टीआरपी की जंग ने कैसे किया टीवी न्यूज़ का सत्यानाश?

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    • Author, डॉक्टर मुकेश कुमार
    • पदनाम, वरिष्ठ टीवी पत्रकार

मुंबई पुलिस ने कुछ चैनलों द्वारा रेटिंग प्रणाली के साथ छेड़छाड़ करने टीआरपी बढ़ाने का भंडाफोड़ किया है. इस भंडाफोड़ ने टीआरपी यानी रेटिंग प्रणाली की खामियों को एक बार फिर से जगज़ाहिर कर दिया है.

ये अच्छी बात हो सकती है, लेकिन इस परदाफ़ाश ने टीआरपी की जंग का एक ही पहलू उजागर किया है. ये पहलू है रेटिंग सिस्टम में मौजूद खामियों का ग़लत तरीक़ों से फ़ायदा उठाना. मगर रेटिंग सिस्टम की केवल यही एक कमी नहीं है. कमियाँ और भी हैं मगर उन पर विचार करने से पहले इस बात पर सोचा जाना चाहिए कि टीआरपी बढ़ाने के लिए न्यूज़ चैनल इस तरह से पागल क्यों हैं कि वे ग़ैर कानूनी तरीके अपनाने तक को आमादा हैं?

मार्केट में अव्वल बनकर अपना वर्चस्व कायम करना और उसके बल पर मुनाफ़ा बढ़ाना एक लक्ष्य है. दूसरा मक़सद अग्रणी बनकर राजनीति और दूसरे हल्कों में अपनी पैठ बनाते हुए दूसरे लाभ उठाना. इसलिए टीआरपी की होड़ में अव्वल बने रहना ज़रूरी है. ध्यान रहे, टीआरपी गिरने से केवल विज्ञापन ही कम नहीं होते, बल्कि आपका रुतबा भी कम हो जाता है.

इसीलिए न्यूज़ चैनल टीआरपी की जंग में अपना सब कुछ झोंक देते हैं. वे हर हथकंडा आज़माने के लिए तैयार हो जाते हैं और इसका सबसे पहला प्रभाव पड़ता है न्यूज़ कंटेंट पर. इसलिए ये बहुत ज़रूरी है कि टीआरपी, टीवी न्यूज़ और बाज़ार के रिश्तों को समझा जाए.

बाज़ार की घुसपैठ

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टेलीविज़न में जब तक बाज़ार ने घुसपैठ नहीं की थी तब तक कंटेंट में वे चीज़ें नहीं दिखाई देती थीं या बहुत कम दिखाई देती थीं, जिनकी शिकायत आज सब लोग करते हैं. उन पर एक संपादकीय नियंत्रण होता था और वह ध्यान रखता था कि कंटेंट स्तरीय हो और उसकी प्रस्तुति में भौंडापन कतई न आए. अस्सी और नब्वे के दशक का दूरदर्शन देख लीजिए. ये शालीनता आपको बराबर दिखेगी.

लेकिन विज्ञापनदाता आए तो अपने साथ टीआरपी भी लेकर आ गए. ये जानना उनकी ज़रूरत हो गई कि कौन से प्रोग्राम ज़्यादा देखे जा रहे हैं ताकि अपने विज्ञापन उन्हीं को दिए जाएं. उनका मक़सद ही यही था कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग उनके विज्ञापन देखें ताकि उनके उत्पादों की माँग बढ़े.

लिहाज़ा, 1986 में आईएमआरबी नामक मार्केटिंग एजंसी ने रेटिंग प्रणाली शुरू कर दी. उधर, दूरदर्शन ने भी 1988 में डार्ट का गठन करके अपने कार्यक्रमों की लोकप्रियता मापने का सिलसिला शुरू कर दिया. बस क्या था, लोकप्रिय कार्यक्रम ही सफलता की कसौटी बन गए. फिर लोकप्रियता के फॉर्मूले बनने लगे और उनके आधार पर कार्यक्रमों का निर्माण शुरू हो गया.

