राजस्थानः अजमेर दरगाह में शिव मंदिर के दावे पर कोर्ट का नोटिस, क्या है पूरा मामला?

अजमेर में ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, अजमेर में ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह
    • Author, मोहर सिंह मीणा
    • पदनाम, जयपुर से बीबीसी हिंदी के लिए

राजस्थान में अजमेर की एक कोर्ट ने हिंदू सेना की उस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है जिसमें दावा किया गया है कि ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह एक शिव मंदिर के ऊपर बनी है.

कोर्ट ने पक्षकारों को नोटिस भी जारी किए हैं.

अजमेर वेस्ट सिविल जज सीनियर डिवीजन मनमोहन चंदेल की कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए 27 नवंबर को अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, दरगाह कमेटी और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को नोटिस जारी किया है.

हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने रिटायर्ड जज हरबिलास सारदा की क़िताब समेत मंदिर होने के तीन आधार बताए हैं और मंदिर में पूजा-पाठ करने की अनुमति देने की मांग की है.

जबकि,अजमेर दरगाह के प्रमुख उत्तराधिकारी और ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के वंशज सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती ने याचिका को 'सस्ती लोकप्रियता पाने का स्टंट' बताया है.

उन्होंने कहा, ''ये लोग समाज और देश को गलत दिशा में ले जा रहे हैं.''

इस मामले में कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 20 दिसंबर की तारीख़ दी है.

बीबीसी
इमेज कैप्शन, बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

क्या हैं वो दावे जिनके आधार पर दायर की गई याचिका?

हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता

इमेज स्रोत, X/VISHNU GUPTA

इमेज कैप्शन, हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता

विष्णु गुप्ता ने दरगाह में मंदिर होने के अपने दावे के पीछे तीन आधार बताए हैं.

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

वो अपने दावे के पहले आधार के बारे में कहते हैं, "अंग्रेजी शासनकाल में अजमेर नगर पालिका के कमिश्नर रहे हरबिलास सारदा ने 1911 में लिखी अपनी किताब में दरगाह के मंदिर पर बने होने का ज़िक्र किया है. हमने उनकी किताब को आधार बनाया है.''

दूसरे दावे के आधार के बारे में उन्होंने कहा, ''हमने अपने स्तर पर शोध किया और किताब की जानकारी के आधार पर दरगाह में जाकर देखा है. दरगाह की संरचना हिंदू मंदिर को तोड़कर बनाई गई है. दरगाह की दीवारों और दरवाजों पर बनी नक्काशी हिंदू मंदिरों की याद दिलाती है.''

अपने दावे के तीसरे आधार के बारे में उन्होंने कहा, ''अजमेर का हर एक शख़्स जानता है और उनके पूर्वज भी बताते रहे हैं कि वहां शिवलिंग होता था. लोगों का कहना है कि यहां हिंदू मंदिर हुआ करता था.''

विष्णु गुप्ता कहते हैं, "दरगाह में असल में संकट मोचन महादेव मंदिर था और हमने मांग की है कि दरगाह का यदि कोई रजिस्ट्रेशन है तो उसे रद्द करते हुए इसे संकट मोचन महादेव मंदिर घोषित किया जाए. हमें वहां पूजा-पाठ करने का अधिकार दिया जाए."

विष्णु गुप्ता ने दावा किया, "दरगाह में बने तहखाने को बंद किया हुआ है. सर्वे होगा तो सारी सच्चाई सामने आ जाएगी."

विष्णु गुप्ता ने साल 2011 में हिंदू सेना की स्थापना की थी. ये संगठन हिंदुत्व के मुद्दे उठाने के लिए चर्चाओं में रहता है.

विष्णु गुप्ता हिंदुओं से जुड़े मामलों पर अपनी टिप्पणियों को लेकर पर पहले भी चर्चा में रहे हैं.

बीते दिनों उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर मुसलमानों से अल्पसंख्यकों का दर्जा वापस लेने की मांग की थी. इससे पहले, साल 2022 में उन्होंने पीएफआई संगठन पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी.

दरगाह कमेटी ने क्या कहा?

सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती

इमेज स्रोत, FACEBOOK

इमेज कैप्शन, सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती का कहना है कि दरगाह का इतिहास साढ़े आठ सौ साल का है.

कोर्ट ने दरगाह कमेटी को भी नोटिस जारी किया है. अजमेर दरगाह में बीते कुछ साल से दरगाह नाजिम की नियुक्ति नहीं हुई है.

इसलिए दरगाह नाजिम का अतिरिक्त चार्ज अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के डिप्टी सेक्रेटरी मोहम्मद नदीम के पास है.

मोहम्मद नदीम बीबीसी से कहते हैं, "अभी हमारे पास कोर्ट का नोटिस नहीं आया है. कोर्ट का नोटिस आने के बाद हम उसे एग्जामिन करेंगे और फिर कानूनी रूप से आगे की कार्रवाई करेंगे."

अजमेर दरगाह के प्रमुख उत्तराधिकारी सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती बीबीसी से फोन पर कहते हैं, "हम अपने वकीलों से राय ले रहे हैं कि हम क्या कर सकते हैं. कानूनी रूप से हम अपना पक्ष रखेंगे."

सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती इसे सस्ती लोकप्रियता पाने का स्टंट बताते हुए कहते हैं, "आय दिन लोग आकर खड़े हो जाते हैं और याचिका लगाते हैं या दावा करते हैं कि किसी मस्जिद या दरगाह में मंदिर है, ये गलत परिपाटी डाली जा रही है."

नसीरुद्दीन कहते हैं, "1911 की जिस किताब के आधार पर ये दावा कर रहे हैं, उस किताब की कोई विश्वसनीयता नहीं है. सौ साल पुरानी किताब की बुनियाद पर साढ़े आठ सौ साल के इतिहास को नहीं झुठलाया जा सकता है."

पुलिस निगरानी बढ़ाई गई

हरबिलास सारदा की किताब में छपी एक तस्वीर

इमेज स्रोत, HARBILAS SARDA

इमेज कैप्शन, हरबिलास सारदा की किताब में दरगाह शरीफ़ की पुरानी तस्वीर

मंदिर पर दरगाह बने होने दावे के बाद से ही ये मामला देश भर में चर्चाओं का केंद्र बना हुआ है.

बीते दिनों देश के कई राज्यों में हुए मंदिर-मस्जिद विवाद के बाद कई घटनाएं और उग्र प्रदर्शन भी सामने आए हैं.

राजस्थान में भी इस याचिका के बाद माहौल में गर्माहट है. इस मामले से शांति व्यवस्था को किसी तरह का नुकसान न पहुंचे, इस पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है.

अजमेर ज़िला पुलिस अधीक्षक (एसपी) वंदिता राणा बीबीसी से कहती हैं, "हम लगातार सभी समाजों से बातचीत कर रहे हैं. मामला कोर्ट में है, तो कोर्ट अपनी प्रक्रिया के तहत निर्णय लेगा. लेकिन, हम ये सुनिश्चित कर रहे हैं कि शांति व्यवस्था न बिगड़े."

प्रदेश के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "आपसी सौहार्द बना रहे और शांति व्यवस्था कायम रहे, इस पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है."

'समाज को एकजुट रहने की ज़रूरत'

सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती मानते हैं कि समाज को एकजुट होने की ज़रूरत है, लेकिन इस तरह की याचिकाओं और दावों से कुछ लोग समाज में अराजकता फैलाने का काम कर रहे हैं.

वो कहते हैं, "ये लोग सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में जो काम कर रहे हैं, उनको नहीं मालूम कि वे देश को कितनी गलत दिशा में ले जा रहे हैं. समाज को एकजुट होने की ज़रूरत है. कब तक ये लोग मंदिर-मस्जिद के विवाद खड़े करते रहेंगे."

नसीरुद्दीन कहते हैं, "ख़्वाजा साहब के दरबार का साढ़े आठ सौ साल का इतिहास है. इन आठ सौ सालों में जयपुर, जोधपुर, कोटा, ग्वालियर समेत सभी राजाओं का दरगाह से लगाव रहा और वे दरगाह से जुड़े रहे. यदि ऐसा होता तो सबसे पहले एतराज वे लोग करते."

केंद्र सरकार से अपील करते हुए सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती कहते हैं, "प्लेसेज ऑफ़ वर्शिप एक्ट 1991 को और मजबूत किया जाए. धार्मिक स्थलों को लेकर 1947 से पहले के जो विवाद चल रहे हैं, उनको अलग रखा जाए. उसमें जो भी कोर्ट के फैसले होंगे, उनका हमेशा की तरह सम्मान होगा. लेकिन ये लोग नए विवाद खड़े न करें."

वो किताब जिसे दावों का आधार बनाया

हरबिलास सारदा की किताब

इमेज स्रोत, HARBILAS SARDA

इमेज कैप्शन, हरबिलास सारदा की किताब को आधार बनाकर मंदिर पर दरगाह के होने का दावा किया गया है.

विष्णु गुप्ता ने अपने दावे के पीछे हरबिलास सारदा की किताब को बड़ा आधार बनाया है.

साल 1911 में हरबिलास सारदा ने अजमेर: हिस्टोरिकल एंड डिस्क्रिप्टिव नाम से एक किताब लिखी थी. 206 पन्नों की इस किताब में कई टॉपिक शामिल हैं.

किताब में दरगाह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का भी एक चैप्टर है, जिसके पेज संख्या 97 के पहले पैराग्राफ में दरगाह में महादेव मंदिर होने का ज़िक्र है.

अंग्रेजी में लिखी इस किताब में हरबिलास सारदा इसके बारे में जो लिखते हैं, उसका हिंदी अनुवाद है,

''परंपरा कहती है कि तहखाने के अंदर एक मंदिर में महादेव की छवि है, जिस पर हर दिन एक ब्राह्मण परिवार द्वारा चंदन रखा जाता था, जिसे अभी भी दरगाह द्वारा घड़ियाली के रूप में रखा जाता है.''

याचिका में इसी को आधार बनाया गया है.

सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती इस किताब की प्रामाणिकता (ऑथेंटिसिटी) पर सवाल खड़े करते हैं.

वो कहते हैं, "जितनी भी ऐतिहासिक किताबें हैं, जिनके लेखक हिंदू और मुस्लिम दोनों रहे हैं, उन्होंने अजमेर दरगाह के बारे में ऐसा कोई ज़िक्र नहीं किया है. दुनिया के हिंदू और मुस्लिम सभी की आस्था का केंद्र अजमेर दरगाह है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)