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नीतीश के बीजेपी से हाथ मिलाने की अटकलें तेज़, राहुल की रैली से बना सकते हैं दूरी
- Author, चंदन जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार की राजधानी पटना में कड़ाके की ठंड के बीच सियासी पारा अचानक चढ़ गया है.
इंडिया गठबंधन और बिहार में महागठबंधन से नीतीश कुमार क्या ख़ुद को अलग करने जा रहे है?
नीतीश कुमार ने बुधवार को बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर श्रद्धांजलि देते हुए वंशवादी राजनीति पर निशाना साधा था.
हालांकि नीतीश कुमार ने किसी का नाम नहीं लिया था. उन्होंने कहा था कि कर्पूरी ठाकुर अपने परिवार का पक्ष नहीं लेते थे लेकिन आज लोग परिवार को आगे बढ़ाने में लगे हैं.
नीतीश कुमार की टिप्पणी को लालू परिवार पर निशाने के रूप में देखा गया. कर्पूरी ठाकुर को बीजेपी की सरकार ने दो दिन पहले ही भारत रत्न देने की घोषणा की थी और इसके लिए नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शुक्रिया कहा था.
इसके बाद गुरुवार सुबह ख़बर आई कि नीतीश कुमार 30 जनवरी को बिहार के पूर्णिया में राहुल गांधी की रैली में शामिल नहीं होंगे.
राहुल भारत जोड़ो न्याय यात्रा के तहत पूर्णिया पहुँच रहे हैं. इससे पहले जेडीयू ने संकेत दिया था कि नीतीश कुमार आरजेडी के साथ रैली में मौजूद रहेंगे.
जेडीयू के सीनियर नेता विजय कुमार चौधरी ने नीतीश कुमार के रैली में शामिल नहीं होने पर कहा है, ''यह ज़रूरी नहीं है कि गठबंधन के सारे नेता रैली में मौजूद रहें.'' इन राजनीति घटनाक्रमों के बाद नीतीश कुमार के फिर से बीजेपी से हाथ मिलाने की अटकलें सातवें आसमान पर है.
जेडीयू प्रवक्ता केसी त्यागी ने कहा है कि नीतीश कुमार ने परिवारवाद के मुद्दे पर कर्पूरी ठाकुर की प्रशंसा की थी, उनका बयान लालू प्रसाद यादव को लेकर नहीं था.
नीतीश कुमार के एनडीए में लौटने की अटकलों पर बिहार बीजेपी के नेताओं ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा है कि पार्टी के लिए यह सोने में सुहागा जैसा है. इससे ने केवल बिहार में बीजेपी का नैतिक साहस बढ़ेगा बल्कि इंडिया गठबंधन भी राष्ट्रीय स्तर पर कमज़ोर होगा.
द हिन्दू से बिहार बीजेपी के नेताओं ने नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर कहा है कि बीजेपी नीतीश कुमार को साथ तभी लेगी जब वह मुख्यमंत्री से इस्तीफ़ा देंगे. ऐसे में विधानसभा भंग करना भी एक विकल्प हो सकता है.
केसी त्यागी ने लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य को भी सलाह दी कि बड़े लोगों के मुद्दों से बच्चों को दूर ही रहना चाहिए.
संबंधों में दरार
अगर नीतीश कुमार फिर से बीजेपी से हाथ मिलाते हैं तो नवंबर 2005 के बाद यह मुख्यमंत्री रहते हुए उनका पाँचवां यूटर्न होगा. अगस्त 2022 में ही नीतीश कुमार ने बीजेपी का साथ छोड़ आरजेडी से हाथ मिलाया था.
जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता केसी त्यागी ने इंडियन एक्सप्रेस नीतीश कुमार के एनडीए में जाने की अटकलों पर कहा, ''हमें इसका कोई इल्म नहीं है. मैं सिर्फ इतना कह सकता हूँ कि इंडिया गठबंधन में जो कुछ चल रहा है, वो ठीक नहीं है. कांग्रेस को वहां सीटें नहीं मांगनी चाहिए जहाँ क्षेत्रीय पार्टियां मज़बूत हैं.''
एक जनवरी को पूर्व मुख्यमंत्री और लालू प्रसाद यादव की पत्नी राबड़ी देवी के जन्मदिन और नए साल के मौक़े पर भी लालू और नीतीश के बीच में संवाद का अभाव देखा गया था.
इससे पहले 29 दिसंबर को दिल्ली में जदयू की बैठक में पार्टी अध्यक्ष ललन सिंह ने इस्तीफ़ा दे दिया था और नीतीश कुमार पार्टी के अध्यक्ष बने थे.
बीजेपी नेता सुशील मोदी ने उस वक़्त दावा किया था कि 'ललन सिंह को लालू के क़रीब आ जाने की वजह से हटाया गया है.'
नीतीश कुमार की परिवारवाद पर टिप्पणी के बाद राजद नेता लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने ट्वीट कर तंज़ कसा था. हालांकि बाद में उन्होंने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया, लेकिन माना जाता है कि यह ट्वीट नीतीश कुमार के ऊपर था.
वहीं आरजेडी ने कहा है कि कोई नेता परिवारवाद में अपनी संतान को राजनीति में आगे नहीं बढ़ा सकता बल्कि जनता ऐसे नेता को आगे बढ़ती है.
दिल्ली से पटना तक मुलाक़ातों और बैठकों का दौर
इन्ही विवादों के बीच गुरुवार देर शाम बिहार बीजेपी के अध्यक्ष सम्राट चौधरी दिल्ली पहुँचे.
समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़ बिहार बीजेपी के बड़े नेताओं की दिल्ली में बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं की बैठक हुई.
अमित शाह के साथ मुलाक़ात के बाद बिहार बीजेपी अध्यक्ष सम्राट चौधरी ने कहा, "2024 का लोकसभा चुनाव कैसे लड़ेंगे, उसकी समीक्षा हुई है."
इससे पहले बिहार सरकार में अहम साझेदार आरजेडी के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने राजद के नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपने आवास पर बुलाया था और मुलाक़ात की.
हालांकि इस पर राजद के प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा है कि इस तरह की मुलाक़ात अक्सर होती है और बिहार सरकार पर कोई ख़तरा नहीं है, नीतीश सरकार अच्छा काम कर रही है.
बिहार सरकार में कथित तौर पर मची खींचतान को लेकर केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता गिरिराज सिंह ने कहा है कि नीतीश कुमार अक्सर लालू यादव को धमकी देते रहते हैं कि "मैं मायके चली जाऊंगी तुम देखते रहना जबकि उनके लिए मायके का दरवाज़ा बंद है."
गिरिराज सिंह का इशारा नीतीश की भाजपा के साथ वापस आने को लेकर माना जाता है.
गिरिराज सिंह का दावा
बीते दिनों लालू प्रसाद यादव और गिरिराज सिंह की एक हवाई यात्रा में मुलाक़ात हुई थी.
इस मुलाक़ात के बाद गिरिराज सिंह ने दावा किया था कि लालू प्रसाद यादव अपने बेटे तेजस्वी यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं.
इसी सियासी हलचल के बीच बिहार सरकार में वित्त मंत्री और जदयू विधायक विजय चौधरी ने भी मीडिया से बातचीत में कहा है कि राज्य सरकार में सब कुछ ठीक है. उन्होंने अमित शाह के साथ बिहार बीजेपी नेताओं की मीटिंग की ख़बरों पर कहा है कि बैठक करना पार्टियों का काम है.
वहीं जदयू के ही एक अन्य विधायक और राज्य सरकार में मंत्री अशोक चौधरी ने पूरे देश में कर्पूरी ठाकुर के फार्मूले पर पिछड़ों और अति पिछड़ों के लिए जातिगत आधार पर आरक्षण की मांग को लेकर ट्वीट किया है.
ज़ाहिर तौर पर इस तरह की मांग बीजेपी और केंद्र सरकार के ऊपर दबाव की राजनीति का हिस्सा है.
इस बीच बिहार विधानसभा के गणित को देखें तो यहां 79 सीटों के साथ आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी है जबकि 78 सीटों के साथ भाजपा दूसरे नंबर पर है वही जदयू के पास 45 सीट हैं यानी 243 सीटों की विधानसभा में जिसके पास जदयू का साथ होगा सरकार उसी धड़े की बनेगी.
वहीं बिहार बीजेपी ने एक बार फिर राज्य में शराबबंदी को लेकर नीतीश कुमार सरकार पर निशाना साधा है.
यानी बिहार की महागठबंधन सरकार में मची उठापटक के बीच सार्वजनिक तौर पर न तो बीजेपी नीतीश को लेकर नरम दिख रही है और न ही महागठबंधन के नेता मान रहे हैं कि सरकार में कोई खींचतान है.
बीजेपी की रणनीति
बिहार बीजेपी के ट्वीट और गिरिराज सिंह के बयान एक और इशारा करते हैं.
दरअसल जानकार यह भी मानते हैं कि बीजेपी को आने वाले लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा फ़ायदा उस स्थिति में हो सकता है, जब आरजेडी और जेडीयू अलग-अलग चुनाव लड़ें भले ही जदयू भाजपा के साथ ना हो.
ऐसा ही साल 2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान हुआ था. उस वक़्त बीजेपी और जेडीयू अलग-अलग थे उन चुनाव में बीजेपी को 22 सीटें मिली थीं जबकि उसके सहयोगी दलों को मिला दें तो एनडीए के खाते में 31 सीट आई थी.
इसमें 6 सीटें एलजेपी और 3 उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी के खाते में गई थीं.
पिछले यानी साल 2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को बिहार की 40 में से 39 लोकसभा सीटों पर जीत भले ही मिली थी, लेकिन इनमें 17 सीट बीजेपी को, 16 जदयू को और 6 सीट एलजेपी को मिली थी.
लेकिन बाद में अगस्त 2022 में जेडीयू एनडीए से अलग हो गई थी.
29 को बिहार पहुंचेगी राहुल की यात्रा
कुछ जानकार यह भी सलाह देते हैं कि कांग्रेस को अपने क्षेत्रीय सहयोगियों को अपने-अपने राज्यों में चुनाव लड़ने देना चाहिए ताकि वह पूरी ताक़त के साथ बीजेपी का मुक़ाबला कर सकें.
वहीं कांग्रेस को मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड जैसे उन राज्यों पर फोकस करने की भी सलाह दी जाती है, जहां उसकी सीधी लड़ाई भाजपा के साथ है.
बिहार की सियासत में मची इस उथलपुथल के बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी की न्याय यात्रा 29 जनवरी को बिहार में प्रवेश करने वाली है.
जबकि खबरों के मुताबिक़ 29 और 30 जनवरी को लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव को ईडी ने 'लैंड फ़ॉर जॉब' मामले में पूछताछ के लिए दिल्ली आने का समन भेजा है.
ऐसे में राहुल गांधी की बिहार में होने वाली रैली पर जदयू का रुख़ भी तय करेगा कि बिहार में विपक्ष का गठबंधन किस दिशा में जा रहा है.
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