केंद्र के फ़ैक्ट चेक नियम पर बॉम्बे हाई कोर्ट में सुनवाई का पूरा मामला क्या है

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    • Author, उमंग पोद्दार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

केंद्र सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने हाल में इंटरमीडियरी गाइडलाइन और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड नियम, 2021 में एक संशोधन की अधिसूचना जारी की थी.

बॉम्बे हाई कोर्ट में इस संशोधन की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है और अदालत में इस मामले पर सुनवाई चल रही है. अंतिम फ़ैसला अभी आना बाक़ी है.

ये संशोधन सरकार को अधिकार देता है कि वो किसी ख़बर को 'फ़र्जी' घोषित कर सकती है. इस संशोधन को आलोचक सरकार की बढ़ती ऑनलाइन सेंसरशिप के रूप में देख रहे हैं.

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इस संशोधन से क्या होगा

6 अप्रैल को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 2021 इंटरमीडियरी नियमों में संशोधन किया.

इस संशोधन से केंद्र सरकार के पास मौजूद सेंसरशिप से जुड़े अधिकारों का दायरा और बढ़ जाता है.

ये नियम इंटरमीडिएटरीज़ को नियंत्रित करते हैं, जिनमें टेलीकॉम सर्विस, वेब होस्टिंग सर्विस, सोशल मीडिया वेबसाइट और सर्च इंजन शामिल हैं.

नए नियमों के तहत, सरकार द्वारा नियुक्त की कई एक बॉडी 'केंद्र सरकार के कामकाज' से संबंधित खबरों को 'फ़र्जी, गलत या भ्रामक' घोषित कर सकेंगी.

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अगर ऐसा होता है जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को उस ख़बर को हटाने के लिए 'ज़िम्मेदार कोशिश' करनी होगी. साथ ही तय करना होगा कि ऐसी सूचना यूजर पब्लिश या डिस्पेल ना करे.

जब सरकार किसी खबर या वीडियो को लेकर इंटरमीडियरी को नोटिफाई करेगी तो 36 घंटों के अंदर ये एक्शन लेने होंगे.

मतलब ये कि इस नियम के तहत सरकार इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर, सर्च इंजन और सोशल मीडिया कंपनियों से ऐसी किसी भी जानकारी को हटाने के लिए कह सकती है जिसे उसकी नियुक्त बॉडी 'फेक' मानती है.

अगर इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर, सर्च इंजन और सोशल मीडिया कंपनियां ऐसा नहीं करती हैं तो उस कंपनी पर आईपीसी के तहत मुकदमा चलाया जाएगा.

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इमेज कैप्शन, सरकार के इस नियम की सिविल सोसायटी के लोगों ने खूब आलोचना की है.

इस नियम पर क्या प्रतिक्रिया दे रहे हैं लोग

सरकार के इस नियम की सिविल सोसायटी के लोगों ने कड़ी आलोचना की है.

प्रेस संस्था एडिटर्स गिल्ड ने एक बयान जारी कर सरकार से ये संशोधन वापस लेने को कहा था.

गिल्ड का कहना था कि सरकार का ये कदम परेशान करने वाला है क्योंकि इसके अनुसार सरकार खुद से संबंधित खबरों की सेंसरशिप करेगी और इसके लिए कोई कोई न्यायिक निगरानी की ज़रूरत नहीं होगी, जो अब तक 2015 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत ज़रूरी है.

'एक्सेस नाउ' और 'इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन' जैसे 17 डिजिटल अधिकार संगठनों ने भी कहा है कि ये संशोधन संवैधानिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता क्योंकि यह बोलने की आज़ादी के अधिकार को ख़तरे में डालता है और इसका इस्तेमाल 'असहमति को दबाने' के लिए किया जा सकता है.

इन संस्थाओं ने ये भी कहा है कि संशोधन में अस्पष्ट शब्दों का उपयोग किया गया है 'जिसे लेकर कोई क्लैरिटी ही नहीं है.'

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इसके अलावा, कई पत्रकारों ने भी कहा है कि सरकार के मौजूदा फैक्ट चेकर्स, प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) अक्सर सरकार की आलोचना करने वाली सूचनाओं को 'फेक' बता देती है.

बीबीसी ने इससे पहले इसे लेकर रिपोर्ट की है कि कैसे सरकारी फ़ैक्ट चेक एजेंसी ने खुद ही फेक और भ्रामक न्यूज़ फैलाई है.

फैक्ट चेक वेबसाइट ऑल्ट न्यूज़ के सह संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने कहा था कि "सरकार खुद की योजनाओं को लेकर फैल रहे फेक न्यूज़ के ख़िलाफ़ लोगों को जागरूक कर सकती थी लेकिन पीआईबी का इस्तेमाल कुछ मामलों को छोड़ दें तो सरकार की छवि चमकाने के लिए ही किया गया है."

उन्होंने यह भी कहा था कि पीआईबी के फ़ैक्ट चेक के पास एक निर्धारित प्रक्रिया नहीं है, जैसा कि अक्सर अन्य फैक्ट चेकर्स के पास होती हैं. पीआईबी किसी चीज़ को 'पूरा संदर्भ दिए बिना ही सही या गलत' बता देती है.

हालाँकि, सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने कहा है कि यह संशोधन पत्रकारिता को सेंसर करने के लिए नहीं है और ये बॉडी विश्वसनीय रूप से काम करेगी.

