'रथ प्रभारी' नियुक्ति के मामले पर मोदी सरकार और विपक्ष क्यों है आमने सामने?

सांकेतिक तस्वीर- सेना के जवानों के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

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    • Author, राघवेंद्र राव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दृश्य 1:

भारत के हर ज़िले में साल 2014 से लेकर अब तक की सरकारी उपलब्धियों का प्रचार करते हुए रथ यात्रा निकल रही है और हर रथ का प्रभारी भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) का एक अधिकारी है.

दृश्य 2:

अपनी सालाना छुट्टी पर घर आया हुआ एक भारतीय सैनिक स्थानीय लोगों को सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारियाँ दे रहा है.

अगर केंद्र सरकार की मंशा पूरी हुई, तो ये दोनों दृश्य जल्द ही हक़ीक़त में बदलते नज़र आएँगे.

दरअसल केंद्र सरकार पिछले नौ साल की उपलब्धियों का प्रचार करने के लिए आईएएस अधिकारियों को रथ प्रभारी के तौर पर तैनात करने की तैयारी में है.

दूसरी ओर हाल ही में रक्षा मंत्रालय के एक निर्देश में कहा गया कि छुट्टी पर जा रहे भारतीय सेना के सैनिकों को राष्ट्र-निर्माण के काम में हिस्सा लेना चाहिए और स्थानीय समुदाय के साथ रचनात्मक तरीक़े से जुड़ना चाहिए और ये काम करते हुए सरकारी योजनाओं का प्रचार करना चाहिए.

इन दोनों ही बातों को लेकर राजनीति गरमा गई है और इस बात पर बहस छिड़ गई है कि क्या नौकरशाही और सेना का राजनीतिकरण किया जा रहा है.

'विकसित भारत संकल्प यात्रा' और 'रथ प्रभारी'

केंद्रीय वित्र मंत्रालय के पत्र में ज़िक्र था ज़िला रथ प्रभारियों की नियुक्ति का

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18 अक्तूबर को वित्त मंत्रालय के एक पत्र में सामने आया कि विभागों से ज़िला रथ प्रभारी के रूप में तैनाती के लिए संयुक्त सचिव, निदेशक और उप सचिव स्तर के अधिकारियों का नामांकन माँगा गया है.

इस पत्र में कहा गया कि 20 नवंबर 2023 से 25 जनवरी 2025 तक ग्राम पंचायत स्तर पर सूचना के प्रसार, जागरूकता और सेवाओं के विस्तार के लिए पूरे देश में विकसित भारत संकल्प यात्रा के माध्यम से भारत सरकार की पिछले 9 वर्षों की उपलब्धियों का प्रदर्शन और उत्सव आयोजित करने का प्रस्ताव है.

इन ज़िला रथ प्रभारियों की तैनाती सभी 765 ज़िलों में की जानी है, जिनमें 2.69 लाख ग्राम पंचायतें कवर हो जाएँगी.

साथ ही पत्र में कहा गया कि रथ यात्रा की तैयारियों, योजना, कार्यान्वयन, निगरानी के लिए समन्वय स्थापित करने के लिए भारत सरकार के संयुक्त सचिवों, निदेशकों, उप सचिवों को रथ प्रभारी (विशेष अधिकारी) के रूप में तैनात करने का निर्णय लिया गया है.

इस चिट्ठी पर कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया एक्स (जो पहले ट्विटर के नाम से जाना जाता था) पर लिखा, "सिविल सर्वेन्ट्स को चुनाव में जाने वाली सरकार के लिए राजनीतिक प्रचार करने का आदेश कैसे दिया जा सकता है?"

पवन खेड़ा के ट्वीट पर वरिष्ठ कांग्रेस नेता और सांसद जयराम रमेश ने लिखा, "यह नरेंद्र का एक और अहंकारोन्मादी आदेश है".

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सरकार ने भी विपक्ष को इस मुद्दे पर आड़े हाथ लिया है.

भारतीय जनता पार्टी की अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक्स पर लिखा, "मुझे यह देखकर हैरानी होती है कि कांग्रेस पार्टी को योजनाओं की पूर्ति सुनिश्चित करने के लिए ज़मीनी स्तर तक पहुँचने वाले लोक सेवकों से दिक़्क़त है. अगर ये शासन का मूल सिद्धांत नहीं है, तो क्या है?"

