बॉम्बे टॉकीज़: पहली 'ब्लॉकबस्टर' और लैब टेक्नीशियन को स्टार हीरो बनाने वाला 'कॉर्पोरेट फ़िल्म स्टूडियो'

बॉम्बे टॉकीज़

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इमेज कैप्शन, बॉम्बे टॉकीज़ देश का पहला कॉर्पोरेट फिल्म स्टूडियो था. इसके बाक़ायदा शेयर जारी किए गए.
    • Author, यासिर उस्मान
    • पदनाम, फ़िल्म इतिहासकार, बीबीसी हिंदी के लिए

ब्लॉकबस्टर…स्टार…मसाला फ़िल्म…ये सारे शब्द आज फ़िल्मों से जुड़े किसी भी ज़िक्र में आमतौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं. आज कहानी उसी फ़िल्म स्टूडियो की जहां से इनकी शुरुआत हुई. जहां से सही मायने में पहली मसाला ब्लॉकबस्टर हिंदी फ़िल्म और पहले बड़े स्टार निकले.

स्टूडियो जिसका नाम था- बॉम्बे टॉकीज़. वो बॉम्बे टॉकीज़ जिसने 1930 और 1940 के दशक की ना सिर्फ़ कुछ सबसे बड़ी हिंदी फ़िल्मेंबनाई, बल्कि अशोक कुमार, दिलीप कुमार और मधुबाला जैसे स्टार्स के करियर ने भी यहीं से उड़ान भरी.

आने वाले सालों में जिस तरह की कमर्शियल फ़िल्मोंसे हिंदी सिनेमा की पहचान बनी, उन फ़िल्मोंका फ़ॉर्मेट- गाने, ड्रामा, रोमांस, और बड़े संघर्ष, यानी वो फ़ॉर्मूले जो आज तक बॉलीवुड ब्लॉकबस्टर्स का हिस्सा हैं, उनकी बुनियाद भी इसी बॉम्बे टॉकीज़ में रखी गई थी.

एक और ख़ास पहलू जिसकी बात कम होती है वो ये है कि 1934 में शुरू हुआ बॉम्बे टॉकीज़ देश का पहला कॉर्पोरेट फ़िल्मस्टूडियो था. एक बेहद संगठित और आत्मनिर्भर स्टूडियो था जिसमें बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स थे. इस स्टूडियो के बाक़ायदा शेयर जारी किए गए. मुनाफ़ा हुआ तो डिविडेंड और बोनस तक दिए गए. यह स्टूडियो स्टॉक एक्सचेंज में भी लिस्टेड था.

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क्या है कहानी बॉम्बे टॉकीज़ की?

बॉम्बे टॉकीज़ जिस इंसान के ख़्वाबों की ताबीर था उनका नाम है हिमांशु राय. राय एक अमीर बंगाली परिवार में पैदा हुए थे. ऐसा परिवार जिसके पास उस दौर में एक निजी थिएटर भी हुआ करता था. कहानी शुरू होती है लंदन से.

कलकत्ता से कानून की डिग्री हासिल करने के बाद बैरिस्टर बनने के लिए हिमांशु राय लंदन पहुंचे थे लेकिन उन्हें यहां थिएटर का शौक़ लग गया. वो नाटकों में अभिनय करने लगे और लंदन के मशहूर वेस्टएंड में भी काम किया. यहां उनकी मुलाक़ात नाटककार निरंजन पाल से हुई.

निरंजन मशहूर स्वतंत्रता सेनानी बिपिन चंद्र पाल के बेटे थे और लंदन में थिएटर की दुनिया में अच्छा नाम कमा रहे थे. ख़ैर निरंजन पाल ने अपने नाटक 'द गॉडेस' का हीरो हिमांशु राय को बना दिया.

इसके बाद 1922 में हिमांशु ने पढ़ाई छोड़ दी और बैरिस्टर बनने के बजाय एक थियेटर ग्रुप बना लिया. इसका नाम 'द इंडियन प्लेयर्स' रखा और ब्रिटेन में अलग अलग जगह शो किए.

