समलैंगिक विवाह के मामले में मुख्य न्यायाधीश के अल्पमत में होने का मतलब क्या?

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- Author, उमंग पोद्दार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मंगलवार को जब सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक जोड़ों को शादी का अधिकार देने से इनकार कर दिया तो यह एक विरला मौक़ा था जब भारत के मुख्य न्यायाधीश अल्पमत में थे.
संविधान पीठ ऐसे मामलों की सुनवाई करती है जिनका सीधा संबंध उन मामलों से होता है जो संविधान के प्रावधानों से जुड़ी होती है.
संविधान पीठ में कम-से-कम पाँच वरिष्ठ जज होते हैं जिनकी संख्या 13 तक भी हो सकती है लेकिन नियम यह है कि यह संख्या सम न होकर विषम होती है ताकि किसी विषय पर मतभेद होने पर बहुमत से फ़ैसला हो सके.
संविधान पीठ की सुनवाई के दौरान देश का मुख्य न्यायाधीश अल्पमत में हो ऐसा एक प्रतिशत से भी कम मामलों में हुआ है.
समलैंगिक विवाह के फ़ैसले में इस असहमति का मतलब क्या है, ये समझने के लिए बीबीसी ने विशेषज्ञों से बात की.
समलैंगिक विवाह का निर्णय

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समलैंगिकों को विवाह का अधिकार देने की माँग करने वाली कुल 21 याचिकाओं को मिलाकर हुई इस सुनवाई में पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से कहा कि समान लिंग और एलजीबीटी+ वाले जोड़ों के लिए विवाह कोई मौलिक अधिकार नहीं है.
हालाँकि मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने कहा कि समान-लिंग वाले जोड़ों को सिविल पार्टनरशिप का अधिकार है और उन्हें बच्चों को गोद लेने में भी सक्षम होना चाहिए, तीन अन्य न्यायाधीश इससे सहमत नहीं थे.
सीजेआई मास्टर ऑफ रोस्टर

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भारत का मुख्य न्यायाधीश मास्टर ऑफ़ रोस्टर होता है, इसका मतलब है कि उनके पास यह निर्धारित करने का पूरा अधिकार है कि कौन से न्यायाधीश किस विशेष मामले की सुनवाई करेंगे, यह शक्ति निर्विवाद है और इस शक्ति का प्रयोग चीफ़ जस्टिस के विवेक पर निर्भर है.
हाल में आई किताब ‘कोर्ट ऑन ट्रायल’ में लेखकों का कहना है कि मामले का न्याय कौन कर रहा है इसका असर नतीजों पर पड़ सकता है क्योंकि अलग-अलग जजों की न्यायिक सोच अलग-अलग होती है.
शोध से पता चला है कि विशेष रूप से संविधान पीठों में मुख्य न्यायाधीश बेहद सीमित मामलों में अल्पमत में रहे हैं.
2019 तक 1603 मामलों में से मुख्य न्यायाधीश ने केवल 11 संविधान पीठ के मामलों में अल्पमत में रहे है, यानी लगभग 0.7% मामलों में.
1950 से 2009 तक के एक अध्ययन के अनुसार संविधान पीठ के 1532 मामलों में से मुख्य न्यायाधीश केवल 10 में अल्पमत में थे जबकि 2009 तक संविधान पीठों में कुल असहमति दर 15% थी.
यह अध्ययन एक स्वतंत्र शोधकर्ता निक रॉबिन्सन ने किया था.
‘कोर्ट ऑन ट्रायल’ के लेखकों के अनुसार, 2010 से 2015 तक, 39 मामलों में से मुख्य न्यायाधीश कभी भी असहमत या अल्पमत में नहीं थे. 2016 से 2019 के बीच भारतीय वकील श्रुतंजय भारद्वाज के शोध के अनुसार 32 मामलों में मुख्य न्यायाधीश कभी भी असहमत या अल्पमत में नहीं थे.
पिछले साल आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण की संवैधानिकता के फैसले पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित असहमत थे और अल्पमत में थे.
समलैंगिक विवाह का फैसला

विशेषज्ञ समलैंगिक विवाह के फैसले के बारे में क्या सोचते हैं? उनकी अलग-अलग राय है.
बीबीसी से बातचीत में स्वतंत्र शोधकर्ता निक रॉबिन्सन ने कहा, "मुख्य न्यायाधीश के असहमत होने से यह संकेत मिल सकता है कि न्यायालय के अधिकांश न्यायाधीश उनके रुख़ से असहमत हैं, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के लिए यह नई बात नहीं है क्योंकि मुख्य न्यायाधीश बनने से पहले भी उनकी कई मामलों में दूसरे जजों से असहमतियाँ रही थीं जैसे कि आधार कार्ड की संवैधनिकता के मामले में."
न्यायिक असहमति पर लिखने वाली कानूनी शिक्षाविद कृतिका अशोक ने कहा, "जब हम मुख्य न्यायाधीश की असहमति देखते हैं, तो यह स्पष्ट नहीं है कि इसका क्या मतलब होगा, इसका मतलब यह हो सकता है कि सीजेआई ने पीठ पर सर्वसम्मति बनाने की कोशिश नहीं की या फिर बेंच चुनने में उनके आकलन में ग़लती हुई."
नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर सुधीर कृष्णास्वामी का मानना था कि समलैंगिक विवाह के फ़ैसले पर यह असहमति सुप्रीम कोर्ट में "वैचारिक दरार" के संकेत नहीं है.
वे कहते हैं, “यह देखना सुखद है कि सीजेआई मास्टर ऑफ़ रोस्टर हैं, लेकिन वे ऐसी बेंच नहीं बनाते हैं जहां उनका स्वत: बहुमत हो, इसका मतलब यह हो सकता है कि न्यायाधीश अपने विचारों से प्रेरित नहीं हैं और न्याय को लेकर उनका रुख़ स्थिर है. यह भारतीय न्यायपालिका के लिए एक अच्छा संकेत है.”
रॉबिन्सन ने कहा कि भारत में "सर्वोच्च न्यायालय में असहमति के विचारों पर आगे चलकर सहमति बनने" की "लंबी परंपरा" रही है, इसमें वर्षों या दशकों का भी समय लग सकता है.
रॉबिन्सन कहते हैं, "चंद्रचूड़ जैसी असहमति अक्सर भविष्य के सर्वोच्च न्यायालय के लिए वैकल्पिक रास्ते के लिए दृष्टि देने में मदद करती है."
मसलन, 1963 में न्यायमूर्ति सुब्बा राव ने लिखा था कि निजता का अधिकार संविधान के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक अनिवार्य तत्व होगा हालाँकि उस समय वह अल्पमत में थे.
इसके 50 से अधिक वर्षों के बाद 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने निजता को मौलिक अधिकार का दर्जा देते हुए सुप्रीम कोर्ट के नौ न्यायाधीशों की पीठ ने सुब्बा राव के राय पर सहमति व्यक्त की थी.
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