जस्टिस नज़ीर: जजों के पिछले फ़ैसलों और उनके अगले ओहदे को लेकर उठते सवाल

जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर

इमेज स्रोत, SCI.GOV.IN

इमेज कैप्शन, जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर
    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जस्टिस (रिटायर्ड) एस अब्दुल नज़ीर को आंध्र प्रदेश का नया राज्यपाल नियुक्त किया है.

मूल रूप से कर्नाटक के रहने वाले जस्टिस नज़ीर इसी साल 4 जनवरी को अपने पद से रिटायर हुए हैं.

सुप्रीम कोर्ट में जज रहते हुए वो कई अहम फैसले देने वाली खंडपीठों में शामिल रहे. नवंबर 2019 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद पर ऐतिहासिक फैसला देने वाली बेंच में भी जस्टिस नज़ीर शामिल थे.

इसके अलावा सरकार के नोटबंदी के फ़ैसले को सही ठहराने वाली बेंच का भी वो हिस्सा थे. सुप्रीम कोर्ट की जिस बेंच ने तीन तलाक़ को अवैध ठहराया था उसमें भी जस्टिस नज़ीर शामिल थे.

जस्टिस नज़ीर को राज्यपाल बनाए जाने के फ़ैसले पर विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं लेकिन जस्टिस नज़ीर ऐसे पहले जज नहीं हैं जिन्हें रिटायर होने के बाद अहम पद मिला है.

जज पहले भी संभालते रहे हैं पद

जस्टिस सदाशिवम

इमेज स्रोत, Prathyush Thomas/Wikipedia

साल 2014 में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड चीफ़ जस्टिस पी सदाशिवम को केरल का राज्यपाल नियुक्त किया गया था. सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद जस्टिस सदाशिवम अपने गांव लौट गए थे. सुप्रीम कोर्ट में उनका कार्यकाल निर्विवाद रहा और उन्होंने कई अहम फ़ैसले दिए. लेकिन जब उन्हें राज्यपाल बनाया गया था तब न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर सवाल ज़रूर उठे थे.

जस्टिस नज़ीर से पहले सुप्रीम कोर्ट की जज रह चुकीं और साल 1992 में रिटार हुईं जस्टिस फ़ातिमा बीवी को 1997 में तमिलनाडु का राज्यपाल नियुक्त किया गया था. साल 2002 में राज्यपाल के पद से रिटायर होने के कुछ महीने पहले ही उन्हें जयललिता को सरकार बनाने का न्यौता देने से पैदा हुए विवाद के बाद इस्तीफ़ा देना पड़ा था.

उनसे पहले साल 1952 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस फ़ज़ल अली को रिटायर होने के बाद ओडीशा का राज्यपाल नियुक्त किया गया था.

हाल के सालों में भी सुप्रीम कोर्ट के कई जज रिटायरमेंट के बाद अहम पद संभाल चुके हैं.

जब रिटायर होते ही राज्यसभा गए रंजन गोगोई

जस्टिस रंजन गोगोई

इमेज स्रोत, PTI

भारत के 46वें मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई को तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मार्च 2020 में राज्यसभा के लिए नामित किया था.

2019 में अयोध्या विवाद पर फ़ैसला देने वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच की अध्यक्षता रंजन गोगोई ने ही की थी. इसके अलावा उन्होंने रफ़ाल सौदे की समीक्षा और राहुल गांधी के ख़िलाफ़ अदालत की अवमानना के मामलों की भी सुनवाई की.

रफ़ाल सौदे में सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे लेकिन रंजन गोगोई की बेंच ने रफ़ाल सौदे की जांच को लेकर दायर की गई सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया था.

जस्टिस रंजन गोगोई ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 रद्द कर दिए जाने के बाद दायर की गई बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को भी खारिज कर दिया था.

जस्टिस रंजन गोगोई को राज्यसभा भेजे जाने के बाद भी सवाल उठा था कि क्या जज रिटायरमेंट के तुरंत बाद राजनीति में आ सकते हैं.

7 जुलाई 2018 को जस्टिस आदर्श कुमार गोयल को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के कुछ घंटे के भीतर ही नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल का अध्यक्ष बना दिया गया था.

