बीबीसी ने कैसे लगाया सात साल की बच्ची की मौत के ज़िम्मेदार तस्कर का पता

    • Author, एंड्रयू हार्डिंग फ़्रांस, बेल्जियम, लक्ज़मबर्ग और ब्रिटेन से रिपोर्टिंग
    • पदनाम, बीबीसी पड़ताल

धूप में एक चौराहे पर बेपरवाही से चहलकदमी करते उस तस्कर को इस बात का बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था कि उसका पीछा किया जा रहा है.

वह एक छोटा, मोटा, 39 वर्षीय व्यक्ति था, जिसने हल्के हरे रंग का शैल सूट और बेसबॉल कैप पहना हुआ था.

वह एक साधारण सा दिखने वाला व्यक्ति था जो दोपहर में एक टेंट वाले प्रवासी स्वागत केंद्र से पास के ट्राम स्टेशन की ओर टहल रहा था.

तभी बीबीसी की टीम उसके पास पहुंची.

जब हम लक्ज़मबर्ग की कैपिटल के बीच चौराहे उसके पास पहुंचे, मैंने पूछा, "हम जानते हैं तुम कौन हो."

"तुम एक तस्कर हो."

मानव तस्कर के साथ इस टकराव की वजह थी 51 दिन पहले शुरू हुई बीबीसी की एक पड़ताल.

बीबीसी की यह पड़ताल उत्तरी फ्रांस के समंदर में सारा नाम की सात वर्षीय लड़की सहित पांच लोगों की मौत के कुछ घंटों बाद शुरू हुई थी. वह बच्ची एक हवा भरी नाव के अंदर शवों के ढेर के नीचे दम घुटने से मर गई थी.

उस पड़ताल में बीबीसी टीम, कैलाइस और बोलोग्ने के आस-पास के अनौपचारिक प्रवासी शिविरों से लेकर लिली में एक फ़्रांसीसी पुलिस इकाई, एसेक्स के एक बाज़ार, बेल्जियम के एंटवर्प, बर्लिन के बेल्जियम बंदरगाह तक पहुंची और अंत में लक्ज़मबर्ग और देश के प्रवासी रिसेप्शन सेंटर के दरवाज़े पर तीन दिन तक निगरानी की.

रिसेप्शन सेंटर के दरवाज़े पर टीम के सामने जो आदमी था, उसकी आंखें सिकुड़ी हुई थीं, कंधे और हाथ आधे-अधूरे उठे हुए थे. टीम यह जानती थी कि वह तस्कर था. इसे ही सारा और उसके परिवार की ख़तरनाक इंग्लैंड यात्रा के लिए पैसे दिए गए थे.

बीबीसी ने कैसे किया उस तस्कर को ट्रैक

लक्ज़मबर्ग के यूरोपीय न्यायालय के बगल में एक नज़दीकी ट्राम स्टेशन की ओर भागते हुए तस्कर ने बार-बार कहा, "मैं कसम खाता हूं कि यह मैं नहीं हूं."

लेकिन हम पहले ही उसका इराक़ी पासपोर्ट और एक इतालवी पहचान पत्र देख चुके थे. जब बीबीसी ने उसका सामना करना शुरू किया उसके कुछ ही पल बाद उसकी जेब में पड़ा फ़ोन बजने लगा.

पहले तो उस तस्कर ने इसे नज़रअंदाज़ कर दिया, लेकिन जब उसने आख़िरकार फ़ोन निकाला और बीबीसी ने उसकी स्क्रीन पर आने वाली कॉल का नंबर देखा, तो टीम को उसके अपराध का पक्का सबूत मिल गया. क्योंकि वो कॉल बीबीसी टीम ही उसे कर रही थी.

पिछले कुछ हफ़्तों के दौरान बीबीसी टीम का एक सदस्य एक प्रवासी बनकर चैनल पार करके इंग्लैंड जाने की कोशिश कर रहा था.

तस्करों के व्यापक नेटवर्क में काम करने वाले कई कथित बिचौलियों तक पहुंचने के बाद, बीबीसी सहयोगी महमूद को आखिरकार तस्कर से मिलवाया गया.

