क्या बिहार में तेजस्वी यादव का कद बढ़ा है, कितनी बड़ी हैं उनकी चुनौतियाँ?

    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना, बिहार से

बिहार में तेजस्वी यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल लगातार उनको राज्य के अगले नेता के तौर पेश कर रही है.

तेजस्वी ने जाति आधारित जनगणना और युवाओं को सरकारी नौकरी देने का हमेशा खुलकर समर्थन किया है. उनके उपमुख्यमंत्री रहते बिहार में इस दिशा में काम भी हुआ है.

तेजस्वी यादव के नेतृत्व में साल 2020 के विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय जनता दल ने अच्छा प्रदर्शन किया था और सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. अगस्त 2022 में नीतीश कुमार के महागठबंधन में शामिल होने के बाद तेजस्वी ने उनको अपना नेता मान लिया था.

नीतीश और तेजस्वी को जोड़ी को बिहार में चुनावी गणित के लिहाज से अजेय जोड़ी माना जा रहा था. इसमें कांग्रेस और वाम दलों का साथ होने से महागठबंधन का मुक़ाबला करना एनडीए के लिए आसान नहीं था.

अब नीतीश कुमार वापस एनडीए में शामिल हो गए हैं यानी बिहार में चाचा-भतीजे की जोड़ी टूट चुकी है. बिहार में 'महागठबंधन' के लिए यह एक बड़ा झटका है. अब तेजस्वी यादव के सामने इसी साल होने वाले लोकसभा चुनाव और बिहार के अगले विधानसभा चुनावों की दो बड़ी चुनौती है.

क्या तेजस्वी का कद बढ़ा है?

माना जाता है कि बार-बार पाला बदलने की वजह से नीतीश कुमार की सियासी लोकप्रियता घटी है. लेकिन क्या नीतीश के इस कदम से बिहार में तेजस्वी यादव का कद बढ़ा है?

वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, "तेजस्वी यादव ने एक नेता के तौर पर ख़ुद को साबित तो किया है. लेकिन इससे उनका कद कितना बढ़ा है यह नहीं कहा जा सकता. हाँ एक बात ज़रूर है कि नीतीश और बीजेपी का कद घटा है और ज़ाहिर तौर पर इसका फ़ायदा तेजस्वी को हुआ है."

सुरूर अहमद के मुताबिक़, साल 2020 के विधानसभा चुनावों में ही तेजस्वी यादव ने ख़ुद को साबित कर दिया था, जब अकेले दम पर चुनाव लड़कर उन्होंने आरजेडी को 75 सीटों पर जीत दिलाई थी. उन चुनावों में बीजेपी को 74 और नीतीश की जेडीयू को 43 सीटें मिली थीं.

उन चुनावों में नीतीश कुमार एनडीए में थे. लेकिन अगस्त, 2022 में नीतीश की जनता दल यूनाइटेड बिहार में विपक्ष के 'महागठबंधन' में शामिल हो गई थी.

नीतीश कुमार उस समय दूसरी बार महागठबंधन का हिस्सा बने थे. नीतीश ने कहा था कि वो मरना पसंद करेंगे लेकिन बीजेपी के साथ वापस जाना पसंद नहीं करेंगे.

यही हाल बीजेपी का था. बीजेपी के केंद्रीय नेताओं के मुताबिक़ नीतीश के लिए एनडीए का दरवाज़ा बंद हो चुका था. जबकि बिहार बीजेपी के नेता भी नीतीश पर लगातार हमलावर थे और प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष सम्राट चौधरी ने तो नीतीश को मुख्यमंत्री पद से हटाने का संकल्प तक ले रखा था.

राजनीतिक मामलों के जानकार और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस के पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, "चुनावी राजनीति में परिणाम चाहे जो हो, पाला बदलकर नीतीश और बीजेपी ने राजनीतिक मामले में तेजस्वी यादव को बढ़त दे दी है. इससे तेजस्वी का कद बढ़ा है."

पुष्पेंद्र कुमार के मुताबिक़ महागठबंधन की सरकार के दौरान तेजस्वी यादव ने बहुत मंझे हुए नेता की तरह व्यवहार किया था. उन्होंने अपने आप को बहुत लो-प्रोफ़ाइल रखा और ऐसा कोई बयान नहीं दिया या बात नहीं की जिससे नीतीश को कोई परेशानी हो.

मसलन माना जाता है कि राज्य सरकार में आरजेडी के कोटे से शिक्षा मंत्री बने चंद्रशेखर और उनके विभाग के अवर मुख्य सचिव केके पाठक के बीच कभी सामंजस्य नहीं बना, लेकिन तेजस्वी यादव ने इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री से कभी कोई मांग नहीं रखी.

नीतीश कुमार कुमार के पाला बदलने से महज़ कुछ दिन पहले आरजेडी के कोटे के कुछ मंत्रियों के विभाग भी बदल दिए, लेकिन तेजस्वी यादव ने इसका कोई विरोध नहीं किया. नीतीश ने आरजेडी और कांग्रेस के कोटे से कुछ मंत्रियों की कुर्सी भी खाली ही रखी, लेकिन इसपर भी कोई विवाद सामने नहीं आया.

जातिगत सर्वे का श्रेय किसको

पटना के एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़ के पूर्व निदेशक डीएम दिवाकर मानते हैं कि तेजस्वी यादव का कद पहले से ही बढ़ा है. तेजस्वी ने लालू की विरासत को संभाला और सांप्रदायिकता, बेरोज़गारी और महंगाई जैसे मुद्दों को उठाया, जो राष्ट्रीय राजनीति के बहस का मुद्दा बना.

बिहार में अक्टूबर 2023 में जातिगत सर्वेक्षण के आँकड़े सार्वजनिक किए गए थे. इसका बड़ा श्रेय तेजस्वी यादव को भी दिया जाता है. दावा किया जाता है कि तेजस्वी यादव ने राज्य में जातिगत सर्वे कराने की मांग पर खूब ज़ोर दिया था.

बाद में इसके लिए नीतीश कुमार भी तैयार हो गए थे. बीजेपी ने भी बिहार में जातिगत जनगणना के प्रस्ताव का समर्थन किया था. बिहार विधानमंडल में इसके पक्ष में फ़रवरी 2019 और 2020 में भी एक प्रस्ताव पारित हुआ था.

तब राज्य में बीजेपी भी नीतीश कुमार के साथ सरकार में शामिल थी. हालाँकि बीजेपी को आमतौर पर ऐसे सर्वेक्षण का विरोधी माना जाता है और बीजेपी के कई नेताओं ने इसे बांटने वाली राजनीति भी कहा था.

पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, "तेजस्वी यादव और आरजेडी ने हाल के समय में ओबीसी से ज़्यादा ईबीसी की राजनीति पर ज़्यादा ध्यान दिया है. यह भी माना जाता है बिहार में जातिगत सर्वे तेजस्वी के दबाव में हुआ है और तेजस्वी इसका दावा कर भी सकते हैं."

बिहार में जातिगत आंकड़े जारी होने के बाद विपक्ष के 'इंडिया' गठबंधन ने इसे पूरे देश में कराने का मांग भी की है. इस मुद्दे के समर्थन के लिए विपक्षी गठबंधन ने अपनी बैठक में एक प्रस्ताव भी पारित किया था.

डीएम दिवाकर का मानना है कि जातिगत जनगणना एक ऐसा मुद्दा था जिसे तेजस्वी यादव ने उठाया था और बाद में उनके सभी विरोधी दलों को इसका समर्थन करना पड़ा. बीजेपी भी इस मुद्दे का विरोध नहीं कर पाई.

तेजस्वी यादव का दावा रहा है कि जातिगत आँकड़ों के आधार पर ही ज़रूरतमंद जातियों तक सरकारी लाभ पहुँत सकता है. इस जनगणना के साथ एक नारा यह भी दिया जाता है कि 'जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी.' यानी यह संख्या के आधार पर आरक्षण की बात करता है.

माना जाता है कि यह एक ऐसा मुद्दा रहा है जिसपर बीजेपी और केंद्र सरकार दबाव में आ सकती थी. लेकिन जातिगत सर्वे की मांग करने वाले तेजस्वी यादव और महागठबंधन को बीजेपी ने कई झटके दिए.

बीजेपी ने जातीय राजनीति के तौर पर पहचान रखने वाले बिहार के कई नेताओं को एनडीए से जोड़ लिया.

इसकी शुरुआत उपेंद्र कुशवाहा से हुई. कुशवाहा ने फ़रवरी 2023 में जेडीयू को छोड़कर अपनी पार्टी 'राष्ट्रीय लोक जनता दल' बना ली थी. बाद में वो एनडीए में शामिल हो गए. बिहार में कुशवाहा आबादी क़रीब 4.2 फ़ीसदी है.

यही नहीं महादलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) ने भी जून 2023 में महागठबंधन का साथ छोड़ दिया. वो भी बाद में एनडीए में शामिल हो गए.

तेजस्वी कहाँ कर सकते हैं दावा

बिहार में लोकजनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान को लेकर भी अटकलें थीं कि वो तेजस्वी यादव के क़रीबी हैं, लेकिन चाचा पशुपति कुमार पारस से अदावत के बाद भी चिराग फिर से एनडीए में शामिल हो गए, जहाँ उनके चाचा पहले से मौजूद हैं.

जातिगत जनगणना के मुद्दे पर बीजेपी को घेरने की कोशिश करने के बाद भी पिछले साल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी की जीत ने इस मुद्दे को कमज़ोर ज़रूर साबित किया है.

बिहार में युवाओं के लिए सरकारी नौकरी की मांग एक बड़ा मुद्दा रही है. रेलवे से लेकर सेना तक की नौकरी के मुद्दे पर यहाँ आंदोलन होते रहे हैं. यही हाल राज्य सरकार की नौकरियों का है. विपक्ष का दावा है कि भारत में बीते 45 साल में सबसे ज़्यादा बेरोज़गारी है.

ऐसे में बिहार बिहार में आरजेडी और तेजस्वी यादव ने नौकरी के मुद्दे को बड़ा बनाने की पूरी कोशिश की है. बिहार में महागठबंधन सरकार के दौरान क़रीब डेढ़ साल में राज्य की सेवाओं में चार लाख लोगों को नौकरी देने का दावा भी किया गया है.

तेजस्वी यादव ने साल 2020 के विधानसभा चुनावों के प्रचार के दौरान अपनी सरकार बनने पर दस लाख नौकरी देने का वादा किया था. जबकि नीतीश कुमार उस दौरान इसे असंभव बता रहे थे.

पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, "नीतीश कुमार नौकरी देने के तेजस्वी के वादे का विरोध कर रहे थे. वो सार्वजनिक भाषणों में भी कहने लगे थे कि इसके लिए पैसे कहाँ से आएंगे. इसलिए महागठबंधन सराकार के दौरान जो नौकरी दी गई उसका श्रेय तेजस्वी यादव ले सकते हैं."

ज़ाहिर है इसलिए महागठबंधन सराकार के दौरान बिहार में दी गई नौकरी का श्रेय आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव को देते हैं. इसलिए लिए नीतीश से नाता टूटने के साथ ही अख़बारों में इसका विज्ञापन तक दिया गया था.

नीतीश की छवि कितना नुकसान

आरजेडी नेता मनोज झा का दावा है कि "तेजस्वी यादव ने बड़ी लकीर खींच दी है. नीतीश कुमार ने पाला क्यों बदला यह किसी को नहीं मालूम लेकिन बिहार की जनता और युवाओं से पूछिए कि वो क्या चाहते हैं."

राज्य में युवाओं को दी गई नौकरी के लिए नीतीश कुमार भी अपना दावा पेश करते हैं. राज्य में एनडीए की सरकार बनने के बाद इसकी भी संभावना है कि चुनावी साल में इस पर राज्य सरकार तेज़ी से काम करे. हालाँकि आरजेडी इसके पीछे तेजस्वी यादव का बनाया हुआ दबाव बताती है.

डीएम दिवाकर का एक और मामले में तेजस्वी यादव को कई अन्य नेताओं से अलग देखते हैं. उनका मानना है कि मुलायम सिंह यादव तक ने केंद्र के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था. मायावती भी ख़ामोश हो गईं. लेकिन लालू सांप्रदायिकता से लेकर तमाम मुद्दों पर बोलते रहे, यही तेजस्वी ने किया.

डीएम दिवाकर कहते हैं, "अगर तेजस्वी चाहते तो अजित पवार की तरह भ्रष्टाचार के आरोप के बाद भी बचे रहते. राजनीतिक जीवन की शुरुआत में ही तेजस्वी ने अपनी जो छवि बनाई है वही बड़ी बात है. इससे तेजस्वी में एक अलग किस्म का नेतृत्व विकसित हुआ है."

बिहार में आम अवधारणा यही है कि नीतीश के बार-बार गठबंधन बदलने से अपने सियासी सफर के अंतिम दौर में उन्होंने अपनी छवि ख़राब की है.

बीते क़रीब डेढ़ साल से नीतीश कुमार देश भर में घूम-घूमकर नरेंद्र मोदी के केंद्र सरकार की आलोचना कर रहे थे और विपक्ष को एकजुट करने में लगे थे.

सुरूर अहमद का मानना है, "बीजेपी ने नीतीश का आकलन करने में ग़लती कर दी है. ये साल 2010 वाले नहीं, साल 2024 वाले नीतीश हैं. अब बीजेपी का राम मंदिर वाला उत्साह कम हो गया है और एक राजनीतिक अनिश्चितता भी आ गई है. जिसका जवाब देना दोनों के लिए मुश्किल है."

माना जाता है कि नीतीश कुमार ने साल 2005 में बिहार की सत्ता में आने के साथ ही कई अहम काम किए थे. ख़ासकर बिहार में कानून और व्यवस्था के मुद्दे पर उनका विशेष ध्यान था.

इसके अलावा बिहार में बुनियादी ढांचे मसलन सड़क और अन्य निर्माण पर उनका ख़ास जोर था.

नीतीश ने बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर अपने शुरुआती कार्यकाल में छात्राओं के लिए साइकिल योजना और महिलाओं को आर्थिक तौर पर मज़बूत करने के लिए जीविका योजना शुरू की थी.

पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, "नीतीश के सीएम बनने के बाद 6-7 साल तक क़ानून और व्यवस्था थोड़ी ठीक हुई थी. उस दौरान बिहार में जो पुराने अपराध होते थे, वह कम हुआ था. लेकिन उसके बाद नीतीश एनडीए में रहे या महागठबंधन में आप आप अख़बार खोलकर देख लीजिए, बिहार में अपराध कम नहीं हुआ है."

किसे होगा फ़ायदा

पुष्पेंद्र कुमार का मानना है कि नीतीश की शुरू की हुई बाक़ी योजनाएं भले चल रही हों, लेकिन उनमें अब चमक ख़त्म हो चुकी है. नीतीश कुमार कुछ भी नया जोड़ पाने में नाकाम रहे हैं. किसी काम को समय पर पूरा करने का उनका लक्ष्य भी कमज़ोर हुआ है.

दूसरी तरफ तेजस्वी यादव और लालू प्रसाद यादव समेत लालू परिवार और उनके क़रीबी पर ईडी की जाँच चल रही है. इसके लिए कभी लालू तो कभी तेजस्वी तो कभी अन्य लोगों को प्रवर्तन निदेशालय की जाँच में शामिल होना पड़ता है. चुनाव प्रचार में यह मुद्दा तेजस्वी को प्रभावित कर सकता है.

हालाँकि इन सब के बाद भी बीते दो दशक से नीतीश कुमार ही बिहार में मुख्यमंत्री की कुर्सी का पर्याय बने हुए हैं. फ़िलहाल एनडीए में उनके वापस आने के बाद वोटों के गणित में भी एनडीए, महागठबंधन पर भारी दिखता है.

फिर भी नीतीश के पाला बदलने का नीतीश को कितना नुक़सान और तेजस्वी को कितना फ़ायदा हो सकता है यह पूरी तरह पुराने चुनावी गणित पर निर्भर नहीं करेगा. बिहार में कौन सा गठबंधन किस मुद्दे को जनता से जोड़ पाएगा, चुनाव परिणाम उस पर भी निर्भर करेंगे.

इसके अलावा बीते क़रीब 20 साल से नीतीश कुमार ही बिहार की सत्ता पर रहे हैं, ऐसे में सत्ता विरोधी रूझान (एंटी इनकंबैंसी) का असर भी एनडीए के गणित पर होगा.

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