ग्रीस नाव हादसा: पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के एक गांव में पसरा मातम

उमरदराज़ नंगियाना

बीबीसी उर्दू, मीरपुर

मोहम्मद अय्यूब को पता है कि उनके भाई उस नाव पर सवार थे लेकिन अब तक उनकी पहचान न तो मरने वालों में हुई है और न ही वो उन बारह पाकिस्तानी नागरिकों में शामिल हैं जो ज़िंदा बच गए थे.

नाव को डूबे कई दिन बीत चुके हैं लेकिन फिर भी मोहम्मद अय्यूब को उम्मीद है कि शायद… शायद कोई चमत्कार हो गया हो और उनके भाई मोहम्मद यासिर अब भी ज़िंदा हों.

हालांकि उन्हें ये भी पता है कि उनके गांव बंडली से जो दो लड़के ज़िंदा बचे लोगों में शामिल हैं, वो यह बता चुके हैं कि जब नाव उलटी तो उनके गांव के बाक़ी 26 लड़के भी उनके साथ ही नाव में सवार थे.

इसके बाद वह कहां गए, गांव के उन दो जीवित बचे लड़कों को नहीं मालूम. वो तो ख़ुद समुद्र में कूद गए थे जहां से यूनानी कोस्ट गार्ड्स ने उनकी जान बचाई.

यूनान में नाव डूबने के हादसे के बाद अब तक लगभग 78 लोगों की लाश निकाली जा चुकी है. जानकारी मिली है कि उस नाव पर 700 से अधिक लोग सवार थे. पाकिस्तान सरकार का कहना है कि वो अपने 200 से ज़्यादा नागरिकों की पहचान कर चुकी है.

क्या है मामला?

  • पिछले हफ़्ते ग्रीस के तट के पास शरणार्थियों को ले जा रही एक नाव डूब गई
  • संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि क़रीब पांच सौ लोग अभी भी लापता हैं
  • नाव पर पाकिस्तान के भी सैकड़ों लोग सवार थे
  • 78 लोगों की लाश निकाली जा चुकी है

लेकिन मोहम्मद अय्यूब ने अपनी आंखों से अपने सबसे छोटे भाई की लाश नहीं देखी और अब तक उन्हें वह बुरी ख़बर भी नहीं मिली जो शायद वह जानते हैं, मगर सुनना नहीं चाहते लेकिन उनके लिए इस ख़बर का इंतज़ार भी कठिन है.

वह कहते हैं, "पता तो चले कि वह ज़िंदा है या नहीं. अगर नहीं तो उसकी लाश तो हमें मिल जाए ताकि हम उसे दफ़न कर सकें."

मोहम्मद अय्यूब से ज़्यादा यह इंतज़ार मोहम्मद यासिर की पत्नी के लिए जानलेवा है जिन्होंने अपनी एक साल की बेटी को गोद में उठा रखा है.

उनका बड़ा बेटा तीन साल का है जो घर के आंगन में दूसरे बच्चों के साथ खेल रहा है. उसको यह भी मालूम नहीं कि घर के बाहर लगे शामियाने के नीचे लोग क्यों आकर बैठ रहे हैं.

बंडली पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के ज़िला कोटली में पाकिस्तान और भारत की सीमा यानी लाइन ऑफ़ कंट्रोल के बिल्कुल नज़दीक स्थित है.

पहाड़ों से सटे छोटे बड़े घरों वाले बंडली गांव के आसपास कई और गांव भी हैं.

क्यों लिया यूरोप जाने का फ़ैसला?

यहां से भारत प्रशासित कश्मीर में बने घरों को भी देखा जा सकता है.

बंडली और उसके आसपास बने घरों में कुछ बहुत बड़े हैं और आधुनिक निर्माण की झलक दिखाते हैं. उन्हें देखकर लगता है कि वहां रहने वाले ख़ुशहाल होंगे लेकिन कुछ घर ऐसे भी हैं जो दो या तीन कमरों वाले हैं और उनमें दो- दो और तीन- तीन परिवार रहते हैं.

उनकी हालत से महसूस होता है कि उनमें रहने वाले लोग बहुत ख़ुशहाल नहीं.

मोहम्मद अय्यूब का घर भी ऐसे ही घरों में से एक है. वह चार भाई और दो बहने हैं. मोहम्मद यासिर उनमें सबसे छोटे भाई थे. उनके पास उनके पास केवल पांच कनाल खेती की ज़मीन है जिससे गुज़र-बसर होना मुमकिन नहीं है.

चारों भाइयों को मेहनत मज़दूरी करनी पड़ती है तो घर चलता है. घर की बाहरी दीवार के पास खड़े मोहम्मद अय्यूब ने बताया कि हालात इतने ज़्यादा ख़राब हो गए थे कि उनसे तंग आकर उनके भाई मोहम्मद यासिर ने यूरोप जाने का फ़ैसला किया था.

