मधुबाला, जिन्हें देख कर शम्मी कपूर अपने डायलॉग तक भूल जाते

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
मधुबाला एक बहुत अच्छी अभिनेत्री थीं लेकिन उनके अभिनय से कहीं अधिक चर्चा उनकी खूबसूरती की होती रही है.
'फ़िल्म इंडिया' के संपादक बाबूराव पटेल कहा करते थे, "मधुबाला भारतीय फ़िल्म उद्योग की सबसे प्रतिभाशाली, बहमुखी और सबसे सुंदर अभिनेत्री थीं."
उनको भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री की वीनस कहा जाता था. अपने ज़माने की मशहूर अभिनेत्री बेगम पारा कहती थीं, "कभी-कभी मुझे मधुबाला की झलक मिल जाती थी जब वो सुबह वॉक के लिए जाया करती थीं. अगर आपकी नज़र उनके चेहरे पर पड़ जाती थी तो आपका दिन बन जाया करता था."
निरूपा रॉय का मानना था कि सिर से लेकर पैरों के नाख़ून तक उनका शरीर पूरी तरह से परफ़ेक्ट था. उसमें कोई भी दोष नहीं था.

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मीनू मुमताज़ कहती थीं, "उनकी त्वचा इतनी गोरी थी कि अगर वो पान खाती थीं तो आप देख सकते थे कि लाल रंग उनके गले के नीचे जा रहा है."
मधुबाला के साथ 'रेल का डिब्बा' फ़िल्म में काम करने वाले शम्मी कपूर उन्हें देखते ही अपना डायलॉग भूल बैठे थे.
मशहूर पत्रकार बीके करंजिया ने अपनी आत्मकथा 'काउंटिंग माई ब्लेसिंग्स' में लिखा था, "उनके किसी भी फ़ोटो ने उनकी असाधारण सुंदरता के साथ न्याय नहीं किया है."
देवानंद थे मधुबाला की खिलखिलाती हुई हँसी के मुरीद

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लेकिन ऐसा भी नहीं था कि उनमें कोई कमी नहीं थी. ख़तीजा अकबर ने मधुबाला की जीवनी 'द स्टोरी ऑफ़ मधुबाला' में लिखा था, "अपने पिता के प्रति उनकी निष्ठा, सही समय पर सही फ़ैसला न ले पाना और अत्यधिक भावुक प्रवृत्ति ने उनके जीवन को जटिल बना दिया था और जिसके कई बुरे परिणाम उन्हें झेलने पड़े थे."
फ़िल्म पत्रिका 'स्टार एंड स्टाइल' के पूर्व संपादक गुलशन ईविंग कहा करते थे, "उनमें कुटिलता बिल्कुल भी नहीं थी. उनमें एक बच्चे का दिल और सादगी थी."
मशहूर अभिनेता देवानंद को मधुबाला की खिलखिलाती हुई हँसी सबसे ज़्यादा पसंद थी.
उन्होंने अपनी आत्मकथा 'रोमैंसिंग विद लाइफ़' में लिखा था, "उनका चेहरा सुबह की ओस की तरह हमेशा तरोताज़ा रहता था. उनकी शख्सियत की सबसे ख़ास चीज़ थी उनकी मशहूर हँसी. कोई भी मौक़ा मिलते ही वो खिलखिला कर हंसती थीं. किसी को ये अंदाज़ा नहीं रहता था कि वो कब, किस बात पर हँस देंगी और कितनी देर तक हँसेंगीं. कई बार तो वो शॉट के दौरान अचानक हँसने लगती थीं. तब निर्देशक सेट की लाइट बुझा कर चाय का ऑर्डर करते थे और इस बात का इंतज़ार करते थे कि मधुबाला कब अपनी हँसी पर क़ाबू पाएं."
महल फ़िल्म ने दी मधुबाला को राष्ट्रीय पहचान

