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ब्रिटेन में भड़की हिंसा, मुसलमानों को क्यों बनाया गया निशाना?
ब्रिटेन के साउथपोर्ट में मशहूर सिंगर टेलर स्विफ़्ट की थीम वाली डांस पार्टी में तीन बच्चियों की मौत के बाद वहां के कई शहरों में हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं.
ब्रिटेन में 13 वर्षों बाद इतने व्यापक स्तर पर प्रदर्शन हो रहे हैं.
शनिवार को हिंसक प्रदर्शन के दौरान लीवरपूल, हल, ब्रिस्टल, मैनचेस्टर, ब्लैकपूल और बेलफास्ट में बोतलें फेंकी गईं. कई जगहों पर पुलिस पर हमले किए. इनमें कुछ पुलिसकर्मी घायल हो गए.
कई जगह प्रदर्शनकारी आमने-सामने आ गए. एक तरफ़ आप्रवासियों का समर्थन करने वाले प्रदर्शनकारी नारे लगा रहे थे-''यहां शरणार्थियों का स्वागत है.'' ''नाजी गंदगियों हमारी सड़कों से चले जाओ.''
वहीं दूसरी ओर आप्रवासी विरोधी प्रदर्शनकारी "रूल ब्रिटानिया", "इंग्लैंड टिल आई डाई" और "वी वांट ऑवर कंट्री बैक", जैसे नारे लगा रहे थे.
पीएम स्टार्मर ने क्या कहा?
शनिवार और रविवार से जारी इन प्रदर्शनों ने ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर की मुश्किलें बढ़ा दी हैं.
हालांकि उन्होंने प्रदर्शनकारियों से सख़्ती से निपटने के आदेश दिए हैं.
हिंसक प्रदर्शनों से निपटने के लिए सोमवार को स्टार्मर के आधिकारिक हाउस 10 डाउनिंग स्ट्रीट में इमरजेंसी बैठक हुई.
स्टार्मर ने हिंसक प्रदर्शनों की निंदा करते हुए कहा, '' इस देश में लोगों को सुरक्षित रहने का हक़ है. इसके बावजूद हमने देखा कि मुस्लिम समुदायों पर निशाना बनाया गया. मस्जिदों पर हमले हुए.''
उन्होंने कहा, ''दूसरे अल्पसंख्यक समूहों को निशाना बनाया गया. सड़कों पर नाजी सैल्यूट दिया गया. पुलिस पर हमले हुए. नस्लीय नारों के साथ हिंसा की गई. इसलिए मुझे इसे धुर दक्षिणपंथियों की बेरहम हिंसा कहने में कोई हिचक नहीं है.''
कैसे शुरू हुए हिंसक प्रदर्शन
29 जुलाई को साउथपोर्ट में टेलर स्विफ़्ट की थीम डांस पार्टी में छोटी उम्र की तीन बच्चियों की चाकू मार कर हत्या कर दी गई.
इस हमले में आठ दूसरे बच्चे और दो वयस्क भी गंभीर रूप से घायल हो गए थे.
इसके बाद इंटरनेट पर अफवाह फैली कि चाकू मारने वाला शख्स़ राजनीतिक शरण मांगने वाला मुस्लिम था जो बोट से ब्रिटेन आया था.
इस वारदात का संदिग्ध 17 वर्षीय एक्सेल रुदाकुबाना है. रुदाकुबाना ब्रिटेन का ही रहने वाला है. लेकिन आप्रवास और मुस्लिम विरोधी प्रदर्शन जारी हैं.
इस अफवाह की वजह से रॉदरम में मास्क पहने आप्रवासी विरोधियों के एक झुंड ने उस होटल पर हमला कर दिया, जहां राजनीतिक शरण मांगने वालों लोगों को रखा जाता है.
इसके साथ ही लीवरपूल, हल, ब्रिस्टल, मैनचेस्टर, ब्लैकपूल हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए.
कौन हैं कट्टर दक्षिणपंथी समूह
इस हिंसक प्रदर्शनों में कई धुर दक्षिणपंथी समूहों के शामिल होने के आरोप लगाए जा रहे हैं.
इन प्रदर्शनों के पीछे टॉमी रॉबिन्सन नाम से चर्चित स्टीफन येक्सले लेनन का हाथ बताया जा रहा है.
रॉबिन्सन इंग्लिश डिफ़ेंस लीग के पूर्व नेता रहे हैं और सोशल मीडिया के जरिये कट्टर दक्षिणपंथी आंदोलन को सोशल मीडिया के जरिये बढ़ाते रहे हैं.
पुलिस का कहना है इन प्रदर्शनों में इंग्लिश डिफेंस लीग शामिल थी.
