बांग्लादेश: शेख़ हसीना के देश छोड़ने की बेटे ने बीबीसी को बताई वजह, आर्मी चीफ़ ने क्या कहा?

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शेख़ हसीना ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया और देश छोड़ दिया है. बताया जा रहा है कि देश छोड़ते वक़्त उनके साथ उनकी बहन शेख़ रेहाना भी थीं.
बीबीसी बांग्ला के मुताबिक़, शेख़ हसीना भारत के शहर अगरतला की ओर एक हेलीकॉप्टर से रवाना हुई हैं.
बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के कार्यक्रम न्यूज़आवर से बातचीत में शेख़ हसीना के पुत्र सजीब वाजिब जॉय ने बताया है कि उनकी माँ रविवार को ही अपना पद त्यागने का मन बना चुकी थीं.
पीएम हसीना के देश छोड़ने के बाद आर्मी चीफ़ जनरल वकार-उज़-ज़मान ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि बांग्लादेश में एक अंतरिम सरकार बनाई जाएगी.
बांग्लादेश में आरक्षण को लेकर चल रहा आंदोलन सोमवार को और व्यापक हो गया.
बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हालात बेकाबू हैं. बीबीसी बांग्ला संवाददाताओं के मुताबिक़, ढाका में बड़े पैमाने पर लूटपाट की घटनाएं हुई हैं.
हजारों प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के आधिकारिक आवास पर धावा बोल दिया.
कई तस्वीरों में दिख रहा है कि लोग आवास में मौजूद सामान को उठा कर ले जा रहे हैं. तस्वीरों में लोग सोफ़े पर बैठे हैं, पेंटिंग उतार रहे हैं और सेल्फ़ी ले रहे हैं.
समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक, हिंसा में अबतक 20 लोगों की मौत हुई है. ढाका के मेडिकल कॉलेज में मौजूद एक पुलिस इंस्पेक्टर बच्चू मिया ने एजेंसी को बताया कि वहां 20 शव आए हैं.
भारत के पूर्वोत्तर के राज्य मेघायल ने बांग्लादेश की सीमा से लगे इलाक़ों में कर्फ़्यू लगा दिया है. आदेश के मुताबिक़, शाम छह बजे से सुबह छह बजे तक कर्फ़्यू रहेगा.


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पीएम आवास समेत सरकारी इमारतों पर हमले
इससे पहले छात्र नेताओं की ओर से किए गए ‘ढाका तक लॉंग मार्च’ के आह्वान पर सोमवार को हज़ारों लोगों ने ढाका के उपनगरीय इलाक़ों की ओर कूच कर दिया.
ढाका के मोहाखाली और मीरपुर इलाक़े में मौजूद बीबीसी बांग्ला के संवाददाताओं के मुताबिक, हज़ारों लोग शाहबाग़ की ओर पैदल और रिक्शा से मार्च कर रहे थे.
मार्च करने वालों में काफ़ी संख्या में महिलाएं थीं.
शाहबाग़ का इलाक़ा आवागमन का एक बड़ा हब है और शहर का केंद्र है, यहां कई पार्क और विश्वविद्यालय हैं.
सेना सड़कों पर तैनात है लेकिन मार्च करने वालों को वो रोक नहीं रही थी और दोपहर बाद से ही सड़कों पर पुलिस की मौजूदगी बहुत कम देखी गई.
ढाका के केंद्रीय इलाक़े में बड़े पैमाने पर आगजनी की घटनाएं हुई हैं. अवामी लीग के दफ़्तर, मुजीब म्यूजियम, पुलिस हेडक्वार्टर की बिल्डिंग को प्रदर्शनकारियों ने आग के हवाले कर दिया. शेख़ हसीना के पिता शेख़ मुजीबुर्रहमान की मूर्ति पर भी तोड़ फोड़ की गई.

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शेख़ हसीना के बेटे ने बीबीसी को क्या बताया?

