ज्ञानवापी के बाद अब मध्य प्रदेश में भोजशाला परिसर के एएसआई सर्वे का आदेश, जानिए पूरा विवाद

भोजशाला परिसर

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    • Author, स्नेहा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बनारस में ज्ञानवापी मामले का विवाद थमा भी नहीं है कि अब मध्य प्रदेश में भोजशाला परिसर का विवाद बढ़ता दिख रहा है. उत्तर प्रदेश के मथुरा में भी इस तरह की मांग पहले से ही हो रही है.

इस बीच मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सोमवार को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को निर्देश दिया कि वो धार जिले के भोजशाला परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करे.

इस इमारत के बारे में अदालत में हिंदू पक्ष ने दावा किया है कि ये वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर है जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताते हैं.

ये इमारत एएसआई के नियंत्रण में है.

11 मार्च को हाई कोर्ट की इंदौर पीठ के जस्टिस एस. ए. धर्माधिकारी और जस्टिस देवनारायण मिश्र ने अपने आदेश में कहा, "भोजशाला मंदिर सह-कमाल मौला मस्जिद परिसर का जल्द से जल्द वैज्ञानिक सर्वेक्षण और अध्ययन कराना एएसआई का संवैधानिक और क़ानूनी दायित्व है."

अदालत ने 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' की याचिका पर ये फ़ैसला सुनाया. मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल को होगी.

भोजशाला परिसर

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मध्य प्रदेश में भोजशाला का मामला अक्सर उठता रहा है. साल 2003 में एएसआई ने एक समाधान निकालते हुए यहाँ हिंदुओ को मंगलवार को पूजा, वहीं मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को नमाज़ पढ़ने की इजाज़त दी.

इसके साथ ही ये भी व्यवस्था हुई कि हिंदू बसंत पंचमी के दिन यहाँ पूजा कर सकते हैं.

हिंदू फ़्रंट फ़ॉर जस्टिस ने एएसआई के आदेश को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में दो मई, 2022 को चुनौती दी.

इनका कहना था कि भोजशाला परिसर पर सिर्फ़ हिंदू समुदाय के लोगों को पूजा करने का अधिकार है.

अब सोमवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एएसआई को भोजशाला परिसर का सर्वे कराने का आदेश दिया है.

भोजशाला में 2019 में सरस्वती पूजा

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हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस

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हिंदू फ़्रंट फ़ॉर जस्टिस ने अदालत में अपनी दलील में कहा, "मस्जिद का निर्माण पूर्व में स्थित भोजशाला मंदिर पर 13वीं-14वीं शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल के दौरान 'मंदिर के प्राचीन ढांचों' को गिराकर किया गया."

हिंदू फ़्रंट फॉर जस्टिस के मध्य प्रदेश में उपाध्यक्ष आशीष गोयल ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, "ये हिंदू समाज की बड़ी जीत है. ये हर्ष और उल्लास का अवसर है. मां सरस्वती मंदिर भोजशाला में पूजा का अधिकार बिना किसी शर्त के मिले, इसके लिए हिंदू समाज वर्षों से प्रयासरत है."

"हमने अदालत में एएसआई सर्वे की याचिका डाली थी और माननीय अदालत ने सर्वे के आदेश दे दिए हैं. इससे सच सामने आएगा और प्रमाणिकता के साथ मां सरस्वती मंदिर भोजशाला में पुन: मां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित होगी."

इस मामले के वकील विष्णु शंकर जैन ने फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा कि भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय करने के लिए ये बहुत बड़ा मील का पत्थर है.

उन्होंने कहा, "अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए एएसआई सर्वे का आदेश दे दिया है. इस एएसआई सर्वे में ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार के माध्यम से सर्वे होगा. फ़ोटोग्राफ़ी और वीडियोग्राफ़ी दोनों पक्षों की मौजूदगी में होगी."

विष्णु शंकर जैन वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद में पूजा का अधिकार मांग रहे याचिकाकर्ताओं के भी वकील हैं. ज्ञानवापी मस्जिद में भी एएसआई सर्वे हुआ है.

भोजशाला पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एएसआई सर्वे का दिया आदेश

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मुस्लिम पक्ष का क्या कहना है?