बीबीसी ने तब तस्कर के साथ कई फ़ोन कॉल्स को चोरी-छिपे रिकॉर्ड किया था. यह वही फ़ोन था जो तस्कर के हाथ में था, जिस वक्त बीबीसी ने उसे लक्ज़मबर्ग के चौराहे पर पकड़ा था. उन कॉल्स में तस्कर ने अपनी पहचान को उजागर किया और बताया था कि वह भी तस्करी के धंधे में है.

उसने कहा था कि वह कुछ पैसों के बदले बीबीसी टीम के सदस्य को उत्तरी फ़्रांस के लिए निकलने वाली उस नाव में बैठा सकता है जिसमें हथियारबंद गार्ड भी मौजूद रहेंगे. तस्कर ने इसके लिए 1,500 यूरो यानी 1,269 पाउंड की क़ीमत मांगी थी.

अब जब बीबीसी टीम उसके सामने खड़ी थी, तो टीम उसके फ़ोन की स्क्रीन पर अपना टेलीफ़ोन नंबर साफ़तौर से देख सकती थी.

बीबीसी ने क्यों शुरू की अपनी ये पड़ताल

बीबीसी ने यह जांच 23 अप्रैल को फ़्रांसीसी समुद्री तट पर एक बेहद निराशाजनक घटना को देखने के बाद शुरू की थी.

बीबीसी की टीम रात भर विमेरेक्स के रिज़ॉर्ट शहर के बाहर एक समुद्र तट पर इंतज़ार कर रही थी.

टीम जानती थी कि यह एक ऐसी जगह है जो तस्करों की पसंदीदा लॉन्च साइट है.

टीम ने यह फ़िल्माया भी था कि कैसे फ़्रांसीसी पुलिस के एक समूह ने एक नाव को रोकने की कोशिश की जिसके बाद तस्करों के दो समूहों और नाव के यात्रियों के साथ हिंसक झड़प भी हुई. हालांकि पुलिस उनको नाव पर चढ़ने से रोक नहीं सकी.

वहां पर अराजकता जैसा महौल था. यात्रियों के दो अलग-अलग समूह ख़तरनाक रूप से भीड़भाड़ वाली हवा भरी नाव पर जगह के लिए जूझ रहे थे.

तस्कर आमतौर पर ऐसी नावों पर 60 से अधिक लोगों को भर देते हैं, लेकिन इस नाव पर 100 से अधिक लोग सवार थे.

उसी नाव में गुलाबी जैकेट में एक छोटी लड़की, जिसे बाद में सारा के रूप में पहचाना गया, वो अपने पिता के कंधों पर कुछ देर के लिए दिखाई दी. कुछ मिनट बाद, तट से कुछ मीटर की दूरी पर वह लड़की और चार अन्य मृत पाए गए.

कुछ बचे हुए लोगों और मृतकों के शवों को फ़्रांसीसी बचाव दल वापस किनारे पर लेकर आया. हालांकि नाव पर अभी भी दर्जनों लोग सवार थे. आख़िरकार उस नाव को वापस इंग्लैंड की ओर भेज दिया गया.

यह विमेरेक्स के पास साल की दूसरी घातक छोटी नाव दुर्घटना थी. बीबीसी ने दोनों पर रिपोर्ट की थी.

इसके बाद के दिनों में,बीबीसी ने सारा के परिवार को तलाशा और उसके पिता अहमद से उनके दुख के बारे में बात की.

बीबीसी ने की सारा के पिता अहमद से बात

सारा के पिता अहमद और उनकी पत्नी अपने तीन बच्चों को इस तरह जोख़िम में डालने के लिए अपराधबोध से भरा हुआ महसूस कर रहे थे.

वे यूरोप से भगाए जाने के डर से ब्रिटेन जाने को मजबूर हुए थे. 14 साल पहले इराक़ से भागने के बाद, बेल्जियम में अहमद के शरण के दावे को बार-बार इस आधार पर ख़ारिज किया जा रहा था कि उनके गृह नगर बसरा को अब एक सुरक्षित जगह माना गया है.

