धरती पर कभी भी, कहीं भी गिर सकता है उपग्रहों का 'दादा' ईआरएस-2

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इमेज कैप्शन, ढाई टन वज़नी ईआरएस उपग्रह की कलाकृति
    • Author, जोनाथन एमोस
    • पदनाम, विज्ञान संवाददाता

एक समय काफ़ी अहमियत रखने वाला यूरोप का एक उपग्रह चंद घंटों के अंदर धरती पर गिरने वाला है.

ईआरएस-2 नाम के इस सैटेलाइट को साल 1995 में लॉन्च किया गया था.

इसकी मदद से उन आधुनिक तकनीकों के विकास में मदद मिली, जिन्हें आज अंतरिक्ष से पृथ्वी की निगरानी में इस्तेमाल किया जा रहा है.

इस उपग्रह ने साल 2011 में काम रोक दिया था, जिसके बाद यह धीरे-धीरे पृथ्वी के क़रीब आ रहा था. अब यह अचानक अनियंत्रित होकर बुधवार को किसी भी समय वायुमंडल में दाख़िल हो जाएगा.

यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ईएसए) का कहना है कि दो टन वज़नी इस सैटेलाइट का ज़्यादातर हिस्सा पृथ्वी की सतह पर पहुंचने से पहले ही जल जाएगा.

हो सकता है कि कुछ हिस्से बचे रहें लेकिन इनके आबादी वाले इलाक़ों में गिरकर नुक़सान करने की आशंका बहुत कम है.

ये टुकड़े दुनिया के किसी भी हिस्से में गिर सकते हैं लेकिन पृथ्वी के ज़्यादातर हिस्से में समंदर होने के कारण अक्सर ऐसे टुकड़े वहीं गिरकर डूब जाते हैं.

ईएसए के अर्थ ऑब्ज़र्वेशन ग्राउंड सेग्मेंट डिपार्टमेंट के मिरको एल्बानी ने कहा, “यह बताना अहम है कि जो हिस्से पृथ्वी में आएंगे, वे रेडियोएक्टिव के ज़हरीले नहीं हैं.”

जो हिस्से पृथ्वी में बिना जले आ सकते हैं, उसमें इसके कुछ आंतरिक पैनल और धातु से बने कुछ हिस्से हो सकते हैं.

उपग्रहों का ग्रैंडफ़ादर

तापमान

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इमेज कैप्शन, आज पृथ्वी के तापमान को मापना ईआरएस कार्यक्रम की वजह से ही संभव हुआ है

यूरोपीय स्पेस एजेंसी ने 1990 के दशक में दो एक जैसे अर्थ रिमोट सेंसिंग (ईआरएस) उपग्रह लॉन्च किए थे - ईआरएस-1 और ईआरएस-2.

वे उस समय के सबसे आधुनिक उपग्रह थे, जिनमें ज़मीन, समंदर और हवा में होने वाले बदलावों को मापने वाले उपकरण लगे हुए थे.

इन उपग्रहों ने बाढ़ पर नज़र रखी, समंदर और महाद्वीपों के तापमान को मापा, बर्फ़ की परतों में आए बदलाव को देखा और भूकंप के दौरान हुए बदलावों की जानकारियां भी जुटाईं.

इनमें से ईआरएस-2 में सूर्य की पराबैंगनी किरणों से पृथ्वी की सुरक्षा करने वाली ओज़ोन परत की जांच करने की भी क्षमता थी.

इन दोनों उपग्रहों को यूरोप में पृथ्वी की निगरानी करने वाले उपग्रहों का ग्रैंडफ़ादर यानी दादा कहा जाता था.

ईआरएस-2 इन दोनों में पहला है जो पृथ्वी की ओर आ रहा है.

अंतरिक्ष में मलबे के ख़तरे

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जब ईआरएस उपग्रहों को लॉन्च किया गया था, उस समय अंतरिक्ष में बेकार हो चुके उपग्रहों से फैलने वाले मलबे को लेकर ज़्यादा सख़्त दिशानिर्देश नहीं थे.

अब ईपीए ने नई नीति बनाई है, जिसके अंतरिक्ष में बिल्कुल भी मलबा नहीं छूटना चाहिए. इसके लिए काम करना बंद कर चुके उपग्रह को नष्ट करने के लिए पांच साल से ज़्यादा समय की छूट नहीं मिल सकती.

साथ ही, भविष्य में छोड़े जाने वाले उपग्रहों में अतिरिक्त ईंधन रखा जाना है, ताकि काम पूरा कर लेने पर उन्हें वापस पृथ्वी में लाया जा सके.

इसका कारण यह है कि दुनिया भर से बड़े पैमाने पर उपग्रह छोड़े जाने से उनके आपस में टकराने की आशंकाएं भी बढ़ती जा रही हैं.

आस्ट्रेलियन ट्रैकिंग कंपनी

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इमेज कैप्शन, ईआरएस-2 पर आस्ट्रेलियन ट्रैकिंग कंपनी एचईओ नज़र रख रही है

ईआरएस-2 को धरती से 780 किलोमीटर ऊपर पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया था.

ईआरएस-2 में बचे ईंधन को इस्तेमाल करते हुए इसे साल 2011 में थोड़ा और नीचे लाकर पृथ्वी से 570 किलोमीटर ऊपर लाया गया था.

उस समय अनुमान लगाया गया था कि इससे यह अगले 15 साल में निचले वायुमंडल में प्रवेश करके नष्ट हो जाएगा.

बुधवार को यह अनुमान क़रीब-क़रीब सही साबित होगा.

वहीं, ईआरएस-1 को भी नीचे लाने की कोशिश की गई थी. मगर ऐसा करते समय उससे संपर्क टूट गया.

यह अभी पृथ्वी से 700 किलोमीटर ऊपर घूम रहा है. इसे नीचे आकर पूरी तरह नष्ट होने में 100 साल से ज़्यादा समय लग सकता है.

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इमेज कैप्शन, ईआरएस कार्यक्रम से चट्टानों में होने वाले बदलाव को मापने की तकनीक विकसित करने में मदद मिली

अमेरिकी कंपनी स्पेस एक्स, जो कि इस समय 5400 से ज़्यादा उपग्रहों को चला रही है, उसने एलान किया है वह एक खामी मिलने के बाद अपने 100 उपग्रहों को वापस पृथ्वी पर ले आएगी.

अंतरिक्ष को सुरक्षित बनाने के लिए काम करने वाले समूह सिक्यॉर वर्ल्ड फ़ाउंडेशन और लियोलैब्स नाम की अमेरिकी कंपनी ने पिछले हफ़्ते कहा था कि अंतरिक्ष से मलबा हटाया जाना चाहिए, क्योंकि यह लगातार बढ़ रहा है.

उनके अनुसार, पहले ही इतना मलबा इकट्ठा हो गया है कि वह दुनिया की आर्थिकी के लिए काफ़ी अहम बन चुके नए उपग्रहों को तबाह कर सकता है.

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