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नीतीश पर राहुल की चुप्पी और तेजस्वी की नरमी से संशय, क्या वाक़ई अभी खेल बाक़ी है?
- Author, विकास त्रिवेदी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार में नीतीश कुमार के सियासी पाला बदलने की अटकलें शुरू होने के साथ ही ये कहा जाने लगा था कि जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू ) और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.
26 जनवरी की शाम राजभवन में हुए कार्यक्रम में नीतीश कुमार तो नज़र आए मगर तेजस्वी यादव की कुर्सी ख़ाली रही.
नीतीश से जब पूछा गया कि तेजस्वी क्यों नहीं आए तो वो बोले- जो नहीं आया है, उनसे पूछिए.
इसके दो दिन बाद जब जेडीयू-आरजेडी सरकार ख़त्म करने का एलान करने नीतीश कुमार मीडिया के सामने आए तो सबको लगा कि अब तेजस्वी से उनके मतभेद खुलकर सामने आएंगे.
मगर नीतीश कुमार ने बस इतना कहा- सब ठीक नहीं चल रहा था तो हमने सरकार ख़त्म कर दी.
नीतीश कुमार तेजस्वी यादव या आरजेडी पर आक्रामक नहीं दिखे.
नीतीश से राहें अलग होने के बाद जब तेजस्वी यादव का वीडियो बयान मीडिया के सामने आया, तब वो भी नीतीश कुमार का नाम लिए बिना जेडीयू पर बहुत नहीं आक्रामक दिखे.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी बिहार में भारत जोड़ो न्याय यात्रा के साथ दाखिल हुए तो अपने कार्यक्रम में नीतीश कुमार पर कुछ नहीं बोले. हालांकि उन्होंने बीजेपी को जमकर निशाने पर लिया.
ऐसे में सवाल ये है कि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार ने आरजेडी और इंडिया गठबंधन के मद्देनज़र कांग्रेस से जो दूरियां बनाईं और जो चुप्पियां अहम नेताओं की ओर से बरती जा रही हैं, क्या इन्हीं चुप्पियों में भविष्य की सियासी संभावनाएं छिपी हुई हैं?
इस कहानी में इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं.
इन चुप्पियों के मायने क्या हैं?
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के पूर्व प्रोफ़ेसर और पूर्व डीन पुष्पेंद्र सिंह ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''नीतीश कुमार किसी का भी साथ छोड़ सकते हैं, किसी के भी साथ आ सकते हैं. सभी ने उनके इस चरित्र को समझ लिया है. कोई भी उन पर हमलावर क्यों होगा? सबको लगता है कि उनकी ज़रूरत पड़ी तो वो फिर वापस आ सकते हैं.''
प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र सिंह बोले, ''नीतीश कुमार ने भी बहुत तीखे हमले नहीं किए. बहुत स्पष्ट रूप से आरोप नहीं लगाए हैं. उन्होंने चलताऊ तर्क दिया कि काम करना मुश्किल हो रहा था. जैसा नीतीश का चरित्र है, उन्होंने भी सोच समझकर रास्ते खुले रखे हैं. बाक़ी पार्टियों ने भी नीतीश को समझ लिया है कि ये आदमी अपने लाभ के लिए आकलन करता है कि उसे कब कहां होना चाहिए. उसे कभी इस बात से परहेज़ नहीं है कि लोग क्या सोचेंगे, राजनीतिक नैतिकता को लेकर क्या होगा, नैतिक पैमाने पर उनको कैसे कसा जाएगा, नीतीश को इस बात की चिंता नहीं है. वो सर्वाइवर हैं.''
नीतीश कुमार ने जब एनडीए का साथ छोड़ा था और आरजेडी के साथ सरकार में आ गए थे तब बीजेपी उन पर हमलावर रही थी.
अमित शाह ने कहा था, ''नीतीश कुमार के लिए एनडीए के दरवाज़े हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं.''
बिहार बीजेपी अध्यक्ष सम्राट चौधरी ने कहा था कि जब तक वो नीतीश कुमार को सत्ता से बाहर नहीं कर देंगे, तब तक पगड़ी नहीं खोलेंगे.
अब सम्राट चौधरी ने पगड़ी पहने हुए नीतीश कुमार के साथ मंत्री पद की शपथ ली और डिप्टी सीएम बनकर नीतीश के साथ सरकार में हैं.
