नीतीश कुमार: बार-बार पाला बदलकर भी सत्ता को साधे रखने वाले नेता

    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बिहार में तेज़ी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रम के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रविवार सुबह अपना इस्तीफ़ा देकर शाम को पुनः मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.

रविवार सुबह 11 बजे नीतीश राजभवन पहुंचे और राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर से मुलाक़ात कर इस्तीफ़ा सौंप दिया. साथ ही उन्होंने गठबंधन से अलग होने का भी ऐलान किया.

मीडिया से उन्होंने कहा, "मैंने इस्तीफ़ा दे दिया है और अब सरकार ख़त्म हो गई. हमने लोगों और पार्टी की राय सुनी, उसके बाद यह फ़ैसला लिया."

अब आगे क्या करेंगे, इस सवाल पर उन्होंने कहा, "हम पहले के सहयोगियों से अलग होकर नए गठबंधन में गए थे. बाक़ी दल साथ देंगे तो सोचेंगे. अगर कुछ होगा तो आपको पता चल जाएगा."

बीते हफ़्ते से ही अटकलें लग रही थीं कि नीतीश कुमार राजद से गठबंधन तोड़कर फिर से बीजेपी के साथ गठबंधन में जा सकते हैं.

आख़िरी समय तक नीतीश ने इस बारे में आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा, लेकिन बिहार की राजनीति में उनका ट्रैक रिकॉर्ड ऐसा रहा है कि हर कयास को सही और संभावना को संभव माना जा सकता है और ऐसा हुआ भी.

राज्यपाल से मुलाक़ात के बाद क्या बोले नीतीश?

नीतीश कुमार से जब इस्तीफ़ा देने की वजह पूछी गई, तो उन्होंने कहा, "यह नौबत इसलिए आई क्योंकि ठीक नहीं चल रहा था. थोड़ी परेशानी थी. हम देख रहे थे. पार्टी के अंदर से और इधर-उधर से राय आ रही थी. सबकी बात सुनकर हमने इस्तीफ़ा दिया और सरकार को भंग कर दिया."

उन्होंने कहा, "हमने पिछले गठबंधन को छोड़कर जो नया गठबंधन बनाया था डेढ़ साल से, उसमें आकर स्थिति ठीक नहीं लगी. और वे लोग काम को लेकर जो दावे कर रहे थे, उससे (हमारे) लोगों का ख़राब लग रहा था."

बिहार राजभवन ने नीतीश के इस्तीफ़े की पुष्टि करते हुए सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट किया, "माननीय राज्यपाल ने माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का त्यागपत्र स्वीकार किया तथा वैकल्पिक व्यवस्था होने तक उन्हें कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करने को कहा."

नीतीश का राजनीतिक सफ़र

नीतीश कुमार अगस्त 2022 में बीजेपी से गठबंधन तोड़कर राजद के साथ आए थे.

राजनीति में नीतीश कुमार का ये पहला यू-टर्न नहीं था. यही वजह है कि तब ना उनके बीजेपी से गठबंधन तोड़ने को लेकर हैरानी हुई थी और ना ही राजद के साथ नई सरकार बनाने से.

पिछले कुछ दिनों से बिहार की राजधानी पटना से आ रहे सभी संकेत एक तरफ़ इशारा कर रहे थे कि 'इंडिया गठबंधन' को एकजुट करने की कोशिशों में लगे नीतीश कुमार अब ख़ुद ही गठबंधन को छोड़कर दूसरे गठबंंधन में जा सकते हैं, जिसका राजनीतिक विकल्प देने की कोशिशें वो कर रहे थे.

स्पष्ट भले ना हो, लेकिन जदयू ये संकेत दे रही थी कि नीतीश इंडिया गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर हो रही देरी से नाराज़ थे और इसी वजह से वह अगला राजनीतिक क़दम उठा सकते हैं.

गठबंधन में दरार के शुरुआती संकेतों के बाद शनिवार दोपहर तक ये लगभग स्पष्ट हो गया कि राजद और जदयू के बीच सबकुछ ठीक नहीं है और आगे नीतीश का रास्ता राजद से अलग होगा. रविवार को नीतीश के बयान के साथ इस पर मुहर भी लग गई.

नीतीश कुमार का अब तक का राजनीतिक जीवन ‘यू टर्न’ लेते रहने और अपने हित की राजनीति करने का गवाह रहा है.

नीतीश कुमार का जन्म पटना से सटे बख़्तियारपुर में एक स्वतंत्रता सेनानी के परिवार में 1 मार्च 1951 को हुआ. बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री लेने वाले नीतीश कुमार का झुकाव हमेशा राजनीति की ओर ही रहा.

नीतीश ने यूं तो राजनीति की शुरूआत लालू प्रसाद यादव और जार्ज फ़र्नांडिस की छत्रछाया में की लेकिन उन्हें ये भी समझ आ गया कि अपनी अलग जगह बनाने के लिए उन्हें अलग होना होगा.