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नड्डा ने आगे लिखा, "शायद कांग्रेस पार्टी के लिए यह एक अनजान अवधारणा है लेकिन सार्वजनिक सेवा प्रदान करना सरकार का कर्तव्य है. अगर मोदी सरकार सभी योजनाओं की संतृप्ति सुनिश्चित करना चाहती है और सभी लाभार्थियों तक पहुँचना सुनिश्चित करना चाहती है तो ग़रीबों के हित को ध्यान में रखने वाले किसी भी व्यक्ति को समस्या नहीं हो सकती है. लेकिन कांग्रेस की रुचि केवल ग़रीबों को ग़रीबी में रखने में है और इसलिए वे विरोध कर रहे हैं."

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खड़गे का सरकार पर निशाना

'रथ प्रभारी' के लिए सेना के इस्तेमाल पर आक्रामक हो रही कांग्रेस

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कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आक्रामक तेवर अपनाते हुए सोशल मीडिया पर लिखा, "मोदी सरकार के लिए सभी सरकारी एजेंसियाँ, संस्थान, विंग और विभाग अब आधिकारिक तौर पर 'प्रचारक' हैं ! हमारे लोकतंत्र और हमारे संविधान की रक्षा के मद्देनजर यह ज़रूरी है कि उन आदेशों को तुरंत वापस लिया जाना चाहिए जो नौकरशाही और हमारे सशस्त्र बलों के राजनीतिकरण को बढ़ावा देंगे."

खड़गे ने इस विषय पर चिंता जताते हुए प्रधानमंत्री को एक पत्र भी लिखा.

पत्र में उन्होंने कहा कि सरकार की रथ प्रभारी बनाने की योजना केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964 का स्पष्ट उल्लंघन है, जो निर्देश देते हैं कि कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी भी राजनीतिक गतिविधि में भाग नहीं लेगा.

खड़गे ने कहा, "हालाँकि सरकारी अधिकारियों के लिए सूचना का प्रसार करना स्वीकार्य है, लेकिन उपलब्धियों का 'जश्न मनाना' और 'प्रदर्शन' करना उन्हें स्पष्ट रूप से सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक कार्यकर्ताओं में बदल देता है."

कांग्रेस अध्यक्ष ने ये भी कहा कि चूँकि सिर्फ़ पिछले नौ वर्षों की 'उपलब्धियों' की बात की जा रही है तो ये साफ़ है कि ये पाँच राज्यों के चुनाव और 2024 के आम चुनावों पर नज़र रखते हुए एक राजनीतिक फ़ैसला है.

उन्होंने कहा, "अगर विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों को वर्तमान सरकार की मार्केटिंग गतिविधियों के लिए नियुक्त किया जा रहा है तो हमारे देश का शासन अगले छह महीनों के लिए ठप हो जाएगा."

कांग्रेस का आरोप- सेना को अपना 'सैन्य राजदूत' बना रही है सरकार

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खड़गे ने रक्षा मंत्रालय के हाल ही में निकाले गए उस आदेश की भी बात की "जिसमें वार्षिक अवकाश पर गए सैनिकों को सरकारी योजनाओं को बढ़ावा देने में समय बिताने का निर्देश दिया गया है, जिससे वे "सैनिक-राजदूत" बन जाएँगे".

उन्होंने कहा, "सेना प्रशिक्षण कमान को हमारे जवानों को देश की रक्षा के लिए तैयारी करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, वो सरकारी योजनाओं को बढ़ावा देने के तरीक़ों पर स्क्रिप्ट और प्रशिक्षण मैनुअल तैयार करने में व्यस्त हैं."

खड़गे ने कहा, "लोकतंत्र में यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सशस्त्र बलों को राजनीति से दूर रखा जाए."

उन्होंने साथ ही ये भी कहा कि "हर जवान की निष्ठा देश और संविधान के प्रति है."

वे बोले, "हमारे सैनिकों को सरकारी योजनाओं का मार्केटिंग एजेंट बनने के लिए मजबूर करना सशस्त्र बलों के राजनीतिकरण की दिशा में एक ख़तरनाक क़दम है. इसके अलावा हमारे देश के लिए कई महीनों या वर्षों की कठिन सेवा के बाद हमारे जवान अपनी वार्षिक छुट्टी पर अपने परिवारों के साथ समय बिताने और निरंतर सेवा के लिए ऊर्जा बहाल करने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता के पात्र हैं. राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उनकी छुट्टियों पर डाका नहीं डाला जाना चाहिए."