हिमांशु राय का पर्दे पर आना

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इमेज कैप्शन, गौतम बुद्ध की कहानी पर आधारित मूक फ़िल्म 'द लाइट ऑफ़ एशिया '
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कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

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समाप्त

हिमांशु राय फ़िल्में बनाना चाहते थे. उस समय की यूरोपीय फ़िल्मों में उपनिवेशी मानसिकता के तहत भारतीयों को एक अजीब स्टीरियोटाइप के रूप में दिखाया जाता था.

हिमांशु राय चाहते थे कि वो भारतीय समाज की असलियत को दिखाने वाली एक नई सिनेमाई भाषा रचें जो पूरी तरह से भारतीय हो मगर उसमें आधुनिकता की छाप हो और तकनीकी तौर पर यूरोपीय फ़िल्मों के साथ खड़ी हो सकें.

इसी इरादे के साथ उन्होंने मूक फ़िल्म 'द लाइट ऑफ एशिया' (हिंदी नाम 'प्रेम संन्यास') बनाने का फ़ैसला किया जो गौतम बुद्ध की कहानी पर आधारित थी.

इसकी स्क्रिप्ट निरंजन पाल ने लिखी थी. 1924 में वो पाल के साथ जर्मनी के म्यूनिख गए, जहां उन्होंने एमेल्का स्टूडियोज़ को साथ में फ़िल्म को-प्रोड्यूस करने के लिए मना लिया.

तय हुआ कि टेक्निकल क्रू और उपकरण एमेल्का के होंगे जबकि बजट, भारतीय कलाकारों और लोकेशन का इंतज़ाम हिमांशु राय को करना होगा.

हिमांशु और निरंजन ने कुछ ही महीनों में बंबई से पैसे जुटा लिए. गौतम बुद्ध की भूमिका ख़ुद हिमांशु राय ने निभाई और जर्मन फ़िल्मकार फ्रैंज़ ऑस्टेन के साथ फ़िल्म का सह-निर्देशन भी संभाला.

जब राजाओं ने दिए अपने हाथी-घोड़े और क़िले

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इमेज कैप्शन, ताजमहल पर आधारित प्रेम कहानी 'शीराज़'

1925 में रिलीज़ हुई ये पहली भारतीय फ़िल्म थी जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिलीज़ किया गया. इसने पहली बार गौतम बुद्ध की कहानी को पश्चिमी दर्शकों तक पहुंचाया- वे दर्शक जिन्हें राय प्रभावित करना चाहते थे.

इसके बाद, राय ने जर्मनी के मशहूर यूएफए स्टूडियो के साथ मिलकर ताजमहल पर आधारित प्रेम कहानी 'शीराज़' (1928), और महाभारत के एक प्रसंग पर 'ए थ्रो ऑफ डाइस' (1929) फ़िल्में बनाईं.

तीनों फ़िल्मों का निर्देशन जर्मन डायरेक्टर फ्रैंज़ ऑस्टेन ने संभाला और हीरो हिमांशु राय ही थे. इन फ़िल्मों की ज्यादातर आउटडोर शूटिंग भारत में ही हुई. राय के अनुरोध पर कई राजाओं ने अपने महल, क़िले, हाथी-घोड़े यहां तक कि जनता को भी बतौर एक्स्ट्रा शूटिंग के लिए उपलब्ध कराया.

बयान ग्राफ़िक्स में

इस अनोखी शूटिंग को याद करते हुए निर्देशक फ्रैंज़ ऑस्टेन ने अपनी डायरी में लिखा, "पुजारियों और भिखारियों की भूमिका वे लोग निभाते थे जो वास्तविक जीवन में यही काम करते थे. अगले दिन मुझे एक ऐसे आदमी की ज़रूरत थी जिसकी फ़िल्म में मौत होती है. मेरा असिस्टेंट डायरेक्टर एक ऐसे आदमी को ले आया जो बेहद मुश्किल से सांस ले पा रहा था. मैं बुरी तरह घबरा गया लेकिन वो आदमी ख़ुद बोला कि वो कल तक हर हाल में मर जाएगा और फिर शूटिंग बिल्कुल असली लगेगी. वो व्यक्ति उस सीन की शूटिंग के दो दिन बाद मर गया."

