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सुरेंद्रन पट्टेल: कैसे बने केरल के बीड़ी मज़दूर अमेरिका में जज
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
सुरेंद्रन के. पट्टेल केवल उन पलों में थोड़ा झिझके, जब मैंने उनसे पूछा कि आर्थिक तंगहाली के दिनों में भी उन्होंने क़ानूनी पेशा ही क्यों चुना?
इस सवाल के जवाब में उन्होंने बताया, "मैंने ये बात किसी से नहीं शेयर की है. जब मैं 13 साल का था तब मैंने अपनी सबसे बड़ी बहन को खो दिया था. यह अब भी मुझे परेशान करती है. मुझे लगता है कि उस मामले में न्याय नहीं हुआ है. उसे आत्महत्या बताया गया था लेकिन इसके पीछे एक बड़ा कारण था. मुझे कभी नहीं लगा कि इस मामले में न्याय हुआ है."
पट्टेल ने अपने हाई स्कूल की पढ़ाई के दिनों में बीड़ी बनाने का काम भी किया. वे इसकी वजह बताते हैं, "ताकि हमलोग एक दिन में तीन बार भोजन कर सकें."
इस तंगहाली के बीच पहले वे केरल में वकील बने फिर सुप्रीम कोर्ट में भी प्रैक्टिस की और उसके बाद अमेरिका चले गए.
अब अमेरिका में उनकी एक पहचान है. वे टेक्सस की 240वीं डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज हैं.
उन्होंने अपने पद की शपथ इसी एक जनवरी को ली है. अमेरिका के जाने के महज पांच सालों के भीतर उन्होंने ये उपलब्धि हासिल की.
पट्टेल आठवीं कक्षा में थे जब उनकी बहन का देहांत हो गया और वो अपने पीछे एक 15 महीने की बेटी छोड़ गईं थीं.
उनकी बहन, छह बच्चों के परिवार की सबसे बड़ी संतान थीं, तीन भाई और तीन बहनें. इनके निरक्षर मां-बाप केरल के कासरगोड ज़िले में दिहाड़ी मज़दूरी करते थे.
क्यों अपनाईवक़ालत?
इस घटना के कुछ साल बाद डिग्री कोर्स से पहले पट्टेल ने फ़ैसला किया, "न्यायिक व्यवस्था ही वह क्षेत्र है जहां मुझे होना चाहिए और क़ानूनी पेशा ही मेरी नियति होगी. मैंने हमेशा वकील बनने का सपना देखा. मैंने कभी कुछ और करना नहीं चाहा, यह मेरे लिए भावानात्मक पहलू बन गया था."
पट्टेल को ठीक-ठीक याद नहीं है कि बीड़ी बनाने से उन्हें कितनी कमाई होती थी. वे बताते हैं, "बहुत ही कम पैसे थे. निजी कंपनी के लिए प्रति हज़ार बीड़ी रोल करने के लिए मज़दूरी मिलती थी. मैं और मेरी बड़ी बहन देर रात तक बैठे-बैठे बीड़ी बनाते थे. मैंने अपना हाई स्कूल पास किया था लेकिन अच्छे अंक नहीं आए. हाई स्कूल के बाद, मैंने पढ़ाई छोड़ दी."
लेकिन यही वो साल था जब अपने भविष्य को लेकर उनका नज़रिया बदला. जब उन्होंने काम करना शुरू किया तो उन्हें शिक्षा की अहमियत का एहसास हुआ.
वे इसके बाद लापरवाह छात्र नहीं रहे. उन्होंने प्री-डिग्री पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया, रात में काम करते हुए और सप्ताह के आख़िरी दिनों में खेती किसानी में मज़दूरी करते हुए भी उन्होंने अध्ययन के प्रति अपने दृढ़ संकल्प को कायम रखा.
लेकिन पहले साल कम उपस्थिति के चलते उन्हें फ़ाइनल परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी गई.
उसने अपने शिक्षकों से परीक्षा में शामिल होने की अनुमति मांगी. उन्होंने बताया, "मैं उन्हें यह नहीं बताना चाहता था कि मैं अपनी आर्थिक तंगहाली के कारण क्लास में शामिल नहीं हो पाया था. ऐसा नहीं है कि मैं ये नहीं चाहता था कि किसी को मेरी स्थिति के बारे में पता चले. लेकिन मैं सहानुभूति नहीं चाहता था. बाद में, निश्चित रूप से, शिक्षकों को मेरे दोस्तों के माध्यम से पता चला."
सफलता के लिए संघर्ष
वे परीक्षा में ना केवल शामिल हुए बल्कि जब नतीजे घोषित हुए तो शीर्ष दो छात्रों में शामिल होकर उन्होंने सभी को चौंका दिया. यह कोझिकोड़ लॉ कॉलेज की दिशा में उनका पहला क़दम था. उन्होंने बताया, "मैं मालाबार पैलेस होटल के मालिक के पास गया, जिसे मिस्टर उथुप्प के नाम से जाना जाता था."
