'बहुमत की सरकार है तो न्यायपालिका पर दबाव बढ़ता है': सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस कौल

- Author, उमंग पोद्दार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा है कि देश में बहुमत की सरकारें न्यायपालिका पर दबाव बनाती हैं, लेकिन ऐसा वर्षों से होता रहा है.
बीबीसी के साथ विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि 1950 के बाद से ऐसा कई बार हुआ है.
उन्होंने इस दौरान 1975 से 1977 के दौर का भी ज़िक्र किया और उस दौरान न्यायपालिका पर सवाल उठाए जाने की भी बात कही.
बोलने की आज़ादी के बारे में भी जस्टिस कौल ने कहा कि ये एक सामाजिक समस्या है. इस इंटरव्यू के दौरान उन्होंने स्वीकार किया कि समाज में इस तरह की दिक़्क़तें बढ़ी हैं.
बीबीसी के साथ इंटरव्यू में उन्होंने जजों की नियुक्ति, समलैंगिक विवाह और अनुच्छेद 370 पर आए फ़ैसलों का भी बचाव किया.
न्यायपालिका तब और अब

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सवाल - क्या आपको लगता है कि पहले न्यायाधीश जिस तरह के फ़ैसले दे सकते थे, या देते थे, आज के दिन भी वैसे ही निर्णय दे सकते हैं या उस पर कुछ असर पड़ा है?
जस्टिस कौल - "देखिए, ये एक प्रोसेस रहा है. अगर आप 1950 से देखेंगे तो ये प्रोसेस रहा है.
साल 1975 से 1977 के दौर में भी एक प्रोसेस रहा है. मैं ये कहूंगा कि हमेशा थोड़ी खींच-तान रहेगी, न्यायपालिका और कार्यपालिका में. वो अच्छा भी है कि थोड़ा सा टर्फ वॉर (खींच-तान) रहे.
न्यायपालिका का काम है, चेक एंड बैलेंस करना. जब हमारे पास इलेक्टोरल सिस्टम ऑफ़ डेमोक्रेसी है. उसमें जब गठबंधन सरकारें होती हैं तो न्यायपालिका का थोड़ा पुश बैक कम हो जाता है.
जब कोई ज़्यादा बहुमत से आए तो उन्हें लगता है कि हमें पब्लिक मैंडेट (जनता का समर्थन) है. तो वो परसीव (ऐसा लगता है) करते हैं कि न्यायपालिका हमारे काम में दखल क्यों दे रही है तो थोड़ा न्यायपालिका की तरफ़ पुशबैक ज़्यादा हो जाता है. ये थोड़ा तो खींच-तान रही है और रहेगी."
न्यायपालिका का काम है, चैक एंड बैलेंस करना. जब हमारे पास इलेक्टोरल सिस्टम ऑफ़ डेमोक्रेसी है. उसमें जब गठबंधन सरकारें होती हैं तो न्यायपालिका पर पुश बैक थोड़ा कम हो जाता है.
सवाल – तो अभी पुश-बैक बढ़ा है?
जस्टिस कौल - "जब मेजोरिटी गवर्नमेंट (बहुमत वाली सरकार) होगी तो हमेशा पुश-बैक (दबाव) थोड़ा सा ज़्यादा होगा."

सवाल - ये पुश-बैक किस तरह बढ़ता है?
जस्टिस कौल - "पुश-बैक इस तरह होता है कि एक लाइन है, उसके एक तरफ़ न्यायपालिका है और दूसरी ओर वो (कार्यपालिका) है.
मेरा मानना है कि जब-जब गठबंधन सरकारें आती हैं तो ये संभव है कि अदालत एक आध क़दम उस लाइन के बाहर भी ले जाए. जब मेजोरिटी गवर्नमेंट (बहुमत वाली सरकारें) आती हैं तो वो (कोर्ट) पीछे आते हैं.
वो लार्जली (मोटे तौर पर) इस बात पर पीछे आते हैं कि मेजोरिटी गवर्नमेंट (बहुमत वाली सरकार) मानती है कि जो वो क़ानून ला रही है वो पब्लिक मैंडेट (जनमत) के साथ ला रही है. इसलिए उस पब्लिक मैंडेट (जनमत) का सम्मान करना चाहिए क्योंकि वो एक लोकतंत्र है.
कोर्ट की इसमें दखलअंदाज़ी कम होनी चाहिए. उसमें जब कोर्ट चैलेंज होता है और उसको हम देखते हैं तो उनको लगता है कि संसद ने तो (क़ानून) पास कर दिया है, हमारा काम है, क़ानून बनाना. आप इस चीज़ में क्यों दखलअंदाज़ी क्यों कर रहे हैं.
लेकिन कोर्ट की भूमिका का फुल एपरीसिएशन (पूरा महत्व) नहीं है. क्योंकि उसका काम ही है कि किस केस में दखलअंदाज़ी करना है, देखने के लिए. थोड़ा बहुत मतभेद रहे तो अच्छा ही है क्योंकि ये सिस्टम की वाइब्रेंसी दिखाता है."

