न्यूज़क्लिक मामला: पत्रकारों के मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप ज़ब्त होने पर बढ़ी निजता से जुड़ी चिंता

दिल्ली में पत्रकारों का प्रदर्शन.

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    • Author, राघवेंद्र राव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के मुताबिक़ न्यूज़ पोर्टल न्यूज़क्लिक के मामले में तीन अक्टूबर को दिल्ली में 88 जगहों और अन्य राज्यों में सात जगहों पर छापेमारी की गई.

दिल्ली पुलिस ने पटियाला हाउस कोर्ट को ये भी बताया है कि छापेमारी के दौरान भारी संख्या में इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और दस्तावेज़ ज़ब्त किए गए.

"भारी संख्या" में ज़ब्त किए गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण न्यूज़क्लिक से जुड़े पत्रकारों के मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप, हार्ड-ड्राइव और पेन ड्राइव हैं जिनकी ज़ब्ती के बाद प्राइवेसी या निजता के मौलिक अधिकार को लेकर चिंताएं एक बार फिर उठ खड़ी हुई हैं.

ये मुद्दा पिछले कुछ सालों में सुप्रीम कोर्ट में भी उठाया जा चुका है. इससे जुड़ी पहली याचिका पांच शिक्षाविदों ने सुप्रीम कोर्ट में 2021 में दायर की थी.

पिछले साल फ़ाउंडेशन फ़ॉर मीडिया प्रोफ़ेशनल्स ने पत्रकारों के डिजिटल उपकरणों को खंगालने और ज़ब्त करने के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था. उनका कहना था कि इन उपकरणों में 'निजी डेटा होता है और उन्हें ज़ब्त कर लेना निजता के अधिकार के ख़िलाफ़ है.'

ये दोनों ही मामले फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं.

सुप्रीम कोर्ट की वकील वृंदा भंडारी कहती हैं, "मौजूदा छापेमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता पर गंभीर सवाल उठाती है".

वे कहती हैं, "बिना किसी आधार या दिशानिर्देश के इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य ज़ब्त करना बेहद परेशानी की बात है. इस संबंध में एक याचिका सर्वोच्च न्यायालय के सामने लंबित है. दुर्भाग्य से इस मामले में कोई हलचल नहीं हुई है."

फ़ाउंडेशन फ़ॉर मीडिया प्रोफ़ेशनल्स का कहना है कि ये बात परेशान करने वाली है कि पत्रकारों के डेटा और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को मनमाने तरीक़े से ज़ब्त किया गया और उन्हें क्लोन प्रतियां, हैश वैल्यू और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी नहीं दी गई जो साक्ष्यों की अखंडता सुनिश्चित करने और पत्रकारों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी हैं.

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'ये निजता का हनन है'

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तीन अक्टूबर को न्यूज़क्लिक के साथ जुड़े पत्रकार अभिसार शर्मा के घर पर भी छापेमारी हुई और उनके दो मोबाइल फ़ोन और एक लैपटॉप ज़ब्त कर लिया गया.

यूट्यूब पर पोस्ट किए एक वीडियो में अभिसार शर्मा ने कहा कि इन उपकरणों को ज़ब्त करते वक़्त न तो उन्हें कोई वारंट दिखाया गया और न ही कोई वजह बताई गई. साथ ही उन्होंने कहा कि वो एक किताब लिख रहे हैं और एक स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हैं और ये सब उनके लैपटॉप में है और इसलिए ये लैपटॉप उनके लिए बेशक़ीमती हैं.

बीबीसी ने एक ऐसे पूर्व पत्रकार से बात की जिन्होंने न्यूज़क्लिक न्यूज़ पोर्टल के साथ क़रीब पांच साल पहले सिर्फ़ आठ महीने के लिए काम किया था.

तीन अक्टूबर की सुबह उनके दरवाज़े पर भी दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल की टीम ने दस्तक दी. काफ़ी देर तक पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उनके मोबाइल फ़ोन और लैपटॉप को ज़ब्त कर लिया.

इस पूर्व पत्रकार ने कहा, "मेरा फ़ोन और लैपटॉप ज़ब्त करते वक़्त मुझे कोई सरकारी दस्तावेज़ या आदेश नहीं दिखाया गया. उन्होंने कहा कि ये न्यूज़क्लिक से जुड़ा मामला है."

इस पूर्व पत्रकार ने पुलिस को ये भी बताया कि जिस मोबाइल फ़ोन और लैपटॉप को वो ज़ब्त कर रहे हैं वो उस वक़्त के नहीं हैं जब वो न्यूज़क्लिक के साथ काम कर रहे थे. इसके बावजूद उन्हें ज़ब्त कर लिया गया.

