क रहना चाहिए लेकिन इस लेनदेन से भारत को सीधा नुकसान होता नहीं दे रहा है.

वो कहते हैं, "सिर्फ चीन ही नहीं, भारत, अरब देश, ब्राज़ील समेत कई देश अपनी अपनी मुद्रा में लेनदेन की कोशिश में हैं, इसलिए एक से अधिक मुद्रा में व्यापार होना इन देशों के हित में है. "

लेकिन चीनी प्रभुत्व बढ़ रह है, उनकी अर्थव्यवस्था जितनी मज़बूत होगी, उतना ही उनकी करेंसी का दबदबा भी बढ़ेगा. इसलिए जानकार मानते हैं कि भारत की लंबे समय के लिए नीति यही होगी कि न चीनी करेंसी का दबदबा बहुत रहे और न ही डॉलर का.

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