उन्हें हाल ही में चेतावनी दी गई थी कि उन्हें कुछ दिनों के भीतर बेल्जियम से निर्वासित किया जा सकता है. उनके सभी बच्चे यूरोप में पैदा हुए और स्वीडन में रिश्तेदारों के साथ रहते हुए बड़े हुए थे, लेकिन उन्हें देश छोड़ने का अंतिम आदेश भी दिया गया था.

लेकिन बीबीसी की टीम उनसे और भी ज़्यादा गहराई में जाकर जानकारी हासिल करना चाहती थी, ताकि उस नाव एक्सीडेंट के लिए ज़िम्मेदार ख़ास आपराधिक गिरोहों का पता लगाया जा सके. बीबीसी की टीम यह जानना चाहती थी कि सारा का परिवार तस्करों के उस नेटवर्क में कैसे फंसा जो दसियों हज़ार प्रवासियों को फ़्रांसीसी तट के एक छोटे से हिस्से की ओर ले जाता रहा है.

18 जून को भी 15 छोटी नावों के सहारे 882 लोगों को इंग्लिश चैनल के पार पहुंचाया गया. यह इस साल एक दिन में चैनल पार करने वालों की रिकॉर्ड संख्या है. जिसके बाद इस साल यूके पहुंचने वाले कुल लोगों की तादाद 12,000 से भी ज़्यादा हो गई है.

सारा की मौत के बाद, ब्रिटिश पुलिस ने जल्द ही यह एलान कर दिया था कि दो संदिग्ध तस्करों को हिरासत में लिया गया है जो अब फ़्रांस को सौंपे जाने का इंतज़ार कर रहे हैं. हालांकि ये दोनों तस्कर नहीं थे, बल्कि वे युवा मज़दूर थे जो कथित तौर पर नाव पर काम करते थे.

अप्रैल की उस रात को नाव हादसे में जितने भी लोग बच गए थे, बीबीसी की टीम ने उन सभी को खोजने और उनसे बात करने की कोशिश की. बीबीसी की टीम ने फ़्रांस में तट के पास अनौपचारिक प्रवासी शिविरों में शरण चाहने वालों के लिए बने हॉस्टल में कुछ लोगों से मुलाकात की.

बीबीसी की टीम ने उनसे अपने नाम ना बताने के लिए कहा. इसकी वजह यह थी कि कुछ लोग चैनल को पार करने के लिए अभी भी कोशिशें जारी रखना चाहते थे.

दुर्घटना वाली नाव पर सारा के बगल में मौजूद एक कुवैती आदमी कुछ हफ़्तों बाद यूके पहुंचने में कामयाब भी रहा.

इसी आदमी ने मदद के लिए फ़्रांसीसी पुलिस को फोन किया था. बीबीसी की टीम ने उसे एक्सेस में ट्रैक किया.

सारा और उसके परिवार के साथ नाव पर सवार दर्जनों लोगों में से कई लोग इस काम को अंजाम देने वाले लोगों के बारे में कुछ नहीं जानते थे.

उन्होंने केवल कुछ छोटे बिचौलियों से बात की थी. ये वे छोटे बिचौलिए हैं जिन्हें अक्सर कैलाइस या बोलोग्ने में ट्रेन स्टेशनों के बाहर संभावित ग्राहकों की तलाश में पाया जा सकता है.

एक बार कीमत तय हो जाने के बाद ज़्यादातर लोग बिचौलियों के पास इलेक्ट्रॉनिक तरीकों से पैसा जमा कराते हैं. पैसों को लेकर शायद ही कभी बहुत ज़्यादा मोल-तोल होता था.

उन्होंने बीबीसी की टीम को बताया कि ये आमतौर पर भरोसेमंद व्यवसायी होते थे, जो कभी-कभी तुर्की, पेरिस या लंदन जैसी जगहों पर नाई की दुकानों या किराने की दुकानों पर काम करते थे. बिचौलिए सफल क्रॉसिंग के तुरंत बाद पैसे को तस्करी करने वाले गिरोह को दे देते थे.