उन्होंने कहा, "मुझे कहा गया है कि मेरे मोबाइल फ़ोन और लैपटॉप को जांच के लिए भेजा गया है और क़रीब 20 दिन से पहले वो वापिस नहीं मिल पाएंगे."

इस घटनाक्रम के बाद ये पूर्व पत्रकार चिंतित हैं.

वो कहते हैं, "ये प्राइवेसी का हनन है. इन उपकरणों में मेरा निजी डाटा है, लोगों के कॉन्टैक्ट नंबर हैं. पहले भी रिपोर्ट्स आई हैं कि वो लोग इन उपकरणों पर कुछ भी प्लांट कर सकते हैं. इस बात का भी ख़तरा है क्यूोंकि कुछ बताकर नहीं गए, न ही लिखित में देकर गए हैं कि वो क्या-क्या ले गए हैं. न ही ये लिखित में दिया गया है कि इन उपकरणों को ले जाते वक़्त उनमें क्या-क्या था. एक महीने बाद अगर इन उपकरणों में पांच नई चीज़ें मिलती हैं तो पुलिस कुछ भी कह सकती है."

दिल्ली में पत्रकारों का प्रदर्शन.

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'सबूत प्लांट करना आसान'

साल 2021 में 'वाशिंगटन पोस्ट' में छपी एक ख़बर में कहा गया कि एक अमेरिकी डिजिटल फॉरेंसिक फ़र्म ने पाया था कि वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता सुरेंद्र गाडलिंग, जो भीमा कोरेगांव मामले में अभियुक्त हैं, उनके लैपटॉप की निगरानी की गई और उस पर 20 महीने से ज़्यादा की अवधि तक आपत्तिजनक दस्तावेज़ प्लांट किए गए.

इस ख़बर के मुताबिक, मैसाचुसेट्स स्थित डिजिटल फोरेंसिक फ़र्म आर्सेनल कंसल्टिंग ने बचाव पक्ष के वकीलों के अनुरोध पर कंप्यूटर की इलेक्ट्रॉनिक प्रतियों के साथ-साथ दो कार्यकर्ताओं सुरेंद्र गाडलिंग और रोना विल्सन के ईमेल खातों की जांच की थी.

आर्सेनल कंसल्टिंग ने पाया कि गाडलिंग को भी उसी हमलावर ने निशाना बनाया था जिसने कथित तौर पर इसी मामले के एक अन्य अभियुक्त रोना विल्सन के लैपटॉप पर सबूत प्लांट किए थे.

वकील प्रसन्ना एस उस मामले की पैरवी कर रहे हैं जिसमें पांच शिक्षाविदों--राम रामास्वामी, सुजाता पटेल, माधव प्रसाद, मुकुल केसवन और दीपक मलघन ने सुप्रीम कोर्ट में उपकरणों की ज़ब्ती और इससे जुड़े निजता के हनन के मामले को उठाया है.

प्रसन्ना कहते हैं, "पुलिस एजेंसियों के पास कोई मैनुअल या प्रोटोकॉल नहीं है जो इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की ज़ब्ती या तलाशी को नियंत्रित करता हो. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के साथ छेड़छाड़ करना आसान होता है, उन पर सबूत प्लांट करना आसान होता है. फ़ाइलें वायरलेस तरीके से स्थानांतरित की जा सकती हैं. इसलिए साक्ष्य की अखंडता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. तो पुलिस के पास कौन सी प्रक्रियाएं और प्रोटोकॉल हैं जो यह सुनिश्चित करते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की अखंडता संरक्षित है."

प्रसन्ना कहते हैं कि ज़ब्ती के वक़्त ही पुलिस को डेटा क्लोन करके देने और हैश वैल्यू देने की स्थिति में होना चाहिए.

वे कहते हैं, "क्योंकि अगर उपकरणों में कुछ छेड़छाड़ होती है तो ज़ब्ती के वक़्त की हैश वैल्यू और ट्रायल के दौरान की हैश वैल्यू अलग-अलग होगी."

वे कहते हैं कि इसीलिए ऐसा भी लगता है कि शायद ये सब इसलिए नहीं किया जा रहा क्यूोंकि ट्रायल के दौरान कुछ साबित ही नहीं करना है.

वो कहते हैं, "अगर आप इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की अखंडता सुनिश्चित करने के बुनियादी प्रोटोकॉल का भी पालन नहीं करते हैं तो आप परीक्षण के दौरान कुछ भी साबित करने में कैसे सक्षम होंगे? मान लीजिये पुलिस को डिजिटल उपकरणों में कुछ आपत्तिजनक लगता है. तो वो उसे कैसे साबित कर पाएंगे अगर उन्होंने किसी प्रक्रिया का पालन ही नहीं किया है."

