चंद दिनों में ही नई नौकरी छोड़ने का फ़ैसला क्यों करने लगे हैं लोग

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    • Author, आदर्श राठौर
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

करन सिंह ने जनवरी 2020 में गुरुग्राम में एक कंसल्टिंग स्टार्टअप जॉइन किया. यह उनकी पहली नौकरी थी. वह बहुत ख़ुश थे मगर कुछ ही हफ़्तों में उन्हें इस नौकरी को छोड़ने का फ़ैसला करना पड़ा.

करन बताते हैं कि शुरुआत में हीं उन्हें कुछ बातें खटक गई थीं. फिर माहौल ख़राब होने लगा.

वह कहते हैं, ''एक क्लाइंट की नाराज़गी पर मीटिंग हुई. मैनेजर ने समस्या को सुलझाने की बजाय ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि दो टीम के सदस्य एक दूसरे पर दोष मढ़ने लगे.''

वे आगे बताते हैं,''एक वरिष्ठ सहयोगी ने नौकरी छोड़ दी. दफ़्तर का माहौल तनावपूर्ण हो गया. मैंने भी कुछ ही दिनों में इस्तीफ़ा दे दिया.''

ये देखा गया है कि लोग अपनी व्यक्तिगत और व्यावसायिक प्राथमिकताओं पर गहनता से विचार करते हैं और ऐसी नौकरी छोड़ने में देरी नहीं करते जहां, उन्हें ख़ुशी न मिले. अब ये नौकरी चाहे नई क्यों न हो.

कम समय में नौकरी छोड़ने के कई कारण होते हैं

  • मैनेजर का ज़्यादा निगरानी रखना
  • भर्ती के दौरान किए गए वायदों को पूरा न करना
  • दफ़्तर का माहौल ख़राब होना
  • कंपनी के नियम लोगों को पसंद न आना आदि

अमेरिका में लेबर मार्केट पर नज़र रखने वाले ब्यूरो ऑफ़ लेबर स्टैटिस्टिक्स के मुताबिक़, अमेरिका में एक नौकरी में किसी शख्स का बिताया औसत कार्यकाल चार साल का है.

लेकिन सितंबर 2022 में लिंक्डइन द्वारा किए गए शोध के मुताबिक़ बहुत सारे कर्मचारियों ने एक साल से पहले ही नौकरी छोड़ दी. इस तरह के मामले अगस्त 2021 में बढ़ने लगे और 2022 मार्च तक चरम पर (पिछले साल के मुक़ाबले 10 प्रतिशत ज़्यादा) थे.

इसका मतलब यह भी निकलता है कि एक नौकरी में असंतुष्ट रहकर कई साल बिताने के बजाय लोग अब जल्दी से नौकरी बदलने में ज्‍यादा इच्छुक नज़र आ रहे हैं.

क्यों हो रहा है ऐसा?

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दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के अटल बिहारी वाजपेयी प्रबंधन एवं उद्यमिता संस्थान में सहायक प्रोफ़ेसर वानिकी जोशी लोहानी लोगों के नौकरी में बने रहने और छोड़ने का कारण बताती हैं.

वो कहती हैं कि एक तो सकारात्मक भावना है, जिसे कहते हैं- वर्क फ़ैमिली एनरिचमेंट. यानी काम से कुछ ऐसा मिल रहा हो, जिससे परिवार समृद्ध हो रहा हो. चाहे वह पैसा हो या फिर सकारात्मक रवैया.

उनके अनुसार, ''अगर कोई ऑफ़िस में खुश रहे और घर भी ख़ुशी से जाए, छुट्टियां समय पर मिलें तो यह उसके लिए अच्छा होता है. वह ऐसे परिवेश वाली नौकरी में टिकना चाहेगा.”

दूसरा कारण वो बताती हैं- वर्क फ़ैमिली कॉन्फ्लिक्ट.

प्रोफेसर वानिकी जोशी लोहानी के अनुसार, ये एक नकारात्मक भावना पैदा करती है. वो काम को बोझ समझता है और ऐसे में परिवार पर ध्यान नहीं दे पाता क्योंकि दफ़्तर का हताशा घर लेकर जाता है.

वो कहती हैं कि जब ‘वर्क फ़ैमिली कॉन्फ़्लिक्ट’, ‘वर्क फ़ैमिली एनरिचमेंट’ से ऊपर हो जाता है तब लोग नौकरी के नए विकल्प तलाशने लगते हैं.

अमेरिका के बोस्टन यूनिवर्सिटी के क्वेस्ट्रॉम स्कूल ऑफ बिज़नेस में मैनेजमेंट एंड ऑर्गनाइज़ेशन के वरिष्ठ प्रवक्ता मोशे कोहेन कहते हैं, “कर्मचारियों और नौकरी देने वालो में एक सामाजिक अनुबंध होता है जो अब टूट रहा है. अब कंपनियां अपने कर्मचारियों का ख्याल नहीं रख रही है.''

वो कहते हैं, ''कर्मचारियों को लगता है कि उन्हें अस्थायी तौर पर रखा गया है और कभी भी निकाला जा सकता है. ऐसे में वे भी नौकरी देने वाली कंपनी के लिए कोई प्रतिबद्धता नहीं रखते. वे नौकरियों को आज़मा रहे होते हैं.”

कोहेन के मुताबिक़, आजकल रिमोट वर्क यानी घर या कहीं से भी काम करने जैसी व्यवस्था का चलन बढ़ा है लेकिन मैनेजर्स को चिंता रहती है कि कर्मचारी काम कर रहे हैं या नहीं. ऐसे में वे ज़्यादा निगरानी रखने लगते हैं. इससे भी मैनेजर और टीम के सदस्यों के बीच भरोसा कम हो रहा है.