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मधुबाला का असली नाम मुमताज़ जहाँ बेगम देहलवी था. उनका जन्म 14 फ़रवरी, 1933 को दिल्ली में हुआ था. नौ साल की उम्र में उन्होंने अपना फ़िल्म करियर शुरू किया था और उनकी पहली फ़िल्म थी 'बसंत'.
इस फ़िल्म की शूटिंग के बाद मुमताज़ दिल्ली वापस चली गईं. फिर देविका रानी ने फ़िल्म 'ज्वार-भाटा' में रोल देने के लिए मुमताज़ को दिल्ली से बुलवा भेजा. बाद में मुमताज़ ने ये रोल किया नहीं लेकिन उनके पिता ने मुंबई (तब बंबई) में बसने का फ़ैसला कर लिया.
उन्हीं दिनों मशहूर निर्देशक केदार शर्मा ने एक फ़िल्म शुरू की 'बेचारा भगवान' जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी कमला चैटर्जी को हीरोइन बनाया लेकिन अचानक कमला का निधन हो गया और फ़िल्म रुक गई.
सदमे से उबरने के बाद केदार शर्मा ने ये फ़िल्म बनाने का फ़ैसला किया और बाल कलाकार मुमताज़ को अपने असिस्टेंट राज कपूर के साथ बतौर हीरोइन ले लिया और मुमताज़ का नाम बदलकर मधुबाला रख दिया.
फ़िल्म का नाम भी बदल कर रखा गया 'नीलकमल.' सन 1949 में मधुबाला की फ़िल्म 'महल' ने उन्हें नए-नए आज़ाद हुए मुल्क के नौजवानों के सपनों की मलिका बना दिया.
राजकुमार केसवानी अपनी किताब दास्तान-ए-मुग़ल-ए-आज़म में लिखते हैं, "झूले पर झूलती हुई एक शोख़ हसीना और बार-बार पास आकर भी नज़रों से ओझल होता वो परीनुमा चेहरा. इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर सफलता के झंडे तो गाड़े ही लेकिन उसी के साथ मधुबाला को किसी भी फ़िल्म की सफलता की गारंटी भी बना दिया."
हॉलीवुड में थी रोल मिलने की संभावना

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इस बीच न्यूयॉर्क की 'थिएटर आर्ट्स' पत्रिका ने एक लेख के साथ मधुबाला का चित्र छापा जिसका शीर्षक था, 'दुनिया की सबसे बड़ी स्टार जो कि बेवेरली हिल्स में नहीं रहती है.'
तीन बार के ऑस्कर विजेता फ़्रैंक कापरा एक फ़िल्म समारोह में भाग लेने बंबई आए. 'मूवी टाइम्स' के संपादक बीके करंजिया अपनी पत्रिका का एक अंक लिए कापरा का इंटरव्यू लेने गए.
उस पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर मधुबाला की तस्वीर छपी हुई थी. करंजिया अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, "कापरा ने पत्रिका देखते ही मुझसे पूछा ये लड़की कौन है? क्या ये वाकई इतनी सुंदर है ? क्या मैं इससे मिल सकता हूँ ? मैं उसे हॉलीवुड में रोल दिलवा सकता हूँ."
ताज होटल में मधुबाला के साथ एक मीटिंग तय कराई गई. करंजिया ने बहुत उत्साहित होकर ये बात मधुबाला के पिता अताउल्लाह ख़ाँ को बताई .
करंजिया ने लिखा, "ये कहते हुए उनके पिता ने सारे मामले पर पानी फेर दिया कि मधुबाला को काँटे छुरी से खाना नहीं आता इसलिए वो इस मीटिंग में नहीं जाएंगी. अगर उन्होंने मेरी बात मान ली होती तो मधुबाला को पूरी दुनिया में एक पहचान मिल गई होती."
दिलीप कुमार से इश्क

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दिलीप कुमार और मधुबाला एक दूसरे से प्यार करते थे लेकिन मधुबाला के पिता को दिलीप कुमार की परछाई तक पसंद नहीं थी. उनको उनके नाम तक से परहेज़ था.
बीआर चोपड़ा की फ़िल्म 'नया दौर' में दिलीप कुमार के साथ नायिका की भूमिका के लिए पहले मधुबाला को चुना गया था. बंबई में इस फ़िल्म की शूटिंग की जानी थी लेकिन बाद में निर्माता बीआर चोपड़ा को लगा कि इसकी शूटिंग भोपाल में भी करना ज़रूरी है.
ख़तीजा अकबर लिखती हैं, "मधुबाला के पिता अताउल्लाह ख़ाँ ने अपनी बेटी को बंबई के बाहर शूटिंग करने की इजाज़त देने से इनकार कर दिया. उन्हें लगा कि बंबई से बाहर जाने पर मधुबाला और दिलीप कुमार के बीच प्यार और परवान चढ़ेगा इसलिए वो इसके लिए राज़ी नहीं हुए. तब तक फ़िल्म की दस दिन की शूटिंग हो चुकी थी. इसके बावजूद बीआर चोपड़ा ने मधुबाला की जगह वैजंतीमाला को फ़िल्म में ले लिया."
वहीं से दिलीप कुमार और मधुबाला की जोड़ी अलग हो गई. इस मामले को बीआर चोपड़ा अदालत में ले गए जिससे दिलीप कुमार और मधुबाला के बीच इतनी कड़वाहट आ गई कि दोनों के संबंध ख़राब हो गए.
मनमुटाव के कई कारण

