राजीव त्यागी की मौतः क्या 'मुर्ग़ों की लड़ाई' बनती जा रही है टीवी डिबेट

इमेज स्रोत, Aajtak grab
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी की एक टीवी चैनल पर डिबेट में शामिल होने के थोड़ी देर बाद हुई मौत से सोशल मीडिया पर एक बार फिर टीवी चैनलों पर होने वाली परिचर्चाओं की आक्रामकता पर बहस छिड़ गई है.
दरअसल नब्बे के दशक के दौरान भारत में जब निजी टीवी समाचार चैनलों के लिए दरवाज़े खुले तो बड़ी संख्या में इनके पंजीकरण की बाढ़ आ गई लेकिन इसके 'कंटेंट' को स्वतः नियंत्रित करने के लिए सरकार ने जो व्यवस्था बनाई वो वर्ष 2011 में ही लागू हो पाई जब इंडियन ब्राडकास्टिंग फेडरेशन ने ब्रॉडकास्टिंग कंटेंट कम्प्लेंट्स काउंसिल का गठन किया.
इसे भारतीय प्रेस काउंसिल की तर्ज़ पर बनाया गया जिसकी अध्यक्षता पूर्व न्यायाधीश करते हैं और इसमें टीवी चैनलों के प्रतिनिधियों को बतौर सदस्य नियुक्त किया गया.
फिर भी चैनलों पर होने वाली परिचर्चा के स्तर को लेकर बहस जारी है.
कांग्रेस के प्रवक्ता और सुप्रीम कोर्ट के वकील जयवीर शेरगिल ने सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को एक पत्र भेजकर मीडिया संस्थानों के लिये 'एडवाइज़री' जारी करने को कहा है ताकि कोई अचारसंहिता लागू की जाए "जिससे सनसनीख़ेज़, निंदात्मक और ज़हरीले" टीवी डिबेट को नियंत्रित किया जा सके.
उन्होंने कहा है कि आचारसंहिता सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि कोई भी एंकर 'लक्ष्मण रेखा' को ना लांघ सके.
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त, 1
समाज का बहुत बड़ा तबक़ा ऐसा भी है जिसे लगता है कि चैनलों पर होने वाली परिचर्चा के स्तर में निरंतर गिरावट देखी जा रही है.
कुछ वरिष्ठ पत्रकारों ने तो चैनलों पर होने वाली परिचर्चाओं को 'मुर्ग़े की लड़ाई' की संज्ञा दी है. वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ख़ुद एक सरकारी टीवी चैनल पर परिचर्चा के एंकर भी रहे. वो बतौर पैनेलिस्ट भी टीवी चैनलों पर राजनीतिक विश्लेषण के लिए बुलाए जाते रहे हैं.
'ख़बरें हो रही हैं प्लांट'
मगर वो कहते हैं कि अब उन्होंने परिचर्चाओं में जाना बंद कर दिया है क्योंकि "परिचर्चा का स्वरूप अपने सबसे निचले स्तर" पर पहुँच चुका है.
बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं,"ये और कितना गिरेगा पता नहीं. टीवी की परिचर्चा को अब सियासी औज़ार में तब्दील कर दिया गया है. कॉर्पोरेट और राजनीतिक दलों के गठजोड़ ने इसे नियंत्रित करना शुरू कर दिया है. दुर्भाग्य से अब इन परिचर्चाओं के ज़रिये खबरें प्लांट की जा रहीं हैं और लोगों की राय को भी प्रभावित करने का काम किया जा रहा है."
उनका कहना है कि भारत में समाचार दिखाने वाले निजी टीवी चैनलों का बड़ा हिस्सा सूचना और संवाद के अलावा हर काम कर रहा है.
कई लोगों को लगता है कि ख़बरों को परोसने और परिचर्चा आयोजित करने में अराजकता और सतहीकरण स्पष्ट दिखने लगा है.