'सरकार को काम करने दीजिए, चुनाव तो जब होंगे तब होंगे'

बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय

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बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने भी इस मामले पर सरकार का पक्ष रखा और विपक्ष के विरोध का जवाब दिया.

मालवीय ने X पर लिखा, "किसने कहा कि भारत सरकार में नौकरशाहों को कार्यान्वित कार्यक्रमों और योजनाओं के बारे में बात करने का अधिकार नहीं है? क्या उन्हें सिर्फ़ दफ़्तरों में बैठना चाहिए और प्रभाव का आकलन करने के लिए ज़मीन पर नहीं होना चाहिए? नौकरशाहों का कर्तव्य है कि वे लोगों की सेवा करें, जैसा निर्वाचित सरकार उचित समझे."

मालवीय के मुताबिक़ "सिर्फ इसलिए कि पाँच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं और आम चुनाव सात महीने दूर हैं, क्या हमें शासन करना छोड़ देना चाहिए? गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में भी, हर साल, चुनाव की परवाह किए बिना, मोदी जी ने सुनिश्चित किया कि उनके नौकरशाह जून-जुलाई के दौरान मैदान में जाएँ, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि स्कूल जाने वाले सभी बच्चों का नामांकन हो. इसने गुजरात में सार्वभौमिक शिक्षा सुनिश्चित की."

मालवीय ने कहा कि इसी तरह पीएम मोदी चाहते हैं कि पीएम आवास योजना (ग्रामीण), राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, पीएम किसान, फसल बीमा योजना, पोषण अभियान, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, जनऔषधि योजना, पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना जैसी कल्याणकारी योजनाएँ अगले छह महीने में पूरी तरह लागू हो जाएँ.

"पूरी सरकार 'विकसित भारत संकल्प यात्रा' नामक एक मेगा संतृप्ति अभियान के तहत 2.7 लाख पंचायतों में फैलेगी, संभावित लाभार्थियों तक पहुंचेगी और उनका नामांकन करेगी. इसलिए सरकार को काम करने दीजिए, चुनाव तो जब होंगे तब होंगे."

'नौकरशाही न्यूट्रल होती है'

अपूर्वानंद
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नौकरशाह राजनीतिक नेतृत्व के प्रतिनिधि नहीं होते हैं. उनका काम नीतियाँ बनाना और उनका क्रियान्वयन करना ज़रूर है पर प्रचार करना नहीं. पिछले 75 वर्षों में ये पहली बार हो रहा है.
अपूर्वानंद
प्रोफ़ेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय

प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग में कार्यरत हैं और एक जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक और स्तंभकार हैं.

वे कहते हैं, "जिसे आप आधुनिक राज्य कहते हैं, उसकी एक ख़ासियत बताई जाती है नौकरशाही. नौकरशाही वो है जो पॉलिटिकल एक्ज़िक्यूटिव से एक दूरी पर रहती है. यानी वो राजनीतिक तौर पर तटस्थ है. तो जहाँ लोकतांत्रतिक स्टेटस है वहां नौकरशाही राज्य का ज़रूरी हिस्सा तो है पर वो पॉलिटिकली न्यूट्रल है."

साथ ही वे यह भी कहते हैं कि भारत में एक ऐसी प्रक्रिया से चुनकर नौकरशाह आते हैं जो ऑब्जेक्टिव है और किसी भी राजनीतिक नेतृत्व से आज़ाद है.

प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद कहते हैं, "वे राजनीतिक नेतृत्व के प्रतिनिधि नहीं होते हैं. उनका काम नीतियाँ बनाना और उनका क्रियान्वयन करना ज़रूर है, लेकिन उनका काम प्रचार करना नहीं है. पिछले 75 वर्षों में ये पहली बार हो रहा है. पहले कभी भी नौकरशाही ने योजनाओं का प्रचार करने का काम नहीं किया."

प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद के मुताबिक़ नौकरशाही का जो पहले से चला आ रहा तरीक़ा था वो टूट गया है.

वे कहते हैं, "अब राजनीतिक वैचारिक नेतृत्व और नौकरशाही के बीच पूर्ण तालमेल है जबकि नौकरशाही को वैचारिक झुकाव से अलग रहना चाहिए."

प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि "अगर नौकरशाही किसी एक विचारधारा का अनुसरण करने लग गई तो वो किसी नई सरकार के आने पर उस सरकार के लिए बाधा बन जाएगी".