"मैंने उनसे कहा कि अगर आपने मुझे नौकरी नहीं दी तो मुझे अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी. अगर आपने मुझे नौकरी दी तो इससे मुझे वकील बनने में मदद मिलेगी. उन्होंने मेरी मदद करने का फ़ैसला किया और मैं उनके होटल में हाउसकीपिंग करने वालों में शामिल हो गया."
इसके बाद उथुप्प के निधन तक दोनों एक दूसरे के संपर्क में रहे. पट्टेल ने उथुप्प के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक केस भी लड़ा.
वो याद करते हैं, "मेरे जज बनने की ख़बर फैलने के बाद उनके भाई मैनुएल का फ़ोन आया था. मुझे लगता है कि वे सभी बहुत उत्साहित हैं कि उनका एक हाउसकीपिंग बॉय अमेरिका में जज बन गया है."
हालांकि मैनुएल अल्लापलाथिंगल को उन दिनों में पट्टेल से मिलना याद नहीं है जब वे उनके होटल में काम करते थे. वे कहते हैं, "मेरे भाई ने बहुत से लोगों की मदद की. सुरेंद्रन के इस स्तर तक पहुंचने की उम्मीद किसी को नहीं थी. मैंने उन्हें बधाई देने के लिए फ़ोन किया था."
लॉ में करियर का सफ़र
क़ानून की डिग्री हासिल करने से पहले पट्टेल ने 1992 में राजनीति विज्ञान में डिग्री हासिल की. क़ानून की डिग्री हासिल करने के चार साल बाद, वह होसदुर्ग में वकालत की प्रैक्टिस के लिए वकील पी. अप्पुकुट्टन की टीम में शामिल हो गए.
अप्पुकुट्टन ने बीबीसी से बताया, "वह इतना उत्साही था कि मैंने उस पर भरोसा किया. मैंने उसे सभी प्रकार के नागरिक मामले सौंपे क्योंकि वह उन सबको निपटाने में सक्षम था. उसके बारे में बलाल गांव के मेरे कुछ क्लाइंट्स ने भी बताया था, तब मैंने उसका आकलन किया था."
पट्टेल ने एक दशक तक अप्पुकुट्टन के साथ काम किया लेकिन जब उनकी पत्नी सुभा को दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में नौकरी मिल गई तो वे उनके साथ दिल्ली आए गए. पट्टेल नहीं चाहते थे कि अपनी पत्नी के करियर की राह में वे रोड़ा बनें. इसलिए वे खुद भी दिल्ली आ गए.
यहां सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने उनके एक दशक लंबे अनुभव को देखते हुए अपना जूनियर नियुक्त करने से इनकार कर दिया लेकिन उन्हें अपने चैंबर से थोड़े समय तक काम करने की अनुमति दे दी.
एक साल के अंदर ही पट्टेल की पत्नी को अमेरिका में नौकरी मिल गई. वो बताते हैं, "उनकी वजह से मैं यहां तक पहुंच पाया हूं. उन्हें यहां नियुक्ति मिली थी. मैं अपने पेशे को छोड़कर खुश नहीं था लेकिन मैं उनके साथ अमेरिका आ गया. उनके बिना यहां तक नहीं पहुंच पाता."
2007 में ह्यूस्टन, टेक्सस आने के बाद पट्टेल ने एक किराने की दुकान में काम किया. तभी उन्हें पता चला कि सिर्फ़ सात साल के अनुभव के साथ वह टेक्सस प्रांत में बार में प्रवेश के लिए परीक्षा दे सकते हैं.
इसके बाद ही उन्होंने इंटरनेशनल लॉ में एलएलएम का कोर्स किया. उन्होंने बताया, "भारत और अमेरिका दोनों ब्रिटिश राष्ट्रमंडल क़ानून का पालन करते हैं. बुनियादी बातें एकसमान हैं और क़ानून को समझना मुश्किल नहीं है."
अमेरिका में कैसी मिली सफलता
इसके बाद पट्टेल ने अपने से उम्र में बड़े स्थानीय वकील ग्लेंडेन बी. एडम्स के साथ काम किया. उस अनुभव के बारे में उन्होंने बताया, "हम क़रीब हो गए थे. जब वह बीमार पड़ते थे तो मैं अस्पताल में उनसे मिलने जाया करता था. जब उनकी मृत्यु हुई, तो उनकी पत्नी रोसेली एडम्स ने मुझे बताया कि वह मुझे अपना तीसरा बेटा मानते थे और कहते थे कि मुझे उनके ताबूत को कंधा देने वालों (पाल बियरर) में से एक होना चाहिए."
पाल बियरर बन जाने पर क्या नाते रिश्तेदारों की भौहें नहीं उठीं, यह पूछे जाने पर पट्टेल ने कहा, "हाँ. कुछ रिश्तेदार हैरान थे लेकिन उनकी पत्नी ने उन सबको हमारे ख़ास रिश्ते के बारे में बताया. लेकिन उन लोगों को अचरज हो रहा था कि यह ब्राउन आदमी पांच गोरे लोगों के साथ पाल बियरर के रूप में क्यों है. लेकिन कोई समस्या नहीं हुई थी. यह मेरे लिए सम्मान और सौभाग्य की बात है. जब मैं जज बना तो उनकी क़ब्र पर गया और कहा 'हमने यह कर दिखाया.'"
पट्टेल ने बताया कि बुधवार को रोजली एडम्स कोर्ट रूम में उनको रोब पहनाएंगी.
जब हमने पट्टेल से ये पूछा कि क्या उन्हें अमेरिका में कभी यह महसूस हुआ कि वे गोरे नहीं हैं, तो उनका जवाब था, "यह आबादी के छोटे तबके के लिए एक मुद्दा है. आम लोगों के लिए कोई मुद्दा नहीं है. अगर ऐसा होता तो मैं जज के तौर नहीं चुना जाता. नस्लवाद मौजूद है. हमने काफ़ी दूरी तय की है और काफ़ी दूरी तय करना बाक़ी है.
"लेकिन साथ ही यह देखिए कि मेरे साथ क्या हुआ. मैं 2017 में यहां का नागरिक बना था और अब 2022 में महज पांच साल बाद मैंने चुनाव जीता है. मुझे विश्वास है कि ऐसा किसी अन्य देश में नहीं होगा."
कैसे चलाया अभियान?
पट्टेल जिस काउंटी में जज के रूप में चुने गए हैं, वहां के बारे में बताते हैं, "यहां 35 प्रतिशत आबादी गोरों की है जबकि, 25 प्रतिशत काले लोग रहते हैं. 24 प्रतिशत लोग स्पेनिश मूल के हैं जबकि केवल 20 प्रतिशत एशियाई हैं.
यह एक विविधतापूर्ण देश है और अधिकांश लोग एक भारतीय मूल के अमेरिकी को डिस्ट्रिक्ट जज के रूप में स्वीकार करते हैं. नस्लवाद से जुड़ी समस्याएं मौजूद हैं लेकिन समाज सक्षम लोगों को समुदाय की सेवा करने वाले लोगों को स्वीकार भी करता है."
चुनावी अभियान के दौरान पट्टेल की आलोचना उनके उच्चारण के लिए की गई, लेकिन उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि इससे उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ है.
उन्होंने बताया, "मुझे इसकी उम्मीद थी. कई बार अभियान में बुरे अनुभव भी हो सकते हैं. लेकिन मैंने शुरुआत में ही तय कर लिया था कि मैं किसी भी तरह का नकारात्मक प्रचार नहीं करूंगा. मैंने मीडिया के सामने सवाल रखा. हमारा काउंटी अमेरिका में सबसे विविधतापूर्ण काउंटी नहीं है. इसलिए, यदि कोई उच्चारण को बर्दाश्त नहीं कर सकता है तो एक अच्छा जज विविधतापूर्ण आबादी की सेवा कैसे कर सकता है?"
"मुझे लगता है कि बड़े पैमाने पर लोगों ने फ़ैसला किया कि आप यहां कब से रह रहे हैं, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, आपने कितने समय तक समुदाय की सेवा की है, इससे भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, मुझे लगता है इन बातों से फ़र्क़ पड़ा."
आख़िरकार, कड़ी मेहनत और दृढ़ लगन के अलावा किन चीज़ों ने आपकी मदद की?
पट्टेल कहते हैं, "यह एक अच्छा सवाल है. कड़ी मेहनत, दृढ़ संकल्प के सामने बहुत संघर्ष और चुनौतियां हैं. लेकिन उन चुनौतियों के सामने बहुत सारे लोगों ने मेरी सहायता की, जीवन के प्रत्येक स्टेज पर मेरी मदद की. मुझे लोगों ने आज़ादी से काम करने दिया. हाई स्कूल में भी कोई पाबंदी नहीं थी और फिर जब मैंने केरल में प्रैक्टिस शुरू की, तब भी."
"मेरे किसी सीनियर ने मुझे कभी किसी केस से नहीं रोका. आज मैं जो भी हूं, उसमें मेरे दोस्तों और मेरे शिक्षकों की भूमिका रही है, उन्होंने मेरे व्यक्तित्व को आकार दिया. भारत में मेरे जीवन के दौरान, मेरी मां ने मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया था. वह त्याग की प्रतिमूर्ति थीं."
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