नीतीश कुमार ने भी कहा था कि मर जाएंगे, मगर बीजेपी में लौटना पसंद नहीं करेंगे.
इससे ठीक विपरीत नीतीश कुमार ने हाल ही में जब पाला बदला तो राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने नीतीश पर वैसी आक्रामकता नहीं बरती, जैसी बीजेपी ने 2022 में बरती थी.
तेजस्वी यादव जेडीयू पर बोले, ''अभी तो खेल शुरू हुआ है, खेल अभी बाक़ी है. मैं जो कहता हूं वो करता हूं, आप लिख कर ले लीजिए जनता दल यूनाइटेड 2024 में खत्म हो जाएगी. एक थके हुए मुख्यमंत्री से हमने काम करवाया.''
तेजस्वी अपने बयान में उपलब्धियों को गिनाते और बीजेपी-जेडीयू की अतीत की सरकार पर हमला बोलते दिखे.
पाला बदलने पर तेजस्वी खुलकर नीतीश का नाम लिए बगैर ही आक्रामक नज़र आए.
पुष्पेंद्र सिंह ने कहा, ''इस मामले में कहा जा सकता है कि आरजेडी और कांग्रेस थोड़ा शालीन हैं. कम से कम तेजस्वी यादव शालीन हैं कि उन्होंने नीतीश पर हमला करके अपमानित करने की कोशिश नहीं की है.''
आंकड़े किस ओर इशारा करते हैं?
नीतीश कुमार ने एनडीए का साथ 2013 में भी छोड़ा था. तब कांग्रेस, सीपीआई के समर्थन से नीतीश सत्ता में बने रहे थे.
2014 लोकसभा चुनावों में जेडीयू बीजेपी के बिना चुनावी मैदान में थी और सिर्फ दो सीटें जीत सकी थी.
2014 चुनाव में बीजेपी 22, कांग्रेस 2, लोक जनशक्ति पार्टी 6, आरजेडी 4 सीटें जीत पाई थी.
2015 में बिहार के विधानसभा चुनाव में जेडीयू को 71 सीटें मिली थीं. आरजेडी को 80 सीटें मिली थीं. वहीं बीजेपी 53 सीटों को जीतने में सफल रही थी.
2017 में नीतीश कुमार ने फिर से आरजेडी का हाथ छोड़कर एनडीए का हाथ थामा.
2019 लोकसभा चुनाव में एनडीए के साथ लड़कर जेडीयू 16 सीटें जीतने में सफल रही थी. बीजेपी ने भी 17 सीटें जीती थीं.
यानी 2014 लोकसभा चुनाव में जेडीयू अकेले लड़कर बस दो सीटें जीत सकी थी, वहीं बीजेपी के साथ 2019 चुनाव में आने पर नीतीश कुमार 16 सीटें जीत पाए.
2020 विधानसभा चुनाव में जेडीयू 43, बीजेपी 74 और आरजेडी 75 सीटें जीत सकी थी. सरकार बीजेपी-जेडीयू की बनी. मगर 2022 में नीतीश कुमार पाला बदलकर फिर तेजस्वी के साथ आए और अब लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी के साथ चले गए हैं.
जानकारों का अनुमान है कि नीतीश कुमार की नई चाल भी लोकसभा चुनावों में फ़ायदा लेने की है.
क्या नीतीश कुमार की दोस्ती लोकसभा चुनाव तक है?
चुनावी रणनीतिकार से पॉलिटिक्ल एक्टिविस्ट बने प्रशांत किशोर जेडीयू में रह चुके हैं.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, प्रशांत किशोर ने हाल ही में कहा कि बीजेपी-जेडीयू का गठबंधन 2025 के चुनाव तक नहीं चल पाएगा और नीतीश कुमार एक बार फिर पलटी मारेंगे.
कुछ महीनों पहले भी प्रशांत किशोर ने कहा था कि नीतीश कुमार आरजेडी के साथ गठबंधन में ज़्यादा दिन तक नहीं रहेंगे.
अब प्रशांत किशोर ने कहा कि बीजेपी ने नीतीश को अपने पाले में लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र लिया होगा, मगर विधानसभा चुनावों में बीजेपी को इसकी कीमत चुकानी होगी.
प्रशांत किशोर बीजेपी और जेडीयू दोनों के लिए काम कर चुके हैं.