इसका सबसे पहले असर मनोरंजन के कार्यक्रमों पर पड़ा. उनकी दिशा बदल गई। वे साहित्यिक कृतियों से हटकर सोप ओपेरा की तरफ चले गए. इनमें वे तमाम मसाले आज़माए जाने लगे तो बॉक्स ऑफिस पर हिट रहने के लिए बंबईया फिल्मों में आज़माए जाते थे.

कार्टून

खाड़ी युद्ध का टेलीविज़न पर सीधा प्रसारण भारतीय टीवी इंडस्ट्री के लिए एक निर्णायक मोड़ था. सैटेलाइट के ज़रिए समाचारों के प्रसारण के लिए इसने वातावरण बना दिया. केबल के ज़रिए टेलीवज़न संपन्न लोगों के घरों में पहुँचने लगा. लोग सीएनएन और बीबीसी देखने लगे.

लेकिन टीवी न्यूज़ काफी समय तक बची रही. शायद इसलिए कि उसे बाज़ार के लिए उस तरह से खोला नहीं गया था. दूरदर्शन ने कुछ प्राइवेट प्रोड्यूसर को स्लॉट बेचे मगर कार्यक्रमों के लिए सख़्त दिशा-निर्देश भी रखे. इसीलिए शुरुआती दौर में न्यूज़लाइन, परख, आजतक (बीस मिनट की बुलेटिन) न्यूज़ टुनाइट, फर्स्ट एडिशन, फिलहाल जैसे न्यूज़ आधारित शो बनते रहे, जिनमें खरी पत्रकारिता देखी जा सकती थी.

इस बीच 1993 में इनटैम और 1998 में टैम नाम से मार्केटिंग रिसर्च की एजंसियाँ आँकड़े देने लगीं और उन्होंने रेटिंग के ज़रिए टीवी कंटेंट पर प्रभाव डालना शुरू कर दिया था. मगर न्यूज़ पर उनका प्रभाव सन् 2000 के बाद ही दिखना शुरू हुआ. जैसे-जैसे न्यूज़ चैनलों की संख्या बढ़नी शुरू हुई, प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी और उसी के साथ टीआरपी में आगे रहने के लिए फॉर्मूलों की खोज भी तेज़ होती चली गई.

मध्यम वर्ग का उपभोक्ता वर्ग में तब्दील होना

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एक-दो साल तक तो फिर भी चैनलों ने संयम रखा. उन्होंने अच्छी पत्रकारिता भी दिखाई. मुक़ाबला कंटेंट का हो रहा था, हालाँकि ये निर्दोष नहीं था, मगर आज की तुलना करेंगे तो वह किसी और दुनिया का टेलीविजन लगेगा. बहरहाल, एक तरफ ज़ी न्यूज़ ने काल, कपाल, महाकाल जैसे अँधविश्वासों और अपराधों पर आधारित कार्यक्रमों का सहारा लिया तो स्टार न्यूज़ फ़ॉक्स न्यूज़ के पैटर्न पर चलते हुए ख़बरों को मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत करने लगा.

हर हफ़्ते आने वाली टीआरपी चैनलों को नए-नए फ़ॉर्मूले देने लगी. जो सामग्री हिट होने लगती, वही फॉर्मूले का रुप ले लेती, ट्रेंड बन जाती. पाँच सी यानी क्राइम, क्रिकेट, सेलेब्रिटी, कंट्रोवर्सी और सिनेमा का फॉर्मूला यहीं से उपजा. धीरे-धीरे टीवी न्यूज़ पत्रकारिता से हटकर मनोरंजन की तरफ बढ़ती चली गई.