शूटिंग के बाद फ़िल्मों के नेगेटिव जर्मनी ले जाकर प्रोसेस और एडिट किए गए. भारतीय संस्कृति को विदेशी नज़र से दिखाने वाली ये फ़िल्में ब्रिटेन और जर्मनी में तो चर्चित रहीं लेकिन भारत में नहीं चलीं जिससे राय को निराशा हुई.

हालांकि तीसरी फ़िल्म 'ए थ्रो ऑफ डाइस' (हिंदी नाम 'प्रपंच पाश') के निर्माण के दौरान अहम घटनाएं घटीं जिससे राय की ज़िंदगी और करियर का रुख़ बदल गया.

मलाड में बॉम्बे टॉकीज़ की इमारत अब जर्जर ख़स्ताहाल में

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इमेज कैप्शन, मलाड में बॉम्बे टॉकीज़ की इमारत अब जर्जर ख़स्ता हालत में है

देविका रानी से मुलाक़ात

लंदन के एक आर्ट स्टूडियो में काम कर रहीं फ़ैब्रिक डिज़ाइनर देविका रानी से हिमांशु राय की मुलाकात हुई. पश्चिमी शैली में ढलीं देविका रवीन्द्रनाथ टैगोर के परिवार से ताल्लुक रखती थीं लेकिन नौ साल की उम्र से ही इंग्लैंड में रह रही थीं.

बिंदास, बेबाक़ और ग्लैमरस देविका पहली नज़र में ही हिमांशु को पसंद आयीं और हिमांशु ने उन्हें 'ए थ्रो ऑफ डाइस' के सेट डिपार्टमेंट में काम करने के लिए बुला लिया.

हिमांशु पहले से शादीशुदा थे और मैरी हैनलिन नाम की उनकी जर्मन पत्नी थीं जो एक अभिनेत्री और डांसर थीं लेकिन इसी फ़िल्म में काम करते हुए हिमांशु और देविका में प्यार हुआ और 1929 में दोनों ने शादी कर ली.

देविका उम्र में हिमांशु से करीब 15 साल छोटी थीं. इसी फ़िल्म के निर्माण के दौरान हिमांशु के निजी जीवन के साथ-साथ फ़िल्मों की दुनिया में भी एक बड़ी घटना घट चुकी थी. हॉलीवुड में दुनिया की पहली बोलने वाली फिल्म 'द जैज़ सिंगर' रिलीज़ हो गयी थी.

'कर्मा' और किसिंग सीन

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इमेज कैप्शन, 1934 को 'कर्मा' बंबई में रिलीज़ हुई और फ्लॉप हो गई.

दौर बोलने वाली फ़िल्मों का आ चुका था. हिमांशु राय ने अपनी अगली फ़िल्म 'कर्मा' को दो भाषाओं (हिंदी और अंग्रेज़ी) में बनाने का फ़ैसला किया. यूरोप में नाम कमा चुके राय की फ़िल्मों को अब तक भारत में कामयाबी नहीं मिली थी.

कर्मा के ज़रिए बॉम्बे फ़िल्म इंडस्ट्री को ये बताना चाहते थे कि वो भारतीय कहानी पर बनी फ़िल्म भी हॉलीवुड के स्तर की हो सकती है.

'कर्मा' में बतौर हीरोइन ग्लैमरस देविका रानी को लिया गया हालांकि देविका की ये पहली फ़िल्म, बतौर हीरो हिमांशु राय की आख़िरी फ़िल्म साबित हुई.

इस फ़िल्म में दोनों पड़ोसी राज्यों के शासकों के रोल में थे जिन्हें एक-दूसरे से प्यार हो जाता है. फ़िल्म में दोनों का बेहद चर्चित और अब सिनेमाई इतिहास में दर्ज हो चुका किसिंग सीन भी था.

इस 'किस' सीन को अक्सर हिंदी फ़िल्मों का पहला 'लिप लॉक' और हिंदी फ़िल्मों का 'सबसे लंबा किस सीन' बताया जाता है मगर ये दोनों ही बातें ग़लत हैं. उस दौर में भारत पर अंग्रेज़ों का शासन था और उस दौर की कुछ और फ़िल्मों में भी किस सीन थे.