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बीके करंजिया इस संबंध विच्छेद का दूसरा कारण बताते हैं. वो लिखते हैं, "अताउल्लाह ख़ाँ ने ये कहते हुए दिलीप कुमार को मधुबाला से शादी करने की इजाज़त नहीं दी कि पहले वो अपनी बहनों की शादी करें. जब मैंने ख़ाँ साहब से इस अजीब सी शर्त के बारे में पूछा तो उनका जवाब था, 'मैं नहीं चाहता कि मेरी बेटी दिलीप कुमार की बहनों के कपड़े धोए."
दिलीप कुमार अपनी आत्मकथा 'द सब्सटेंस एंड द शैडो' में इस मनमुटाव का एक तीसरा कारण बताते हैं. वो लिखते हैं, "आम धारणा के विपरीत अताउल्लाह ख़ाँ मधुबाला से मेरी शादी के ख़िलाफ़ नहीं थे. उनकी अपनी एक प्रोडक्शन कंपनी थी. वो दो बड़े स्टारों को एक छत के नीचे लाने के विचार से बहुत ख़ुश थे. लेकिन अगर मैंने सारे मामले को अपने दृष्टिकोण से नहीं देखा होता तो वैसा ही हुआ होता जैसा वो चाहते थे."
दिलीप कुमार लिखते हैं, "अताउल्लाह ख़ाँ मधु को ये समझाने में कामयाब हो गए कि मैं उनसे अभद्र व्यवहार कर रहा हूँ. वो अपने पिता के तर्कों से सहमत दिखीं. और उन्होंने मुझे ये समझाने की कोशिश की कि शादी होने के बाद सब चीज़ें सुलझा ली जाएंगी. लेकिन मुझे लग गया कि मैं एक जाल में फंसने जा रहा हूँ और अपने करियर को संवारने में अब तक जो सावधानी मैंने बरती है वो दूसरों की इच्छाओं और रणनीति में दब कर नष्ट हो जाएगी."
दिलीप कुमार ने लिखा कि मधुबाला इस मामले में तटस्थ रहीं और उन्हें उनकी परेशानी का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं रहा, इसी बात पर दिलीप कुमार ने उनसे शादी न करने का फ़ैसला किया.
दिल में छेद होने के बावजूद कड़ी मेहनत

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मधुबाला को बचपन से ही दिल की बीमारी थी. उनके दिल में छेद था. उस समय तक उस बीमारी का कोई इलाज नहीं था. बीमारी के बावजूद उन्होंने मुगल-ए-आज़म फ़िल्म की शूटिंग पूरी की.
उनमें अपने काम के लिए गज़ब का समर्पण था. मुग़ल-ए-आज़म के असिस्टेंट डायरेक्टर सुल्तान अहमद बताते हैं, "आपको याद होगा फ़िल्म का पहला सीन जिसमें मधुबाला को बुत बनाकर खड़ा किया गया था. मधुबाला ज़री के काम से लदे भारी-भरकम कपड़ों के वज़न के साथ वो शॉट ओके होने तक घंटों झुलसा देने वाली गर्मी के बीच बिना किसी शिकायत के खड़ी रहीं. फ़िल्म के आख़िरी सीन में मधुबाला ज़्यादातर लोहे की भारी-भरकम ज़ंजीरों में जकड़ी होती हैं."
राजकुमार केसवानी लिखते हैं, "ज़ंजीरे इस क़दर भारी थीं कि वो जब-जब उन्हें पहन कर खड़े होने की कोशिश करतीं तो घुटनों के बल गिर पड़तीं लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी पूरी ताक़त लगाकर काम को अंजाम दिया. इन ज़ंजीरों का बोझ मधुबाला के वज़न से भी ज़्यादा था, जिन्हें पहन कर चलना बेहद आज़माइश और तकलीफ़ का काम था."
उनका इलाज करने वाले बंबई के चोटी के ह्रदय रोग विशेषज्ञ डाक्टर जाल वकील ने उन्हें आगाह किया था कि वो बहुत ज़्यादा मेहनत वाला काम न करें और फ़िल्म में नाच का सीन तो न ही करें.
ख़तीजा अकबर लिखती हैं, "ये ताज्जुब की बात है कि उनके ऊपर कई प्रतिबंध लगाने वाले उनके पिता अताउल्लाह ख़ाँ ने उनको कम फ़िल्में लेने के लिए बाध्य नहीं किया. उनके काम के बोझ को कम करने की कोशिश नहीं की गई. उन्होंने 'गेटवे ऑफ़ इंडिया' और 'मुग़ल- ए- आज़म' फ़िल्मों की रात में भी शूटिंग की."
किसी भी निर्माता ने मधुबाला के काम के बोझ को कम नहीं किया. नाचना, पानी में भीगना और पैरों में ज़ंजीर पहनकर चलना मधुबाला ने सब कुछ किया. कई बार ऐसा भी हुआ कि वो काम करते करते बेहोश हुईं लेकिन ठीक होते ही उन्होंने फिर काम करना शुरू कर दिया.
किशोर कुमार से 'बेमेल शादी'

