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ब्रिटेन के गोरे, काले-भूरे लोगों पर अपना गुस्सा क्यों निकाल रहे हैं?- ब्लॉग
- Author, मोहम्मद हनीफ़
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक, बीबीसी पंजाबी के लिए
लगभग 70-75 साल पहले हमारे पूर्वज गोरों से आज़ादी पाने के लिए अपने घर से निकले थे.
अभी आपने देखा ही होगा कि ब्रिटेन में गोरों के गुट बाहर आ गए हैं, वे हमसे आज़ादी मांग रहे हैं .
ब्रिटेन में होटलों पर, दुकानों पर, मस्जिदों पर हमले हो रहे हैं.
दशकों पहले जो गोरे आधी दुनिया पर राज करते थे, वे अब हम जैसे लोगों से कह रहे हैं कि आपने यहां आकर हमारी नौकरियां छीन लीं हैं.
वे कह रहे हैं, आप छोटी नावों में बैठकर यहां आ जाते हो और फिर पूरी जिंदगी चार सितारा होटलों में हमारी सरकार के खर्च पर रहते हो. आपने हमसे हमारा ब्रिटेन छीन लिया है.
ब्रिटेन की मीडिया और सरकार को भी यह समझ नहीं आ रहा कि इन समूहों को क्या कहा जाए.
वज़ीर-ए-आज़म (प्रधानमंत्री) कहते हैं कि ये बदमाश हैं, वहीं मीडिया कहता है कि ये प्रो-यूके विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.
कुछ समझदार लोग आकर बताते हैं कि यह ग़रीब गोरों का ग़ुस्सा है जो बाहर निकल रहा है.
गोरे देशों से आए आप्रवासियों पर क्यों नहीं निकलता ग़ुस्सा?
कोई यह नहीं बताता कि यह ग़ुस्सा गोरे देशों से आए आप्रवासियों पर क्यों नहीं निकलता है.
यूक्रेन में युद्ध होता है, वहां से लोग भागकर यहां पहुंचते हैं.
सरकार भी और गोरे नागरिक भी अपने घरों के दरवाजे़ खोलकर उनका स्वागत करते हैं. ऐसा करना भी चाहिए.
लेकिन वहां अफ़गानिस्तान में ब्रिटेन लगभग 40 वर्षों से युद्ध में अपनी भूमिका निभा रहा है. अगर वहां से कोई भागकर आ जाए तो गोरे लोगों का कल्चर खतरे में पड़ जाता है.
इसे नस्लवाद कहें, नस्लपरस्ती कहें या वह पुरानी बीमारी कि एक गोरे रंग का व्यक्ति किसी दूसरे रंग के व्यक्ति को इंसान नहीं मानता है .
सारा भार काले-भूरे लोगों पर, फिर भी...
गोरा भले ही कम पढ़ा-लिखा हो, भारत, पाकिस्तान जैसे देश में जाकर वह खुद को प्रधान समझने लगता है और अगर वहां से कोई सर्जन बनकर भी आ जाए तो कई गोरों के लिए वह अप्रवासी और ग़ैरक़ानूनी ही रहता है.
बुद्धिमान लोग यह भी समझाते हैं कि देखो ब्रिटेन का ग़रीब गोरा सुबह घर से निकलता है तो अंडे और डबल ब्रेड पटेल जी की दुकान से खरीदता है.
ट्रेन में बैठता है तो वहां कंडक्टर मीर पुरी होता है और अगर ऊबर में बैठ जाए तो ड्राइवर झेलम या लुधियाना का होगा.
जब किसी ढाके वाले के ढाबे का चिकन टिक्का मसाला खा-खा कर बीमार पड़ जाएगा तो उसका इलाज कोई गुजरात से आया डॉक्टर ही करेगा, नर्स भी जमैका की होगी. और फिर दवा लेने के लिए फ़ार्मेसी जाएगा, वहां भी कोई हमारा ही भाई-बहन खड़ा होगा .
बादशाहत छिन गई?
ब्रिटेन के राजनेताओं ने अपनी सारी अक्षमताओं का भार विदेश से आए काले और भूरे लोगों पर डाल दिया है.
यूके एक औद्योगिक देश था. यहां फ़ैक्टरियाँ चलती थीं, मिलें चलती थीं. कोई कुछ बनाता था और फिर उसे दुनिया को बेच देता था.
अब वो यूरोप से भी अलग हो गया है. उसके यहां खेतों में काम करने के लिए मज़दूर भी नहीं मिल रहे हैं. डॉक्टर और नर्स पहले ही बाहर से आते थे.
अब गोरी आवाम को बस यही कहते हैं कि हम कभी विश्व के बादशाह हुआ करते थे, अब बाहर से लोगों ने आकर हमारी बादशाहत छीन ली है .
सच बात तो यह है कि बादशाहत को कोई ख़तरा नहीं है. फर्क सिर्फ़ इतना है कि पहले ब्रिटेन के राजा या रानी का हुक्म आधी दुनिया में चलता था. अब जो हमारा बादशाह है, उसकी बात उसका बेटा हेनरी भी नहीं मानता है.
ब्रिटेन ने भारत पर कई सौ वर्षों तक शासन किया और फ़ॉर्मूला उनके पास एक ही था, जिसे तब 'डिवाइड एंड रूल' या 'फूट डालो और राज करो' कहा जाता था. हिंदू को मुस्लिम से लड़ाओ और पंजाबी को पंजाबी से लड़ाओ.
अब ऐसा लगता है कि यही फ़ॉर्मूला वे अपने देश में भी लेकर आए हैं.
यहां भी ग़रीबों से कहा जा रहा है कि बाहर से आए ग़रीब आपका हक़ मार रहे हैं.
कई इलाकों में लोगों ने एकजुट होकर कहा है कि हमने धर्म और रंग के नाम पर नहीं लड़ना है और इन्हें भी चाहिए कि जो ज्ञान और क़ानून वे आधी दुनिया को बताने गए थे, उसे थोड़ा आपने घर पर भी लागू करें. शायद पुरानी बीमारी से कुछ राहत मिल जाए .
रब्ब राखा.
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है.)
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