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सवाल - आपको लगता है कि भारत में इस समय फ्री स्पीच (अभिव्यक्ति की आज़ादी) का जो स्टेटस है, आप जबसे जज बने हैं तब से आप इसमें किसी तरह का ट्रेंड देख रहे हैं. आपको लगता है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी कम हुई है?
जस्टिस कौल - मेरा विचार ये है कि जो लिखता है, उसको लिखने दीजिए, जो पेंट कर रहा है, उसे पेंट करने दीजिए. मेरी अपनी सोच रही है कि हिंदुस्तानी सोसाइटी बहुत लिबरल (उदार) रही है. किसी धर्म का कुछ मानना है, किसी दूसरे धर्म का कुछ और मानना है.
अगर इतने डायवर्स देश (विविधताओं से भरे) को एक साथ रखना है और एक साथ रहना है तो एक दूसरे को टॉलरेट (सहना) करना तो सीखना पड़ेगा. मैं एक मज़बूत विश्वास रखता हूँ कि हर आदमी को अपनी ज़िंदगी को अपनी तरह जीने का हक़ है.
मेरा विचार ये है कि जो लिखता है, उसको लिखने दीजिए, जो पेंट कर रहा है, उसे पेंट करने दीजिए.
सवाल – क्या आपको लग रहा है कि अभी इस दौर में इस पर असर पड़ा है, जैसे अगर हम देखें तो इंडिया की प्रेस फ्रीडम इंडेक्स रेटिंग काफ़ी गिर रही है. कितने पत्रकारों के ख़िलाफ़ मामले बढ़ रहे हैं, कुछ लिखने के लिए, कुछ करने के लिए?
जस्टिस कौल - देखिए कहीं न कहीं, कुछ दिक्क़तें सामने आई हैं. लेकिन मैं किसी पीरियड (समय विशेष) पर इसे फ़िक्स नहीं करना चाहूंगा.
मैं इसे एक सामाजिक समस्या के रूप में देखता हूँ. अगर आप समाज को देखिए तो कहीं न कहीं हमारी एक दूसरे के प्रति सहिष्णुता कम हुई है.
और मैं देश की बात नहीं कर रहा हूं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यही समस्या है.
हम मानते हैं कि माई-वे या हाई वे नहीं होना चाहिए. या तो मेरा रास्ता मानो या नहीं...तभी कोई कहता है कि वो भक्त हैं, वो ओपोनेंट हैं.
न्यायपालिका में यौन शोषण के मामले