दरअसल, बाज़ार ने मीडिया को फील गुड का कंसेप्ट दे दिया. वह चाहता था कि दर्शकों को ऐसी चीज़ें न दिखाई जाएं जिनसे उनका खरीदारी वाला मूड बिगड़े. इस बीच मध्यवर्ग का मिजाज़ भी बदल चुका था. वह उपभोक्ता वर्ग में तब्दील हो गया था और जन सरोकारों से उसका नाता टूट गया था. वह ख़बरों को उपभोग करने वाली वस्तुओं के रूप में देखना चाहता था. बाज़ार की भी उससे यही अपेक्षा थी इसलिए टीआरपी के माध्यम से मीडिया के ज़रिए ये काम किया.

पहले पहल अपराध पर आधारित ख़बरों और कार्यक्रमों की बाढ़ आई. उन्हें मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत किया जाने लगा. ज़ी न्यूज़ और स्टार का सनसनी इसकी मिसाल बना. फिर आज तक पर जुर्म और वारदात आए. इन सब में ऐंकर नाटकीयता के साथ कार्यक्रमों को प्रस्तुत करते थे. ये बीमारी तमाम चैनलों में फैल गई.

यही दौर था जब चैनलों ने रियलिटी शो का काम हाथ में ले लिया. पश्चिमी उत्तरप्रदेश की गुड़िया के लिए ज़ी टीवी ने स्टूडियो में अदालत लगा दी और फिर हरियाणा में बोरवेल में गिरे बंटी को निकालने का लाइव कवरेज करके ट्रेंड सेट कर दिया.

टीवी मीडिया में चमत्कार और अंधविश्वास का दौर

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इसी के साथ-साथ ज्योतिष और तथाकथित साधु-संतों के प्रवचनों की भी बाढ़ आ गई. ज़ाहिर है कि अनपढ़ों की भारी आबादी वाले देश में ये बिकाऊ माल था और इनके आधार पर चैनलों को भर-भर के टीआरपी मिलने लगी. इनका संबंध टीआरपी से तो था ही, कमाई से भी था क्योंकि ये ज्योतिषी और साधु-संत चैनलों को पैसे देते थे. इस ट्रेंड से एनडीटीवी जैसे इक्का-दुक्का चैनल ही बच सके, मगर टीआरपी के मोर्चे पर उन्हें इसका भारी नुकसान भी उठाना पड़ा.

कुछ प्रवृत्तियाँ न्यूज़ चैनलो पर स्थायी रूप से काबिज़ हो गई तो कुछ आई और चली गई. स्थायी रूप से काबिज़ होन वाली प्रवृत्तियों में उपरोक्त दोनों हैं. क्रिकेट, सिनेमा, और कंट्रोवर्सी को भी इनमें जोड़ा जा सकता है. लेकिन कुछ प्रवृत्तियाँ आई और चली गई. जैसे एक समय अंध विश्वासों और मिथकों पर आधारित झूठी-सच्ची कहानियों का दौर चल पड़ा था.

भूत-प्रेत, सूनी हवेलियाँ, चमत्कार, दुनिया ख़त्म होने की घोषणाएं, दूसरे ग्रहों से आने वाले जीव-जंतु, अवैज्ञानिक जानकारियों से भरी कहानियों का एक लंबा दौर चला. तमाम चैनल देश भर में इसी तरह की चीज़ें तलाशने और उन्हें नाटकीय रूप देकर प्रस्तुत करने मे जुट गए. इसी दौर में आज तक पर बिना ड्राइवर की कार चली और मध्य प्रदेश के कुंजीलाल ने तमाम न्यूज़ चैनलों को बेवकूफ बनाया.

एक चैनल ने तीस सेकेंड के वीडियो से कैसे दिन भर खेला जा सकता है इसका फ़ॉर्मूला ईजाद किया. नतीजा ये हुआ कि तमाम चैनल ऐसे फ़ुटेज की तलाश में जुट गए. कुछ ने यू ट्यूब का सहारा लिया तो कुछ ने इधर-उधर होने वाले मारपीट, दुर्घटनाओं के वीडियो पर खेलना शुरू कर दिया.