हालांकि तीन लोगों ने जिनमें से दो लोग सारा के साथ एक ही नाव पर थे, उन्होंने बीबीसी की टीम को बताया कि जिस तस्करी गिरोह से वे निपटे थे, वो बेल्जियम के एंटवर्प बंदरगाह से काम कर रहा था. यह गिरोह अपने आपराधिक नेटवर्क और अवैध ड्रग्स व्यापार के लिए जाना जाता है.

वे इस बात से भी सहमत थे कि गिरोह का नेतृत्व एक व्यक्ति कर रहा था जो कि जबल नाम से जाना जाता था. अरबी में जबल का मतलब पहाड़ होता है. उन तीनों व्यक्तियों में से दो निजी तौर पर जबल से मिल चुके थे और एक उससे फोन पर बात भी कर चुका था.

कौन था लोगों को इंग्लिश चैनल पार करवाने वाला तस्कर

फिर बीबीसी की टीम आगे बर्लिन तक गई जहां एक और सोर्स से जबल की पहचान हुई और उसने बीबीसी को बताया कि जबल ने पहली बार कामयाब ना रहने पर दूसरी बार क्रॉसिंग की कोशिश का वादा किया था. बीबीसी के सभी सोर्स यह बता रहे थे कि जबल बेल्जियम में था, शायद एंटवर्प में.

बीबीसी की टीम मई में एटवर्प पहुंची और जबल का पता लगाने और उससे भिड़ने की योजना पर काम करना शुरू किया. जबल के पिछले ग्राहकों में एक ने उसकी एक तस्वीर भी साझा की थी. एक और ग्राहक ने बीबीसी के साथ उसका इराक़ी पासपोर्ट और यूरोपीय पहचान पत्र की कॉपी भी साझा की थी.

यह पहचान पत्र एक पहाड़ी इतालवी शहर में जारी किया गया था. इस जगह पर संगठित अपराध की जांच चल रही है.

बीबीसी की टीम ने पाया कि जबल का असली नाम रेबवार अबास ज़ंगाना था. वह उत्तरी इराक़ का एक अविवाहित कुर्द व्यक्ति था. जबल ज़ाहिर तौर पर एक कट्टर मुसलमान और एक प्रवासी व्यक्ति था. वह खुद भी इधर-उधर भटकते हुए कैलाइस, ब्रुसेल्स और एंटवर्प में रह रहा था.

बीबीसी की टीम को बताया गया कि वह दो भागीदारों के साथ काम करता है और हो सकता है कि इराक़ में उसका कोई और भी वरिष्ठ सहयोगी हो.

बीबीसी के अरबी भाषी सहकर्मी महमूद ने यूके जाने का रास्ता तलाश रहे प्रवासी के रूप में एंटवर्प में एक नाई की दुकान में एक बिचौलिए से मुलाक़ात की. बिचौलिए ने ऐसा दावा किया था कि वो जबल को जानता है और वो उसके साथ कॉल पर बात करवा सकता है.

बीबीसी की टीम ने उस कॉल के लिए करीब दो हफ्तों तक इंतज़ार किया. लेकिन आख़िरकार देर रात एक दिन बीबीसी की टीम का फोन बजा. कॉल पर जबल ने कहा, "हैलो. तो आप ब्रिटेन जाना चाहते हैं? आपको कितनी सीटें चाहिए? क्या आप तैयार हैं?"

उस कॉल और उसके बाद की दो फ़ोन बातचीत में, जबल ने बताया कि वो अभी भी तस्करी के धंधे में है. उसने बीबीसी की टीम को भरोसा दिलाया कि चैनल पार करने की यात्रा पूरी तरह से सुरक्षित रहेगी और उन्होंने सारा की मृत्यु के बाद से अपनी रणनीति में सुधार किया है.

"आप में से कितने लोग तैयार हैं?" उन्होंने पूछा, और कहा कि केले में मौसम अगले दिन पार करने के लिए साफ़ नहीं है. लेकिन बीबीसी को उस पहले कॉल के कुछ घंटों बाद, एक सोर्स से पता चला कि जबल हाल ही में जल्दबाज़ी में एंटवर्प से चला गया था.