कर्मा की ज्यादातर शूटिंग भारत में हुई मगर इसे पूरा होने में दो साल से ज्यादा का वक्त लग गया. वजह थी इसके निर्माण के दौरान आया ग्रेट डिप्रेशन जिसके कारण दुनिया भर में आर्थिक संकट आ चुका था.

आख़िरकार, मई 1933 में अंग्रेज़ी में फ़िल्म कर्मा का प्रीमियर लंदन में हुआ. फ़िल्म ज़्यादा चली तो नहीं मगर देविका रानी की खूबसूरती और उनके अंग्रेज़ी उच्चारण की ख़ूब तारीफ़ हुई.

फिर इसी साल नाज़ी पार्टी के सत्ता में आने के बाद हिमांशु राय के जर्मनी में बने फ़िल्मी नेटवर्क पर असर पड़ा. उन्होंने फैसला कर लिया कि अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म निर्माण के बजाय अब भारत की घरेलू फ़िल्म मार्केट पर ध्यान केंद्रित करेंगे.

1933 के अंत में, हिमांशु राय और देविका रानी भारत लौटे. अपने साथ वो फ़िल्म 'कर्मा' का हिंदी वर्ज़न भी लेकर आए. 27 जनवरी 1934 को 'कर्मा' बंबई में रिलीज़ हुई और फ्लॉप हो गई.

हॉलीवुड स्टाइल के 'बॉम्बे टॉकीज़' की नींव

बॉम्बे टॉकीज लिमिटेड

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इमेज कैप्शन, बॉम्बे टॉकीज़ लिमिटेड में बंबई के बड़े बिज़नेसमैन राजनारायण दूबे ने पैसा लगाया.

अब तक पुणे में प्रभात फ़िल्म कंपनी और कोलकाता में न्यू थिएटर्स जैसे स्टूडियो शुरू हो चुके थे. राय का सपना था कि वो बंबई में हॉलीवुड जैसा बड़ा स्टूडियो बनाएं, जो फ़िल्म उद्योग के असली केंद्र बन सकें.

फ़िल्मों की फंडिंग की समस्या हमेशा रहती थी. ज़्यादातर पैसे पारंपरिक साहूकारों से लिए जाते थे, जिनकी शर्तें कड़ी होती थीं और वो फ़िल्म व्यवसाय को समझते भी नहीं थे.

राय का मानना था कि फ़िल्म निर्माण को एक संगठित और पेशेवर रूप दिया जाए, जिससे पैसा जुटाने के लिए ज़्यादा भरोसेमंद और औपचारिक तरीकों का इस्तेमाल हो.

बात सिर्फ पैसों की नहीं थी- वो फ़िल्म उद्योग को क्रिएटिव बिज़नेस के रूप में समाज में एक सम्मानजनक दर्जा दिलाना चाहते थे.

इसी जुनून के साथ स्टूडियो के लिए ज़मीन देखने का सिलसिला शुरू हुआ. उनकी तलाश ख़त्म हुई बंबई के बाहरी इलाके मलाड में. बंबई के बड़े बिज़नेसमैन राजनारायण दूबे ने पैसा लगाया.

साउंडप्रूफ शूटिंग फ्लोर, एडिटिंग रूम्स और प्रिव्यू थिएटर मॉडर्न स्टूडियो वाला स्टूडियो बनकर तैयार हुआ जिसे नाम दिया गया- बॉम्बे टॉकीज़ लिमिटेड.

निरंजन पाल भी फाउंडिंग टीम का अहम हिस्सा थे.

देश का सबसे आधुनिक फ़िल्म स्टूडियो बनाने के सपने पर काम करते हुए, बॉम्बे टॉकीज़ ने जर्मनी से आधुनिक उपकरण ख़रीदे और जर्मन और ब्रिटिश प्रोफेशनल्स को अपने साथ जोड़ लिया जिनमें सिनेमैटोग्राफर जोसेफ वीर्शिंग, आर्ट डायरेक्टर कार्ल वॉन स्प्रेट्टी और निर्देशक फ्रैंज़ ऑस्टेन शामिल थे.