ये फ़ॉर्मूला अपना आकर्षण खोता इसके पहले मिथकीय पात्रों और स्थानों की खोज शुरू हो गई. किसी चैनल ने स्वर्ग की सीढ़ी खोल ली तो किसी ने पांडवकालीन लाक्षागृह और सीता वाटिका. इनकी प्रस्तुति में भी नाटकीयता भर दी गई. ऐंकर कभी उड़नतश्तरी पर बैठे नज़र आने लगे तो कभी स्वीमिंग सूट पहनकर अंतरिक्ष यात्रा की तैयारी करने लगे.

इसी के आसपास स्टिंग ऑपरेशन का सिलसिला शुरू हुआ. दरअसल, इसकी शुरुआत तहलका कांड से हुई. तहलका कांड ने न्यूज़ चैनलों को इसकी ताक़त का एहसास करवा दिया था. उन्हें लगा कि इसकी धमक काफी ज़ोर से सुनाई देती है. लोकप्रियता तो मिलती ही है, चैनल का खौफ़ भी बढ़ जाता है.

शुरू में इसने छप्पर फाड़ के टीआरपी भी दिलाई. लेकिन जब स्टिंग ऑपरेशन ज़्यादा होने लगे और उनकी विश्सनीयता भी संदिग्ध हो गई तो फिर दर्शक मिलने मुश्किल होने लगे. ज़ाहिर है कि चैनलों ने भी इससे हाथ झाड़ लिए.

सास-बहू और साज़िश का नया ट्रेंड

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इस बीच स्टार न्यूज़ के कार्यक्रम सास बहू और साज़िश ने नया ट्रेंड स्थापित कर दिया. टीवी धारावाहिकों के टुकड़ों से बना ये कार्यक्रम स्टार और बाद में एबीपी न्यूज़ की टीआरपी का बड़ा ज़रिया बन गया था. अगर इस कार्यक्रम की टीआरपी को हटा दिया जाता तो ये चैनल बहुत नीचे खिसक जाता. ज़ाहिर है कि इसका मुक़ाबला करने के लिए दूसरे चैनलों ने भी इसी तरह के कार्यक्रम शुरू कर दिए जो आज तक चल रहे हैं.

इन तमाम फ़ॉर्मूलों का असर ये हुआ कि चैनलों में पत्रकारिता बंद हो गई. चैनलों ने फ़ील्ड रिपोर्टिंग पर ध्यान देना बंद कर दिया. राजनीतिक रिपोर्टिंग तो हाशिए पर ही धकेल दी गई. अच्छे-अच्छे रिपोर्टर या तो बाहर हो गए या फिर वे भी प्रस्तोता बनकर वही सब करने लगे. ख़बरें डेस्क पर आधारित हो गईं.

टीवी पत्रकारिता बाइट जर्नलिज्म में पहले ही तब्दील हो चुकी थी, मगर न्यूज़ एजंसी के द्वारा उसकी सप्लाई शुरू हो जाने से वह भी थम गई. चैनलों को अर्थशास्त्र के लिहाज़ से भी ये जम रहा था. न हर्र लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा आ रहा था. मोटी सैलरी वाले वरिष्ठ पत्रकारों की छुट्टी करके नौसिखियों के भरोसे चैनल चलाने का दौर शुरू हो गया. ज़ाहिर है कि कंटेंट को तो बरबाद होना ही था.

यूपीए-दो के अंतिम वर्षों में चैनलों में राजनीतिक रिपोर्टिंग और विचार-विमर्श की वापसी हुई. हर चैनल पर प्राइम टाइम में बहस होने लगी. शुरुआत में ये शालीन रहीं और गंभीर भी, मगर धीरे-धीरे कुतर्कों, चीख-चिल्लाहटों, मार-पीट, गाली-गलौच से भरती चली गई. अब ये बहसें भी ड्रामा, एक्शन से भर गईं और विचारों की जगह मनोरंजन प्रधान हो गई.