राजनीति में क़रीब पांच दशक बिता चुके नीतीश कुमार अपनी सहूलियत के हिसाब से दल और गठबंधन बदलते रहे.

नीतीश ने 1974 से 1977 के बीच जय प्रकाश नारायण के आंदोलन में हिस्सा लिया. उन्होंने सत्येंद्र नारायण सिन्हा के नेतृत्व वाली जनता पार्टी से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की.

नीतीश पहली बार 1985 में हरनौत सीट से विधायक चुने गए. इस दौर में वो बिहार में विपक्ष में बैठे लालू प्रसाद यादव के सहयोगी थे.

आपातकाल के विरोध में खड़ी हुई जनता दल में कई विघटन हुए. 1994 में जॉर्ड फर्नांडिस ने समता पार्टी का गठन किया. नीतीश उनके साथ हो लिए. अगले साल बिहार विधानसभा चुनावों में समता पार्टी को सिर्फ़ 7 सीटें मिली.

पहले समता पार्टी, फिर बीजेपी

नीतीश को ये समझ आ गया था कि बिहार में समता पार्टी अकेले अपने दम पर मज़बूती से नहीं लड़ सकती है. साल 1996 में उन्होंने बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया.

पहली बार 1989 में सांसद बने नीतीश 1998 से 2001 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में अलग-अलग विभागों के केंद्रीय मंत्री भी रहे.

नीतीश साल 2001 से 2004 के बीच वाजयेपी की सरकार में रेलवे मंत्री रहे.

इसी बीच साल 2000 में 3 मार्च से 10 मार्च के बीच नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री भी बनें. मुख्यमंत्री का पद भले ही नीतीश कुमार को सिर्फ़ सात दिनों के लिए मिला हो, लेकिन उन्होंने अपने आप को लालू प्रसाद यादव के ख़िलाफ़ एक मज़बूत विकल्प के रूप में ज़रूर पेश कर दिया था.

2004 तक केंद्र में मंत्री रहने वाले नीतीश 2005 में फिर राज्य की राजनीति में लौटे और मुख्यमंत्री बने.

पिछले लगभग 19 सालों में 2014-15 में दस महीनों के जीतनराम मांझी के कार्यकाल को छोड़ दिया जाए तो नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री पद पर रहे हैं.

हालांकि इस दौरान नीतीश कुमार अपनी सहूलियत के हिसाब से अपने गठबंधन सहयोगी बदलते रहे.

शनिवार को पटना में राजनीतिक पारा चढ़ता रहा. जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा और बीजेपी के नेता बैठकों में वयस्त रहे.

मीडिया रिपोर्टों में नीतीश के पाला बदलकर फिर से बीजेपी के साथ लौट जाने और जल्द ही बीजेपी और जदयू के नए गठबंधन की तस्वीर स्पष्ट हो जाने का दावा किया जा रहा था. रविवार को इस्तीफ़ा देकर नीतीश ने स्वयं इन सभी दावों पर मुहर लगा दी.

नीतीश कुमार पिछले दो दशकों से बिहार की राजनीति की धुरी बने हुए हैं. बीते एक दशक में नीतीश कुमार ने पांचवीं बार पाला बदला है.

1996 में नीतीश ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया. बीजेपी के साथ नीतीश का ये गठबंधन साल 2013 तक रहा. नीतीश ने बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और बिहार की सत्ता पर ख़ुद को जमा लिया.

बिहार की राजनीति में बीजेपी और नीतीश का साथ 17 साल तक रहा.

नीतीश ने बीजेपी से पहली बार अलग राह तब पकड़ी जब साल 2014 में बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित किया.

17 साल बाद बीजेपी से हुए दूर, फिर आए पास

मोदी का विरोध करते हुए नीतीश बीजेपी से अलग हो गए और 2014 लोकसभा चुनाव अकेले लड़ा.

पिछली लोकसभा में बीस सांसदों वाली जदयू सिर्फ़ दो सीटों तक सिमट गई. चुनाव में निराशाजनक नतीजों के बाद नीतीश ने राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया.

2015 में नीतीश ने राजद और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा और गठबंधन को भारी बहुमत हासिल हुआ. नीतीश एक बार फिर मुख्यमंत्री बने और तेजस्वी यादव उनके डिप्टी सीएम.

ये महागठबंधन दो साल ही चला और नीतीश ने 2017 में महागठबंधन से नाता तोड़ लिया. नीतीश ने बीजेपी से गठबंधन कर सरकार बनाई और बीजेपी नेता सुशील मोदी उनके डिप्टी सीएम बने.

2020 में नीतीश ने बीजेपी के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा और सत्ता में वापसी की. हालांकि जदयू की सीटें बीजेपी से कम रहीं. बीजेपी को 74 सीटें मिलीं थीं और जदयू को सिर्फ़ 43. राज्य में तीसरे नंबर की पार्टी होने के बावजूद, नीतीश मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहे.