"क्या करते, भूख से मर रहे थे. मज़दूरी कभी मिलती है, कभी नहीं मिलती, और जो मिलती है उससे गुज़र-बसर नहीं होता। महंगाई इतनी अधिक हो गई है कि घर का ख़र्च चलाना भी मुश्किल हो गया है."

ख़तरनाक़ रास्ता

मोहम्मद अय्यूब के भाई मोहम्मद यासिर के सामने ऐसे उदाहरण थे जब उनके गांव बंडली के बहुत से लोग विदेश गए और फिर उनके हालात बेहतर हुए.

उन्हें भी यही रास्ता नज़र आया लेकिन यह रास्ता बहुत ख़तरनाक था. इसमें मानव तस्करों की मदद से ग़ैर क़ानूनी तौर पर यूरोप पहुंचने की कोशिश करनी थी.

इस कोशिश में हवाई सफ़र के बाद उन्हें अफ़्रीकी देश लीबिया जाना था जहां से उन्हें अफ़्रीका, एशिया और यूरोप के बीच स्थित भूमध्य सागर के पानी में एक बहुत ही छोटी सी नाव में सफ़र करना था जो आमतौर पर क्षमता से कहीं अधिक भरी होती है.

इससे पहले भी बहुत सी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें भूमध्य सागर को पार करके यूरोप पहुंचने की कोशिश में ऐसी नावें उलट गई और सैकड़ों लोग मारे गए.

इसके बावजूद एक माह दस दिन पहले मोहम्मद यासिर ने मानव तस्करों की मदद से यह सफ़र करने के लिए घर छोड़ा और इसमें वह अकेले नहीं थे.

उनके गांव के कई युवक इस ख़तरनाक सफ़र के लिए या तो कुछ दिन पहले ही निकल चुके थे या उनके साथ जा रहे थे और कुछ बाद के दिनों में उनके पीछे आने वाले थे.

भूमध्य सागर में यूनान के जल क्षेत्र में डूबने वाली नाव में बंडली गांव के 20 से अधिक लोगों के सवार होने की सूचना है.

'सारा किया धरा एजेंट का है'

गांव के उन्हीं लोगों में 26 साल के साजिद असलम भी शामिल थे. उन्होंने इंटरमीडिएट तक शिक्षा प्राप्त की थी लेकिन इसके बाद से पिता के साथ हाथ बंटाने के लिए पास के शहर खोई रत्ता में अपनी दुकान पर काम करते थे.

उनकी छोटी बहन अरीबा असलम बीए की छात्रा हैं जिन्हें अब तक विश्वास नहीं हो रहा कि उनके भाई शायद अब कभी वापस ना आ सकेंगे.

वह बात करने के लिए पूरी हिम्मत जुटाने के बावजूद जब बोलने लगीं तो फूट-फूट कर रोने लगीं.

"मेरे पिता ब्लड प्रेशर के मरीज़ हैं. हम दो बहनें पढ़ रहे हैं. वह हमारे घर का सहारा था. अब हम क्या करेंगे?"

अरीबा को बेबसी के साथ बहुत ग़ुस्सा भी है. उनका ग़ुस्सा मानव तस्करों पर है जो उनके "भाई को धोखे में रख कर ले गए."

वो कहती हैं कि यह सारा किया धरा एजेंटों का है.

अरीबा कहती हैं, "उन्होंने मेरे भाई को सब्ज़ बाग़ दिखाए. वह अपने बेहतर भविष्य के लिए यूरोप की ओर गए और अपनी जान की बाज़ी हार गए."

ये कहते ही वह फिर फूट-फूट कर रोने लगीं. उनके साथ बैठे उनके पिता राजा मोहम्मद असलम उन्हें दिलासा देने की कोशिश करते रहे.

राजा मोहम्मद असलम कहते हैं कि उनके परिवार से बहुत से लड़के पहले भी इसी तरह मानव तस्करों की मदद से यूरोप जाने की कोशिश कर चुके थे और कुछ वहां पहुंच भी चुके थे. उनके गांव के बहुत से लड़के भी इसी रास्ते से गए थे.

ख़ुद साजिद असलम के कुछ रिश्तेदार भाई एक से अधिक बार ऐसी कोशिश कर चुके थे.

मानव तस्कर से कैसे हुआ संपर्क?

राजा मोहम्मद असलम कहते हैं कि यह स्मगलर अधिकतर उन्हीं क्षेत्रों के होते हैं जिन्हें सब जानते हैं. वह युवाओं को सपना दिखाते हैं कि बिना वीज़े के भी यूरोप जाना मुमकिन है और वहां जाकर उनकी ज़िंदगी बदल जाएगी.

