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नीतीश कुमार क्या कांग्रेस की वजह से महागठबंधन से अलग हुए या वजह कुछ और है?
- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के एक बार फिर बीजेपी का हाथ थामने के बाद कांग्रेस पर चौतरफा हमले हो रहे हैं.
रविवार को बिहार में बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने से पहले राज्यपाल को इस्तीफा सौंपने के बाद नीतीश कुमार ने पत्रकारों से कहा कि सबकुछ ठीक नहीं चल रहा था.
उन्होंने काफी कोशिश की लेकिन बात नहीं बन पाई. क्या उनका इशारा कांग्रेस की ओर था?
जनता दल (यूनाइटेड) के सीनियर नेता केसी त्यागी ने नीतीश के इस बयान को ज्यादा स्पष्ट किया.
उन्होंने आरोप लगाया, "कांग्रेस इंडिया गठबंधन का नेतृत्व हड़पना चाहती थी. "नीतीश कुमार ने इस गठबंधन को बनाने के लिए कड़ी मेहनत की.
वो कहते हैं, ''नीतीश ही ममता बनर्जी,अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल को साथ लेकर आए लेकिन कांग्रेस दूसरी पार्टियों की बढ़त वाली जगह में तो अपने लिए ज्यादा सीट की मांग कर रही है लेकिन जहां वो अस्तित्व में नहीं है वहां भी क्षेत्रीय दलों की शर्तों को मानने को तैयार नहीं है.''
नीतीश कुमार और उनकी पार्टी के नेताओं का कहना है कांग्रेस के अहंकारी रवैये की वजह से गठबंधन ठीक दिशा में आगे नहीं बढ़ पा रहा था.
कांग्रेस 'बलि का बकरा'?
लेकिन कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है गठबंधन कांग्रेस के रवैये से नहीं नीतीश की ‘मौकापरस्ती’ की वजह से टूटा.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शरद गुप्ता कहते हैं,''कांग्रेस का यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल में ना के बराबर वजूद है. इसलिए उस पर ये आरोप लगाना सही नहीं है कि महागठबंधन से नीतीश का नाता कांग्रेस की वजह से टूटा. नीतीश के महागठबंधन से बाहर निकलने की वजह आरजेडी और जेडीयू का झगड़ा है.''
के सी त्यागी का कहना है कि इंडिया गठबंधन में नीतीश को लेकर शुरू से ही रवैया ठीक नहीं था. उनका इशारा नीतीश कुमार को संयोजक बनाने को लेकर पैदा विवाद की ओर था.
लेकिन शरद गुप्ता कहते हैं, '' इंडिया गठबंधन का संयोजक बनाने का विरोध ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने किया था."
"कांग्रेस ने कभी ये नहीं कहा था कि वो नीतीश कुमार को संयोजक नहीं बनाएगी. कांग्रेस को दोष देना बलि का बकरा ढूंढने जैसा है.''
शरद गुप्ता कहना है कि कांग्रेस अब एक कमजोर पार्टी होकर रह गई है. उसके ज्यादातर नेता अब जमीनी लड़ाई लड़ने में नाकाम हैं.
उनका कहना है कि इंडिया गठबंधन में सबसे कमजोर पार्टी कांग्रेस ही है. इस वक़्त वो अपना वजूद बनाने में लगी हैं. ऐसे में ये आरोप सही नहीं लगता कि कांग्रेस इतना दबाव बढ़ा सकती है कि नीतीश कुमार महागठबंधन से अलग हो जाएं.
वो कहते हैं, ''महागठबंधन टूटने में बीजेपी का भी हाथ रहा है. पार्टी ने नीतीश कुमार से क्या वादा किया ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन राजनीति में ऐसी चीजें आइसबर्ग की तरह होती हैं. जितना दिखता है उससे बहुत ज्यादा पर्दे के पीछे रहता है.''
'कांग्रेस और नीतीश के बीच भरोसे की कमी थी'
हालांकि कुछ राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि कांग्रेस भले ही कमजोर हो गई है लेकिन उसमें 'एक खास तरह गुरुर है.'
‘द हिंदू’ की राजनीतिक संपादक निस्तुला हेब्बर कहती हैं, "कांग्रेस को लगता है कि आरजेडी, जनता दल यूनाइटेड, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस जहां सक्रिय हैं वो तो उसके इलाके रहे हैं. यहां के वोटर उसके रहे हैं. कांग्रेस को लगता है कि वो अपनी जमीन अपना वोट इन पार्टियों को दिए जा रही है इसलिए उसके अंदर एक गुरुर और अड़ियलपन है."
वो कहती हैं,''कांग्रेस के अंदर नीतीश को लेकर एक अविश्वास की भावना भी थी. कांग्रेस को लगता था कि नीतीश कभी भी पलटी मार सकते हैं और अब जो हुआ है उससे उसका शक और पुख्ता हो गया.''
निस्तुला हेब्बर कहती हैं, ''हाल में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के दौरान जो हिंदू उभार दिखा और नरेंद्र मोदी का समर्थन बढ़ा उसने भी नीतीश कुमार को पाला बदलने के लिए प्रोत्साहित किया. उन्हें लगा कि बीजेपी के साथ गठबंधन किया तो उन्हें लोकसभा चुनाव में सीटें भी मिलेंगी और उनका राजनीतिक अस्तित्व भी बचा रहेगा.''