हालांकि उन्हें एक ट्राइब्यूनल का अध्यक्ष बनाया गया था और इसे लेकर कोई विवाद नहीं था लेकिन रिटायर होने के कुछ घंटों के भीतर ही पद दिए जाने को लेकर ज़रूर सवाल उठे थे.

जस्टिस आदर्श कुमार गोयल को एससी/एसटी एक्ट पर दिए विवादित फ़ैसले के लिए याद किया जाता है. इस फ़ैसले के तहत अनुसूचित जातियों और जनजातियों की सुरक्षा के लिए बनाए गए इस क़ानून के कुछ प्रावधानों को कमज़ोर कर दिया गया था.

जस्टिस गोयल से पहले जस्टिस स्वतंत्र कुमार एनजीटी के प्रमुख थे लेकिन उनके रिटायर होने के बाद से आठ महीनों तक एनजीटी प्रमुख का पद खाली था और जस्टिस गोयल को रिटायर होने के तुरंत बाद उन्हें इस पद पर नियुक्त कर दिया गया था.

जज पहले भी भेजे जाते रहे हैं राज्यसभा

भारत के 21वें चीफ़ जस्टिस रंगनाथ मिश्रा को कांग्रेस पार्टी ने साल 1998 में राज्यसभा भेजा था. जस्टिस रंगनाथ मिश्र राज्यसभा जाने वाले सुप्रीम कोर्ट के दूसरे जज थे. उनसे पहले जस्टिस बहारुल इस्लाम राज्यसभा सदस्य रह चुके थे.

हालांकि बहारुल इस्लाम सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट का जज नियुक्त होने से पहले भी 1962 से 1972 के बीच कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा सदस्य रह चुके थे.

जस्टिस बहारुल इस्लाम जनवरी 1983 में सुप्रीम कोर्ट के जज के पद से रिटायर हुए थे और उसी साल जून में कांग्रेस ने उन्हें फिर से राज्यसभा भेज दिया था.

कूलिंग ऑफ़ पीरियड

जस्टिस आरएम लोढ़ा ने कहा तथा कि रिटायर होने के बाद जजों के लिए दो साल का कूलिंग ऑफॉ पीरियड होना चाहिए

इमेज स्रोत, PTI

इमेज कैप्शन, जस्टिस आरएम लोढ़ा ने कहा था कि रिटायर होने के बाद जजों के लिए दो साल का कूलिंग ऑफॉ पीरियड होना चाहिए

रिटायर होने वाले जजों के कूलिंग ऑफ़ पीरियड को लेकर सवाल उठते रहे हैं. जस्टिस आरएम लोढ़ा ने अपने रिटायरमेंट के दिन भाषण में कहा था, "जजों को कोई पद स्वीकार करने के लिए दो साल का कूलिंग ऑफ़ पीरियड होना चाहिए."

हालांकि अक्तूबर 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने जजों के रिटायर होने के बाद पद स्वीकार करने के लिए कूलिंग ऑफ़ पीरियड निर्धारित करने से इनकार कर दिया था.

उस समय जस्टिस पी सदाशिवम के केरल का राज्यपाल पद स्वीकार करने के बाद जजों के पद स्वीकार करने को लेकर बहस छिड़ी थी. इस संबंध में दायर की गई जनहित याचिका को खारिज करते हुए तत्कालीन चीफ़ जस्टिस एचएल दत्ता की बेंच ने कहा था कि अदालत कूलिंग ऑफ़ पीरियड की ऐसी कोई सीमा निर्धारित नहीं कर सकती है.

जनहित याचिका में मांग की गई थी कि किसी रिटायर जज को सरकारी पद पर नियुक्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट से सलाह-मशविरा किया जाना चाहिए.

भारत के संविधान का अनुच्छेद 124(7) सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने वाले जजों को न्यायपालिका के क्षेत्र में कोई पद लेने से रोकता है. सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायर होने के बाद किसी अदालत में वकालत भी नहीं कर सकते हैं.

साल 1958 में अपनी चौदहवीं रिपोर्ट में भारत के विधि आयोग ने जजों के रिटायर होने के बाद सरकारी पद लेने पर रोक की सिफ़ारिश की थी, हालांकि इस सिफ़ारिश को कभी लागू नहीं किया गया.