"मैंने अपने बेटे को बहुत समझाया कि यह बहुत ख़तरनाक रास्ता है लेकिन वह ज़िद पर अड़ा था. इसके साथ ही, मुझे यह भी डर था कि अगर मैंने उसको ज़्यादा रोका या पैसे न दिए तो वह घर से भागकर भी यह क़दम उठा लेगा."

बंडली निवासी मोहम्मद अय्यूब के साथ थोड़ा अलग मामला था. उनके भाई मोहम्मद यासिर ने परिवार से मशवरा कर यह फ़ैसला किया था. फिर उन्होंने किसी मानव तस्कर एजेंट से संपर्क किया जो रावलपिंडी में रहता था. मोहम्मद यासिर के अलावा उस एजेंट से उनके घर के किसी और सदस्य की कभी मुलाक़ात नहीं हुई थी.

"उसके साथ बस फ़ोन पर ही संपर्क था. मैंने उसे कभी नहीं देखा. केवल मेरे भाई को ही जानकारी थी कि वह उससे कैसे मिला."

राजा मोहम्मद असलम कहते हैं कि ये एजेंट अलग समूहों में काम करते हैं.

वो बताते हैं, "यहां के एजेंट का काम केवल यहां से लोगों को तैयार करना, पैसे लेना और उन्हें अगली मंज़िल की तरफ़ रवाना कर देना होता है. आगे दूसरे एजेंट होते हैं और फिर लीबिया पहुंचने के बाद बड़े एजेंट मिलते हैं."

मोहम्मद यासिर और साजिद असलम भूमध्य सागर तक कैसे पहुंचे?

मोहम्मद अय्यूब ने बीबीसी को बताया कि उनके भाई ने लगभग एक महीने पहले परिवार वालों से अंतिम मुलाक़ात की और वह बंडली से इस्लामाबाद रवाना हो गए.

इस्लामाबाद से एजेंट ने उन्हें टिकट देकर जहाज़ पर बैठाया. उसी टिकट पर उन्हें इस्लामाबाद से लीबिया तक सफ़र करना था और रास्ते में जहाज़ को पहले दुबई और फिर मिस्र में रुकना था. साजिद असलम का सफ़र भी बिल्कुल ऐसा ही था.

साजिद के रिश्तेदार भाई वसीम अकरम ने बीबीसी को बताया कि मिस्र से लीबिया जाने के लिए एजेंट ने उन्हें परमिट दिया था जो फ़र्ज़ी होता है और इस पर लीबिया में प्रवेश ग़ैर क़ानूनी होता है.

"लेकिन लीबिया में सरकार जैसी कोई चीज़ तो है नहीं इसलिए वहां जाना आसान होता है और इसीलिए सारे एजेंट लीबिया को ही चुन रहे हैं."

मोहम्मद अय्यूब कहते हैं कि जब उनके भाई मोहम्मद यासिर लीबिया पहुंच गए और उन्होंने वहां से फ़ोन पर जानकारी दी तो फिर एजेंट के साथ समझौते के अनुसार उन्होंने 22 लाख रुपये (लगभग सवा छह लाख भारतीय रुपये) की रक़म एजेंट को भिजवा दी.

इतनी बड़ी रकम उन्होंने अलग-अलग रिश्तेदारों और दोस्तों से उधार ली थी.

उन्हें लग रहा था कि जब उनके भाई यूरोप पहुंचकर कमाना शुरू कर देंगे तो वह सभी लोगों को रक़म वापस कर देंगे लेकिन अब वह यह कैसे कर पाएंगे, उन्हें नहीं मालूम.

लीबिया पहुंचने पर क्या होता है?

मोहम्मद अय्यूब कहते हैं कि लीबिया पहुंचकर बस इंतज़ार होता रहा कि कब नाव तैयार हो और कब उस पर सवार होकर यूरोप की ओर यात्रा शुरू करें. इस इंतज़ार के दौरान उनके भाई को बहुत मुश्किल दिन भी गुज़ारने पड़े.

"एक दिन उसने फ़ोन किया और बताया कि उन्होंने मुझे खाने के लिए तीन-चार दिन से कुछ नहीं दिया. मैं तो बिल्कुल कमज़ोर हो गया हूं, क्या करूं. इसके बाद हमने यहां एजेंट से संपर्क किया और उससे कहा कि यह क्या हो रहा है. ऐसे हालात हैं तो उसको वापस भेज दो या आगे यूरोप भेजो. आख़िर तुमने पैसे लिए हैं, 22 लाख रुपए लिए हैं!"

इसके दो दिन बाद ही मोहम्मद यासिर की नाव पर जाने की बारी आ गई. उन्होंने अपने परिवार वालों को बताया, "आज मैं जा रहा हूं, मैं नाव में बैठ गया हूं."