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उन्होंने पहले ही एक शादी कर चुके किशोर कुमार से शादी करने का फ़ैसला किया. किशोर इलाज के लिए उन्हें लंदन ले गए. डाक्टरों ने उन्हें भारी और तनाव वाला काम करने से मना किया. उनको बच्चे न पैदा करने की सलाह दी गई.
डॉक्टरों ने उन्हें ठीक हो जाने की कोई उम्मीद नहीं दिखाई. उनको बताया गया कि वो दस साल भी जीवित रह सकती हैं और एक साल में भी उनकी मौत हो सकती है. वो इस अहसास के साथ बंबई लौटीं कि उनके पास बहुत अधिक समय नहीं बचा है.
अपने जीवन के अंतिम नौ साल वो तिल-तिल कर मरती रहीं. मधुबाला की बहन मधुर ने ख़ातिजा अकबर को बताया था, "लंदन से लौटते ही किशोर कुमार उन्हें हमारे घर ले आए. उन्होंने कहा कि वो बहुत व्यस्त हैं और मधुबाला के लिए उनके पास समय नहीं है. मधुबाला को इसका बहुत बुरा लगा. वो गंभीर रूप से बीमार थीं. उनको उस समय अपने पति की ज़रूरत थी. किशोर कुमार ने उनके इलाज का सारा ख़र्चा उठाने की पेशकश की लेकिन क्या ये काफ़ी था?"
किशोर उनसे फ़ोन पर बात करते लेकिन धीरे-धीरे किशोर का उनसे मिलने आना कम होने लगा. ख़तीजा अकबर लिखती हैं, "ये एक बेमेल शादी थी जो जल्दबाजी में की गई थी. इस शादी से उन्हें कभी ख़ुशी नहीं मिली. मधुबाला को किशोर से अत्यधिक प्रेम की दरकार थी जो उन्हें उनसे नहीं मिला."
अंत तक बना रहा सौंदर्य और आकर्षण

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किशोर कुमार की तीसरी पत्नी लीना चंदावरकर का मानना था कि जब मधुबाला को इस बात का अहसास हो गया कि दिलीप कुमार से उनकी शादी नहीं होने वाली तो उन्होंने ये जताने के लिए कि वो किसी से भी शादी कर सकती हैं, उन्होंने एक ऐसे शख़्स से शादी की जिन्हें वो ठीक से जानती भी नहीं थीं.
मधुबाला का किशोर कुमार से शादी करने का जो भी कारण रहा हो, प्यार उसका कारण नहीं था. उनके अंतिम समय मे दिलीप कुमार उनसे मिलने गए. उनका कहना था, बीमारी की हालत में भी वो उतनी ही आकर्षक लग रही थीं.
उनसे मिलने वालों में बीके करंजिया भी थे, उन्होंने लिखा, "उनका चेहरा पीला पड़ा हुआ था. वो कमज़ोर ज़रूर हो गई थीं लेकिन वो तब भी सुंदर लग रही थीं."
अपने 36वें जन्मदिन के नौ दिन बाद 23 फ़रवरी, 1969 को मधुबाला ने मौत के साथ संघर्ष छोड़ दिया और हमेशा के लिए अपनी आँखें मूँद लीं.
दिलीप कुमार उस समय मद्रास में 'गोपी' फ़िल्म की शूटिंग कर रहे थे. जब वो उस शाम बंबई पहुंचे तब उन्हें मधुबाला के निधन की ख़बर दी गई, तब तक उनको दफ़नाया जा चुका था.
दिलीप उन्हें अंतिम विदा देने कब्रिस्तान पहुंचे. फिर वो वहाँ से अपनी संवेदना व्यक्त करने मधुबाला के घर गए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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