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शेख़ हसीना के बेटे सजीब वाजिद जॉय ने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के कार्यक्रम न्यूज़आवर को बताया है कि उनकी माँ 'कल यानी रविवार को ही अपना पद छोड़ने का मन बना चुकी थीं.'
उन्होंने बीबीसी के कार्यक्रम न्यूज़आवर को बताया, "उन्होंने पिछले 15 साल में बांग्लादेश का कायापलट किया है. जब वो सत्ता में आई थीं उस समय बांग्लादेश को एक विफल देश माना जाता था. वो एक ग़रीब मुल्क था. लेकिन आज उसे एशिया के उभरते टाइगर के रूप में देखा जाता है."
उन्होंने सरकार पर छात्रों के ख़िलाफ़ दमन के आरोपों को ख़ारिज किया और कहा, "अकेले रविवार को ही 13 पुलिस वालों को भीड़ ने पीट-पीट मार डाला. ऐसे में आप पुलिस से क्या उम्मीद करते हैं?"
सजीब वाजिद जॉय ने कहा कि 'अब उनकी माँ की राजनीतिक वापसी संभव नहीं होगी.'
उन्होंने बीबीसी को बताया, "अब वो 70 के पार हो चुकी हैं. मेहनत के बावजूद थोड़े से लोगों ने उनके ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया. मेरे ख़्याल से अब वो वापसी नहीं करेंगी."
आर्मी चीफ़ ने क्या कहा?
आर्मी चीफ़ जनरल वकार-उज़-ज़मान ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि देश में एक अंतरिम सरकार की स्थापना होगी.
उन्होंने बताया कि इसके लिए उन्होंने अलग अलग पक्षों से बात भी की है.
आर्मी चीफ़ ने देश को संबोधित करते हुए लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है.
सैन्य प्रमुख ने कहा कि बांग्लादेश में आंदोलन में जो लोग मारे गए हैं, उनके लिए इंसाफ़ होगा.
सरकारी आवास पर प्रदर्शनकारियों का धावा

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ऐसे वीडियो फ़ुटेज सामने आ रहे हैं जिसमें दिख रहा है कि प्रदर्शनकारी शेख़ हसीना के आधिकारिक आवास गणभवन में घुसकर लूटपाट कर रहे हैं.
कुछ प्रदर्शनकारी कुर्सियां और सोफ़े ले जाते दिखे.
सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच भिड़ंत में पिछले महीने में लगभग 300 लोग मारे गए थे.
रविवार को दोबारा शुरू हुई हिंसा में कम से कम 90 लोग मारे गए.
बांग्लादेश में जुलाई महीने से ही छात्र आंदोलन कर रहे थे. उनकी मांग थी कि देश में ज़्यादातर बड़े सरकारी नौकरी में मौजूद आरक्षण को ख़त्म किया जाए.
हालाँकि छात्रों के आंदोलन के बाद शेख़ हसीना सरकार ने कुछ कोटे को कम ज़रूर किया, लेकिन लगातार जारी हिंसा के बीच छात्र प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के इस्तीफ़े की मांग पर अड़े हुए थे.
इस आंदोलन पर काबू पाने के लिए पिछले महीने ही सरकार ने सेना को बुलाया था. रविवार से छात्रों ने 'सविनय अवज्ञा' आंदोलन की अपील कर रखी थी.
इसमें लोगों से सरकारी टैक्स न देने की अपील की गई थी.