जस्टिस नज़ीर को राज्यपाल बनाए जाने पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

साल 2013 में जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार की थी तब भाजपा के तत्कालीन दिवंगत नेता अरुण जेटली ने राज्यसभा में दिए एक बयान में कहा था, "ये ख़तरा बड़ा है, रिटायर होने के बाद सरकारी पद पाने की इच्छा रिटायर होने से पहले के जज के फ़ैसलों को प्रभावित करती है, ये न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए ख़तरा है."

एक अन्य बयान में जेटली ने कहा था, "रिटायर होने से पहले दिए जाने वाले फ़ैसले रिटायर होने के बाद मिलने वाले पद के प्रभाव में दिए जाते हैं"

अब कांग्रेस ने दिवंगत अरुण जेटली के इसी बयान का हवाला देते हुए जस्टिस नज़ीर की नियुक्ति पर सवाल उठाए हैं. कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, "ये कोई उत्तर नहीं है कि ये पहले भी हुआ है, जितनी जल्दी से आजकल ऐसा किया जा रहा है वह सौद्धांतिक रूप से गलत है और हम इसका विरोध कर रहे हैं. हम किसी व्यक्ति विशेष का विरोध नहीं कर रहे हैं."

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेता और राज्यसभा सांसद एए रहीम ने जस्टिस नज़ीर को आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बनाए जाने की आलोचना की है. उन्होंने कहा कि यह नियुक्ति संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है.

फेसबुक पोस्ट में उन्होंने लिखा, "उन्हें (नज़ीर को) यह पद लेने से मना कर देना चाहिए. देश को अपनी कानूनी व्यवस्था में विश्वास नहीं खोना चाहिए. मोदी सरकार के ऐसे फैसले भारतीय लोकतंत्र पर धब्बा हैं."

उन्होंने कहा, "वे अयोध्या मामले में फैसला देने वाली पीठ के सदस्य थे. 26 दिसंबर, 2021 को हैदराबाद में अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद की बैठक में भी उन्होंने हिस्सा लिया था, जिसके बाद विवाद हुआ था. यह परिषद संघ परिवार से जुड़ी हुई है."

राज्यपाल बनने पर सवाल क्यों?

सुप्रीम कोर्ट

इमेज स्रोत, Getty Images

ऐसे कई पद हैं जिन पर सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जजों की ही नियुक्ति हो सकती है. नेशनल कंपनी लॉ एपीलेट ट्राइब्यूनल के चेयरपर्सन जस्टिस अशोक भूषण हैं जिनकी नियुक्ति पर कोई विवाद नहीं हुआ था.

लेकिन कई लोगों का मानना है कि गवर्नर राजनीतिक पद है और इस पर पूर्व जज की नियुक्ति से बचा जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता करुणा नंदी कहती हैं, "हमारी अदालतों में सरकार ज्यादातर मामलों में एक पार्टी होती है, ऐसे कई तरीक़े हैं जिनके ज़रिए न्यायपालिका को कार्यपालिका के नियंत्रण से स्वतंत्र रखा जाना चाहिए ताकि दोनों की शक्तियों के बीच में जो विभाजन है वह बना रहे और सरकार और सत्ताधारी दल के पास उन संस्थानों पर प्रभाव दिखाने का मौका न हो जिनका काम सरकार पर निगरानी रखना है."

नंदी कहती हैं, "रिटायरमेंट के बाद, ख़ास तौर पर गवर्नर जैसे पद पर नियुक्तित को लेकर सवाल उठेंगे ही क्योंकि ये एक राजनीतिक पद है."

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े का भी मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जजों की राजनीतिक नियुक्ति से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल तो उठता ही है.

संजय हेगड़े कहते हैं, "हालांकि ये पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट के किसी रिटायर्ड जज को राज्यपाल बनाया गया है. साल 2014 में पी सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बनाया गया था. उनकी नियुक्ति के बाद भी सवाल उठे थे."

2014 में लिखे एक लेख में संजय हेगड़े ने कहा था, "निष्पक्ष न्यायपालिका में जनता का विश्वास स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए अनिवार्य है. कई बार जनता के मन में ये सवाल आ सकता है कि जज रिटायरमेंट के बाद पद के ऑफ़र से प्रभावित हो सकता है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)