इमेज स्रोत, Getty Images
लेकिन दूसरी तरफ़ मीडिया घरानों का कहना है कि वो वही कंटेंट दिखाते हैं जिसे लोग पसंद करते हैं. इसमें टीआरपी रेटिंग्स की भी बड़ी भूमिका है जो कार्यक्रम की लोकप्रियता के बारे में बताती है और इन्ही रेटिंग्स पर संस्था की कमाई को निर्भर रहना पड़ता है.
संघ विचारक संदीप महापात्रा कहते हैं परिचर्चा का मतलब होता है कि आप अपनी बात कहें और दूसरे को अपनी बात रखने का मौक़ा भी दें. लेकिन उनका कहना है कि 12 लोगों के परिचर्चा में शामिल होने से ये बिलकुल अराजक हो जाता है.
वो कहते हैं कि अब उन्होंने भी टीवी की परिचर्चाओं में जाना बंद कर दिया है.
उनका मानना है कि इन चैनलों पर कंटेंट को नियंत्रित नहीं किया जा सकता क्योंकि जैसे ही इस दिशा में कोई क़दम उठाया जाएगा, उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार के रूप में देखा जाने लगेगा.
संदीप महापात्रा कहते हैं," अब आप भारतीय प्रेस परिषद का उदाहरण ले लीजिए. वो एक स्वतः नियंत्रण करने वाली संस्था है. मगर उसके अधिकार सीमित हैं. उसी तरह टीवी के लिए जो व्यवस्था की गई है वो भी भारतीय प्रेस परिषद की तरह ही अधिकारविहीन है."

इमेज स्रोत, Getty Images
'नफ़रत की नुमाईश'
वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता नवभारत टाइम्स, दैनिक हिन्दुस्तान और आउटलुक के संपादक रह चुके हैं और वो टीवी पर होने वाली परिचर्चाओं में शामिल भी होते हैं. वो चर्चाओं के गिरते स्तर के लिए दर्शकों को भी ज़िम्मेदार ठहराते हैं. उनका कहना है कि गंभीर पत्रकारिता से बिलकुल उलट हो गया है परिचर्चाओं का स्तर. वो कहते हैं कि टीआरपी की वजह से लगभग हर समाचार चैनल परिचर्चा पर ज़्यादा ध्यान देने लग गया है.
टीवी चैनलों पर होने वाली परिचर्चाओं में ज़्यादातर राजनीतिक दल के प्रवक्ता होते हैं और संदीप महापात्रा कहते हैं कि सभी दल के प्रवक्ताओं पर दबाव रहता है कि दूसरे दल के प्रवक्ता की बात को कितना ज़ोर से चिल्ला कर दबा सकते हैं.
लोक जन शक्ति पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अजय कुमार कहते हैं कि जब कभी वो किसी चैनल पर परिचर्चा में शामिल होते हैं तो उन्हें फ़ोन पर मेसेज मिलने शुरू हो जाते हैं कि आप ज़ोर से अपनी बात रखिए और अपने विरोधी पर निजी हमले कीजिये. वो कहते हैं कि किसी किसी परिचर्चा में उन्हें इतनी ज़ोर से बोलना पड़ता है कि गला बैठ जाता है.
वो कहते हैं कि टीवी चैनलों में प्रयोग का दौर चल रहा है जहां 'कंटेंट' राजा तो है मगर श्रोता महाराजा हैं.
राष्ट्रीय जनता दल के प्रवक्ता मनोज झा कहते हैं कि अब परिचर्चाओं में शामिल होने का असर उनके 'मेंटल हेल्थ' पर पड़ने लगा है. उनके अनुसार टीवी में परिचर्चा सिर्फ नफ़रत की नुमाईश बनता जा रहा है जिससे लोगों के दिमाग़ में ज़हर घुल रहा है.
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त, 2
वरिष्ठ पत्रकार और एंकर राजदीप सरदेसाई के अनुसार हर रोज़ टीवी पर परिचर्चा अंत में एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप का मैच बन कर ख़त्म होती है, इससे न सिर्फ़ इसमें शामिल होने वाले बल्कि एंकर के दिमाग़ी स्वास्थ्य पर ख़राब असर पड़ता है.
उन्होंने अपने ट्वीट में स्वीकार किया कि परिचर्चा मुर्गों की लड़ाई जैसी होती जा रही है.
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त, 3
वहीँ एक दूसरे अंग्रेज़ी टीवी चैनल एनडीटीवी की एंकर रह चुकीं निधि राज़दान के अनुसार जो लोग टीवी के समाचार और उसमें घुल रहे ज़हर की शिकायत कर रहे हैं उन्हें याद रखना चाहिए कि इसके लिए हम सब ज़िम्मेदार हैं.
अपने ट्वीट में वो कहती हैं, "जो ऐसे चैनल देखते हैं, जो उनपर विज्ञापन देते हैं और जो उनका संपादन करते हैं, सब ज़िम्मेदार हैं."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