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कुनाल कामरा

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इमेज कैप्शन, स्टैंड-अप कॉमेडियन कुनाल कामरा ने सबसे पहले इस संशोधन की संवैधानिकता को चुनौती दी.

बॉम्बे हाईकोर्ट में अब तक क्या हुआ

10 अप्रैल को स्टैंड-अप कॉमेडियन कुनाल कामरा ने इस संशोधन की संवैधानिकता को चुनौती दी.

उन्होंने अपनी याचिका में कहा कि ये नियम मनमाने हैं और इस पूरी प्रक्रिया में दूसरे पक्ष को सुनवाई का अधिकार नहीं दिया गया है.

उन्होंने तर्क दिया कि इस सेंसरशिप का आधार संविधान की ओर से दिए गए फ्री स्पीच के अधिकार के खिलाफ़ है.

इसके बाद इस संशोधन को लेकर एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगज़ीन्स और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भी याचिका दायर की.

हालांकि केंद्र सरकार ने कोर्ट में कहा है कि सही जानकारी पाना नागरिकों का मौलिक अधिकार है, और इसलिए ये नियम असंवैधानिक नहीं हैं.

इसमें ये भी कहा गया है कोर्ट ये तय करेगा कि क्या सच है ना कि सरकार.

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हालांकि, सरकार ने कोर्ट को बताया कि चूंकि मामला अदालत में विचाराधीन है इसलिए फ़ैक्ट चेक यूनिट की नियुक्ति को 5 जुलाई तक के लिए टाल दिया गया है.

हालांकि सुनवाई अभी पूरी नहीं हुई है, लेकिन हाई कोर्ट ने सरकार के रुख़ पर सवाल उठाया है.

कोर्ट ने सरकार से पूछा कि सच क्या है ये तय करने वाली सरकार अकेली कैसे हो सकती है. इसके अलावा, यह भी पूछा गया कि सरकार प्रिंट और डिजिटल मीडिया के बीच अंतर कैसे कर सकती है.

कोर्ट ने यह भी सवाल किया पूछा है कि क्या राजनीतिक कैंपेन फ़ेक न्यूज़ जांच करने वाली यूनिट के दायरे में आएंगे?

साथ ही कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि 'मिसलीडिंग' टर्म सब्जेक्टिव यानी व्यक्तिपरक भी हो सकता है.

कोर्ट ने कहा कि नागरिकों के पास सत्ता से सवाल पूछने और सरकार पर शक करने का पूरा अधिकार है.

कोर्ट ने ज़रूरी सुरक्षा उपायों की कमी पर भी चिंता व्यक्त की और व्यंग्य को इस संशोधन से छूट देने की बात कही.

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'नियंत्रण रखने की कोशिश'

हालांकि, इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के वकील तन्मय सिंह का कहना है, "अब तक सिर्फ़ याचिकाकर्ताओं ने ही अपनी दलीलें कोर्ट में सामने रखी हैं और सरकार की ओर से जवाब आना अभी भी बाकी है."

वह कहते हैं, "इसलिए यह अनुमान लगाना उचित नहीं है कि अदालत किस ओर जाती दिख रही है."

इस मामले में सरकार 31 अगस्त को अपना पक्ष रखेगी.

उन्होंने इस तथ्य की ओर भी इशारा किया कि "आईटी नियमों के माध्यम से सरकार सोशल मीडिया और डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म्स पर अधिक से अधिक नियंत्रण रखने की कोशिश कर रही है."

कोर्ट ने इन संशोधनों की संवैधानिकता पर भी सवाल उठाया है.

साल 2021 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने, 2021 के नियमों में एक और संशोधन पर अंतरिम रोक लगा दी थी, जिसमें कहा गया था कि डिजिटल न्यूज़ आउटलेट और ऑनलाइन पब्लिशर्स को सरकार की ओर से निर्धारित आचार संहिता का पालन करना होगा.

कोर्ट ने माना था कि ये संशोधन पहली नज़र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करते हैं और 'अनुचित' हैं.

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क्या इससे चुनाव प्रभावित होंगे

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देश में अगले साल लोकसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में आलोचकों को डर है कि इस संशोधन से सरकार से जुड़ी खबरों की रिपोर्टिंग पर असर पड़ सकता है.

तन्मय सिंह कहते हैं, "ऐसा साफ़ तौर पर लगता है कि इन नियमों को बनाने वाले अधिकारियों के दिमाग में था कि चुनाव नज़दीक हैं. भले ही इसका आधिकारिक कारण सरकार की छवि को चमकाना ना हो लेकिन इससे सरकार को फ़ायदा तो होगा."

यहां तक कि बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी सरकार से पूछा कि क्या चुनाव अभियानों और उसके कवरेज़ के दौरान दिए गए बयान को 'बिज़नेस ऑफ़ गर्वनमेंट' माना जाएगा? क्या ये फ़ैक्ट चेक यूनिक के दायरे में आएगा.

आलोचकों का कहना है कि इस कानून को जल्दबाज़ी में लाया गया है.

पहले इस साल 2 जनवरी को, सरकार ने ऑनलाइन गेमिंग को रेगुलेट करने के लिए मसौदा पेश किया था. लेकिन, दो सप्ताह बाद सरकार ने ये संशोधन मसौदा पेश कर दिया.

स्टेकहोल्डर्स को जवाब देने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया गया था. जवाब देने के लिए इतना कम समय दिए जाने को लेकर भी सरकार की मंशा पर सवाल उठाए गए थे.

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