धार के शहर क़ाज़ी (मुस्लिम समुदाय के स्थानीय प्रमुख) वक़ार सादिक़ ने अदालत के इस फ़ैसले पर बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, " हमें न्यायपालिका में पूरा भरोसा है. माननीय अदालत के लिए मेरे मन में सम्मान है लेकिन ये फ़ैसला हमें स्वीकार्य नहीं है."

उन्होंने कहा कि बार-बार इस मामले को उठाकर सांप्रदायिक स्थितियां पैदा करने की कोशिश हो रही है लेकिन मुस्लिम समुदाय ऐसा होने नहीं देगा.

उन्होंने कहा, "इस मामले को अयोध्या का रूप देने की कोशिश हो रही है. क़रीब 800 साल से मुसलमान यहाँ नमाज़ पढ़ रहे हैं. इसका स्वरूप अब बदलने की कोशिश हो रही है. मुझे तो लगता है कि जिन लोगों के हाथों में ताक़त है, वही ये सब चला रहे हैं और हालात बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं."

भोजशाला परिसर

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एएसआई ने भी अदालत में रखा अपना पक्ष

अदालत में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की तरफ़ से पेश होते हुए असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल हिमांशु जोशी ने कहा, "जुलाई 2003 में जो आदेश पारित किया, उसमें तत्कालीन एक्सपर्ट बॉडी के तत्वाधान में साल 1902-03 में तैयार रिपोर्ट पर विचार नहीं किया गया. इस रिपोर्ट में साफ़ तौर पर वाग्देवी की भोजशाला मंदिर की पहले से मौजूदगी के बारे में कहा गया था और गुरुकुल और वैदिक अध्ययन के मंदिर के विषय में भी यही कहा गया था."

उनके अनुसार, "इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया था कि इस मंदिर को इस्लामी आक्रमणकारियों ने ढहा दिया, और बाद में उन्होंने सत्ता संभालने के बाद यहाँ मस्जिद का निर्माण करवा दिया."

इस पर अदालत में मुस्लिम पक्ष के वकील अजय बगाड़िया ने दलील दी कि राज्य सरकार और एएसआई जाहिर तौर पर सरकार के प्रभाव और दबाव में एक ख़ास तरह का पक्ष ले रहे हैं.

उन्होंने कहा कि अब अगला क़दम फ़ैसले की सूक्ष्मता से अध्ययन के बाद ही लिया जाएगा.

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भोजशाला परिसर-1912

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'इसे संशय के बंधनों से मुक्त कराने की ज़रूरत'

उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के जस्टिस एस. ए. धर्माधिकारी और जस्टिस देवनारायण मिश्र ने एएसआई के द्वारा वैज्ञानिक सर्वे का आदेश देते हुए कहा कि इस पूरे स्थल की प्रकृति से रहस्य हटाने और इसे संशय के बंधनों से मुक्त कराने की ज़रूरत है.

अदालत ने कहा, "संक्षेप में कहें तो भोजशाला मंदिर सह कमाल मौला मस्जिद को लेकर जो रहस्य की स्थिति बनी है, उससे विवाद का साया बड़ा हो गया है."

अदालत ने निर्देश दिया है कि एएसआई के निदेशक या अतिरिक्त निदेशक के नेतृत्व में एएसआई की पांच सदस्यों की एक कमिटी बनाई जाए और इसकी रिपोर्ट छह सप्ताह के भीतर दाखिल की जाए.

कोर्ट ने एएसआई को क्या-क्या निर्देश दिये हैं-

  • अदालत ने कहा कि ऐसे प्रयास किए जाएं कि एक्सपर्ट कमिटी में (अगर रैंक और पोजिशन के हिसाब से उपलब्ध हों) दोनों ही समुदाय के अधिकारी हों.
  • दोनों पक्षों के नामित प्रतिनिधियों की मौजूदगी में फ़ोटोग्राफ़ी, वीडियोग्राफ़ी हो
  • एएसआई ने बंद पड़े कमरों, पूरे परिसर के हॉल और सभी कलाकृति, प्रतिमा, ढांचे की सूची बनाने और उसकी वैज्ञानिक जांच करने को कहा है. अदालत ने कहा है कि कार्बन डेटिंग समेत आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल कर विभिन्न ढांचों की उम्र का अंदाजा लगाया जाए.
भोजशाला परिसर

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भोजशाला का इतिहास

मध्य प्रदेश का एक ज़िला है धार. ये राजधानी भोपाल से क़रीब 260 किलोमीटर दूर है. धार को महलों का शहर कहा जाता है. यहां कई पर्यटन स्थल हैं.

