अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ़ वॉर से क्या भारत बन जाएगा 'डंपिंग ग्राउंड'

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अमेरिका और चीन के बीच जारी उत्पादों पर टैरिफ़ को लेकर बढ़ रहे तनाव से दुनिया में कई देशों के लिए नए मौकों की संभावनाएं पैदा हुई हैं.
भारत पर अमेरिका ने 26 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाया है और इससे भारत के लिए भी कुछ क्षेत्रों में मौके पैदा हो सकते हैं. लेकिन, इन मौकों के बीच चुनौतियां भी हैं.
विश्लेषक आशंका ज़ाहिर कर रहे हैं कि भारतीय बाज़ार, चीन के उत्पादकों के लिए 'डंपिंग ग्राउंड' बन सकता है.
चीन ऐसे उत्पाद भारतीय बाज़ार में डंप कर सकता है, जिन्हें टैरिफ़ को लेकर तनाव की वजह से अमेरिका के बाज़ार में बेचने में चीनी उत्पादकों को दिक़्क़तों का सामना करना होगा.

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बढ़ रहा कारोबारी घाटा

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भारत और चीन के बीच कारोबारी घाटे में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. भारत का चीन के साथ कारोबारी घाटा बढ़कर 99.2 अरब डॉलर हो गया है.
इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों, सोलर सेल और बैटरी के आयात में बढ़ोतरी को इसकी बड़ी वजह माना जा रहा है.
वित्तीय वर्ष 2025 में भारत और चीन के बीच सालाना कारोबार 127.7 अरब डॉलर का हुआ. भारत ने चीन को 14.2 अरब डॉलर का निर्यात किया, जबकि चीन से 113.4 अरब डॉलर का आयात किया.
इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों, इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी, सोलर सेल और ऐसे अन्य औद्योगिक उत्पादों जिनकी सप्लाई चेन में चीन का प्रभाव है, इनकी मांग में बढ़ोतरी की वजह से चीन से आयात 11.5 प्रतिशत बढ़ गया. वहीं, आयात के मुक़ाबले चीन को भारत के निर्यात में 14.5 प्रतिशत की गिरावट आई है.
इससे भी भारत के कारोबारी घाटे में रिकॉर्ड स्तर की बढ़ोतरी हुई है और ये 99.2 अरब डॉलर तक पहुंचकर अपने अब तक के सर्वोच्च स्तर पर है.
सिर्फ़ मार्च में ही भारत ने चीन से 9.7 अरब डॉलर का आयात किया. यदि चीन भारत में डंपिंग करता है, तो भारत का कारोबारी घाटा और अधिक बढ़ सकता है.
अमेरिका ने लगाया चीन पर भारी टैरिफ़

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ये आंकड़े ऐसे समय में आए हैं, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत समेत मुख्य कारोबारी देशों के लिए टैरिफ़ में 90 दिनों के विराम की घोषणा की है ,जबकि चीन पर लगाए टैरिफ़ में भारी बढ़ोतरी की है.
चीन पर अमेरिका के भारी टैरिफ़ लगाने से ये आशंकाएं भी पैदा हुई हैं कि चीन अपने सामान के लिए अमेरिकी बाज़ार के बाहर विकल्प देख सकता है और ज़रूरत पड़ने पर भारतीय बाज़ार में सामान भेज सकता है.
थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के निदेशक अजय श्रीवास्तव कहते हैं, "आठ मुख्य औद्योगिक उत्पादों की श्रेणी में चीन भारत का सबसे बड़ा निर्यातक है. भारत सभी मुख्य औद्योगिक उत्पादों के लिए चीन की सप्लाई चेन पर निर्भर है. इसी वजह से भारत का कारोबारी घाटा बढ़ रहा है."
अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि भारत के लिए ये और अधिक चिंताजनक है कि चीन के लिए भारत का निर्यात गिर रहा है.
अजय श्रीवास्तव कहते हैं, "ये जो आंकड़े हैं, भारत को इन्हें गंभीरता से लेना चाहिए. ये सिर्फ़ कारोबारी समस्याओं के ही संकेत नहीं है. ये प्रतिद्वंद्विता का संकट है. भारत को अपने औद्योगिक उत्पादन में खामियों को दूर करना होगा और औद्योगिक क्षमताओं को बढ़ाने में निवेश करना होगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो ये कारोबारी घाटा और बढ़ेगा और इससे चीन पर हमारी निर्भरता और बढ़ेगी."
क्या कहते हैं विश्लेषक?