नीतीश गठबंधन के मुख्यमंत्री तो थे लेकिन उनकी पार्टी की सीटें कम होने की वजह से बीजेपी का दबाव उन पर बढ़ता जा रहा था. बीजेपी के साथ दो साल सरकार चलाने के बाद नीतीश ने फिर पलटी मारी और आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना ली.

अगस्त 2022 में फिर से नीतीश मुख्यमंत्री बने और तेजस्वी यादव उनके डिप्टी सीएम.

इस बार नीतीश ने बीजेपी के ख़िलाफ़ सख़्त रवेया अपनाया. उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के ख़िलाफ़ विपक्षी पार्टियों का गठबंधन बनाने के प्रयास किए.

नीतीश ने एक बयान में बीजेपी के बारे में कहा था, "मर जाना कबूल है लेकिन उनके साथ जाना हमें कभी कबूल नहीं है."

नीतीश ने ये बयान 30 जनवरी 2023 को मीडिया से बात करते हुए दिया था. अभी इसे एक साल भी नहीं हुआ है, नीतीश अब फिर से बीजेपी के साथ हो लिए हैं.

बीजेपी का रुख़ भी नीतीश को लेकर इस दौरान सख़्त ही रहा. अप्रैल 2023 में एक बयान में बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था, "एक बात स्पष्ट कह देता हूं, किसी के मन में अगर ये संशय हो कि चुनाव के परिणामों के बाद, नीतीश बाबू को फिर से भाजपा एनडीए में लेगी, तो मैं बिहार की जनता को स्पष्ट कह देना चाहता हूं और लल्लन बाबू को भी स्पष्ट कह देना चाहता हूं, आप लोगों के लिए भाजपा के दरवाज़े हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं."

हालांकि अब नीतीश कुमार और बीजेपी, दोनों का ही रुख़ बदल चुका है. ना नीतीश को बीजेपी के साथ जाने में कोई हिचकिचाहट हुई और ना ही बेजेपी को उनके लिए बाहें फैलाने में.

भाजपा नेता और पूर्व डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी से जब पत्रकारों ने नीतीश की वापसी को लेकर सवाल किया था तो उनका कहना था, ''राजनीति में कोई दरवाज़ा बंद नहीं होता है. आवश्यकता अनुसार दरवाजा बंद होता रहता है, खुलता रहता है.''

शुक्रवार को जब आरजेडी सांसद मनोज कुमार झा ने मीडिया से कहा, "मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से आग्रह है कि गठबंधन के बारे में जो कयास लगाए जा रहे हैं, वो उसको शाम तक दूर कर दें क्योंकि वही गठबंधन के मुखिया हैं", तो इसके जवाब में जेडीयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार बोले, "नीतीश कुमार असमंजस की राजनीति नहीं करते. नीतीश कुमार राज्य के निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं और रहेंगे."

नीतीश कुमार बिहार के निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं और उनके अब तक के राजनीतिक जीवन से ये स्पष्ट है कि वो आगे भी मुख्यमंत्री बने रहना चाहते हैं और शायद इसलिए ही एक बार फिर से वो अपना राजनीतिक सहयोगी बदलने की राह पर चल दिए हैं.

बिहार विधानसभा में भले ही नीतीश की पार्टी संख्या के मामले में आरजेडी और बीजेपी से बहुत पीछे हों, लेकिन ये नीतीश की राजनीतिक कुशलता ही है कि अपनी पार्टी का कोई मज़बूत ढांचा ना होने के बावजूद भी राज्य में जनाधार और कार्यकर्ताओं वाली पार्टियों को किनारे लगाकर सत्ता का केंद्र बने हुए हैं.

महादलितों की पॉलिटिक्स

2007 में नीतीश कुमार ने दलितों में भी सबसे ज़्यादा पिछड़ी जातियों के लिए 'महादलित' कैटेगरी बनाई. इनके लिए सरकारी योजनाएं लाई गईं. 2010 में आवास, पढ़ाई के लिए लोन, स्कूली पोशाक देने की योजनाएं लाई गईं.

आज बिहार में सभी दलित जातियों को महादलित की कैटेगरी में डाला जा चुका है. साल 2018 में पासवानों को भी महादलित का दर्जा दे दिया गया.

यूं तो बिहार में दलितों के सबसे बड़े नेता रामविलास पासवान हुए लेकिन जानकार कहते हैं कि दलितों के लिए ठोस काम नीतीश कुमार ने किया है.

नीतीश ख़ुद 4 प्रतिशत आबादी वाली कुर्मी जाति से आते हैं, लेकिन सत्ता में रहते हुए उन्होंने हमेशा उस पार्टी के साथ गठबंधन में ही चुनाव लड़ा जिनके पास ठोस जाति-वर्ग का वोट रहा हो.

नीतीश हमेशा अपनी सहूलियत के हिसाब से गठबंधन बनाते और तोड़ते रहे. उनका अगला राजनीतिक कदम जो भी हो, लेकिन ये स्पष्ट है कि वो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहना चाहते हैं.

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