किशोर ने कहा कि बीजेपी को अपने मतदाताओं को ये समझाना मुश्किल होगा कि उसने क्यों नीतीश कुमार का साथ दिया, तब जबकि कुछ महीने पहले कहा था कि नीतीश के लिए दरवाज़े अब हमेशा के लिए बंद हैं.
किशोर ने कहा, ''ये नया गठबंधन भी विधानसभा चुनावों से पहले ख़त्म हो जाएगा. हो सकता है कि लोकसभा चुनाव ख़त्म होने के कुछ महीनों के भीतर ही ये गठबंधन ख़त्म हो जाए.''
प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र सिंह कहते हैं, ''जेडीयू और बीजेपी ने अगर मिलकर चुनाव लड़ा है तो इस गठबंधन को लोकसभा चुनाव में ज़्यादा फ़ायदा हुआ है. ये बात बहुत साफ थी. इनको लोकसभा की सीटें चाहिए और सत्ता में साझेदारी चाहिए. नीतीश कुमार को अचानक अहसास हुआ कि 2024 में बीजेपी आएगी. ये जो कोशिश थी कि बीजेपी सत्ता में ना आए या उसकी सीट कम हो जाए, इनको अहसास है कि ऐसा नहीं होगा. अगर वो नहीं होने वाला है, तो इनको लगता है कि समय रहते उस तरफ आएं जो जीतने वाला पक्ष हो. अगर इनको इंडिया गठबंधन के जीतने की संभावना नज़र आती तो ये वहीं रहते.''
नीतीश के मन में क्या कोई डर था?
नीतीश कुमार जब सीएम पद से इस्तीफ़ा देकर राजभवन के बाहर आए तो बोले थे, ''यह नौबत इसलिए आई क्योंकि ठीक नहीं चल रहा था. थोड़ी परेशानी थी. हम देख रहे थे. पार्टी के अंदर से और इधर-उधर से राय आ रही थी. सबकी बात सुनकर हमने इस्तीफ़ा दिया और सरकार को भंग कर दिया."
बीते कुछ महीनों में जेडीयू के अंदर भी सब कुछ ठीक ना होने की ख़बरें सामने आईं थीं.
दिसंबर 2023 में ललन सिंह ने अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दिया था और नीतीश कुमार अध्यक्ष बन गए थे.
जानकारों का कहना है कि नीतीश कुमार के मन में जेडीयू के टूटने का भी डर था.
प्रोफेसर पुष्पेंद्र सिंह कहते हैं, ''महाराष्ट्र में जो अनुभव हुआ कि पार्टी दो टुकड़ों में टूट जाती है. जैसे- एनसीपी और शिवसेना. दो धड़े ख़ुद को मूल पार्टी साबित करने की कोशिश करते हैं. ये काफी डरे हुए थे. नीतीश कुमार को भी कुछ समय से ये चिंता सता रही थी. दूसरा-बीजेपी और आरजेडी की तुलना में ये छोटी पार्टी हैं. इनको लगातार इस बात का डर रहा है कि इनकी पार्टी टूट सकती है.''
बिहार में लोक जनशक्ति पार्टी के साथ भी यही हुआ था और ये पार्टी चाचा भतीजे में बँट गई थी.
वो कहते हैं, ''कम विधायक होने के कारण पार्टी टूटने का ख़तरा रहता है. ये डरे हुए हमेशा से थे कि पार्टी का एक हिस्सा बीजेपी और दूसरा हिस्सा आरजेडी में जा सकता है. इनके कुछ विधायक बीजेपी को पसंद करते हैं और कुछ आरजेडी को पसंद करते हैं.''
राहुल गांधी ने नहीं लिया नीतीश का नाम
भारत जोड़ो न्याय यात्रा बिहार के किशनगंज में पहुंच गई है.
बीते दिनों तत्कालीन आरजेडी-जेडीयू सरकार ने जाति आधारित सर्वे को जारी किया था. राहुल गांधी बीते महीनों में जाति आधारित सर्वे और जाति के अनुपात के हिसाब से नौकरियों में भागीदारी की मांग करते रहे हैं.
राहुल गांधी सोमवार को जब किशनगंज पहुंचे तो वो पीएम मोदी पर आक्रामक दिखते हैं और पूरे देश में जाति आधारित जनगणना की मांग करते हैं.