इंग्लिश डिफेंस लीग कट्टर दक्षिणपंथी समूह है जिसकी स्थापना 2009 में हुई थी.
ये समूह हिंसक प्रदर्शनों, इस्लाम और आप्रवासी विरोधी रुख़ के लिए जाना जाता है.
कहा जा रहा है कि कट्टरपंथी दक्षिणपंथी समूह के लोग बच्चियों की मौतों के बहाने हिंसक प्रदर्शन को और भड़का रहे हैं.
ब्रिटेन में अतिवादी संगठनों पर रिसर्च करने वाले संगठन ‘होप नॉट हेट’ के मुताबिक़, एक और फ़ासिस्ट समूह पेट्रियोटिक अल्टरनेटिव के सदस्य डेविड माइल्स ने खुद साउथपोस्ट की हिंसा के फ़ोटो शेयर किए थे.
मुस्लिमों पर निशाना
प्रदर्शनकारी आप्रवासी मुस्लिमों को निशाना बना रहे हैं. उनकी मस्जिदों पर हमले हो रहे हैं. ये बात खुद प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने मानी है.
ब्रिटिश अख़बार ‘गार्डियन’ ने ‘टेल मामा’ के एक विश्लेषण का हवाला देते हुए लिखा है कि पिछले एक सप्ताह में मुस्लिमों को धमकियों की संख्या पांच गुना बढ़ गई है.
मुस्लिमों की हत्या करने और उनकी महिलाओं के साथ रेप करने की धमकी दी जा रही है. हेट क्राइम की घटनाओं में तीन गुना बढ़ोतरी हो रही है.
टेल मामा मुस्लिम विरोधी हेट क्राइम को ट्रैक करने वाला एक मॉनिटरिंग ग्रुप है.
उसका कहना है कि मुस्लिमों के बीच बढ़ रहे डर और कट्टरपंथी समूहों के प्रदर्शन के बीच सीधा संबंध है.
मॉनटरिंग ग्रुप का कहना है कि साउथपोर्ट, लीवरपूल और हार्टेलपूल में कम से कम दस मस्जिदों पर हमले हुए हैं उन्हें ऐसी चेतावनी दी गई है.
आप्रवासियों के ख़िलाफ़ क्यों है गुस्सा
ब्रिटेन में आप्रवासियों की बढ़ती आबादी एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा है.
ब्रिटेन में रहने वाले लोगों का मानना है कि आप्रवासियों की बढ़ती संख्या यहां की हाउसिंग, शिक्षा व्यवस्था और सरकार की ओर से चलाई जा रही नेशनल हेल्थ सर्विस पर बहुत ज्यादा दबाव डाल रही है.
इस वजह से ब्रिटेन के लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. उनका कहना है कि यहां की नौकरियों पर भी आप्रवासियों का क़ब्ज़ा बढ़ता जा रहा है.
इस बीच ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में बढ़ते दबाव और महंगाई की वजह से भी आप्रवासियों के ख़िलाफ़ गुस्सा बढ़ रहा है.
2016 में यूरोपीय यूनियन से अलग के लिए शुरू किए ब्रेग्जिट पर मतदान दौरान दूसरे यूरोपीय देशों से आप्रवासियों की घुसपैठ भी एक बड़ा मुद्दा था.
ब्रिटेन में आप्रवास क़ानून और भारतीय आप्रवासी
आप्रवासियों के ब्रिटेन आने से जुड़े नियमों में सख्ती की वजह से हाल के कुछ अरसे में इनकी संख्या घटी है.
मई में जारी एक आंकड़ों के मुताबिक़ 2022 में कुल आप्रवासियों की संख्या 7,64,000 थी लेकिन 2023 में ये घट कर 6,85,000 हो गई.
पिछले साल ब्रिटेन में सबसे ज्यादा आप्रवासी भारत से आए थे, कुल आप्रवासियों में ये 20 फीसदी है. इसके बाद नाइजीरिया और चीन के लोगों का नंबर है.
ब्रिटेन सरकार का कहना है कि छात्रों की संख्या बढ़ने और केयर सेक्टर में नौकरी के लिए आने वाले लोगों की वजह से आप्रवासियों की संख्या बढ़ी है.
इस साल जनवरी में पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने एक नया नियम शुरू किया था. इसके मुताबिक आप्रवासियों की संख्या घटा कर तीन लाख लानी थी.
ब्रिटेन में सुनक की कंजर्वेटिव पार्टी आप्रवासियों के खिलाफ़ ज्यादा सख़्त रही है, जबकि लेबर पार्टी को आप्रवासियों के प्रति नरम रुख़ वाला माना जाता है.
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