धार ज़िले की वेबसाइट पर बताया गया है कि राजा भोज ने धार में एक महाविद्यालय की स्थापना की थी जिसे बाद में भोजशाला के रूप में जाना जाने लगा.

इस पर बताया गया है कि भोजशाला या सरस्वती मंदिर के अवशेष अब भी प्रसिद्ध कमाल मौला मस्जिद में देखे जा सकते हैं, जिसे धार के तत्कालीन मुस्लिम शासकों ने बनवाया था.

मस्जिद में एक बड़ा खुला प्रांगण है, जिसके चारों ओर स्तंभों से सज्जित एक बरामदा एवं पीछे पश्चिम में एक प्रार्थना गृह स्थित है.

परंपरागत ढंग से यहां साल में सिर्फ़ एक बार सरस्वती की पूजा होती रही है और मुसलमान हर शुक्रवार को नमाज़ अदा करते रहे हैं.

लेकिन साल 2003 में हिंदू जागरण मंच ने हिंदुओं के वहां नियमित प्रवेश की मांग को लेकर एक आंदोलन शुरू किया था.

यह आंदोलन हिंसक हो उठा था और सांप्रदायिक तनाव पैदा हो गया था. इसके कारण धार में लगातार कई दिनों तक कर्फ़्यू लगाना पड़ा था. इसके बाद भी कई बार तनाव के कई मामले सामने आए हैं.

भोजशाला मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एएसआई सर्वे का दिया आदेश

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इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यहां कमाल अल दीन का मज़ार है. वो चिश्ती संत हैं और फ़रीद अल-दीन गंज-ए शकर और निज़ामुद्दीन औलिया के अनुयायी थे.

उनका मकबरा इस मस्जिद के पास है 'जिसके बारे में दावा किया जाता है कि इसे मंदिर के हिस्सों से बनाया गया है."

2012 में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में प्रकाशित माइकल विलिस के रिसर्च पेपर के अनुसार, भोजशाला 'हॉल ऑफ़ भोज' शब्द का इस्तेमाल राज भोज से जुड़ा है और इसका हवाला राजा भोज के 'संस्कृत अध्ययन केंद्र' को बताने के लिए किया जाता है. राजा भोज परमार राजवंश के शासक थे.

विलिस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, "20वीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों से कमालुद्दीन चिश्ती की मज़ार के पास स्थित मस्जिद की पहचान भोजशाला के रूप में की गई जिसके बाद से 'ये इमारत धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक तनाव के केंद्र में बदल गया."

धार ज़िले की वेबसाइट के अनुसार, राजा भोज ने धार में एक कॉलेज की स्थापना की थी जिसे बाद में भोजशाला कहा गया.

विलिस के रिसर्च पेपर ' धार, भोज एंड सरस्वती: फ्रॉम इंडोलॉजी टू पॉलिटिकल माइथोलॉजी एंड बैक' में उन्होंने लिखा है कि इस इमारत को बनाने में कई तरह के खंभो का इस्तेमाल किया गया. यहां फ़र्श पर खुदी पट्टियों और दीवारों पर उकेरी चीजें अब भी देखी जा सकती हैं. ये दिखाता है कि इस इमारत के लिए इस्तेमाल की गई सामग्रियां एक बड़े क्षेत्र के पुराने स्थलों से जमा की गई थीं."

इस मस्जिद का हवाला 1822 में अंग्रेजी लेखक जॉन माल्कम और 1844 में विलियम किनकैड के लेखन में भी है. उन्होंने राजा भोज से जुड़ी लोकप्रिय कहानियों का दस्तावेज़ तैयार किया था लेकिन इनके लेखन में भोजशाला का ज़िक्र नहीं है.

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