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सवाल – हाल ही में यूपी में एक सिविल जज थीं, उन्होंने चीफ़ जस्टिस को पत्र लिखा कि उनके जो ज़िला जज हैं, उन्होंने उनके साथ यौन उत्पीड़न किया है. उसके बाद उनकी आईसीसी में शिकायत भी बहुत मुश्किल से दर्ज हो सकी. अब वो कह रही थीं कि उन्हें इथूनेशिया करने की इजाज़त दे दी जाए क्योंकि उनमें अब जीने की कोई इच्छा नहीं रह गई है. तो ऐसे हमने पहले भी देखा कि जो पहले चीफ़ जस्टिस रह चुके हैं, रंजन गोगोई, उनके ख़िलाफ़ भी आरोप आए थे. अब ज़िला न्यायालय में एक जज़ हैं उनके ख़िलाफ़ आरोप लगाए गए हैं. ऐसे में न्यायपालिका के अंदर से जो यौन उत्पीड़न की शिकायतें आती हैं, आपको लगता है कि न्यायपालिका उससे निपटने में पूरी तरह से असमर्थ रही है.
जस्टिस कौल- देखिए, भगवान जज को ऊपर से नहीं टपकाते हैं. वे भी हमारी सोसाइटी का हिस्सा हैं. ऐसे में जज से अपेक्षाएं ज़्यादा होती हैं. लेकिन वो एब्सोल्यूट नहीं हो सकतीं. कुछ मामले होंगे, जिनसे निपटा जा सकता है. अब ये एक ख़ास मामला है, जिसकी जानकारी मुझे नहीं हैं.
लेकिन हर चीज़ में एक आरोप होता है और एक बचाव भी होता है. क्या हम आरोपों को फाइनल मान लें? और दूसरे शख़्स को बर्बाद कर दें? बिना ये जांच किए कि उसने कोई ग़लती की है या नहीं?
मैं इसे एक भावुक प्रतिक्रिया समझूंगा कि मुझे मरने की अनुमति दीजिए. कुछ चिट्ठी लिखी है तो अटेंड हुई है. चीफ़ जस्टिस ने देखा है, उसे अटेंड किया है. ये नहीं है कि नज़रअंदाज़ कर दी गई हो.
कभी-कभी एक पक्ष को लगता है कि मेरे तरीके से नहीं हो रहा है...है तो एड्रेस होगी. और सही ...नहीं है तो ये नहीं हो सकता कि जो नतीजा मुझे चाहिए, वही नतीजा चाहिए. ये किसी भी चीज़ में है.

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सवाल – हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में जातिगत प्रतिनिधित्व को आप कैसे देखते हैं. विधि मंत्रालय के मुताबिक़, 5 सालों में हुईं 659 नियुक्तियों में 75% लोग सामान्य वर्ग के थे. एससी सिर्फ 3.5% और एसटी 1.5% और ये स्थिति सुप्रीम कोर्ट में भी रही है. इसकी क्या वजहें हैं?
जस्टिस कौल - न्यायिक नियुक्तियां तीन चरणों में होती हैं. सब-ऑर्डिनेट जजेज़ की जो नियुक्तियां होती हैं, उनमें आरक्षण होता है. उसे अमल में भी लाया जाता है.
हाई कोर्ट के एक तिहाई जज उसी में से आते हैं. तो वो एक तिहाई का तो प्रतिनिधित्व हो गया.
हम बात कर रहे हैं वो जो बार (वकालत करने वाले वकीलों का संघ) से आते हैं. अब कई बार सामाजिक उत्थान यहां नहीं उतना हुआ है. तो आपको बार में किस एज में देखना है.
आपने देखना है, 45 से 50 साल के उम्र वर्ग की ओर. इसी आठ दस साल के वक़्त में आपको प्रतिनिधित्व देखना होगा.
अगर किसी विशेष समुदाय से वकील देखेंगे, कोई कंशेसन देंगे. चीज़ देखेंगे. लेकिन अगर नहीं है तो जबरदस्ती इस चीज़ को कैसे किया जा सकता है.
महिलाओं की नियुक्तियों की बात करें तो मैं कई बार कहता हूं कि कई पोस्ट्स में महिलाओं की नियुक्तियां 50 फीसद से ज़्यादा हो रही हैं. अब 25 साल पहले महिलाएं नहीं थीं तो आज उन्हें कैसे कंसीडर किया जाएगा.
फिर भी उस पहलू को देखा जाता है. कई बार जब सरकार कि दिलचस्पी होती है तो ऐसा नहीं कि वह कास्ट या कम्यूनिटी नहीं देखती है. ऐसे में प्रतिनिधित्व तो है, लेकिन उचित प्रतिनिधित्व में थोड़ा वक़्त लगता है.

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सवाल - क्या सरकार जजों की नियुक्ति के मामले में कोर्ट के आदेश का पालन नहीं कर रही थी?
जस्टिस कौल - जबसे ये कॉलेजियम सिस्टम आया है तो ये पॉलिटिकल क्लास को लगता था कि नहीं हमारा कुछ रोल होना चाहिए.
एनजेसी को सरकार ने पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया. एक तरफ़ से वो स्वीकार नहीं कर रहे थे एक तरफ़ से कॉलेज़ियम अपनी सिफ़ारिश दे रहा था.

