समलैंगिक विवाह को सुप्रीम कोर्ट की ना, पांच जजों की बेंच में किसने क्या कहा?

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- Author, सुचित्र मोहंती
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दिए जाने की मांग वाली याचिकाओं पर मंगलवार को फ़ैसला सुना दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि क़ानून समलैंगिक जोड़ों के शादी करने के अधिकार को मान्यता नहीं देता और इसके लिए कानून बनाना संसद का काम है.
भारत के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इस मामले में आदेश सुनाते हुए कहा, "ये अदालत क़ानून नहीं बना सकती लेकिन क़ानून लागू कर सकती है."
भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ केंद्र के इस विचार से सहमत थी कि कानून के साथ छेड़छाड़ करने से अन्य कानूनों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है. पीठ के अन्य सदस्य न्यायमूर्ति एसके कौल, रवीन्द्र भट्ट, हिमा कोहली और पीएस नरसिम्हा थे.
सीजेआई ने कहा कि ये अदालत संसद या राज्यों की विधानसभाओं को शादी की नई संस्था का गठन करने के लिए विवश नहीं कर सकती.
उन्होंने ये भी कहा कि अदालत स्पेशल मैरिज एक्ट को सिर्फ़ इसलिए असंवैधानिक नहीं करार दे सकती क्योंकि ये समलैंगिक शादियों को मान्यता नहीं देता.
सीजेआई ने ये भी कहा कि अदालत विशेष विवाह अधिनियम को दोबारा नहीं ड्राफ़्ट कर सकती और न ही अन्य कानूनी प्रावधानों को बदल सकती है. उन्होंने कहा कि कोई 'न्यायिक कानून' नहीं हो सकता है.
चीफ़ जस्टिस ने ये भी कहा कि अगर शीर्ष न्यायालय विशेष विवाह अधिनियम को खत्म करती है तो इससे देश आज़ादी से पहले के दौर में पहुंच जाएगा. वहीं, अगर अदालत दूसरा रास्ता अपनाती है और इस कानून में कोई शब्द विशेष को जोड़ती है तो ये विधायिका की भूमिका निभाने जैसा हो जाएगा.
सीजेआई चंद्रचूड़ ने और क्या कहा?

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सीजेआई ने कहा कि शादी के अधिकार में संशोधन का अधिकार विधायिका के पास है लेकिन एलजीबीटीक्यू+ लोगों के पास पार्टनर चुनने और साथ रहने का अधिकार है और सरकार को उन्हें दिए जाने वाले अधिकारों की पहचान करनी ही चाहिए, ताकि ये कपल एक साथ बिना परेशानी के रह सकें.
उन्होंने कहा कि साथ रहने के अधिकार में ही अपने पार्टनर को चुनने और उस साथ को मान्यता दिलाने का अधिकार समाहित है. सीजेआई ने कहा, "इस तरह के जोड़ों को मान्यता न देना क्वीयर जोड़ों के साथ भेदभाव करने जैसा होगा."
सीजेआई ने ये भी स्पष्ट कर दिया है कि सॉलिसिटर जनरल ने ये कहा कि केंद्र सरकार एक समिति बनाएगी, जो ये अध्ययन करेगी कि समलैंगिक जोड़ों को कौन-कौन से अधिकार दिए जा सकते हैं.
सीजेआई ने कहा, "जीवनसाथी चुनना अपने जीवन की दिशा चुनने का अभिन्न हिस्सा है. कुछ लोगों के लिए ये उनके जीवन का सबसे बड़ा फ़ैसला है. इस अधिकार की जड़ें संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और आज़ादी के हक तक जाती हैं."
इस दौरान कोर्ट ने ये भी कहा कि अगर दो ट्रांसजेंडर आपस में शादी करना चाहते हैं और वे अपनी पहचान ट्रांस-मेन और ट्रांस-वुमन के तौर बताते हैं तो उनकी शादी विशेष विवाह अधिनियम के तहत पंजीकृत की जा सकती है.
सीजेआई ने ये भी कहा कि अपनी पहचान पुरुष और महिला के तौर पर बताने वाले सारे एलजीबीटीक्यू जोड़े भी शादी कर सकते हैं.
बच्चा गोद लेने को लेकर जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, "ऐसी कोई सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं है जो ये दिखाती या साबित करती हो कि सिर्फ़ विषमलैंगिक जोड़े ही बच्चे को स्थिर जीवन दे सकते हैं."