हॉलीवुड की तर्ज़ पर हिमांशु और देविका क्रिएटिव काम पर ध्यान देते थे जबकि फाइनेंस और बिज़नेस को देखने के लिए अलग टीम थी जिसकी ज़िम्मेदारी राजनारायण दूबे की थी.

तय किया गया कि बॉम्बे टॉकीज़ की फ़िल्मों में हीरोइन देविका रानी ही होंगी. मगर पहली ही फ़िल्म में स्कैंडल खड़ा हो गया.

'जवानी की हवा'

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इमेज कैप्शन, 'जवानी की हवा' बॉम्बे टॉकीज़ की पहली फ़िल्म थी

बॉम्बे टॉकीज़ की पहली फ़िल्म एक थ्रिलर मर्डर-मिस्ट्री थी, नाम था 'जवानी की हवा'. फ़िल्म के हीरो बेहद हैंडसम नजमुल हसन थे जिन्हें खु़द हिमांशु राय ने ही चुना था.

लेखक भाइचंद पटेल अपनी किताब 'टॉप 20: सुपरस्टार्स ऑफ़ इंडियन सिनेमा' में लिखते हैं, "हसन एक लंबे और आकर्षक व्यक्तित्व वाले नौजवान थे और लखनऊ के नवाबी ख़ानदान से ताल्लुक रखते थे. बॉम्बे टॉकीज़ ने उनके साथ कई फ़िल्मों के लिए क़रार किया था."

जवानी की हवा, 1935 का एक दृश्य

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इमेज कैप्शन, जवानी की हवा, 1935 का एक दृश्य

हिमांशु राय स्टूडियो को स्थापित करने के जुनून में हर समय काम में व्यस्त रहने लगे थे. उधर स्टूडियो में अफ़वाह फैल गयी थी कि उनकी युवा पत्नी देविका का अफे़यर चल रहा है.

भाइचंद पटेल लिखते हैं, "निरंजन पाल का आरोप है कि फ़िल्म जवानी की हवा की शूटिंग के दौरान देविका अपने सह-कलाकार के क़रीब आ गई थीं."

मलाड में बॉम्बे टॉकीज़ की इमारत

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इमेज कैप्शन, मलाड में बॉम्बे टॉकीज़ की इमारत

मुंबई से गायब हुए देविका-नजमुल कलकत्ता में मिले

1935 में रिलीज़ हुई 'जवानी की हवा' और देविका-नजमुल की जोड़ी हिट रही. इसी जोड़ी के साथ अगली फ़िल्म 'जीवन नैया' की शूटिंग भी शुरू कर दी गई.

मगर शूटिंग के दौरान अचानक देविका और नजमुल ग़ायब हो गए. स्कैंडल खड़ा हो गया जब पता चला कि देविका नजमुल हसन के साथ कलकत्ता में हैं.

आख़िरकार दोनों कलकत्ता के ग्रांड होटल में मिले. देविका स्टूडियो की बड़ी हीरोइन थीं. राय के करीबी सहयोगी शशाधर मुखर्जी किसी तरह देविका को मना कर वापस ले आए.

मगर राय और देविका दोनों का रिश्ता इसके बाद पहले जैसा नहीं रहा. नजमुल हसन को नौकरी से निकालकर, उनके साथ शूट की गई रीलों को नष्ट कर दिया गया. 'जीवन नैया' के लिए तलाश शुरू हुई एक नए हीरो की.

'किस्मत' से मिला हिंदी सिनेमा का पहला 'स्टार'

फिल्म

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इमेज कैप्शन, देविका-अशोक की जोड़ी ने साथ में कई फ़िल्में कीं लेकिन 'अछूत कन्या' को उनकी सबसे यादगार फ़िल्म माना जाता है.

बॉम्बे टॉकीज़ के लैब टेक्नीशियन कुमुदलाल कुंजीलाल गांगुली की किस्मत ने अचानक करवट ली जब हिमांशु राय ने उन्हें हीरो बनाने का फ़ैसला किया.

कुमुदलाल कुंजीलाल गांगुली का फ़िल्मी नाम रखा गया अशोक कुमार. ये फ़ैसला कितना ऐतिहासिक था इसका अंदाज़ा आने वाले सालों में हुआ जब अशोक कुमार हिंदी सिनेमा के पहले 'स्टार' बने.