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सवाल - अभी आपका 5 दिसंबर को जजों की नियुक्ति से जुड़ा हुआ, इसकी अंतिम सुनवाई में आपने कहा था कि कुछ चीज़ों को बिन कहे छोड़ देना चाहिए...आपका क्या आशय था?
जस्टिस कौल - ''मैंने डेट दी थी, हालाँकि वो मैटर लगा नहीं. कोर्ट की रजिस्ट्री चीफ जस्टिस के अंडर काम करती है. अगर वो नहीं लगाया तो मैं इस चीज़ में ज़्यादा जाऊंगा नहीं. क्योंकि मैं समझता हूं कि ये उनका अधिकार क्षेत्र है. इसलिए मैंने कहा कि मैं इसमें क्या कह सकता हूं.
चीफ जस्टिस के साथ इस विषय पर चर्चा हुई थी लेकिन मैं इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं करूंगा.
यह इंटरनल सिस्टम है. हाँ मैंने ज़िक्र किया था. इस चीज़ में मैं ज़्यादा कुछ कहना नहीं चाहूँगा. रिटायरमेंट के बाद इस चीज़ पर मैं रोशनी डालना उचित नहीं समझता हूं."
और किस किस की लिस्टिंग किस कोर्ट में होनी चाहिए ये चीफ जस्टिस का प्रेरोगेटिव है. चीफ़ जस्टिस को ट्रस्ट करना होगा इस मामले में.
पहले जिन जजों को इस सिस्टम से दिक़्क़त थी, जब वो चीफ़ जस्टिस बने कोई भी इसका कुछ अच्छा नतीजा नहीं निकाल पाए.
आगे कोई चीफ जस्टिस ये देख सकते हैं कि अगर कुछ बेहतर किया जा सके तो.

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सवाल - एक तरफ़ इलेक्टोरल बॉन्ड जैसे अहम मुद्दे अभी भी अदालत में लंबित हैं, वहीं समलैंगिक विवाह जैसे मुद्दे पर एक साल में फ़ैसला भी आ गया? इसे आप कैसे देखते हैं?
जस्टिस कौल - ''मेरा यह मानना है संवैधानिक मामलों पर जल्दी फ़ैसले होने चाहिए क्योंकि इनसे बड़े मामलों का समाधान होता है. कहीं न कहीं बात वहीं जाकर अटक जाती है कि चीफ जस्टिस लिस्टिंग करते हैं. एक हद तक उसके अधिकार क्षेत्र में आ जाता है.''
सेम सेक्स मैरिज, चीफ जस्टिस के अधिकार क्षेत्र में ये एक सामाजिक मुद्दा था. चीफ जस्टिस के विचार में इसे महत्व देना था. रिजल्ट चाहे कुछ और ही निकला हो.
अनुच्छेद 370 पर कोर्ट का रुख़

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सवाल - अनुच्छेद 370 से जुड़े दो मुद्दे थे - पहला ये कि इसे हटाया जाना क़ानूनी था या नहीं. और दूसरा मुद्दा था कि जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँटा जाना सही था या नहीं. दूसरे मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि चूंकि एक सॉलिसिटर जनरल ने आश्वासन दिया है कि राज्य का दर्जा वापस आ जाएगा तो इस पर हमें कोई टिप्पणी देने की ज़रूरत नहीं है. पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रोहिंटन नरीमन का कहना था कि न फ़ैसला करना भी अपने आप में एक फ़ैसला करना है.
जस्टिस कौल - बयान सिर्फ़ सॉलिसिटर जनरल का नहीं था. ये गृह मंत्री की ओर से संसद में दिए गए बयान पर टिका था. अब कोई चीज़ किसी सिद्धांत पर तय हुई है तो उसमें कुछ नहीं होता है, आगे जाकर तो एक एवेन्यू है, इसमें कोई शक नहीं है.
सवाल - ये जो वापस होने वाला बयान है, इसकी कोई क़ानूनी बाध्यता नहीं है. दूसरे क़ानून के जानकारों का भी मानना था कि कोर्ट को एक फ़ैसला देना चाहिए था.
जस्टिस कौल - क़ानून एक ऐसी चीज़ है, जिसमें विचारों की विविधता रहेगी. इसी वजह से वो लोग क्या ठीक समझते हैं और बेंच क्या ठीक समझती है, इसमें फ़र्क़ आ जाता है. लेकिन जो मुद्दा था उसका समाधान दिया गया है.
वो स्टेटमेंट (गवर्नमेंट के वकील ने) अपने आप नहीं दी थी. उनसे पूछा गया उन्होंने इंस्ट्रक्शन लिए और फिर वापस आए. करें न करें लेकिन ये एक बाध्यकारी बयान है.
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