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पाकिस्तान और सऊदी अरब की डिफ़ेंस डील में क्या तुर्की भी शामिल होगा?
- Author, बीबीसी तुर्की, अंकारा
तुर्की ने हाल के हफ्तों में अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आई उन रिपोर्टों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया दी है, जिनमें उसके सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच बने रक्षा गठबंधन में शामिल होने की संभावना जताई गई थी.
तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फ़िदान ने कहा कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ बातचीत जारी है, लेकिन अब तक किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं.
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि तुर्की का लक्ष्य 'एक व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा मंच' तैयार करना है.
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच पिछले साल सितंबर में ये डिफ़ेंस डील हुई थी.
डील के बाद जारी संयुक्त बयान में कहा गया था, ''पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस ने स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए हैं. दोनों देश किसी भी आक्रामकता के ख़िलाफ़ मिलकर काम करेंगे. अगर दोनों देशों में से किसी एक के ख़िलाफ़ भी कोई आक्रामक होता है तो इसे दोनों के ख़िलाफ़ माना जाएगा.''
इस रक्षा गठबंधन में तुर्की के शामिल होने को लेकर पहली रिपोर्ट समाचार एजेंसी ब्लूमबर्ग ने प्रकाशित की थी.
उस रिपोर्ट में कहा गया था कि तीनों देशों के बीच बातचीत में प्रगति हुई है और तुर्की के शामिल होने से क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन पर निर्णायक असर पड़ सकता है.
पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्री रज़ा हयात हर्राज ने कुछ दिन पहले कहा था कि लगभग एक साल की बातचीत के बाद पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच त्रिपक्षीय रक्षा समझौते का मसौदा तैयार कर लिया गया है.
हर्राज ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा कि यह संभावित समझौता उस द्विपक्षीय समझौते से अलग है, जिसकी घोषणा पाकिस्तान और सऊदी अरब ने पिछले साल की थी.
पाकिस्तान परमाणु हथियार रखने वाले देशों में से एक है.
क्या बोला पाकिस्तान?
रज़ा हयात हर्राज ने कहा कि इस त्रिपक्षीय समझौते को अंतिम रूप देने के लिए पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच आम सहमति होनी ज़रूरी है.
उन्होंने बताया, "पाकिस्तान,सऊदी अरब और तुर्की का त्रिपक्षीय समझौता पहले से ही एजेंडे में है. समझौते का मसौदा इस समय तैयार है. यह दस्तावेज़ सऊदी अरब और तुर्की के अधिकारियों के पास भी है और तीनों देश इस पर बातचीत कर रहे हैं. इस प्रक्रिया को करीब 10 महीने हो चुके हैं."
अब तक सऊदी अरब ने इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है.
तुर्की की प्रतिक्रिया
तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फ़िदान ने क्षेत्रीय सहयोग की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है.
उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया की कई पुरानी समस्याओं की जड़ क्षेत्र के देशों के बीच आपसी अविश्वास है और यही अविश्वास दरारों और संकटों को जन्म देता है.
फ़िदान ने कहा, "क्षेत्र के देशों को एक-दूसरे की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए. यह मंच बाहर के लिए नहीं है. जब क्षेत्र के देश एक-दूसरे पर भरोसा करेंगे तो 80 प्रतिशत समस्याएं व्यावहारिक रूप से हल हो जाएंगी."
उन्होंने आगे कहा, "खाड़ी क्षेत्र के देशों को एक-दूसरे पर भरोसा करना चाहिए, अन्य देशों को भी ऐसा ही करना होगा. जब ऐसा बड़ा प्लेटफॉर्म बनेगा तो मेरी राय में ज़्यादातर समस्याएं सुलझ जाएंगी."
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच सुरक्षा सहयोग की प्रक्रिया पर बोलते हुए उन्होंने कहा, "फ़िलहाल बातचीत और संवाद जारी हैं, लेकिन हमने किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं."