जानकारों का कहना है कि सत्ता में आने के बाद बिहार में आरजेडी जनता दल (यूनाइटेड) की तुलना में मजबूत बन कर उभरी है.
इस दौरान लालू प्रसाद यादव और कांंग्रेस के बीच तालमेल काफी अच्छा हो गया था.
नीतीश इससे असहज हो रहे थे. इससे बीजेपी को नीतीश को यह समझाने का मौका मिल गया कि वो उसके साथ राजनीतिक फायदे में रहेंगे.
नीतीश के सहयोगी क्या कह रहे हैं
नीतीश कुमार के नजदीकी सहयोगियों का दावा है कि बिहार के सीएम के पाला बदलने में राजनीतिक समीकरण का हाथ रहा .
उनके मुताबिक नीतीश कुमार का आकलन था कि यादव जैसी वर्चस्व वाली ओबीसी जातियां लोकसभा चुनाव में जनता दल (यूनाइटेड) को वोट नहीं देंगी. हिंदी प्रदेशों में कांग्रेस की हार और नरेंद्र मोदी के लगातार मजबूत होने की वजह से भी नीतीश को बीजेपी की ओर जाने के लिए बाध्य किया.
ये दावा भी किया जा रहा है कि हिंदी प्रदेशों में कांग्रेस की हार और नरेंद्र मोदी के लगातार मजबूत होने की वजह ने भी नीतीश को बीजेपी की ओर जाने के लिए बाध्य किया.
'द प्रिंट' के राजनीतिक संपादक डीके सिंह का कहना है, " राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में बीजेपी की जीत के बाद उसका वोट बैंक मजबूत हो रहा है. दूसरी ओर नीतीश को ये भी लग रहा था कि उनके कुछ विधायक आरजेडी और कुछ बीजेपी को ओर चले जाएंगे. इसलिए भी वो बीजेपी की ओर गए. नीतीश कुमार को लग रहा था वो अब अपनी आखिरी पारी खेल रहे हैं. वो अपने राजनीतिक भविष्य को बचाने के लिए बीजेपी की ओर गए हैं."
विश्लेषकों का कहना है कि नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक ताकत कम होते जाने से चिंतित थे.
बिहार की राजनीति को समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं कि नीतीश कुमार की राजनीतिक ताकत काफी कम हो गई है.
सुरूर अहमद कहते हैं, "उनके सिर्फ 43 विधायक हैं वो भी बीजेपी के सहयोग के साथ. जबकि ममता के पास 213 विधायक हैं बगैर बीजेपी की मदद के. अरविंद केजरीवाल पास दिल्ली और पंजाब हैं. ये 2010 के नीतीश कुमार नहीं हैं. ये 2024 के नीतीश कुमार हैं जो राजनीतिक तौर काफी कमजोर हैं."
' महागठबंधन छोड़ने से सबसे ज्यादा नुकसान अति पिछड़ों का'
सुरूर अहमद कहते हैं, ''नीतीश की अपनी महत्वाकाक्षाएं हैं और इसी के साथ वो इंडिया गठबंधन में गए थे. उन्हें लगता था कि पीएम पद की दावेदारी उन्हें प्लेट में परोस कर दे दी जाएगी.लेकिन कांग्रेस, तृणमूल और आम आदमी पार्टी जैसे दल क्या इतने भोले हैं. अब जब वहां बात नहीं बनी तो नीतीश बीजेपी के साथ चले आए. महागठबंधन से निकलने के लिए कांग्रेस पर जो लगाए जा रहे आरोप बिल्कुल बकवास हैं.''
सुरूर अहमद कहते हैं, "नीतीश कुमार और उनकी पार्टी भले ही कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दिए जाने का श्रेय ले रहे हैं लेकिन लेकिन इस फेरबदल में सबसे ज्यादा अति पिछड़ा वर्ग को नुकसान हुआ. कोई बड़ा अति पिछड़ा चेहरा नहीं है जिसे मंत्रिमंडल में जगह मिली हो."
उनका कहना है कि नीतीश भले ही बीजेपी के साथ जाकर खुद को विजेता महसूस कर रहे हैं लेकिन आखिरकार उन्हें नुकसान होगा. क्योंकि 'जनता दल यूनाइडेट कैडर बेस पार्टी नहीं है. जब वो बीजेपी से मिल कर चुनाव लड़ती है तो बीजेपी और आरएसएस का कैडर उनकी मदद करते हैं.'
हालांकि आरजेडी भी कैडर आधारित पार्टी नहीं है लेकिन उसकी समर्थक जातियों के लोग बूथ मैनेजमेंट से लेकर चुनाव प्रबंधन का सारा काम करते हैं. जिस दिन बीजेपी नीतीश से अलग होगी वो मुश्किल में होंगे क्योंकि नीतीश के पास कैडरों की ताकत नहीं है. उनकी जाति के वोट भी महज तीन से चार फीसदी ही हैं.
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