एलजीबीटीक्यूएआई जोड़ों के बचाव में सीजेआई ने कहा कि इस समुदाय के लोगों को पुलिस थाने बुलाकर उनकी सेक्शुअल आइडेंटिटी के बारे में पूछताछ करके उत्पीड़न नहीं करना चाहिए.
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पुलिस को क्वीयर लोगों पर उन्हें जन्म देने वाले परिवार के पास जाने का दबाव नहीं बनाना चाहिए. साथ ही किसी क्वीयर जोड़े पर उनके रिश्ते को लेकर एफ़आईआर दर्ज करने से पहले पुलिस को शुरुआती जांच कर लेनी चाहिए.
सीजेआई ने कहा कि क्वीयर सहित अविवाहित जोड़े बच्चा गोद ले सकते हैं.
सीजेआई ने कहा कि केंद्र सरकार को कैबिनेट सचिव की अगुवाई में समिति के गठन की प्रक्रिया में आगे बढ़ना चाहिए, ताकि राशन कार्ड, पेंशन, ग्रैच्युटी और उत्तराधिकार सहित समलैंगिक जोड़ों से जुड़े कई चिंताओं पर विचार किया जा सके.

'समलैंगिक रिश्ते नई व्यवस्था नहीं'
न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने कहा कि समलैंगिक रिश्तों को प्राचीन समय से ही मान्यता मिली हुई है. ये रिश्ते न सिर्फ़ यौन गतिविधियों के लिए थे बल्कि भावनाओं की पूर्ति के लिए भी होते थे. उन्होंने अपने आदेश में कुछ सूफ़ी परंपराओं का ज़िक्र किया.
जस्टिस कौल ने कहा कि वो सीजेआई के आदेश से सहमत हैं.
जस्टिस कौल ने ये भी कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट में किसी तरह के जोड़-घटाव का बहुत व्यापक परिणाम देखने को मिल सकता है.
उन्होंने कहा कि गैर-विषमलैंगिक जोड़ों और विषमलैंगिक जोड़ों को एक सिक्के के दो पहलू के तौर पर देखा जाना चाहिए.
जस्टिस कौल ने कहा कि इतिहास में किए गए अन्याय और भेदभाव में सुधार के लिए ये मौका है और सरकार को इस तरह की शादियों और रिश्तों को अधिकार देने चाहिए.

जस्टिस रवींद्र भट्ट ने दिया ये तर्क
न्यायमूर्ति रवींद्र भट्ट ने क्वीयर जोड़ों को बच्चा गोद लेने का अधिकार देने से साफ़ इनकार कर दिया. जस्टिस पीएस नरसिम्हा भी उनसे सहमत थे.
वहीं, जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस कौल इसके पक्ष में थे.
जस्टिस भट्ट ने हालांकि ये ज़रूर कहा कि राज्यों को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि क्वीयर समुदाय के लोगों को उत्पीड़ित न किया जाए.
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार एक उच्च-स्तरीय समिति बनाएगी जो ये देखेगी कि क्वीयर जोड़ों को क्या अधिकार और लाभ दिए जा सकते हैं.
उन्होंने ये भी कहा कि होमोसेक्शुअल रिश्तों में रह रहे ट्रांससेक्शुअल लोगों को शादी का अधिकार है.

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और हिमा कोहली
न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा ने न्यायमूर्ति रवींद्र भट से सहमति दिखाई.
हालांकि, उन्होंने ये कहा कि समलैंगिक जोड़ों को बाहर रखने वाली सरकारी योजनाओं जैसे पेंशन, पीएफ़, ग्रैच्युटी, बीमा इत्यादि के समीक्षा की जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि शादी का अधिकार संवैधानिक हक है या ये रिवाज़ों के हिसाब से चला आ रहा है.
वहीं जस्टिस हिमा कोहली ने भी न्यायमूर्ति रवींद्र भट्ट के रुख से सहमति जताई.
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