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यूरोपीय संघ और ब्रिटेन की प्रतिक्रिया
यूरोपीय संघ ने बांग्लादेश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को शांतिपूर्ण तरीक़े से सत्ता सौंपने की अपील की है.
ईयू ने कहा है कि बांग्लादेश में मानवाधिकारों को पूरा सम्मान होना चाहिए.
27 देशों के इस समूह के शीर्ष राजनयिक जोसेफ़ बॉरेल ने कहा है, “बांग्लादेश में हो रही घटना पर यूरोपीय संघ क़रीबी नज़र बनाए हुए है.”
ईयू का कहना है, “यूरोपीय संघ बांग्लादेश में हाल के दिनों में प्रदर्शनों में मारे गए लोगों को लेकर काफ़ी दुखी है. हम सेना प्रमुख की बात पर भरोसा करते है कि बांग्लादेश के हालात से शांतिपूर्वक निपटा जाएगा और ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से जो भी हत्याएँ हुई हैं उनकी निष्पक्ष जाँच की जाएगी.”
वहीं, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर की ओर से कहा गया है कि बांग्लादेश में लोकतंत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जल्द कदम उठाने की ज़रूरत है.
प्रधानमंत्री कार्यालय के आधिकारिक प्रवक्ता ने लंदन में पत्रकारों से बातचीत में कहा है, “हमने हाल के दिनों में बांग्लादेश में जो हिंसा देखी है उससे प्रधानमंत्री काफ़ी दुखी हैं.”
उनका कहा, “मुझे उम्मीद है कि बांग्लादेश में लोकतंत्र को सुनिश्चित करने के लिए तुरंत कदम उठाया गया है, ताकि बांग्लादेश के लोगों की सुरक्षा और देश में शांति बहाल हो सके.”

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बांग्लादेश प्रदर्शन को लेकर भारत क्यों चुप है?
भारत में बीबीसी संवाददाता सौतिक बिस्वास के अनुसार, विशेषज्ञों का कहना है कि बांग्लादेश में बढ़ती हिंसा पर दिल्ली की चुप्पी आश्चर्यजनक नहीं है.
एक तो, भारत आम तौर पर उन देशों में राजनीतिक संकटों या संवेदनशील आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने से बचता है जिनके साथ उसके घनिष्ठ संबंध हैं.
इसके अलावा, बांग्लादेश में अस्थिर समय के दौरान, दिल्ली का लक्ष्य अपने कर्मियों और हितों की रक्षा करना है.
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत विरोधी भावना भड़क सकती है, ख़ासकर सरकारी आलोचकों में जो दिल्ली के साथ ढाका के करीबी संबंधों का विरोध करते हैं.
इस प्रकार, भारतीय अधिकारी ऐसे कामों से बचते हैं जो बांग्लादेश के साथ उनके संबंधों को सामने ला सकते हैं, खासकर जब ढाका में गुस्सा और विरोध बढ़ रहा हो.

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पिछले महीने शुरू हुआ था विरोध प्रदर्शन
1971 में बांग्लादेश की आज़ादी के लिए लड़ने वालों स्वतंत्रता सेनानियों के रिश्तेदारों के लिए कई सिविल सेवा नौकरियों में दिए गए आरक्षण को लेकर पिछले महीने छात्र सड़कों पर उतर आए थे.
हालांकि सरकार ने अधिकांश कोटा वापस ले लिया था, लेकिन छात्रों ने अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखा और हसीना सरकार के इस्तीफडे की मांग पर अड़े रहे.
छात्र मारे गए लोगों और घायलों के लिए इंसाफ़ की मांग कर रहे हैं.
बढ़ते विरोध प्रदर्शनों और हिंसा को समाप्त करने के लिए शेख़ हसीना ने छात्र नेताओं के साथ बिना शर्त बातचीत की पेशकश की थी लेकिन लेकिन छात्र प्रदर्शनकारियों ने उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया और ढाका कूच का आह्वान कर दिया.
विरोध प्रदर्शन के दौरान कई पुलिस स्टेशनों और सरकारी इमारतों में आग लगने के बाद व्यवस्था बहाल करने के लिए पिछले महीने सेना को बुलाया गया था.
पिछले महीने जुलाई में हुई हिंसा में दर्जनों लोग मारे गए थे, जिनमें से कई लोगों की मौत पुलिस की गोली से हुई थी.
पिछले दो सप्ताह में सुरक्षा बलों की बड़ी कार्रवाई में कथित तौर पर लगभग 10,000 लोगों को हिरासत में लिया गया, जिनमें विपक्षी समर्थक और छात्र प्रदर्शनकारी भी शामिल हैं.
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