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विश्लेषकों का मानना है कि भारत के लिए सबसे पहली चिंता ये हो सकती है कि अमेरिका के बाज़ार के लिए रास्ते बंद होने पर चीन के उत्पादक भारत समेत दूसरे बाज़ारों में अपना सामान भेज सकते हैं.
जब कोई उत्पादक बाज़ार मूल्य से कम पर अपने सामान को बाज़ार में भेजता है, तो इसे 'डंपिंग' कहा जाता है.
अजय श्रीवास्तव कहते हैं, "इस आशंका को नकारा नहीं जा सकता है कि चीनी उत्पादक भारतीय बाज़ार में अपना सामान कम क़ीमत पर भेज सकते हैं. डंपिग की आशंका तो है ही."
भारतीय बाज़ार में डंपिंग पर निगरानी के लिए डायरेक्टर जनरल ऑफ़ ट्रेड रेमेडीज़ है, जो डंपिंग होने पर ड्यूटी यानी शुल्क लगा सकते हैं.
हालांकि, अमेरिकी टैरिफ़ वॉर के बीच अभी डीजीटीआर ने चीन के उत्पादों पर कोई नई ड्यूटी नहीं लगाई है. डीजीटीआर ने चीन समेत कई और देशों से आने वाले कुछ रासायनिक उत्पादों पर 'डंपिंग' के आरोपों में जांच ज़रूर की है.
डीजीटीआर भारतीय बाज़ार में डंपिंग पर नज़र रखता है और ज़रूरत पड़ने पर टैरिफ़ भी लगाता है.
अजय श्रीवास्तव कहते हैं, "अमेरिका चीन के उत्पादों का बहुत बड़ा ग्राहक है. ज़ाहिर है टैरिफ़ बढ़ने से इस बाज़ार के रास्ते चीन के लिए बंद होंगे. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि चीन ऐसे ही भारतीय बाज़ार में अपना सामान भेज देगा. भारत में ख़रीददार होंगे, तब ही चीन सामान भेजेगा. यदि चीन बाज़ार मूल्य से कम पर और बड़ी मात्रा में भारतीय बाज़ार में सामान डंप करता है, तो उस पर निगरानी के लिए डीजीटीआर है. लेकिन यहां इससे बड़ी संभावना ये है कि नई सप्लाई चेन विकसित हो सकती है. भारत अमेरिका जाने वाले चीनी उत्पादों का पड़ाव बन सकता है."
विश्लेषक ये मान रहे हैं कि चीन अपने अर्ध निर्मित सामान या उत्पादों के कुछ हिस्सों को भारत, वियतनाम या फिर दूसरे देशों में भेज सकता है और वहां उन्हें पूरा करके अमेरिका भेजा जा सकता है.
अजय श्रीवास्तव कहते हैं, "चीन के अर्ध निर्मित सामान भारत, वियतनाम, मेक्सिको जैसे देशों के बाज़ार में आएंगे और यहां से पूरे होकर ये अमेरिका के बाज़ार में भेजे जा सकते हैं. भारत में उत्पादन ख़र्च चीन के मुक़ाबले क़रीब बीस प्रतिशत अधिक है. लेकिन चीन पर अमेरिका ने भारी टैरिफ़ लगाया है, ऐसे में भारत में पूरे होने वाले उत्पाद महंगे होने के बावजूद, टैरिफ़ लगने पर चीन के उत्पादों से सस्ते ही होंगे. ऐसे में भारत चीन के उत्पादों के लिए एक पड़ाव बन सकता है."
भारत पर क्या असर पड़ेगा?

