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कनाडा की इमिग्रेशन पॉलिसी क्या बाकी देशों के लिए मॉडल बन सकती है?- दुनिया जहान
तेरह देशों के 29 लोगों के लिए कनाडा का राष्ट्रीय ध्वज दिवस यानि 15 फरवरी 2022 यादगार बन गया. इस दिन से उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई.
राष्ट्रीय ध्वज दिवस के दिन उन लोगों को वीडियो कॉल के ज़रिये कनाडा की राष्ट्रीयता की शपथ दिला कर नागरिकता प्रदान की गई. नए नागरिकों ने कनाडा का राष्ट्रगीत भी सुना. समारोह में कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो भी शामिल हुए और समारोह 35 मिनट तक चला.
कनाडा में लोगों की कमी है और काम करने वालों की भी कमी है. इस समस्या से निपटने के लिए कनाडा ने 2025 तक कुशल रोज़गार करने वाले आप्रवासियों की संख्या प्रति वर्ष पांच लाख से बढ़ाने का लक्ष्य रखा है. कुशल श्रमिकों की किल्लत की समस्या से कनाडा ही नहीं बल्कि और भी देश जूझ रहे हैं.
बाकी देशों को भी कनाडा का इमिग्रेशन मॉडल या इमिग्रेशन पॉलिसी नीति अपनानी चाहिए?
जितने अधिक उतना बेहतर
टोरंटो मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी में अप्रवास और एकीकरण शोध केंद्र की अध्यक्ष एना ट्रिएनडीफ़िलाडू कहती हैं, "ऐसा समझा जाता है कि अप्रवासी देश में नए कौशल, नए टैलेंट और नई परंपराएं और विविधता लाते हैं. तो जितने ज़्यादा लोग और जितनी अधिक विविधता उतना बेहतर होता है."
भूभाग के हिसाब से कनाडा, रूस के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है लेकिन कनाडा की आबादी केवल तीन करोड़ आठ लाख है.
भौगोलिक दृष्टि से कनाडा अलग-थलग है और उन क्षेत्रों से दूर है जहां अस्थिरता और आर्थिक समस्याएं ज्यादा हैं. इस वजह से कनाडा अप्रवास को नियंत्रित कर सकता है और तय कर सकता है कि देश में किसे बसाया जाए.
कनाडा में इमिग्रेशन का इतिहास लंबा है. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 1947 में कनाडा ने अपने इमिग्रेशन कानून में बदलाव किया और काम करने के लिए विदेशियों को लाना शुरु किया था ताकि अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण हो सके.
इसके बाद 1960 के दशक में कनाडा ने अंकों पर आधारित इमिग्रेशन पॉलिसी या पॉइंट बेस्ड इमिग्रेशन मॉडल अपनाया. ऐसा करने वाला कनाडा पहला देश बना.
एना कहती हैं, "यह मानव संसाधन आधारित व्यवस्था है. अगर आपकी आयु 35 या उससे कम है तो कुछ अंक मिलेंगे. अगर अंग्रेज़ी और फ्रेंच आती है तो उसके भी अंक मिलेंगे. आप के भाई या बहन कनाडा में हैं तो उसके अंक मिलेंगे, अगर आप के पास कनाडा में काम करने का अनुभव है तो उसके कुछ और अंक मिलेंगे."
कनाडा में अप्रवासन के लिए विदेशों से आवेदन किया जाता है और सबसे अधिक अंक पाने वालों को कनाडा आकर स्थायी निवासी बनने के लिए आमंत्रित किया जाता है. नागरिकों के कनाडा पहुंचते ही यह प्रक्रिया शुरू हो जाती है.
एना ट्रिएनडीफ़िलाडू बताती हैं कि ये एक नियंत्रित व्यवस्था है. लेकिन स्थायी निवासी का दर्जा पाने पर भी मतदान का अधिकार नहीं मिलता जो कि राजनीतिक अधिकार है.
वो कहती हैं, "तीन साल तक स्थायी निवासी रहने के बाद आप कनाडा की नागरिकता पाने के लिए आवेदन कर सकते हैं. इस दर्जे के तहत आपके परिवार के सदस्य भी आकर आप के साथ रह सकते और उनका अंग्रेज़ी या फ्रेंच जानना भी आवश्यक नहीं होता. आपके पति या पत्नी को वर्क परमिट भी मिलता है. यूरोपीय देशों की दृष्टि से यह अजीब है."
साल 2025 तक पंद्रह लाख लोगों को देश में बसने के लिए आमंत्रित करना कनाडा का लक्ष्य है. यानि हर साल पांच लाख लोगों को आमंत्रित करना जो कनाडा की मौजूदा योजना का हिस्सा है.