1936 में ही आई 'जीवन नैया' चली लेकिन अगली फ़िल्म 'अछूत कन्या' ने तो कामयाबी के झंडे गाड़ दिए. दलित लड़की और एक ब्राह्मण लड़के की दुखद प्रेम कहानी ने अशोक कुमार को बतौर हीरो स्थापित कर दिया.

देविका-अशोक की जोड़ी ने साथ में कई फ़िल्में कीं लेकिन 'अछूत कन्या' को उनकी सबसे यादगार फ़िल्म माना जाता है.

बॉम्बे टॉकीज़ ने हर साल लगभग तीन फ़िल्में बनाने की प्लानिंग की. करीब 400 लोगों के स्टाफ़ और बेहतरीन तकनीकी उपकरणों के साथ वो साल-दर-साल हिट फ़िल्में बनाते रहे.

दूसरे भारतीय स्टूडियोज़ के मुकाबले उनकी फ़िल्में तकनीकी रूप से बेहतरीन होती थीं. उनमें एक खास चमक होती थी, जो हॉलीवुड के एमजीएम स्टूडियो की फ़िल्मों की याद दिलाती थी.

देविका रानी को स्क्रीन पर कुछ उसी अंदाज़ में पेश किया जाता था जैसे हॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री ग्रेटा गार्बो को किया जाता था.

बॉम्बे टॉकीज़ को लगे बड़े झटके

 देविका रानी

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इमेज कैप्शन, देविका रानी को 'द फर्स्ट लेडी ऑफ़ इंडियन सिनेमा' भी कहा जाता है

1939 में बॉम्बे टॉकीज़ में अचानक झटका लगा. दूसरा विश्व युद्ध शुरू होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने जर्मन तकनीशियनों के साथ साथ जोसेफ विर्शिंग और स्टूडियो के लिए 16 फ़िल्में निर्देशित करने वाले फ्रैंड ऑस्टेन को भी बुला लिया.

कई जर्मन स्टाफ़ को गिरफ़्तार करके अंग्रेज़ों ने उन्हें एक कैंप में क़ैद कर लिया था. जिस स्टूडियो की फ़िल्में बेहतरीन तकनीक के लिए जानी जाती थीं, वो तकनीकी गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हो गई.

नई टीम स्थापित करने और लगातार फ़िल्में बनाने के तनाव के चलते हिमांशु राय को नर्वस ब्रेकडाउन हो गया. 16 मई 1940 को महज़ 48 की उम्र में हिमांशु राय चल बसे.

हिमांशु की मौत ने देविका को हिलाकर रख दिया लेकिन स्टूडियो को संभालना था. बॉम्बे टॉकीज़ की कमान अब 'द फ़र्स्ट लेडी ऑफ़ इंडियन सिनेमा' देविका रानी को दी गई.

हिंदी सिनेमा की ट्रेंडसेटर

भारत की पहली 'ब्लॉकबस्टर' फिल्म 'किस्मत' का पोस्टर

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इमेज कैप्शन, बॉम्बे टॉकीज़ की सबसे बड़ी हिट और भारत की पहली 'ब्लॉकबस्टर' फ़िल्म 'किस्मत' (1943) बनी. इस फ़िल्म ने बॉलीवुड के कई नए ट्रेंड सेट किए.

उस दौर के भारत में एक महिला का फ़िल्म स्टूडियो संभालना एक साहसिक शुरुआत थी. मगर हिमांशु राय के बाद स्टूडियो में दो गुट बन चुके थे और सत्ता संघर्ष शुरू हो गया. देविका ये सब झेलती हुई जी जान से जुटी रही और बसंत और किस्मत जैसी बेहद हिट फ़िल्में प्रोड्यूस कीं.

देविका के दौर में ही बॉम्बे टॉकीज़ की सबसे बड़ी हिट और भारत की पहली 'ब्लॉकबस्टर' फ़िल्म 'किस्मत' (1943) बनी. ज्ञान मुखर्जी निर्देशित यह फ़िल्म कोलकाता के रॉक्सी सिनेमा में तीन साल से ज़्यादा चली थी. इस फ़िल्म ने बॉलीवुड के कई नए ट्रेंड सेट किए.