कुछ लोग इन परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेकते. अगर उन्हें लगता है कि नौकरी उनकी उम्मीदों या ज़रूरतों के अनुरूप नहीं है या माहौल अच्छा नहीं मिल पा रहा है तो वे तुरंत वहां से निकल जाते हैं.

तुरंत नौकरी छोड़ना कितना सही?

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विशेषज्ञों का कहना है कि बहुत देर से नौकरी छोड़ने के बजाय सोच-समझकर जल्दी नौकरी छोड़ना सही फ़ैसला हो सकता है.

कैलिफोर्निया के पेपरडाइन ग्राज़िडियो बिज़नेस स्कूल में बिहेवियरल साइंस की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बॉबी थॉमसन का मानना है “जब आपको लगे कि चीजें सही नहीं हैं तो उस नौकरी को छोड़ना आत्मविश्वास भरा क़दम होता है. अगर कर्मचारी को लगे कि कंपनी में नकारात्मक माहौल बहुत ज्यादा है और हालात को बदलना उनकी क्षमता से बाहर है तो समझ में आता है कि उन्हें क्यों जल्दी से वहां से निकल जाना चाहिए.”

साथ ही ऐसी नौकरी में लगे रहने से अच्छे मौके भी हाथ से निकल जाते हैं.

लेकिन करन सिंह कहते हैं कि नई नौकरी तलाशते वक्त उनसे ये पूछा गया कि पुरानी नौकरी इतनी जल्द क्यों छोड़ दी. वहीं मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाले लोगों के लिए नौकरी छोड़ना आसान नहीं होता.

वो बताते हैं, मैंने इंटरव्यू दिए और एक महीने के अंदर नोएडा में एक नई कंपनी जॉइन कर ली. यहां वेतन भी अच्छा है और माहौल भी.”

लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि हर किसी के पास ऐसी आज़ादी नहीं होती. जेएनयू में सहायक प्रोफ़ेसर वानिकी जोशी लोहानी कहती हैं कि हर इंडस्ट्री की स्थिति अलग है.

उनके अनुसार, कई ऐसे सेक्टर है जैसे कपड़ा, दूरसंचार उद्योग जहां लोग नौकरी छोड़ने से बचते हैं वहीं आईटी,कंसल्टेंसी, मार्केंटिंग आदि में बिज़नस ज़्यादा है वहां नौकरी का ऑफर भी मिल जाता है.

सुधार के लिए क्या करना ज़रूरी

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ऐसा नहीं है कि हमेशा कंपनियां ही ग़लत होती हैं. कर्मचारियों का तुरंत नौकरी छोड़ देना कंपनियों के लिए भी नुक़सानदेह होता है.

क्वेस्ट्रॉम स्कूल ऑफ बिज़नेस में वरिष्ठ प्रवक्ता कोहेन कहते हैं कि कुछ लोग अपनी ज़रूरतों को पूरा करने की चाह में बहुत ज्यादा ‘शॉर्ट-टर्मिस्ट’ हो गए हैं यानी वे तुरंत सब कुछ पाना चाह रहे हैं.

वह कहते हैं, “बहुत से लोग चाहते हैं कि वित्तीय लाभ के अलावा कुछ नया सीखने को मिले, काम करने को लेकर ऑफ़िस में उनके हिसाब से लचीलापन हो. लेकिन ऐसी उम्मीदें पहले दिन पूरी नहीं हो सकतीं. उन्हें लगता है कि आते ही उन्हें कोई महत्वपूर्ण काम सौंप दिया जाएगा या फिर राय बना लेते हैं कि थोड़ी-बहुत कमियों वाला बॉस एक ख़राब बॉस है. लेकिन ऐसा नहीं होता.

कोहेन ये सलाह देती है कि नौकरी छोड़ने से घबराइए मत. लेकिन थोड़ा ठहरिये, जल्दबाज़ी में कोई फ़ैसला मत लीजिए.”

प्रोफ़ेसर वानिकी जोशी लोहानी कहती हैं कि कंपनियों को यह देखना चाहिए कि उनके यहां ‘रीटेंशन रेट’ यानी किसी निश्चित अवधि में कर्मचारियों के टिके रहने की दर और ‘अट्रीशन रेट’ यानी नौकरी छोड़ने की दर क्या है. इसके बाद रीटेंशन बढ़ाने और अट्रीशन कम करने के लिए मानवीय दृष्टिकोण अपनाकर ज़रूरी बदलाव करने चाहिए.

जब ऐसे हालात हों तो क्या करें

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लेकिन तब कोई क्या करे, जब नौकरी की शुरुआत में ही कंपनी या वहां के माहौल को लेकर नकारात्मक संकेत नज़र आने लगें?

पेपरडाइन ग्राज़िडियो बिज़नस स्कूल में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बॉबी थॉमसन सलाह देती हैं कि नौकरी छोड़ने से पहले इत्मिमान से विचार करना चाहिए. कर्मचारियों को अपने काम और ज़िम्मेदारियों को लेकर ऊपर के अधिकारियों से बात करनी चाहिए और संस्थान के बाक़ी सदस्यों से रिश्ते सुधारने चाहिए. अपने किसी पुराने सहयोगी, सलाहकार या करियर कोच की मदद लेकर नज़रिया बदलने में मदद ली जा सकती है.

हालांकि, थॉमसन कहती हैं कि वह लोगों की हालात को भांपने की क्षमता पर यक़ीन रखती हैं, ख़ासकर जब उन्होंने इस बारे में भी काफ़ी सोच-विचार कर लिया हो कि इस समय तुरंत नौकरी छोड़ने का क्या असर हो सकता है.

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