एना कहती हैं कि प्रधानमंत्री ने 2018 में तीन सालों में बारह लाख लोगों को लाने की घोषणा की थी. लेकिन कोरोना महामारी की वजह से इसमें दिक्कत आयी और अब वो लक्ष्य प्राप्त करने के लिए इसे बढ़ा कर सालाना पांच लाख कर दिया गया है.
ये संख्या केवल स्थायी निवास का दर्जा पाने के लिए है. इसके अलावा चिकित्साकर्मियों, या कृषि श्रमिकों के लिए भी आप्रवास योजना में तजवीज है.
इनमें से कई लोग कालांतर से स्थायी निवास का अधिकार प्राप्त कर लेते हैं.
न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर में भी अंक आधारित अप्रवास योजना है लेकिन कनाडा उनसे अलग है क्योंकि कनाडा में स्थायी निवासी के तौर पर आने से पहले वहां पहले से नौकरी होना आवश्यक नहीं है.यानि वहां पहुंच कर ख़ुद नौकरी खोजनी पड़ती है.
कनाडा में बेरोज़गारी की दर केवल पांच प्रतिशत है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि लोगों को वहां पहुंचते ही नौकरी मिल जाएगी. लेकिन डॉक्टर, चिकित्साकर्मी और आईटी इंजीनियरों के लिए नौकरियां अधिक हैं.
एना ट्रिएनडीफ़िलाडू कहती हैं कि कनाडा के पड़ोसी देश अमरीका और दुनिया में कई जगह जैसे ब्राजील और भारत में भी दक्षिणपंथी ताकतें प्रभावी है और नस्लवाद की समस्या है.
वो कहती हैं, "ऐसा नहीं कि यह समस्या कनाडा में नहीं है. लेकिन वहां लोग इससे अवगत हैं और इस समस्या का हल निकालना चाहते है. यहां भी ज़मीनी सच्चाई आदर्श तो नहीं है."
ज़िंदगी और मौत का सवाल
कई देशों में जनसंख्या वृद्धि दर और जीवन प्रत्याशा में बदलाव आ रहे हैं और श्रम बाज़ार पर इसका असर पड़ रहा है. कनाडा में भी ऐसा देखा जा रहा है.
ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र और जनसांख्यिकी की प्रोफ़ेसर मेलिंडा मिल्स कनाडा में इस बदलाव के कारणों के बारे में कहती हैं कई देशों में चिकित्सा व्यवस्था बेहतर हुई है और लोगों के खानपान में सुधार आया है जिससे अब लोगों की जीवन प्रत्याशा बढ़ गयी है मगर वहीं कई देशों में जनसंख्या वृद्धि दर भी कम हुई है.
वो कहती हैं, "महिलाएं अब अधिक शिक्षित होने लगीं हैं और नौकरियां करने लगी हैं. इसके साथ ही कई देशों में बच्चों की देखरेख की व्यवस्था मौजूद नहीं है, पू्र्व एशिया और यूरोप के कई देशों मे मकानों की किल्लत है. तो इसके कई ढांचागत कारण हैं."
जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट की एक वजह राजनीतिक भी है. 1980 के दशक में चीन ने जनसंख्या नियंत्रण नीति लागू की. जिसके अंतर्गत एक परिवार में केवल एक ही बच्चे की अनुमति दी गयी थी. 30 साल तक इस नीति को जारी रखा गया लेकिन साल 2015 में इसे समाप्त कर दिया गया. लेकिन इसके बाद भी वहां जन्म दर में कोई ख़ास उछाल नहीं देखा गया.
चीन को लेकर इस मुद्दे पर मेलिंडा कहती हैं, "चीन का मामला रोचक है. उसकी आबादी बहुत बड़ी है. लेकिन बूढ़ी होती आबादी की जगह नई आबादी के लिए जन्म दर कम से कम 2.1 प्रतिशत होनी चाहिए."
"जब कि चीन का वर्तमान जन्म दर 1.16 है इसलिए उसकी आबादी में बुजुर्गों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है. वहीं आबादी के मामले में भारत चीन से आगे निकल गया है. कई देशों की आबादी घटने जा रही है."
वो आगे कहती हैं,"2050 तक जर्मनी की आबादी पांच प्रतिशत और चीन की आबादी सात प्रतिशत घटने का अनुमान है. वहीं इटली की आबादी 12 प्रतिशत और जापान की आबादी 16 प्रतिशत तक घट सकती है. लातविया और लिथुआनिया जैसे बाल्टिक क्षेत्र की आबादी 20 प्रतिशत तक घटने का अनुमान है. इसका इन देशों पर गहरा असर पड़ेगा."
लोगों की जीवन अवधि में वृद्धि और जन्म दर में गिरावट से जो स्थिति पैदा हुई है उसने कई देशों को चौका दिया है. मेलिंडा मिल्स कहती हैं अब काम करने वालों की किल्लत हो गयी है. स्वास्थ्य सेवाओं में कमी आ रही है. इसलिए कई देश अपनी नीतियों पर पुनर्विचार कर रहे हैं और समाधान के लिए अप्रवास के बारे में भी सोच रहे हैं. लेकिन कई देशों में आबादी तेज़ी से बढ़ भी रही है.