वे कहते हैं, "या तो वो उस सरकार को काम नहीं करने देगी या बाधाएं डालेगी या एक अप्रत्यक्ष रूप से तख़्तापलट करेगी. तो ये काफ़ी ख़तरनाक है क्योंकि ये लोकतंत्र और लोकतांत्रिक राज्य का विनाश होने जैसा है."

'ये सेंटर-स्टेट रिलेशन्स का मामला है'

प्रोफ़ेसर आशुतोष कुमार चंडीगढ़ स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान पढ़ाते हैं और राजनीतिक विश्लेषक हैं.

वे कहते हैं, "इस तरह की कोशिश राजीव गाँधी ने भी की थी जब वो पंचायती राज से जुड़ा 64वाँ संविधान संशोधन संसद में लाए थे. उससे पहले उन्होंने ज़िला मजिस्ट्रटों के साथ मीटिंग करनी शुरू की थी. तो विपक्षी राज्य सरकारों को लगा कि उन्हें बाइपास किया जा रहा है. साल 1989 चुनावी साल था और 1988 में राजीव गाँधी ने ये काम शुरू किया था. तो विपक्षी दलों ने इस बात पर काफ़ी हल्ला मचाया और ये संशोधन राज्य सभा में पास नहीं होने दिया."

प्रोफ़ेसर आशुतोष कहते हैं, "मोदी जी के बारे में भी कहा जाता है कि वो सीधे तौर पर आल इंडिया सर्विसेज़ में कार्यरत अधिकारियों से जुड़ने ने कोशिश करते हैं. और अभी केंद्र सरकार ये दिखाने की कोशिश कर रही है कि ऑल इंडिया सर्विसेज़ के लोग हमारे लोग हैं और वो सेंट्रल सर्विसेज़ रूल्स के तहत काम करते हैं."

वे कहते हैं कि "ये मामला सेंटर-स्टेट रिलेशन्स" यानी केंद्र और राज्यों के बीच के संबंधों से जुड़ा है. उनके मुताबिक़ केंद्र सरकार आईएएस अफ़सरों से सीधा राब्ता बनाने की कोशिश कर रही है.

वे कहते हैं, "तो कोशिश ये है कि आप सीधे आल इंडिया सर्विसेज़ की सेवाओं का उपयोग करें और उन्हें यह महसूस कराएं कि वे केंद्र सरकार के नियंत्रण में हैं. लेकिन केंद्र सरकार जो करने जा रही है उस पर राज्यों की सरकारें बहुत हल्ला करेंगी."

'सेना को वैचारिक बनाना बहुत ही ख़तरनाक'

सांकेतिक तस्वीर- सीमा पर मुस्तैद भारतीय सेना के जवान
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प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद के मुताबिक़ सेना को वैचारिक बनाना बहुत ही ख़तरनाक है.

वे कहते हैं, "आर्मी का काम न तो राष्ट्रवाद और न किसी विचारधारा का प्रोपगैंडा करना है. और न ही आर्मी सरकार के बात की प्रचारक होती है. लेकिन हमने पिछले कुछ सालों में देखा है कि जो हमारे आर्म्ड फोर्सेज़ के चीफ़ हैं वो विचारधारा से जुड़े स्टेटमेंट देने लगे हैं. ये भी बहुत ख़तरनाक है."

वे कहते हैं, "अमेरिका मेंं ट्रंप के समय पुलिस चीफ़ ने खड़े होकर बयान दिया था कि वो संविधान से बंधे हुए हैं न कि किसी पद से. तो ये स्वतंत्रता होती है."

प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद के मुताबिक़ भारत की सेना एक प्रोफ़ेशनल सेना के तौर पर मशहूर रही है और भारत की आर्मी पर भारत की जनता यकीन करती है, हर धर्म के लोग यकीन करते हैं कि वो संकट की स्थिति में बिना किसी भेदभाव के खड़ी होगी.

सैनिकों के सरकारी योजनाओं के प्रचार की बात पर प्रोफ़ेसर आशुतोष कुमार कहते हैं, "अगर ऐसा किया जा रहा है तो बहुत ग़लत है. इस तरह की बातें हताशा और सत्ता से बाहर हो जाने का डर दिखाती हैं. INDIA गठबंधन बनने के बाद सरकार की हठ बहुत बढ़ गई है. पता नहीं अभी और क्या क्या किया जाएगा."