राहुल गांधी कहते हैं, ''बिहार सामाजिक न्याय की धरती है. पूरा देश बिहार की ओर देख रहा था क्योंकि सामाजिक न्याय को बिहार से ज़्यादा अच्छे से कोई नहीं समझ सकता. हर किसी को अधिकार है कि ओबीसी, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, सामान्य श्रेणी की सही संख्या जान सके. ऐसे में जाति आधारित सर्वे क्रांतिकारी कदम था.''
राहुल जिस यात्रा में बोल रहे थे, उसमें पहले नीतीश कुमार को शामिल होना था. मगर एनडीए में जा चुके नीतीश कुमार यात्रा में शामिल नहीं हुए.
जेडीयू के प्रवक्ता केसी त्यागी ने कहा था कि कांग्रेस के रवैये से इंडिया गठबंधन टूट के कगार पर है. कांग्रेस नेता भी इसके जवाब में नीतीश कुमार को घेरते रहे हैं.
मगर राहुल गांधी ऐसा कोई बयान नहीं देते हैं.
राहुल की ये यात्रा बिहार में सीमांचल से शुरू हुई है, जहां अभी आरजेडी और कांग्रेस की मज़बूत पकड़ है. सीमांचल में चार ज़िले आते हैं- पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, अररिया.
2019 लोकसभा चुनाव में एनडीए ने इस इलाके में तीन सीटें जीती थीं और कांग्रेस एक सीट जीत सकी थी. जेडीयू तब एनडीए का हिस्सा थी.
कटिहार और पुर्णिया फिलहाल जेडीयू के पास है. अररिया बीजेपी और किशनगंज कांग्रेस के पास है. सीमांचल में 47 फ़ीसदी आबादी मुसलमानों की है, जो कांग्रेस और आरजेडी के पक्ष में वोट डालते रहे हैं.
इन चार ज़िलों में 24 विधानसभा सीटें हैं और 2025 चुनावों में ये सीटें अहम रहेंगी.
नीतीश के लिए निर्णायक
हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को तेलंगाना के अलावा राज्यों में हार का सामना करना पड़ा था.
भारत जोड़ो न्याय यात्रा के ज़रिए कांग्रेस हिन्दी भाषी राज्यों में अपनी पकड़ मज़बूत करना चाह रही है. ऐसे में राहुल गांधी की नीतीश कुमार पर चुप्पी भी भविष्य की संभावनाओं की ओर इशारा कर रही है.
पुष्पेंद्र सिंह कहते हैं, ''पाला नीतीश बदलते हैं, दूसरे नहीं बदलते हैं. कर्ता नीतीश कुमार हैं. लोग ये समझते हैं और दरवाज़े खुले रखते हैं. इनको दूसरों की ज़रूरत होती है और दूसरों को भी इनकी ज़रूरत होती है.''
नीतीश के फ़ैसले के पीछे पांच राज्यों के जो नतीजे आए हैं, उन्हें भी वजह बताया जा रहा है.
पुष्पेंद्र सिंह बोले, ''इन राज्यों के नतीजों ने नीतीश कुमार को थोड़ा हिलाया होगा. उन्होंने देखा कि बीजेपी मज़बूत है. लोकसभा चुनाव के बाद के लिए नीतीश कुमार रास्ता खुला रख रहे हैं. ये तय है कि नया गठबंधन लोकसभा चुनावों के लिए है. पर ये स्पष्ट नहीं है कि क्या ये 2025 विधानसभा चुनावों के लिए भी है.''
नीतीश कुमार ने नौंवी बार शपथ ली थी और वो अब तक पांच बार सियासी पाला बदल चुके हैं. 2014 को छोड़ दिया जाए तो अतीत में नीतीश कुमार ने जब-जब पाला बदला है उन्हें ज़्यादातर मौक़ों पर इसका फ़ायदा मिला है.
क्या नीतीश कुमार इस बार भी फ़ायदा उठा पाएंगे?
पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र सिंह कहते हैं, ''नीतीश कुमार ने जो भी किया वो बड़ा जुआं है. इसमें नीतीश कुमार बुरी तरह हार भी सकते हैं. हो सकता है कि अतीत की तरफ सफल भी हो जाएं. लेकिन इस बार का जुआं नीतीश कुमार के लिए निर्णायक रहेगा. अगर ये फेल हुए तो ये बिहार की राजनीति से बाहर हो जाएंगे.''
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