दरअसल जबल को अप्रैल में नाव दुर्घटना में हुई पांच मौतों में उसकी भूमिका के चलते गिरफ़्तारी का डर सता रहा था, जिस वजह से वो भाग रहा था.

लक्ज़मबर्ग में छिपा हुआ था जबल

फिर बीबीसी के सोर्स ने जबल के फ़ोन से एक स्क्रीन ग्रैब शेयर किया. इसे एक बड़े, सफ़ेद टेंट के अंदर काले बिस्तरों की कतारों के साथ लिया गया था, जिस तरह की चीज़ें आप शरणार्थी शिविर में देख सकते हैं.

जब बीबीसी ने इंटरनेट पर इसी तरह की तस्वीरों की खोज की, तो लक्ज़मबर्ग में एक नए आधिकारिक शरणार्थी और प्रवासी स्वागत केंद्र के बारे में 2022 के एक लेख में एक बहुत ही करीबी और समान तस्वीर मिली. बीबीसी की टीम तुरंत ही वहां पहुंची.

लक्ज़मबर्ग एक एक छोटा देश है. शरणार्थियों और प्रवासियों के लिए इसका प्राइमरी रिसेप्शन सेंटर राजधानी के मॉडर्न एडमिनिस्ट्रेटिव सेंटर में है. लेकिन जबल यहां क्यों आया? शायद वह बस कुछ समय के लिए चुपचाप रहना चाहता था, या किसी नए नाम के तहत शरण के लिए आवेदन करना चाहता था.

लेकिन यह कैसे पता चलेगा कि वो यहां है भी? बीबीसी की टीम अंदर नहीं जा सकती थी. परिसर आम जनता के लिए बंद था, जिसमें एक एंट्री और एग्ज़िट प्वाइंट था जिस पर कम से कम चार निजी सुरक्षा गार्ड तैनात थे.

लक्ज़मबर्ग में उस पहली शाम फिर से महमूद नाम का प्रवासी बनकर बीबीसी के सहकर्मी ने जबल से फ़ोन पर बात करने में क़ामयाबी हासिल की. उसी दौरान बीबीसी का एक और सहकर्मी उसी परिसर के चारों ओर गाड़ी भी चला रहा था और थोड़ी-थोड़ी देर पर हॉर्न बजा रहा था.

बातचीत के दौरान बीबीसी की टीम तस्कर की तरफ से हॉर्न की आवाज़ को साफ़तौर पर सुन सकती थी. जिससे यह साफ़ हो गया कि जबल उस परिसर में मौजूद था.

लेकिन एक मुश्किल यह भी थी कि उसे इस तरह बाहर निकालना था ताकि उसे शक ना हो. अगर वह फिर से भाग जाता और टीम उसे ना देख पाती तो सारा कुछ फिर से शुरू करना पड़ता. इसीलिए बीबीसी की टीम ने तीन दिनों तक परिसर के एंट्री प्वाइंट की निगरानी की. अंत में बीबीसी की टीम ने तीसरे दिन लगभग दोपहर के तीन बजे से ठीक पहले जबल को एक प्रवासियों के एक समूह के साथ बाहर निकलते देखा. वह बाईं ओर मुड़ा, ट्राम स्टेशन की ओर बढ़ रहा था.

बीबीसी की टीम उसकी तरफ़ भागी. जब टीम उसके पास पहुंची तो उसने कहा, "यह मैं नहीं हूं, भाई. मुझे कुछ नहीं पता. तुम्हारी समस्या क्या है?"

वह चिंतित दिख रहा था, लेकिन उसने बिना टकराव दिखाए अपनी आवाज़ धीमी रखी, क्योंकि वह ट्राम स्टेशन की ओर वापस जा रहा था. बीबीसी की टीम ने सारा की एक तस्वीर निकाली, और उससे पूछा कि क्या वह सात वर्षीय बच्चे की मौत के लिए ज़िम्मेदार है. उसने फिर से इनकार में अपना सिर हिलाया.