प्रसन्ना कहते हैं कि मोबाइल फ़ोन जैसे व्यक्तिगत डिजिटल उपकरणों में बहुत सारी जानकारी होती है. "उनमें आपके जीवनसाथी, आपके वकील, आपके डॉक्टर के साथ संवेदनशील पत्राचार हो सकता है, व्यक्तिगत तस्वीरें हो सकती हैं. पत्रकारों का अपने स्रोतों से पत्र-व्यवहार होता है. तो वे दिशानिर्देश कहां हैं जो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करें?"

प्रसन्ना एक और ज़रूरी सवाल भी उठाते हैं. वे कहते हैं, "हमें कैसे पता चलेगा कि जांच एजेंसियां कल व्हाट्सएप चैट लीक नहीं करेंगी. हमने इसे रिया चक्रवर्ती और अर्नब गोस्वामी मामलों में देखा कि उनकी व्हाट्सएप चैट लीक हो गई थी. हमारे पास ऐसा कोई कानून नहीं है जहां इन मामलों में ज़िम्मेदारी तय की जा सके."

न्यूज़क्लिक के संस्थापक संपादक को गिरफ्तार कर ले जाती पुलिस.

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'हर नागरिक को संभावित आतंकवादी माना जा रहा है'

प्रशांत टंडन एक स्वतंत्र पत्रकार हैं. साल 2022 में दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने एक मामले की जांच में उनका मोबाइल फ़ोन भी ज़ब्त कर लिया था. वो मोबाइल फ़ोन उन्हें आज तक नहीं लौटाया गया है.

वो कहते हैं, "सवाल यह है कि क्या पुलिस की ऐसी कार्रवाई वैध है या नहीं? ये चीजें अदालतों के निर्देशों का पालन करते हुए ही की जानी चाहिए. पुलिस को अदालत को बताना चाहिए कि उन्हें किसी के डिजिटल उपकरणों को ज़ब्त करने की ज़रूरत क्यों है.

मोबाइल फ़ोन और लैपटॉप जैसे उपकरणों की ज़ब्ती को लेकर गहरी चिंताएं हैं.

टंडन कहते हैं, "एक बार किसी का मोबाइल फोन ज़ब्त हो जाए तो कौन जानता है कि पुलिस उसमें क्या डाल दे. यह किसी के वश में नहीं है. पुलिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता. हमने भीमा कोरेगांव मामले में देखा है जहां अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने रिपोर्ट किया है कि आरोपियों के कंप्यूटर में सबूत प्लांट किए गए थे."

टंडन कहते हैं कि फ़ोन बहुत ही निजी चीज़ है. "फ़ोन पर आप अपने परिवार के सदस्यों और बहुत करीबी दोस्तों के साथ बातचीत करते हैं. ऐसे मैसेज भी होते हैं जिन्हें आप सार्वजनिक नहीं करना चाहेंगे. यहां निजता का मुद्दा है."

प्रशांत टंडन के मुताबिक "मूल समस्या ये है कि हर नागरिक को संभावित आतंकवादी माना जा रहा है".

वे कहते हैं, "इससे बचने के उपाय करने होंगे. सुप्रीम कोर्ट को लोगों को ऐसी स्थितियों से बचाने के लिए उपाय करने चाहिए. प्रत्येक नागरिक को अपनी निजता की रक्षा करने का अधिकार है. निजता की रक्षा की जानी चाहिए."

भारत की सुप्रीम कोर्ट.

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क्या कहती है सरकार

सुप्रीम कोर्ट में इस विषय से जुड़े एक लंबित मामले में दायर हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा है कि सीबीआई मैनुअल में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को जब्त करने के संबंध में विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय हैं जिनका इस्तेमाल अन्य एजेंसियां भी कर सकती हैं.

साथ ही केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि इस मामले में राष्ट्रीय स्तर पर दिशानिर्देश तय करना राज्यों के साथ परामर्श के बाद ही किया जा सकता है क्योंकि कानून और व्यवस्था राज्य का विषय है.

केंद्र सरकार ने ये सुझाव भी दिया है कि अपराध की प्रकृति, अपराधियों की कार्यप्रणाली और संवैधानिक सीमाओं के भीतर प्रक्रियात्मक कानून को ध्यान में रखते हुए अच्छी अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं को भारतीय संदर्भ में अपनाया या समायोजित किया जा सकता है.

सरकार का ये भी कहना है कि ज़्यादातर एजेंसियों के पास इस मामले पर प्रक्रियात्मक एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) हैं और सीबीआई मैनुअल विस्तृत तरीके से डिजिटल साक्ष्य के विषय से निपटता है और महत्वपूर्ण सुरक्षा उपायों के साथ एक प्रक्रिया तैयार करता है जो देश में वैधानिक और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है.

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