मेलिंडा कहती हैं कि पाकिस्तान, फ़िलीपीन्स और कई अफ़्रीकी देशों में जैसे मिस्र, तंज़ानिया और कोंगो में आबादी तेज़ी से बढ़ रही है और वहां युवा आबादी ज्यादा है.
वो कहती हैं, "नाइजीरिया की आबादी सालाना 3.6 प्रतिशत की तेज़ी से बढ़ रही है. फ़िलहाल उसकी आबादी 20 करोड़ है और अनुमान है कि 2050 तक वो 40 करोड़ हो जाएगी."
"एक तरफ़ जहां आबादी बूढ़ी हो रही है और वहीं दुनिया के दूसरे हिस्सों में शिक्षित और प्रशिक्षत युवा आबादी बड़ी संख्या में मौजूद हैं तो हमें अपने देश की सीमाओं के बारे में और अप्रवास के बारे में नए सिरे से सोचना होगा."
देश और विदेश
लोग अपना देश छोड़ कर विदेशों का रुख़ क्यों करते है इसपर वाशिंगटन डीसी स्थित काउंसिल ऑफ़ फॉरेन रिलेशंस के सीनियर फेलो और अफ़्रीकी मामले के विशेषज्ञ एबेनज़ेर ओबाडारे कहते हैं कि लोग कई कारणों से विदेश जा कर बसते हैं.
वो कहते हैं, "अपने देश में हो रहे राजनीतिक उत्पीड़न और असुरक्षा या आर्थिक चिंता की वजह से लोग देश छोड़ देते हैं. इन लोगों को आर्थिक प्रवासी कहा जाता है. इनमें से ज्यादातर लोग अठारह से तीस साल से बीच की उम्र के होते हैं. ये लोग अपनी काबिलियत के चरम पर होते हैं. ये लोग प्रतिभाशाली होते हैं. इनमें कौशल और रचनात्कता होती है और उद्यमी भी होते हैं."
जब प्रतिभशाली और अनुभवी युवा अपना देश छोड़ देते हैं तो इसका उस देश पड़े असर को लेकर एबेनज़ेर कहते हैं कि जिस देश के युवा देश छोड़ देते हैं उसके लिए देश के अत्यावश्यक और महत्वपूर्ण संसाधन की चोरी हो जाने जैसा है.
वे कहते हैं, "इससे पैदा होने वाली कमी की क्षतिपूर्ति बहुत मुश्किल है. इसका उस देश की राजनिति, तकनीकी विकास, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा संस्थानों पर बहुत बुरा असर पड़ता है. हर साल लगभग बीस हज़ार अकादमिक लोग अफ़्रीका छोड़ते हैं. उन देशों की इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है."
देश की प्रतिभा वहीं रहकर काम करे और लोगों को पर्याप्त अवसर अपने ही देश में ही मिल जाएं. किसी भी देश को अपने प्रतिभा को बाहर जाने रोकने के लिए ज़रुरी कदम उठाने को लेकर एबेनज़ेर ओबाडारे कहते है कि अगर वे नीति निर्माता होते तो वो कोशिश करते कि देश में अच्छी शिक्षा व्यवस्था बने. युवाओं को अच्छी शिक्षा प्राप्त करने और अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल करने के पर्याप्त अवसर मिले.
वो आगे बताते हैं कि, "बहुत से लोग इंग्लैंड या अन्य देशों में इसलिए नहीं जाते क्यों कि वहां ढांचागत सुविधाएं नाइजीरिया से बहुत बेहतर हैं. बल्कि इसलिए जाते हैं क्योंकि ये सुविधाएं पाने के लिए वहां उतनी परेशानी नहीं होती जितनी उनके अपने देश में होती है."
एबेनज़ेर ओबाडारे कहते हैं कि ये समस्या अभी इतनी बड़ी नहीं लगती क्योंकि सरकार सोचती है अगर चंद हज़ार लोग चले भी जाते हैं तो भी पीछे काफ़ी लोग हैं. लेकिन वो आगाह करते हैं कि अफ़्रीका की आबादी आनेवाले तीस सालों में अस्सी करोड़ से एक अरब तक पहुंच जाएगी और प्रतिभाशाली लोगों का अप्रवासन इसी स्तर पर चलता रहा तो आने वाले सालों में बड़ी समस्या खड़ी हो जाएगी.
यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि अगर अफ़्रीकी सरकारों ने इस समस्या का समाधान नहीं किया तो भविष्य में उनके सामने बड़ी समस्याएं होंगी.
वो आगे कहते हैं, "हमें चाहिए कि इन सरकारों की जवाबदेही तय करें. उनसे पूछा जाए कि क्यों आपके प्रतिभाशाली लोग देश छोड़ रहे हैं. युवाओं को रोज़गार देने के लिए क्या सहायता चाहिए? इन सरकारों के प्रशासन के तरीकों की निगरानी और जवाबदेही होनी चाहिए. आम अफ़्रीकी लोग भी और यही चाहते हैं.
कनाडा की नकल
बर्लिन स्थित रॉबर्ट बॉश फ़ाउंडेशन में वरिष्ठ प्रवास शोधकर्ता जेसिका बायथर का मानना है कि जनसांख्यिकी के अनुमान के अनुसार आने वाले सालों में कई देशों को कुशल कर्मचारियों और श्रमिकों की किल्लत का सामना करना पड़ेगा.
वो कहती हैं, "इस किल्लत को कम करने के लिए देशों को अपनी आबादी को बेहतर प्रशिक्षण दे कर उनके कौशल को बढ़ाना होगा. लेकिन इसके बावजूद कई क्षेत्रों में प्रवासी श्रमिकों की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी."
जर्मनी में श्रमिकों और कर्मचारियों की बड़ी किल्लत है. इसके साथ ही वहां जन्म दर लगातार गिर रही है और आबादी का बड़ा हिस्सा बूढ़ा हो रहा है.
एक अनुमान के अनुसार आर्थिक रूप से अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता को बरकरार रखने के लिए जर्मनी को सालाना चार लाख प्रवासी कर्मचारियों की ज़रुरत है.
जेसिका बायथर कहती हैं कि इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जर्मनी की नयी गठबंधन सरकार ने अपने आप्रवास नियमों में व्यापक सुधार किए हैं ताकि आसानी से आप्रवासी श्रमिकों को जर्मनी आने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके. कई दशकों में पहली बार इतनी उदार नीति अपनायी गयी है.
जेसिका के अनुसार, जर्मनी में नए नियमों के अंतर्गत आप्रवास की प्रक्रिया को आसान बनाया गया है.
वो कहती हैं, "पहले के मुकाबले श्रमिकों को लाने के लिए आवश्यक न्यूनतम वेतन को कम किया गया है. इसके साथ ही आप्रवासियों के लिए जर्मनी की नागरिकता प्राप्त करने के न्यूनतम अवधि को आठ वर्ष से घटा कर पांच वर्ष कर दिया गया है और कुछ मामलों मे यह तीन वर्ष भी किया गया है."
ज़रूरत के बावजूद टार्गेट नहीं हो रहा पूरा
जिन देशों के सामने यह समस्या है उनकी संख्या बढ़ रही है और समाधान दूर लग रहा है. जेसिका कहती हैं कि कई देश प्रशिक्षित श्रमिकों की किल्लत का सामना कर रहे है.
"हंगरी इमिग्रेशन के पक्ष में नहीं रहा है वहां भी निर्माण क्षेत्र, आईटी क्षेत्र, होटल उद्योग में प्रशिक्षित कामगारों की भारी किल्लत है जिसकी वजह से देश में अस्थायी वर्क परमिट बढ़ा दिए गए हैं ताकि वियतनाम और अन्य देशों से श्रमिक आ सकें."
लेकिन उदार नीतियों के बावजूद इन देशों को इमिग्रेशन के अपने लक्ष्य को पाने में दिक्कत हो रही है.
जेसिका बायथर कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि जर्मनी आने के लिए लोगों में होड़ लगी हो. फिर भाषा की समस्या होती है.
वो बताती हैं कि, "ऐसी रिपोर्टें भी हैं कि जो लोग आए हैं वो जर्मनी छोड़ कर वापस जा रहे हैं क्योंकि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भाषा की अड़चन के अलावा उन्हें नस्लवादी भेदभाव झेलना पड़ता है या वो इस समाज में सहज महसूस नहीं करते."
जेसिका आगे कहती हैं, "जर्मन सरकार कई कदम उठा रही ताकि अप्रवासी जर्मन समाज में घुलमिल जाएं. उन्हें जर्मन भाषा सिखाई जा रही है. मगर आप्रवास के बिना इन देशों को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा."
कई देश कनाडा की तरह उदारवादी इमिग्रेशन पॉलिसी को अपनाते दिख रहे हैं. लेकिन कनाडा का इमिग्रेशन मॉडल क्या सभी के लिए अनुकूल होगा?
कनाडा का विशाल भूभाग और बेरोज़गारी की दर में कमी और आम लोगों का अप्रवास नीति को समर्थन जो अन्य देशों के पास नहीं है. तो जवाब सीधा है- कनाडा की हो या किसी और की लेकिन एक अप्रवासन नीति सभी देशों में लागू नहीं हो सकती.
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