साजिद असलम भी उसी नाव पर सवार हो गए थे. वह भी एजेंट को 22 लाख रुपये अदा करके आ रहे थे. उनकी अपनी बहन अरीबा असलम से फ़ोन पर बात हुई थी.

"उन्होंने बताया था कि वह तीन दिन बाद यूरोप पहुंच जाएंगे लेकिन जब सात दिन बीत गए और उनसे संपर्क नहीं हुआ तो हमें डर लगने लगा कि कुछ गड़बड़ है."

भूमध्य सागर में क्या हुआ?

मोहम्मद अय्यूब और राजा मोहम्मद असलम कहते हैं कि आमतौर पर इस तरह की यात्रा में तीन दिन ही लगते थे जिनमें लोग लीबिया से यूरोप पहुंच जाते थे. जिस नाव पर राजा मोहम्मद असलम के बेटे सवार हुए थे उसको लीबिया से निकले तीन दिन से अधिक बीत चुके थे. उनका अपने बेटे से कोई संपर्क नहीं था.

उन्होंने पाकिस्तान में मौजूद एजेंट को फ़ोन किया और पता करने की कोशिश की कि उनका बेटा कहां है. "वह पहले तो टालमटोल करते रहे कि आज फ़लां फ़लां जगह पर हैं, कल यूरोप के जल क्षेत्र में चले जाएंगे लेकिन फिर एक दिन उन्होंने अपने फोन बंद कर दिए."

इसके बाद यूनान से राजा मोहम्मद असलम के किसी रिश्तेदार ने उनको ख़बर दी कि पाकिस्तान छोड़ लीबिया के रास्ते यूरोप जाने वालों को ले जा रही नाव हादसे का शिकार हो गई है और वह डूब गई है.

इसके बाद और ख़बरें आनी शुरू हो गईं. केवल 80 के लगभग लोगों की जान बचाई जा सकी थी जिनमें सिर्फ़ 12 पाकिस्तानी शामिल थे. उनमें से दो का संबंध बंडली से भी था लेकिन वह मोहम्मद यासिर और साजिद असलम नहीं थे.

मोहम्मद अय्यूब और राजा मोहम्मद असलम के परिवारों को एक हल्की सी उम्मीद थी कि शायद उनके प्यारे उस नाव में सवार ही नहीं हुए हों लेकिन बंडली के दो जीवित बच जाने वालों ने अपने संदेशों में बताया कि वे उनके साथ ही नाव में सवार हुए थे.

उनके अनुसार बंडली से संबंध रखने वाले 28 लोग उस नाव में सवार थे.

"जो भी होना है, अब जल्दी हो जाए"

मोहम्मद अय्यूब ने अब भी पूरी तरह उम्मीद नहीं छोड़ी लेकिन वह कहते हैं कि इंतज़ार की तकलीफ़ सहना अब उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है.

"अगर हमारा भाई ज़िंदा नहीं भी तो कम से कम हमें उसकी लाश मिल जाए ताकि हम उसे दफ़न कर पाएं."

वह कहते हैं कि जो बातें मालूम हैं उनसे ऐसा लगता है कि उनके भाई के ज़िंदा बच जाने की उम्मीद कम है लेकिन वह जब तक ख़ुद अपनी आंखों से देख नहीं लेते वह उम्मीद क़ायम ही रखेंगे लेकिन अधिकारियों का कहना है कि जो पाकिस्तानी अब तक 'लापता' हैं उन्हें वापस लाने में वक़्त लगेगा.

मीरपुर के कमिश्नर चौधरी शौकत अली ने बीबीसी को बताया कि उनके डिविज़न से लगभग 23 ऐसे लोग हैं जिनके बारे में पक्की ख़बर है कि वह नाव में सवार थे. उनमें से केवल दो ज़िंदा बचाए गए. बाक़ी लोगों के जीवित बचने की संभावनाएं न होने के बराबर हैं.

उनका कहना है कि सरकार की ओर से जल्द ही प्रभावित परिवारों के लोगों के डीएनए के नमूने जमा किए जाएंगे. यह नमूने यूनान भिजवाए जाएंगे जहां मुर्दा हालत में मिलने वालों के साथ उनको मैच किया जाएगा.

"अगर डीएनए मैच हो जाते हैं तो फिर उनकी लाशों को पाकिस्तान लाने का काम शुरू होगा."

इन सभी कामों में कई दिन लग सकते हैं. उस वक़्त तक मोहम्मद अय्यूब और राजा मोहम्मद असलम समेत लगभग 20 से अधिक परिवार बेबसी, मायूसी और एक मद्धिम सी उम्मीद के धागे से बंधे रहेंगे.

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