मणिपुर में मैतेई असम राइफल के ख़िलाफ़ हैं और कुकी पुलिस के ख़िलाफ़

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अंग्रेज़ी अख़बार डेक्कन हेराल्ड में रक्षा मामलों के जानकार सुशांत सिंह ने लिखा कि कहा ये जा रहा है कि इस कवायद का मक़सद राष्ट्र-निर्माण है लेकिन "सेना मुख्यालय द्वारा उल्लिखित हर एक योजना में मोदी सरकार की विशिष्ट छाप है. अन्यथा, इसमें यूपीए-युग की एनआरईजीएस जैसी या विपक्ष द्वारा संचालित राजस्थान, केरल या पंजाब जैसे राज्यों की योजनाओं को भी सूचीबद्ध किया गया होता."

सुशांत सिंह लिखते हैं कि स्पष्ट रूप से यह एक पूरी तरह से राजनीतिक पहल है जिसमें सेना अपने सैनिकों को मोदी सरकार के राजदूत के रूप में कार्य करने पर सहमत हुई है.

वे कहते हैं, "राजनीतिक मक़सद साफ़ है. 2014 के बाद से मोदी ने जनता के मन में सेना और सैनिकों के साथ अपनी और अपनी पार्टी की पहचान बनाने की पुरज़ोर कोशिश की है."

सुशांत सिंह लिखते हैं कि भारत का लोकतांत्रिक मॉडल जानबूझकर सेना को समाज से अलग रखने पर आधारित है लेकिन ये बात अब ख़त्म हो गई है. "इन सैनिकों को अब भाजपा के लिए अर्ध-राजनीतिक कार्यकर्ताओं, या अधिक सटीक रूप से, मोदी के राजनीतिक राजदूतों में बदल दिया जाएगा."

नौकरशाही के राजनीतिकरण पर बहस

नौकरशाही का राजनीतिकरण एक ऐसा मुद्दा है जो दशकों से चर्चा का विषय रहा है.

पिछले वर्षों में हुए कई चुनावों में ऐसी ख़बरें आम थीं कि रिटायर्ड आईएएस या आईपीएस अधिकारी चुनाव लड़ने की उम्मीद में राजनीतिक दलों के चक्कर काटते दिखे.

हाल ही में ओडिशा कैडर के आईएएस अधिकारी वीके पांडियन सुर्ख़ियों में तब आ गए जब वॉलन्टरी रिटायरमेंट या स्वैच्छिक सेवानिवृति लेने के एक दिन बाद ही उन्हें ओडिशा सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर का दर्जा दे दिया गया. ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि पांडियन ओडिशा के मुख्यमंत्री के क़रीबी रहे हैं और आने वाले समय में उन्हें और बड़ी ज़िम्मेदारियां दी जा सकती हैं.

ऐसे राजनेताओं की एक लम्बी फ़ेहरिस्त है जो पहले नौकरशाह थे और बाद में राजनीति में आ गए. इनमें से कुछ जाने-माने नाम हैं यशवंत सिन्हा, नटवर सिंह, डॉ एस जयशंकर, हरदीप सिंह पुरी, अजीत जोगी, मणिशंकर अय्यर, मीरा कुमार और अरविंद केजरीवाल.

बहस का विषय ये भी रहा है कि क्या नौकरी करते वक़्त नौकरशाह राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े होते हैं.

सेवानिवृत होने के बाद जब कोई ब्यूरोक्रेट किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाता है तो ये इल्ज़ाम भी लगते हैं कि क्या वो ब्यूरोक्रेट सेवा में रहते वक़्त उसी राजनीतिक दल के हितों की रक्षा करता था?

प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि हर किसी की राजनीतिक राय हो सकती है और राजनीतिक राय होगी तभी तो कोई वोट देगा.

वे कहते हैं, "नौकरशाह भी वोट देते हैं और ज़रूरी नहीं है कि सत्तारूढ़ पार्टी को ही दें. यही तो ख़ास बात है कि जो भी उसकी अपनी राजनीतिक राय है वो इस बात के आड़े नहीं आनी चाहिए कि वो सरकार के लिए काम कर रहा है. अगर आपने उसे प्रॉपगैंडिस्ट (प्रचारक) बना दिया तो वो किसी भी और विचारधारा की सरकार के लिए बाधा बन जाएगा."

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