बीबीसी की टीम ने क्यों किया तस्कर के मोबाइल पर फोन?

इसके बाद बीबीसी की टीम ने उसका फ़ोन नंबर डायल किया. वह इसे अनदेखा कर सकता था. वह चुपचाप ट्राम आने तक इंतज़ार कर सकता था. लेकिन जब टीम ने उसे अपना फ़ोन उठाने और उसे हमें दिखाने के लिए कहा, तो वह थोड़ा सा चौंक गया और फिर उसने अपना फोन दिखाया.

ज़्यादा करीब झुकने पर, टीम ने स्क्रीन देखी और वह फ़ोन नंबर देखा जिसका इस्तेमाल टीम यूके की एक छोटी नाव यात्रा आयोजित करने के लिए कई दिनों से उसे कॉल करने के लिए कर रही थी. अब उसकी पहचान को लेकर कोई शक नहीं था.

टीम से टकराव के बाद फ़्रांसीसी पुलिस को इसके नतीजों के बारे में बताया गया. फ़्रांसीसी पुलिस अप्रैल में हुई मौतों की जांच का नेतृत्व कर रही थी. उन्होंने कहा कि वे इस स्तर पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे.

वहीं, ब्रिटेन ने अपने समुद्र तट को सुरक्षित करने और पूरे यूरोप में मानव तस्करी नेटवर्क को ट्रैक करने और बाधित करने के लिए फ़्रांसीसी पुलिस की ओर से किए जा रहे प्रयासों को सहयोग और समर्थन देने के लिए तीन सालों में आधा बिलियन पाउंड खर्च करने का एलान किया है.

लेकिन फ़्रांसीसी सीमा पुलिस ने बीबीसी को बताया कि वे तस्करों की बढ़ती हिंसा से बहुत चिंतित हैं. हालांकि तस्कर गिरोहों के नेताओं को गिरफ्तार करने में कुछ सफलता का दावा करते हुए वरिष्ठ फ़्रांसीसी अधिकारियों ने निजी तौर पर सुझाव दिया कि आने वाले वक्त में यह समस्या ब्रिटेन की इमिग्रेशन और लेबर पॉलिसी पर निर्भर करेगी.

क्या कहते हैं सारा के पिता अहमद

सारा का जीवित परिवार जिसमें उसके पिता अहमद, मां नूर, 12 वर्षीय बहन राहफ़ और नौ वर्षीय भाई हुसाम - उत्तरी फ़्रांसीसी शहर लिली के बाहर एक छोटे से गांव में प्रवासियों के लिए निर्धारित एक अस्थायी हॉस्टल में रह रहे हैं.

बच्चों के पास स्कूल जाने की कोई सुविधा नहीं है, और उन्हें सर्दी के बाद फ़्रांस में रहने का कोई अधिकार नहीं है.

राहफ़ ने बीबीसी को बताया, "मैं हर किसी की तरह एक सामान्य जीवन चाहती हूं. मैं बहुत कुछ मिस कर रही हूं. मैं इंग्लैंड में स्कूल जाना चाहती हूं क्योंकि वहां मेरी चचेरी बहन है. वह मेरी उम्र की है. मुझे अपने दोस्तों की याद आती है."

अहमद फ़्रांसीसी पुलिस के संपर्क में हैं, जिसने मौतों की अपनी जांच के हिस्से के रूप में उसे कई संदिग्ध तस्करों की तस्वीरें दिखाई हैं.

अहमद ने पहले दावा किया है कि तस्कर के पास जाना ही उसका आख़िरी विकल्प था. भले ही अहमद का यह दावा सच हो या झूठ, पर उसका कहना है कि उसने एक कठोर सबक सीखा है.

अहमद ने बीबीसी से कहा,"ये लोग लालची हैं. उन्हें सिर्फ़ पैसे की परवाह है. मुझे उम्मीद है कि हमें न्याय मिलेगा. हम सभी को. मेरी बेटी की मौत बेकार नहीं जानी चाहिए."

(फ़ेरास कवाफ़ और कैथी लॉंग की अतिरिक्त रिपोर्टिंग)

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