टेलीवीज़न न्यूज़ के महापतन के वर्तमान दौर की शुरुआत लगभग पाँच साल पहले हुई. ये भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का दौर है और यही एजेंडा अब टीवी में पसर चुका है. इसलिए टीवी का हर कंटेंट अब अंधराष्ट्रवाद, हिंदुत्ववाद और सवर्णवाद से प्रभावित है. ज़ाहिर है कि टीआरपी के लिहाज़ से भी ये हिट फ़ॉर्मूला साबित हो रहा है.

मामला मॉब लिंचिंग, लव जिहाद, तबलीगी जमात का हो, हाथरस, पालघर का हो या चीन-पाकिस्तान का, हर ख़बर, हर चर्चा का इस्तेमाल एजेंडा सेटिंग और उन्माद भड़काकर टीआरपी हासिल करने के लिए किया जाने लगा. ये टीआरपीखोर-सत्तापरस्त ग़ैर ज़िम्मेदार पत्रकारिता का ऐसा उदाहरण बनने लगा कि पूरी दुनिया में उसके बारे में बात की जाने लगी.

राजनीति के असर का दौर

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बेशक़ मौजूदा राजनीति ने एक आतंकित करने वाला वातावरण भी बना दिया है जिसमें अच्छी पत्रकारिता करने वाले निशाने पर हैं. बहुत सारे ऐसे पत्रकारों पर राजद्रोह के केस कर दिए गए हैं. ऐसे में ये स्वाभाविक ही है कि उसकी आवाज़ उन्माद भरे शोर मे गुम हो जाए.

इस एजेंडे ने पूरे कंटेंट को एकतरफा बना दिया है. ऐंकर एक पार्टी के प्रवक्ता की तरह पेश आ रहे हैं और सरे आम बेशर्मी के साथ नफरत और हिंसा फैला रहे हैं. उन्हें या उनके चैनल को सच या पत्रकारिता से लेना-देना नहीं है. उन्हें ना देश की चिंता है और ना ही लोकतंत्र की. मीडिया की इसी भूमिका की वज़ह से भी लोकतंत्र का आयतन सिकुड़ता जा रहा है.

वीडियो कैप्शन, भारत-पाक तनाव और मीडिया की 'नौटंकी'

सवाल उठता है कि दो दशकों के महापतन के इस दौर में वे संस्थाएं क्या कर रही थीं, जिनके कंधों पर इसे रोकने की ज़िम्मेदारी थी?

आत्म नियमन की वकालत करने वाली ये संस्थाएं चाहे वह नेशनल ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन हो, ब्राडकॉस्ट एडिटर्स एसोसिएशन हो या फिर पत्रकारों एवं संपादकों की संस्थाएं, शुरू में आशावाद का दामन थामे हुए कहती रहीं कि सब ठीक हो जाएगा.

दलील दी गई कि अभी भारत में टीवी शैशवकाल में है और बच्चा बड़ा होगा तो सब ठीक हो जाएगा. लेकिन किसी ने ये ध्यान नहीं दिया कि ये बच्चा कुपोषण और ग़लत पैरेंटिंग का शिकार हो रहा है और बड़ा होकर भस्मासुर बन जाएगा. ऐसी चेतावनी देने वाले लोग भी थे, मगर उन पर ध्यान ही नहीं दिया गया.

आज आलम ये है कि दर्शक दुखी हैं, नाराज़ हैं, लेकिन उनके दिमाग़ों में ऐसा कूड़ा भर दिया गया है कि वे यही सब देख और सराह रहे हैं. एक वर्ग है जिसने इस टीवी से किनारा कर लिया है, मगर उससे इस चैनलों को कोई फ़र्क नहीं पड़ता. उन्हें तो टीआरपी भी मिल रही है और सत्ता का संरक्षण भी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं. डॉक्टर मुकेश कुमार ने 'टीआरपी टीवी न्यूज़ और बाज़ार' नाम से एक किताब भी लिखी है.)

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