पहली बार किसी हिंदी फ़िल्म में मुख्य किरदार (अशोक कुमार) को एक चोर और एंटी-हीरो के रूप में दिखाया गया. इसके साथ ही किस्मत उन शुरुआती फ़िल्मों में से थी, जिसमें 'लॉस्ट एंड फाउंड' (बिछड़ना और फिर मिलना) वाली कहानी थी.

जिसमें हीरो बचपन में अपने माता-पिता से बिछड़ जाता है और अंत में उनसे फिर मिल जाता है. इसके बाद में यह फॉर्मूला दशकों तक कई हिंदी फ़िल्मों में अपनाया गया.

फ़िल्म का गीत 'दूर हटो ऐ दुनियावालों हिंदुस्तान हमारा है' आज तक याद किया जाता है.

अशोक कुमार ने देविका रानी के ख़िलाफ़ की बग़ावत

कुमुदलाल कुंजीलाल गांगुली

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इमेज कैप्शन, कुमुदलाल कुंजीलाल गांगुली का फ़िल्मी नाम अशोक कुमार रखा गया.

इसी साल देविका रानी ने अपनी आखिरी फ़िल्म हमारी बात (1943) में अभिनय किया. इसमें नए अभिनेता राज कपूर ने भी एक छोटा सा किरदार निभाया था.

बॉम्बे टॉकीज़ ने सिर्फ अशोक कुमार ही नहीं और बतौर स्टूडियो हेड देविका रानी ने हिंदी सिनेमा को दिलीप कुमार और मधुबाला जैसे बेमिसाल सितारे भी दिए. मगर परेशानियां बढ़ती गईं.

कई मुद्दों को लेकर अशोक कुमार ने ज्ञान मुखर्जी और शशाधर मुखर्जी के साथ मिलकर देविका रानी के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी. फिर बॉम्बे टॉकीज़ को छोड़कर 'फ़िल्मिस्तान' नाम से एक नया स्टूडियो शुरू कर दिया.

देविका इन मुसीबतों से उबर नहीं पाईं. 1945 में देविका रानी ने बॉम्बे टॉकीज़ के अपने शेयर बेच दिए और रूसी पेंटर स्वेतोस्लाव रोएरिख से शादी कर ली. फ़िल्म इंडस्ट्री को अलविदा कह कर वो बंगलौर चली गईं.

देविका रानी को भारत में सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से नावाज़ गया. 9 मार्च 1994 को बंगलौर में उन्होंने अंतिम सांस ली.

बॉम्बे टॉकीज़ का अंत

बादबान बॉम्बे टॉकीज़ की आखिरी फिल्म 'बादबान' का पोस्टर

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इमेज कैप्शन, बॉम्बे टॉकीज़ की आख़िरी फ़िल्म- बादबान

देविका के स्टूडियो छोड़ने के बाद में अशोक कुमार और कुछ पुराने लोग बॉम्बे टॉकीज़ लौट आए थे जिसके बाद मजबूर (1948), ज़िद्दी (1948) और महल (1949) जैसी कामयाब फ़िल्में भी बनीं लेकिन स्टूडियो अपनी पुरानी प्रतिष्ठा और गौरव वापस नहीं पा सका.

1954 की फ़िल्म बादबान बॉम्बे टॉकीज़ की आख़िरी फ़िल्म साबित हुई. 2023 में बनी प्राइम वीडियो की कामयाब सीरीज़ 'जुबिली' की कहानी के कई हिस्से बॉम्बे टॉकीज़ के इतिहास से प्रेरित थे.

अपने 20 साल के सफ़र में बॉम्बे टॉकीज़ ने 40 फिल्मों का निर्माण किया और कई बड़े स्टार खड़े किए.

इन सबसे ऊपर जिस तकनीकी कौशल और कहानी कहने की फ़िल्मी शैली की नींव इस स्टूडियो ने रखी, वह आज भी हमारी फ़िल्मों की आत्मा का एक अहम हिस्सा है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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