ये संभावना भारतीय उत्पादकों के लिए एक मौक़ा हो सकती है. लेकिन यहां भी कई आशंकाएं हैं.
बाज़ार और अमेरिकी व्यवहार की अनिश्चितता की वजह से, विश्लेषक ये मानते हैं कि भारतीय उत्पादक अपनी उत्पादन क्षमता में निवेश करने से पहले सोचेंगे.
अजय श्रीवास्तव कहते हैं, "चीन और अमेरिका के बीच कारोबारी रिश्ते अनिश्चित हैं. ट्रंप आगे अपने निर्णय बदल सकते हैं. कुछ सालों में अमेरिका की राजनीति में बदलाव आ सकता है. ऐसे में भारतीय उत्पादक अपनी क्षमता में निवेश करने के लिए बहुत उत्साहित नहीं होंगे."
वहीं, अगर चीन की कंपनियां भारत का एक ट्रांज़िट प्वाइंट के रूप में इस्तेमाल करती हैं या किसी तरह से अमेरिका सामान भेजने के लिए भारतीय बाज़ार का इस्तेमाल करती हैं तो इससे भारत के बंदरगाहों या लॉजिस्टिक सेवा प्रदाताओं को अल्पकालिक लाभ तो हो सकता है, लेकिन अमेरिका के नाराज़ होने का ख़तरा भी है.
भारत रख रहा है नज़र

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हाल ही में भारत ने बताया है कि वह सस्ते दाम पर हो रहे आयात पर निगरानी रख रहा है. भारत ने कंपनियों को चेतावनी भी दी है कि वह अमेरिका के टैरिफ़ से चीन को बचने में मदद ना करें.
फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइज़ेशन के निदेशक अजय सहाय भी मानते हैं कि चीन के भारतीय बाज़ार में सामान की डंपिंग को लेकर चिंताएं हैं.
अजय सहाय कहते हैं, "इंडस्ट्री इसे लेकर चिंतित ज़रूर है. ज़ाहिर है जब चीन के हाथ से अमेरिका का पांच सौ अरब डॉलर का बाज़ार चला जाएगा, तो वह दूसरे बाज़ार तलाशेगा. ऐसे में कम क़ीमत पर चीनी सामान की डंपिंग की आशंका को नकारा नहीं जा सकता है."
हालांकि, सहाय ये भी मानते हैं कि भारत सरकार स्थिति पर निगरानी कर रही है और ज़रूरत पड़ने पर क़दम उठाने के लिए तैयार है.

सहाय कहते हैं, "सरकार निगरानी कर रही है.आयात की हर सप्ताह समीक्षा की जा रही है और कुछ संवेदनशील उत्पादों की दैनिक स्तर पर निगरानी हो रही है. हमें उम्मीद है कि सरकार ज़रूरत पड़ने पर एंटी डंपिंग ड्यूटी लगाएगी और भारतीय कारोबारियों के हितों की रक्षा के लिये जो विकल्प मौजूद हैं, उनका इस्तेमाल करेगी."
अजय सहाय कहते हैं, "डंपिंग की आशंका तो है लेकिन उद्योग जगत को इससे बहुत चिंतित होने की ज़रूरत नहीं है."
भारत उत्पादन का हब बनना चाहता है. हालांकि चीन के सस्ते उत्पादों और सामान पर निर्भरता, ख़ासकर महत्वपूर्ण घटकों के लिए, भारत की इस महत्वाकांक्षा में बाधा डाल सकती है.
अजय श्रीवास्तव का कहना है, "यदि चीन के सस्ते उत्पाद भारतीय बाज़ार में डंप होंगे तो इससे निश्चित रूप से भारतीय उत्पादकों को झटका लगेगा. भारत के अपने घरेलू उत्पादकों के हितों पर इससे चोट हो सकती है. भारतीय कंपनियां जानबूझकर सस्ते किए गए उत्पादों से प्रतिद्वंद्विता नहीं कर पाएंगी."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित















