कर्पूरी ठाकुर: दो बार रहे सीएम लेकिन नहीं बनाई कोई निजी संपत्ति

    • Author, अरविंद मोहन, वरिष्ठ पत्रकार
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के ठीक अगले दिन बिहार के जननायक कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की घोषणा कुछ लोगों को भले पसंद न आई हो, लेकिन भाजपा से लेकर कम्युनिस्ट पार्टियों के लोगों तक ज़्यादातर ने इसे पसंद ही किया है.

कर्पूरी ठाकुर ऐसे नेता थे, जिनका सम्मान सभी करते थे. उनके जीवन मूल्यों की आज भी सभी सराहना करते हैं.

उनके राजनीतिक विचार आज सर्वमान्य बन चुके हैं. उनके कार्यकाल में लिए गए फ़ैसलों का प्रभाव आज ज़्यादा प्रबल ढंग से महसूस किया जा रहा है.

उन्हें भारत रत्न दिया जाना अति पिछड़ा वोट पाने की आस लगाए बैठी बीजेपी का चुनावी दांव ही माना जा रहा है.

कर्पूरी ठाकुर पचास, साठ और सत्तर के दशक में बिहार के समाजवादी आंदोलन की पैदाइश थे. वो इसी धारा के बड़े नेता बने और दो बार बिहार के मुख्यमंत्री बनने के साथ सोशलिस्ट पार्टियों के सर्वोच्च पदों तक गए.

अपने जीवन में उन्होंने एक चुनाव के अलावा सारे चुनावों में जीत हासिल की. इस रिकॉर्ड से ज़्यादा शानदार है उनकी सादगी और संघर्ष का रिकॉर्ड.

संघर्षों के बीच उनकी राजनीति निखरती गई, उनके निजी गुण सबके सामने आते गए और उनके बुनियादी राजनीतिक विचारों की स्वीकार्यता बढ़ती चली गई.

विरोध की भी नहीं की परवाह

आज बराबरी वाले समाजवादी मूल्य, सामाजिक न्याय और हिन्दी प्रेम सभी दलों और राजनेताओं को प्रिय हो गए हों, लेकिन ये कर्पूरी ठाकुर ही थे जिन्होंने शिक्षा में अंग्रेज़ी की अनिवार्यता को खत्म किया था.

उन्होंने सरकारी काम हिन्दी में करने की घोषणा की, लड़कियों के लिए पूरी पढ़ाई मुफ़्त की और सबसे पहले हिन्दी पट्टी में आरक्षण देने का फ़ैसला किया.

आरक्षण में भी उन्होंने महिलाओं और ग़रीब अगड़ों के साथ पिछड़ों को भी दो श्रेणियों में बांटकर लाभ देने का फ़ैसला किया था.

बहुत सारे लोगों को उनके ये फ़ैसले पसंद नहीं आए थे. उनका भारी विरोध हुआ. इन फ़ैसलों के चलते उनकी सरकारें गिरीं. आज जो उनको पुरस्कार देने का श्रेय ले रहे हैं या तालियां बजा रहे हैं, वे भी उस समय विरोध करने वालों में शुमार थे.

बहुत ही पिछड़े इलाक़े के ग़रीब नाई परिवार में जन्मे कर्पूरी ठाकुर जब मुख्यमंत्री बन गए थे, तब भी उनके पिता गांव में हज़ामत बनाया करते थे.

कर्पूरी ठाकुर जब पढ़ते थे, तब वह भी पुश्तैनी काम करते थे. बाद में चुनाव प्रचार के दौरान लोगों के दरवाज़े पर जाकर उस्तरा निकालकर दाढ़ी बनाने की पेशकश करते थे. वह कहते थे, "आउ मालिक दाढ़ी बना दई छी."

सादगी भी, चालाकी भी

इसी तरह, सुबह जिसके यहाँ गए, उसके यहां से मांगकर दातुन करते. फिर नाश्ता मांगते.

लोग उनकी सादगी पर फिदा हो जाते थे. वे ऐसा सुबह से दोपहर के बीच कई-कई बार कर लेते थे. हर किसी को लगता कि वे कितनी मेहनत करते हैं और लोगों से कितने जुड़े हुए हैं.

उनके ज्ञान और सादगी को जितना पसंद किया जाता था, उतना ही उनकी छोटी-मोटी चालबाज़ियों को भी लोग ख़ूब पसंद करते थे.

ये सब करना उनकी कलाकारी नहीं, मजबूरी थी क्योंकि विचारों के अलावा समाजवादी धारा ने कभी उनको ठोस राजनीतिक आधार नहीं दिया.

बिहार का पिछड़ा आंदोलन उनकी पीढ़ी के साथ ही परवान चढ़ा. इस जमात में भी दबंग यादवों-कोइरियों-कुर्मियों के आगे नाई जाति के एक व्यक्ति की क्या बिसात हो सकती थी, जिनकी आबादी हर गाँव में एक-दो घर से ज्यादा नहीं होती.

दूसरी ओर, जनता पार्टी लगातार टूटती-बिखरती रही और अक्सर कर्पूरी ठाकुर को बेमन से किसी पक्ष में साथ होना पड़ता था. पार्टी के विभाजन में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा नहीं लिया.

कर्पूरी ठाकुर की एक ख़ासियत थी कि उन्होंने कभी बुनियादी मूल्यों से समझौता नहीं किया. समाजवाद और सामाजिक न्याय उनके लिए सबसे बुनियादी मूल्य थे.

उनके पुराने साथी और सांसद रहे मंजेलाल बताते थे कि उन्होंने तीन बार विधायकों की सहकारी आवास समिति की सदस्यता का फॉर्म कर्पूरी ठाकुर को दिया था, मगर हर बार वह व्यस्तता का बहाना बनाकर टाल देते थे.

शायद वो पक्के तौर पर तय कर चुके थे कि समाज के लिए काम करेंगे और कोई निजी संपत्ति नहीं बनाएंगे.

पिता की झोपड़ी के अलावा उनके पास कोई ज़मीन-जायदाद नहीं रही.

जनसंघ के साथ सरकार बनाने का 'खेल'

कर्पूरी ठाकुर राजनीति के बहुत चतुर और कुशल खिलाड़ी थे. जनसंघ के साथ मिलकर सरकार बनाने के सवाल पर कर्पूरी ठाकुर ने उस समय के बड़े समाजवादी नेता रामानंद तिवारी के साथ दांव खेला.

नैतिकता का सवाल उठाकर कर्पूरी ठाकुर ने पहले रामानंद तिवारी से ‘सांप्रदायिक’ जनसंघ के साथ न जाने की घोषणा करवाई. तिवारी को समाजवादी विधायकों ने अपना नेता चुना था लेकिन वो मुख्यमंत्री बनने से रह गए और कर्पूरी ठाकुर ने जनसंघ के साथ मिलकर सरकार बना ली.

अहीर वर्चस्व वाली जनता पार्टी के विधायक दल का नेता बनने के लिए भी उन्होंने कई बार दांव-पेंच चले, मगर सामाजिक न्याय या समाजवाद से कभी छल नहीं किया.

सादगी और साहस

1974 के कांग्रेस विरोधी आंदोलन के दौरान जेपी मोतिहारी आए थे. हवाई अड्डा मैदान में विशाल जनसभा हुई. जेपी कुछ देर से आए थे और फिर ज़्यादा देर तक संबोधित करते रहे.

शाम होने पर जेपी ने ख़ुद ही बैठक ख़त्म करने की घोषणा की तो लोग वापस लौटने लगे.

अचानक जेपी को मंच के नीचे से कुछ शोर सुनाई दिया. मंच की निगरानी कर रहे स्वयंसेवक किसी व्यक्ति को ऊपर चढ़ने से रोक रहे थे.

जेपी की नज़र पड़ी तो उन्होंने हस्तक्षेप किया. यह व्यक्ति कोई और नहीं, बल्कि कर्पूरी ठाकुर थे.

दरअसल, उनकी सामान्य वेशभूषा से कोई उनको पहचान नहीं पाया था. वे नेपाल में थे और सभा की जानकारी मिलने पर यहां चले आए थे.

जेपी ने लोगों से कर्पूरी ठाकुर को सुनने का आग्रह किया. यहीं कर्पूरी ठाकुर ने विधानसभा से इस्तीफ़ा देने की घोषणा की. ये इस आंदोलन में बिहार विधानसभा से किसी विपक्षी का पहला इस्तीफ़ा था.

संवेदनशील शख़्सियत

दूसरी घटना साल 1984 की है. दिल्ली में एक समाजवादी ठिकाने पर हम दो दोस्तों पर उनकी नज़र पड़ी. उन्होंने हमें बुलाया और पूछा कि क्या तुम लोगों के पास कोई गाड़ी है. जब हमने हां कहा तो उन्होंने जेब में हाथ डाला और कुछ पैसे देने के साथ अज्ञेय की किताब 'सदानीरा' लाकर देने को कहा.

तब अज्ञेय जी की कविताओं का डीलक्स संस्करण दो खंडों में छपा था और कर्पूरी जी ने उसकी समीक्षा पढ़ी थी.

वे शाम को मौर्य एक्सप्रेस से पटना लौटने वाले थे. हमने पैसे नहीं लिए और दरियागंज से किताब ले आए.

शाम को जब हमने किताब सौंपी तब पहला काम उन्होंने मूल्य देखने का किया. फिर ‘तुम लोग विद्यार्थी हो’, ऐसा कहते हुए उसकी क़ीमत दे दी.

किताब महंगी थी, सो हमने भी चुपचाप पैसे ले लिए. लेकिन देर तक हम अपने मन में बैठी कर्पूरी ठाकुर की छवि का इस अनुभव से मिलान करते रहे.

लंबे पत्रकार और कार्यकर्ता जीवन में हमें आज की राजनीति में उन जैसा कोई दूसरा नहीं मिला.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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