ये बयान दिखाते हैं कि तुर्की उन दो देशों के साथ सुरक्षा सहयोग के मुद्दे पर अब भी विचार कर रहा है, जिनसे उसके करीबी रिश्ते हैं, लेकिन उसका मुख्य उद्देश्य पूरे क्षेत्र के सभी देशों की भागीदारी से एक ज़्यादा बड़ा मंच तैयार करना है.
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि हाकान फ़िदान 'गठबंधन' शब्द की जगह 'प्लेटफ़ॉर्म' शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं.
तुर्की के पाकिस्तान के साथ सैन्य रिश्ते और रक्षा सहयोग इस समय काफ़ी मज़बूत हैं और उनमें लगातार विस्तार हो रहा है.
पिछले साल भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सैन्य टकराव के दौरान रिपोर्टें सामने आई थीं कि तुर्की ने विशेष रूप से सशस्त्र ड्रोन के ज़रिये पाकिस्तान को सैन्य सहायता दी थी, जिस पर भारत सरकार ने नाराज़गी जताई थी.
तुर्की, अज़रबैजान और पाकिस्तान हाल के सालों में रक्षा उद्योग और सुरक्षा क्षेत्रों में सहयोग करते रहे हैं.
तुर्की और सऊदी अरब के बीच सैन्य सहयोग
तुर्की और सऊदी अरब के बीच सैन्य और रक्षा उद्योग सहयोग भी हाल के वर्षों में बढ़ा है.
दोनों देशों ने साल 2022 में रक्षा उद्योग के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए एक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए थे.
रिपोर्टों के अनुसार सऊदी अरब तुर्की में विकसित किए जा रहे पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान 'काआन' में दिलचस्पी रखता है और ड्रोन, 'अल्ताय' टैंक और दूसरे अहम सैन्य उपकरण खरीदना चाहता है.
हाल के हफ्तों में तुर्की और सऊदी अरब की नौसेनाओं ने भी अपना संयुक्त सहयोग शुरू किया है.
6 जनवरी को तुर्की नौसेना मुख्यालय में दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों की भागीदारी के साथ नौसैनिक सहयोग के समन्वय पर पहली बैठक आयोजित की गई.
तुर्की की प्राथमिकता
तुर्की के विदेश मंत्री के अनुसार, उसका लक्ष्य क्षेत्र में एक व्यापक सुरक्षा मंच स्थापित करना है.
तुर्की यह चाहता है कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के अलावा मिस्र, इंडोनेशिया, मलेशिया, साथ ही क़तर और खाड़ी सहयोग परिषद (गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल- जीसीसी) के सभी सदस्य इस ढांचे में शामिल हों.
तुर्की और इंडोनेशिया के विदेश और रक्षा मंत्रियों की 9 जनवरी को अंकारा में बैठक हुई, और तुर्की ने हाल ही में रक्षा और सुरक्षा सहयोग को गहरा करने के लिए इंडोनेशिया के साथ रणनीतिक बैठकें आयोजित की हैं.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तुर्की और मलेशिया के बीच संयुक्त रक्षा परियोजनाएं भी बढ़ रही हैं और तुर्की मलेशिया में एक सैन्य जहाज़ निर्माण कारखाना स्थापित करना चाहता है.
तुर्की का उद्देश्य यह है कि इस मंच के तहत इस्लामी देशों के एक व्यापक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए जाएं, जिसमें एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता, राजनीतिक संप्रभुता और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का सम्मान किया जाए.
हाकान फ़िदान का यह कहना कि "यह मंच क्षेत्र के बाहर के लिए नहीं है".
उनका इशारा भारत और इसराइल जैसे देशों की ओर माना जा रहा है जिन्होंने सऊदी अरब और पाकिस्तान की नज़दीकी पर चिंता जताई है.
कुछ इसराइली मीडिया रिपोर्ट्स और विश्लेषणों में यह भी कहा गया है कि तुर्की का सऊदी अरब और पाकिस्तान के समझौते में शामिल होना इसराइल के क्षेत्र में अपनी सुरक्षा बढ़त बनाए रखने के प्रयासों को कमज़ोर कर सकता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.